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भारत में गरीबों की कीमत पर लोग अमीर क्यों हो रहे हैं?

1990 के दशक ने इस देश में कई चीज़ें स्थाई रूप से बदल दी थी. फिर चाहे राजनीति की बात हो या अर्थव्यस्था की या फिल्म इंडस्ट्री की. नाइनटीज़ में बहुत कुछ हुआ. हम पैदा हुए. अयोध्या में ढांचा गिराया गया, बंबई के धमाके हुए, केंद्र की सरकार ने देश की आर्थिक नीतियों में आमूल चूल बदलाव किए. हमने आर्थिक उदारीकरण की नीतियां अपनाईं. यानी कई उद्योगों को सरकार के दखल से मुक्त कर निजीकरण के हवाले किया. इसका असर भी हमारी अर्थव्यस्था पर दिखने लगा. और तब अखबार, सरकार और कारोबार से जुड़े लोग एक मध्यम वर्ग उभरने की खूब चर्चा किया करते थे.

उद्योग बढ़ेंगे तो नौकरियां बढ़ेंगी, लोगों की आमदनी बढ़ेगी, उनकी खरीदने की क्षमता बढ़ेगी, मतलब मध्यम वर्ग का दायरा बढ़ेगा. और ऐसा हुआ भी. उदारीकरण के बाद आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी की रेखा से निकल कर मध्यम वर्ग वाले ब्रेकेट की तरफ बढ़ा. क्योंकि मध्यम वर्ग आबादी का बड़ा हिस्सा था. इसलिए चुनावी मेनीफेस्टो से लेकर बजट की घोषणाओं तक में मध्यम वर्ग का प्रभाव दिखने लगा. लेकिन अब जाकर हमें ये रियलाइज़ हो रहा है कि जिस उदारीकरण को हम गरीबी मिटाने का हथियार मान रहे थे. वो समाज में बड़ी आर्थिक खाई पैदा करने लगा है. मुट्ठीभर अमीर और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं. जबकि गरीब और निम्न मध्यम वर्ग वाले अब उदारीकरण के फेर में पिसते दिख रहे हैं.

अमीर गरीब के बीच खाई की ये बातें हम हवा हवाई नहीं कह रहे हैं.एक नया सर्वे आया है, जिसमें कई चौंकाने वाले नतीजे मिले हैं. हम में ज्यादातर लोग, कमाई वाले स्तंभ बहुत नीचे आते हैं, उनकी कमाई क्यों घटती जा रही है, ये सर्वे इसके जवाब तलाशने की कोशिश करता है.

एक बड़ी पुरानी कहावत है. अमीर और अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब.

फिल्मों से लेकर नुक्कड़ पर होने वाली चर्चा तक, इसका इस्तेमाल खूब होता आया है. अब इस कहावत को अगर एक दावा मान लें, तो उसकी काट के लिए दूसरे दावे भी पेश किए जाते हैं. विकास के दावे. बदलाव के दावे. अच्छे दिन के दावे. लेकिन दावों का क्या है, मुंह खोलिए और दावा ठोंक दीजिए. इतने भर से वो सही नहीं हो जाता.

तो कैसे सही होता है? डेटा से. हिंदी में कहें तो आंकड़ों की शक्ल में ठोस जानकारी. जब किसी बात के साथ डेटा दिया जाता है, तब दावे से सत्य तक की यात्रा की शुरुआत होती है. और अब जो डेटा हमारे सामने आया है, वो पहले दावे को ही मज़बूत कर रहा है – अमीर, और अमीर होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब.

मुंबई में एक थिंक टैंक है People’s Research on India’s Consumer Economy (PRICE). इसने एक सर्वे किया है ICE 360 सर्वे 2021. यहां 360, ज्यामिती का 360 है. 360 डिग्री वाला. इस सर्वे की रिपोर्ट अब आ गई है. और इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में सबसे गरीब 20 फीसदी लोगों की आय पिछले 5 सालों में आधी से भी कम हो गई है. माने सौ रुपिया जेब में था, तो अब 50 भी नहीं है.

इस रिपोर्ट की जानकारी हमें मिली इंडियन एक्सप्रेस अखबार में छपी संदीप सिंह की रिपोर्ट से. अंग्रेज़ी समझ लेते हैं, तो इस रिपोर्ट को आप ज़रूर पढ़ें. ये आपको आर्थिक उदारीकरण से लेकर कोरोना से बचाव के नाम पर लगाई गई पाबंदियों और उसके बाद राहत पैकेज को लेकर सरकार ने जो बड़े बड़े दावे किए थे, उन सबको एक अलग नज़र से देखने का मौका देगी. हम आगे जो बातें बताएंगे, वो संदीप सिंह की रिपोर्ट और प्राइस की वेबसाइट पर ICE360 को लेकर दी गई जानकारी पर आधारित है.

ICE360 सर्वे सिर्फ ये नहीं कह रहा है कि गरीबों की आय आधी हुई है. वो ये भी कह रहा है कि इन्हीं पांच सालों के दौरान भारत में सबसे अमीर 20 फीसदी परिवारों की आय 39 फीसदी बढ़ गई है. पिछले पांच सालों में आखिर ऐसा क्या हुआ कि गरीबों के हाथ से पैसा निकलता गया और अमीरों की तिजोरी भरती गई, इसपर आएंगे, लेकिन पहले ज़रूरी है कि हम ये समझें कि ये सर्वे तैयार कैसे किया गया है. ताकि दर्शक इन दावों और आंकड़ों के वैज्ञानिक आधार का भी अनुमान लगा सकें.

सर्वे को पिछले साल यानी 2021 के अप्रैल से लेकर अक्टूबर के बीच किया गया। सर्वे दो राउंड में हुआ। पहले राउंड में 2 लाख घरों और फिर दूसरे राउंड में 42 हजार घरों को कवर किया गया। और इस दौरान 25 राज्यों और यूनियन टेरिटरीज़ के 100 जिलों में सर्वे टीम्स गईं. इन 100 ज़िलों में 120 कस्बों और 800 गावों को शामिल किया गया. दोनों राउंड्स में ग्रामीण और शहरी – दोनों तरह के इलाकों से जानकारी इकट्ठा की गई. जानकारी कौनसी, ये हमें PRICE की वेबसाइट पर मालूम पड़ा –

पहली जानकारी थी घरों की आर्थिक सेहत. इसमें आय, खर्च, बचत, निवेश और कर्ज़ जैसी चीज़ें शामिल थीं.

सर्वे के लिए एक्सपेंडीचर मैप भी बनाए गए. ये देखा गया कि खर्च में रूटीन वाली चीज़ें कौनसी थीं और बिना रूटीन वाली कौनसी. रूटीन में आप मकान के किराए को रख सकते हैं, नॉन रूटीन में अचानक सामने आना वाला खर्च, जैसे किसी बीमारी के दौरान होने वाला खर्च.

ये भी मालूम किया गया कि परिवारों के आय के स्रोत क्या हैं. कौन नौकरी करता है. कैसी करता है – पक्की या फिर कॉन्ट्रैक्ट पर. सैलरी वाला मामला है या दिहाड़ी वाला.

इसके बाद देखी गई क्वालिटी ऑफ लिविंग. माने घर में टीवी-फ्रिज जैसा कितना सामान है.

इसके बाद ये देखा गया कि सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुंच है या नहीं. मसलन सड़क, बस या कल्याणकारी योजनाएं.

इस सर्वे में भारत की आबादी को आय के आधार पर पांच कैटेगरी में बांटा गया है. हर कैटेगरी में 20 फीसद लोग. पूअरेस्ट, लोअर मिडिल, मिडिल, अपर मिडिल और रिचेस्ट. इसीलिए सर्वे में सबसे गरीब 20 फीसदी और सबसे अमीर 20 फीसदी के बीच पैदा होती खाई की बात नज़र आती है.

सर्वे को मोटा हिसाब तो हमने आपको बता दिया. सबसे गरीब 20 फीसदी लोगों की कमाई 2015-16 की तुलना में 2020-21 में 53 फीसदी घट गई थी. और इसी दौरान सबसे अमीर 20 फीसदी लोगों की कमाई 39 फीसदी बढ़ गई थी. अब कुछ और बारीक ऑब्ज़र्वेशन्स की चर्चा करते हैं.

पहला बिंदू जुड़ता है आर्थिक उदारीकरण की नीति से. 1995 के बाद से सबसे गरीब 20% भारतीय परिवारों की सालाना आय लगातार बढ़ रही थी. माने गरीब लोगों के हाथ में पैसा पहुंच रहा था. उसपर अब ब्रेक लग गया है. और गाड़ी रिवर्स गियर में चली गई है. पूरी रफ्तार से उलटी दिशा में चल रही है. पूरी रफ्तार वाली बात हमने जुमले में नहीं कही है. 2005 से 2016 तक सबसे गरीब 20 फीसदी परिवारों की आय हर साल 9.9 फीसदी की दर से बढ़ रही थी. कुल बढ़त रही 183 फीसद. और 2016 से 2021 के बीच ये सारी बढ़त बेमानी हो गई.

ऐसा क्यों हुआ है, उसका एक कारण जो सभी जानते हैं, वो है कोरोना लॉकडाउन. कोरोना एक नए तरह की चुनौती थी. कोई नहीं जानता था कि इससे निपटने का सबसे कारगर तरीका क्या है. लॉकडाउन जैसे सख्त कदम

के पक्ष में ये तर्क दिया जाता है. लेकिन प्राइस का सर्वे लॉकडाउन के असर की जो तस्वीर हमारे सामने पेश करता है, उसके बाद साल दर साल लगाए जा रहे लॉकडाउन पर सवालिया निशान खड़े हो जाते हैं.

हम जानते हैं कि कोविड के चलते 2020-21 में GDP में 7.3% की गिरावट देखी गई. प्राइस का सर्वे बता रहा है कि इस गिरावट ने सबसे ज़्यादा किसे प्रभावित किया. सर्वे के मुताबिक महामारी ने शहरी गरीबों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया और उनकी घरेलू आय को कम कर दिया। सिर्फ सबसे गरीब 20 फीसदी ही नहीं. इनके बाद आने वाले 20 फीसदी लोअर मिडिल इनकम ग्रुप की आय भी 32 फीसदी कम हुई. इनके बाद आने वाले 20 फीसदी मिडिल इनकम परिवारों की आय भी पांच सालों में 9 फीसदी घट गई. इनका पैसा घटा, तो बढ़ा किसका –

अपर मिडिल और धनी परिवारों का. अपर मिडिल परिवारों की आय 5 साल में 7 फीसदी बढ़ी. सबसे अमीर 20 फीसदी के बारे में हम पहले ही आपको बता चुके हैं. अब इसमें ये भी देखने को मिला है कि इन 20 फीसदी धनी परिवारों ने उदारीकरण के बाद पांच सालों के दरम्यान कभी इतनी तेज़ी से पैसा नहीं जोड़ा, जितना इन्होंने 2015-16 से 2020-21के दौरान जोड़ा. मतलब अमीर सिर्फ अमीर नहीं हो रहे हैं. वो और तेज़ी से अमीर हो रहे हैं.

हम इन सारे आंकड़ों को आपके पास छोड़ जा रहे हैं. हो सकता है कि आज बड़ी खबर आपको बड़ी बोरिंग लगी हो. लेकिन हमारी गुज़ारिश है कि देश की इस बोरिंग सच्चाई को बार बार देखिएगा. और सोचिएगा कि क्या यही वो भारत है, जो आप अपने लिए और अपने बच्चों के लिए चाहते हैं.

अब आज की सुर्खियां.

पहली सुर्खी चुनावी प्रदेश पंजाब से. पंजाब में आज बीजेपी ने अपने पत्ते खोल दिए हैं. बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन में कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, इसका ऐलान कर दिया गया है. पंजाब में कई दशकों बाद ये पहला चुनाव है जब शिरोमणी अकाली दल बीजेपी के साथ एनडीए गठबंधन में नहीं है. आपको मालूम ही होगा कि कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था. तो इस चुनाव में बीजेपी ने अपने नए साथी एनडीए में शामिल किए हैं. कौन हैं वो. कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस. और शिरोमणि अकाली दल(संयुक्त).

ये सुखदेव सिंह ढिंढसा की पार्टी है. तो दिल्ली में आज बीजेपी मुख्यालय में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ कैप्टन अमरिंदर और सुखदेव ढिंढसा भी मौजूद थे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में नड्डा ने बताया कि पंजाब की 117 सीटों में से बीजेपी 65 सीटों पर लड़ेगी, कैप्टन की पार्टी की 37 सीट और ढिंढसा का अकाल दल संयुक्त 15 सीटों पर चुनाव लड़ेगा.

इस दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी चुनावी मुद्दों में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता में गिनवाया. कहा कि सीमा पार से हथियारों की डिलिवरी एक बड़ी समस्या है, हथियारों पर रोक लगनी चाहिए. इस दौरान कैप्टन मंत्रिमंडल में अपने पूर्व सहयोगी और मौजूदा पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू पर निशाना साधने से भी नहीं चुके. कहा कि सिद्धू को मंत्रिमंडल में शामिल करने की सिफारिश पाकिस्तान से आई थी.

पंजाब के बाद एक अपडेट यूपी से भी लेते जाइए. यूपी में आज एनडीए की तरफ से पहले मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दी गई है. रामपुर की स्वार सीट से बीजेपी के सहयोगी अपना दल ने हैदर अली खान को टिकट दी है. हैदर अली कांग्रेस की टिकट पर कई बार सांसद रहीं नूर बानो के पौत्र हैं. स्वार सीट से समाजवादी पार्टी की टिकट पर आज़म खान के बेटे अब्दुल्ला आज़म चुनाव लड़ सकते हैं. 2017 में भी इस सीट से अब्दुल्ला ने इस सीट से चुनाव जीता था. लेकिन बाद में उम्र की गलत जानकारी देने का दोषी पाए जाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनका नामांकन रद्द कर दिया था.

दूसरी सुर्खी में बात कोरोना की. पिछले 24 घंटे में देश में कोरोना के 3 लाख 6 हजार नए केस दर्ज किए गए. 439 लोगों की मौत हुई. अब देश में कुल एक्टिव मरीजों की संख्या 22 लाख 49 हजार हो गई है. चिंता की बात ये है कि पॉजिटिविटी लगातार ऊपर जा रही है. ये अब बढ़कर 20.75 फीसदी हो गई है. माने अगर पांच लोग कोरोना का टेस्ट कराते हैं तो उनमें से एक कोरोना पॉजिटिव आता है.

तीसरी सुर्खी शेयर बाज़ार से. शेयर बाज़ार में आज एक दिन में ही लोगों का करोड़ों रुपयों का नुकसान हो गया. सेंसेक्स में आज 1983 अंकों तक की गिरावट देखी गई. बाज़ार बंद होने तक सेंसेक्स 1545 अंक गिरकर 57 हजार 491 अंकों पर बंद हुआ. निफ्टी में भी बड़ी गिरावट देखी गई. आपको ध्यान होगा कुछ दिन पहले तक सेंसेक्ट 60 हजार के पार था. लेकिन पिछले हफ्ते भी गिरावट देखी गई और आज हफ्ते के पहले दिन भी गिरावट हुई.

इस गिरावट का मतलब ये समझिए कि लोग बाज़ार से अपने शेयर बेचकर पैसे निकाल रहे हैं. मतलब बाज़ार और अर्थव्यस्था को लेकर उनमें डर की आशंका है. एक हफ्ते बाद देश का आम बजट पेश किया जाएगा और उससे पहले बाज़ार में इस तरह की निराशा सरकार की नीतियों पर बहुत कुछ कहती है.


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