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ये 3 तस्वीरें अफगानिस्तान का एक अलग चेहरा आपके सामने उकेरकर रख देंगी!

मशहूर अमेरिकी फ़ोटोग्राफ़र सैली मेन का एक कथन है –

Photographs open doors into the past, but they also allow a look into the future.

तस्वीरें सिर्फ़ अतीत का दरवाज़ा नहीं खोलतीं, बल्कि वे भविष्य की झलक भी दिखलाती हैं.

आजकल दुनिया का पहिया अफ़ग़ानिस्तान के इर्द-गिर्द घूम रहा है. हम भी चर्चा करेंगे, अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास की सबसे मशहूर तस्वीरों के बारे में.

घोड़े पर सवार उस हताश ब्रिटिश सर्ज़न की कहानी जानेंगे, जिसने अफ़ग़ानिस्तान की मिट्टी की तासीर दशकों पहले बता दी थी. उस ‘अफ़ग़ान गर्ल’ की कहानी क्या है, जो 80 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान के हालात का प्रतीक बन गई थी? बामियान में बुद्ध की मूर्ति उड़ाए जाने का क़िस्सा, जिसने तालिबानी शासन का सच उघाड़ दिया था. इसके अलावा, बात करेंगे अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात पर. वहां क्या कुछ नया चल रहा है? सबसे पहले ये तस्वीर देखिए. इसमें एक सैनिक घोड़े पर बैठा दिख रहा है. उसका चेहरा पीछे की तरफ झुका हुआ है. घोड़े की हालत भी बेहद ख़राब दिख रही है. ऐसा लगता है, मानो वो किसी भी पल दम तोड़ देगा.

Ramnants Of Enemy
रेमनेंट्स ऑफ़ एन आर्मी.

आपने तस्वीर को गौर से देख लिया, अब इसके पीछे की कहानी जानते हैं. ये तस्वीर असल में एक पेंटिंग है. इसे बनाया था, ब्रिटिश पेंटर एलिज़ाबेथ थॉम्पसन ने. साल 1879 में. दूसरे ब्रिटिश-अफ़ग़ान वॉर के दौरान. हालांकि जिस कहानी को उन्होंने अपनी पेंटिंग का आधार बनाया, वो 37 साल पहले घट चुकी थी. पहले ब्रिटिश-अफ़ग़ान युद्ध के समय.

क्या थी वो कहानी?

ये तब की बात है, जब भारत पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का राज चल रहा था. 18वीं सदी में रूसी साम्राज्य भी अपनी सीमा का विस्तार करने में जुटा था. ब्रिटेन को एक डर बहुत दिनों से सता रहा था. अगर रूस ने अफ़ग़ानिस्तान को अपने काबू में कर लिया, तो वो भारत तक भी पहुंच सकता है. ब्रिटेन ने अपने बचाव के लिए आक्रमण का रास्ता चुना. 1838 में ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया. उसने काबुल में कठपुतली सरकार और सेना भी बिठा दी. ब्रिटेन ने अफ़ग़ान कबीलों का भरोसा जीतने के लिए खूब पैसा भी खर्च किया. लेकिन उन्हें वहां से कुछ हासिल नहीं हो रहा था. उल्टा, ब्रिटेन के ख़िलाफ़ विद्रोह बढ़ने लगा.

ब्रिटिश इंडिया के अकाउंट डिपार्टमेंट्स ने लिखा,

‘अगर इसी तरह छह महीने और चला, तो भारत में हमारा खज़ाना पूरी तरह खाली हो जाएगा.’

इस पर लंदन से हुक़्म आया कि खर्च में कटौती की जाए. कबीलाई नेताओं को पैसा देने की बजाय लोकल लोगों की आर्मी बनाओ. जब वो मज़बूत हो जाए तो हम वहां से वापस लौट आएंगे. कबीलों को दी जा रही मदद बंद कर दी गई. इससे लोग अचानक से नाराज़ हो गए. उन्हें अपनी ज़मीं पर विदेशी शासन वैसे ही पसंद नहीं था. ब्रिटिश राज के इस फ़ैसले ने आग को और भड़का दिया था. इसके बाद कबीलों ने ब्रिटेन के ख़िलाफ़ जिहाद का बिगुल फूंक दिया.

रेमनेंट्स ऑफ़ एन आर्मी

मशहूर इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल एक और घटना का ज़िक्र करते हैं. नवंबर 1841 की बात है. ब्रिटिश ऑफ़िसर अलेक्जेंडर बर्न्स को एक अफ़ग़ान लड़की से प्यार हो गया. उसने उसे अपने घर में रख लिया. वो लड़की एक अफ़ग़ान की ग़ुलाम थी. अफ़ग़ान को लगा कि उसका अहंकार लुट गया. ये ख़बर जब गावों में फैली तो माहौल अचानक से बदल गया.

आनन-फानन में ब्रिटिश एजेंट सर विलियम मैक्नाथन ने सुरक्षित बाहर जाने देने का समझौता किया. लेकिन अफ़ग़ानों ने मैक्नाथन की हत्या कर दी. अपने दो-दो अधिकारियों की हत्या के बाद ब्रिटेन को हालात का अंदाज़ा हो चुका था. 06 जनवरी 1842 को ब्रिटेन ने वापसी के लिए कूच किया. ब्रिटिश आर्मी की एक टुकड़ी जलालाबाद में मौजूद थी. काबुल से 150 किलोमीटर दूर. लेकिन मौसम खराब होने की वजह से ये लोग वहां पहुंच नहीं पा रहे थे.

उधर, काबुल में हालात इतने खराब हो चुके थे कि रुकना मुनासिब नहीं था. 06 जनवरी को सोलह हज़ार पांच सौ लोगों का काफ़िला काबुल से निकला. इनमें से साढ़े चार हज़ार सैनिक थे. बाकी लोग सैनिकों की सेवा के लिए लाए गए थे. ब्रिटेन ने सुरक्षित वापसी का समझौता किया तो था. लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं थी. और, फिर आशंका सच हो गई. अफ़ग़ान कबीलों ने काफ़िले को घेरकर जोरदार हमला किया. कई लोग तो ठंड के चलते मर गए.

जलालाबाद में ब्रिटिश आर्मी काबुल से आ रहे मेहमानों के स्वागत की तैयारी कर रही थी. एक हफ़्ते बाद वहां एक हताश सैनिक पहुंचा. उसके गले पर तलवार के निशान थे. हाथ भी कटा हुआ था. उसका घोड़ा मरियल स्थिति में था. उसका नाम था, विलियम ब्रायडन. वो ब्रिटिश आर्मी में असिस्टेंट सर्ज़न के पद पर काम कर रहा था.

जलालाबाद में मौजूद ब्रिटिश कमांडर ने पूछा,

‘बाकी सेना कहां है?’

ब्रायडन ने हताश लहजे में कहा,

आई एम दी आर्मी. यानी मैं इकलौता ही बचा हूं.

उसी विलियम ब्रायडन की कहानी को एलिज़ाबेथ थॉम्पसन ने अपनी पेंटिंग में आकार दिया. उन्होंने इसका नाम रखा, ‘रेमनेंट्स ऑफ़ एन आर्मी’. एक सेना के अवशेष. हालांकि, अगले कुछ दिनों में कई और लोग भी बचकर निकल आए. लेकिन ये संख्या एक सौ के आस-पास थी. साढ़े सोलह हज़ार में से एक सौ. आप इस घटना की वीभीषिका का अंदाज़ा लगा सकते हैं. इस घटना ने उस समय की महाशक्ति ब्रिटेन का मनोबल तो चकनाचूर किया ही. साथ में अफ़ग़ानिस्तान की मिट्टी की तासीर भी बयां कर दी थी.

अफगानी लड़की की कहानी

आज हम जिस दूसरी तस्वीर की चर्चा करेंगे. वो है, ‘अफ़ग़ान गर्ल’ की. रेफ़्यूज़ी कैंप में रहनेवाली सुर्ख आंखों वाली 12 साल की लड़की, जो जुलाई 1985 में मशहूर पत्रिका ‘नेशनल जियोग्राफ़िक’ के कवर पर छपी. इस तस्वीर को क्लिक किया था, जाने-माने फ़ोटोग्राफ़र स्टीव मैक्करी ने. इसको इतिहास की सबसे चर्चित तस्वीरों में से गिना जाता है. इसकी तुलना लियोनार्डो डा विंची की मोनालिसा वाली पेंटिंग से भी की जाती है.

Afghan Girl
अफगान लड़की

स्टीव मैक्करी ने ये तस्वीर दिसंबर 1984 में खींची थी. उस समय अफ़ग़ान-सोवियत वॉर चल रहा था. लाखों की संख्या में लोग विस्थापित थे. उनके पास खाने तक के लिए कुछ नहीं था. मैक्करी वॉर कवर करने आए ugS थे. उन्होंने पेशावर में नासेर बेग कैंप के पास चल रहे स्कूल में बच्चों की आवाज़ सुनी. उन्होंने टीचर से बच्चों को देखने की इजाज़त मांगी. तभी, उन्हें वहां ये ऐतिहासिक तस्वीर मिल गई. लेकिन उस कमरे में भीड़ और शोर इतना ज़्यादा था कि उन्हें बच्ची का नाम पूछने तक का मौका नहीं मिला.

मैक्करी बताते हैं कि उस तस्वीर के छपने के बाद काफी बदलाव हुआ. लोग रेफ़्यूजी कैंप्स में मदद के लिए आने लगे. अफ़ग़ान लोगों के दर्द की तरफ दुनिया का ध्यान गया. नेशनल जियोग्राफ़िक ने अफ़ग़ान बच्चों की मदद के लिए एक फंड भी बनाया. ये तस्वीर फ़ेमस तो खूब हुई, लेकिन उस लड़की का पता 18 बरस बाद चला. 2002 में. उसका नाम था, शरबत गुला. उस वक़्त तक उसकी शादी हो चुकी थी.

तस्वीर पर तर्क

‘अफ़ग़ान गर्ल’ की तस्वीर पर पक्ष और विपक्ष दोनों तरह के तर्क दिए जाते हैं. एक पक्ष कहता है कि वो तस्वीर अफ़ग़ानिस्तान के गर्व, आत्म-सम्मान और जीजिविषा को दर्शाती है.

दूसरे पक्ष का मानना है कि असल में वो लड़की गुस्से में थी. पश्तून समाज में महिलाओं को चेहरा दिखाने की इजाज़त नहीं होती. वो भी गैर-मर्द और गैर-मुस्लिम के सामने तो कतई नहीं. स्टीव मैक्करी पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने गुस्से के भाव को कुछ और बताकर प्रचारित किया. इसके चलते शरबत गुला को बाद में कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ा.

बामियान के बुद्ध

तीसरी तस्वीर है, बामियान में स्थित बुद्ध की दो प्रतिमाओं की. जिसे तालिबान ने 2001 में बम से उड़ा दिया था. बुद्ध की ये प्रतिमाएं कम-से-कम 15 सौ बरस पुरानी थीं. इन्हें पहाड़ को काटकर बनाया गया था. उस समय, इनका शुमार दुनिया की सबसे ऊंची बुद्ध मूर्तियों में किया जाता था.

Bamiyan Buddha
बामियान के बुद्ध.

साल 2001. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान 1.0 के शासन का अंतिम साल था. उस समय तक तालिबानियों की कट्टरता और बढ़ती जा रही थी. फ़रवरी महीने में तालिबान ने बुद्ध की प्रतिमाओं को उड़ाने का ऐलान किया. ये उनकी कट्टर नीति का नतीजा था. पूरी दुनिया में इसकी निंदा हुई. यहां तक कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी उन प्रतिमाओं को बख़्शने की अपील की. भारत ने ऑफ़र दिया कि वो उन प्रतिमाओं को अपने यहां शिफ़्ट कर सकता है. लेकिन तालिबान ने किसी की नहीं सुनी.

उनका ध्यान मूर्तिभंग से ज़्यादा उसके प्रदर्शन पर था. एक दिन तालिबानी लड़ाके मूर्ति के सामने इकट्ठे हुए. पहले तो उन्होंने मन भर गोलियां बरसाईं. इससे भी मूर्तियां नहीं टूटीं तो उन्होंने दोनों को बम लगाकर उड़ा दिया.

इस घटना के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं. एक तो ये कि इस्लाम में मूर्ति-उपासना की व्यवस्था नहीं है. इसलिए, वो गैर-मुस्लिमों को सबक सिखाना चाहता था. एक तर्क ये दिया जाता है कि तालिबान पर लादेन का प्रभाव बढ़ रहा था. इसलिए, उसके कहने पर तालिबान ने इस घटना को अंज़ाम दिया.

तालिबान का अलग तर्क

एक दिलचस्प तर्क तालिबान की तरफ से आया था. मुल्ला उमर का एक सलाहकार था, रहमतुल्लाह. उसने अंदर की कहानी बताई थी कि कैसे तालिबान ने उन मूर्तियों को उड़ाने का फ़ैसला लिया.

विध्वंस से कुछ हफ़्ते पहले की बात है. यूएन की तरफ से बार-बार चेतावनी दी जा रही थी कि अफ़ग़ानिस्तान में दस लाख से अधिक लोग भूख की वजह से मर सकते हैं. अफ़ग़ानिस्तान लंबे समय से युद्ध, सूखे और देह कंपाने वाली ठंड से जूझ रहा था. उसी समय विदेश से एक डेलीगेशन आया. उन्होंने तालिबान को बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को ठीक कराने का प्रस्ताव दिया. इसके लिए वे लोग करोड़ों खर्च करने के लिए तैयार थे. तालिबान ने कहा कि आप ये पैसे लोगों के खाने पर खर्च कर दीजिए. उन लोगों ने इस प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया. उनका कहना था कि पैसे सिर्फ़ मूर्ति के लिए हैं, लोगों के लिए नहीं.

इससे नाराज़ होकर तालिबान ने मूर्ति को उड़ाने का फ़ैसला किया था. ये वर्ज़न तालिबान का है. एक बात है कहते हैं ना. अगर आप कुछ नया बना नहीं सकते तो आपके पास कुछ बिगाड़ने का हक़ भी नहीं है.


कंगना के इंस्टा अकाउंट हैक का क्या है तालिबान कनेक्शन?

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