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क्रिकेट में नस्लभेद की ये कहानी आपको हैरान कर देगी

एक चलती-फिरती कहावत है,

Cricket is a gentleman’s game.
यानी, क्रिकेट भद्रजनों का खेल है.

लेकिन इन दिनों इंग्लिश क्रिकेट में जो खुलासे हो रहे हैं, उसे भद्रता की श्रेणी में कतई नहीं रखा जा सकता. वजह, अज़ीम रफ़ीक. पाकिस्तान के कराची में पैदा हुए. बाद में परिवार इंग्लैंड चला गया. रफ़ीक़ को क्रिकेट खेलने का शौक था. उन्होंने इस खेल में अपना कैरियर बनाने का प्लान बनाया. अपनी सफ़लता का रास्ता भी तैयार कर लिया था.

स्कूल के दिनों में ही यॉर्कशायर काउंटी क्लब से जुड़ गए. फिर इंग्लैंड की अंडर-15 और बाद में अंडर-19 वर्ल्ड कप टीम के कप्तान भी रहे. जो रूट, बेन स्टोक्स और जोस बटलर जैसे खिलाड़ी उनकी कप्तानी में खेल चुके हैं. 2007 में इंग्लैंड टीम के बोलिंग कोच डेविड पार्सन्स ने यहां तक कहा था कि रफ़ीक़ इंग्लिश क्रिकेट का भविष्य हैं. वो एक दिन सनसनी पैदा करेगा.

इस बात को 14 बरस बीत चुके हैं. रफ़ीक़ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं. उन्होंने क्रिकेट जगत को सदमे में डाल दिया है. अपने खेल की वजह से नहीं, बल्कि अपनी रीढ़ की हड्डी की वजह से. अज़ीम रफ़ीक़ ने इंग्लिश क्रिकेट में व्याप्त नस्लभेद के ख़िलाफ़ लड़ने का रास्ता चुन लिया है. उनके खुलासे के बाद समूचे क्रिकेट जगत में हंगामा मच गया है.

16 नवंबर को रफ़ीक़ ने संसदीय कमिटी के सामने अपनी बात रखी. उन्होंने कमिटी के सामने क्या बताया? उनके खुलासे के बाद आगे क्या होगा? और जानेंगे, क्रिकेट इतिहास में नस्लभेद की बड़ी कहानियों के बारे में भी.

पहले इतिहास की बात.

साल 1959 का क़िस्सा है. 28 बरस के बासिल डि ओलिविरा उम्मीद हार गए. उन्हें लगने लगा कि उनका क्रिकेट कैरियर कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा. ओलिविरा दक्षिण अफ़्रीका के केपटाउन में पैदा हुए थे. उनकी चमड़ी का रंग सफेद नहीं था. दक्षिण अफ़्रीका में उस समय रंगभेद की नीति लागू थी. मुल्क़ की स्पोर्ट्स टीम में सिर्फ़ व्हाइट खिलाड़ियों को जगह दी जाती थी. क्रिकेट में भी वही नियम था.

ओलिविरा ने क्लब क्रिकेट में तहलका मचा रखा था. वो ताबड़तोड़ बल्लेबाजी तो कर ही लेते थे. ज़रूरत पड़ने पर विकेट भी निकाल लेते थे. कहते हैं कि उस दौर में उनसे बेहतर अश्वेत क्रिकेटर कोई नहीं था. अगर उनकी चमड़ी सफेद होती तो बहुत पहले दक्षिण अफ़्रीका के लिए खेल सकते थे.

रंगभेद ने उनके जीवन के सबसे अच्छे पलों को मिट्टी में मिला दिया था. ओलिविरा अब और इंतज़ार नहीं करना चाहते थे. उन्होंने जीवन में आगे बढ़ने का फ़ैसला कर लिया. राह बदलने से पहले उन्होंने दो काम किए. पहला, उन्होंने बचपन की दोस्त से शादी कर ली. और दूसरा, इंग्लिश काउंटी क्लब लंकाशायर के नाम एक चिट्ठी भेजी.
इतना करने के बाद वो एक प्रिंटिंग फ़र्म में काम करने लगे.

कुछ महीनों के बाद उनके पास एक चिट्ठी आई. इंग्लैंड से. तब तक ओलिविरा क्रिकेट का ख़याल निकाल चुके थे. जब उन्होंने चिट्ठी पढ़ी तो उनके अचरज का ठिकाना नहीं रहा. मिडल्टन क्रिकेट क्लब ने उन्हें टीम में शामिल करने का ऑफ़र दिया था. वेस्ट इंडीज के वेस हॉल ने ऐन मौके पर अपना नाम वापस ले लिया था. ओलिविरा के पास फ़्लाइट के पैसे तक नहीं थे. तब पूरे मोहल्ले ने उनके लिए चंदा किया. और अंतत:, बासिल डि ओलिविरा इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए.

काउंटी क्रिकेट क्लब में पहला साल बढ़िया रहा. उनका कॉन्ट्रैक्ट दो साल के लिए बढ़ा दिया गया. ओलिविरा मौके के इंतज़ार में थे. उन्होंने अपने खेल की बदौलत अच्छी-खासी ख़्याति कमा ली. उन्हें इसका फल भी मिला. मई 1966 में ओलिविरा को इंग्लैंड की नेशनल टीम में जगह मिल गई. उस समय तक वो ब्रिटेन की नागरिकता ले चुके थे.

उनके जीवन का सबसे अहम पड़ाव आया, 1968 के साल में. इंग्लैंड की टीम को दक्षिण अफ़्रीका के दौरे पर जाना था. ओलिविरा इस टीम में जगह पाने के हक़दार थे. साउथ अफ़्रीका के टूर से ठीक पहले ऐशेज़ खेला गया. फ़ॉर्म में होने के बावजूद ओलिविरा को टीम से बाहर रखा गया. आख़िरी मैच में किसी तरह उनकी जगह बनी. पहली इनिंग में उन्होंने 158 रन बनाए. इसकी बदौलत इंग्लैंड मैच जीत गया और सीरीज़ ड्रॉ पर समाप्त हुई.

इस इनिंग के बाद ओलिविरा की जगह पक्की मानी जा रही थी. उस दौर में मेरिलबोन क्रिकेट क्लब (MCC) इंग्लिश क्रिकेट का माई-बाप था. टीम चुनने का काम उसी का था. जब MCC ने साउथ अफ़्रीका टीम का ऐलान किया तो उसमें ओलिविरा का नाम नहीं था. ये ओलिविरा और उनके चाहनेवालों के लिए बड़ा झटका था.

जिस टीम ने उन्हें रंग के आधार पर दुत्कार दिया, उसके ख़िलाफ़ खेलने की बात ही कुछ और ही थी. MCC ने उनका सपना चकनाचूर कर दिया. दरअसल, MCC अश्वेत ओलिविरा को टीम में शामिल कर साउथ अफ़्रीका के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहती थी. इसलिए, उसने रंगभेद की नीति को मौन स्वीकार्यता दे दी थी.

इस फ़ैसले का जमकर विरोध हुआ. मीडिया और सरकार ने मिलकर MCC को दुत्कारा. ओलिविरा के पते पर समर्थन के इतने खत आए कि डाकघर को अलग से लोग लगाने पड़े.

MCC को अब रास्ता निकालना ही था. उन्हें जल्दी ही रास्ता मिल भी गया. उसी समय टिम कार्टराइट चोटिल हो गए. उनकी जगह पर एक बोलर की दरकार थी. ओलिविरा बैटिंग ऑलराउंडर थे. इसके बावजूद उन्हें टीम में शामिल कर लिया गया.

जब साउथ अफ़्रीका की सरकार को इस बारे में पता चला तो वो नाराज़ हो गई. उसने कहा कि ओलिविरा को किसी भी हालत में खेलने नहीं दिया जाएगा. नतीजतन, MCC को दिल पर पत्थर रखकर टूर रद्द करना पड़ा.

1970 में साउथ अफ़्रीका की टीम को इंग्लैंड आना था. MCC अड़ गई कि मैच तो होकर रहेंगे. लेकिन उससे पहले भयंकर प्रोटेस्ट हुए. पिच को बर्बाद किया जाने लगा. कमेंटेटर्स टूर के बहिष्कार की धमकी देने लेगे. फिर ब्रिटिश सरकार भी इस विरोध में शामिल हो गई. भारत समेत कई देशों ने कहा कि अगर साउथ अफ़्रीका टूर हुआ तो वे 1970 के कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा नहीं लेंगे. आखिरकार, आयोजकों को हफ़्ते भर पहले सीरीज़ पर ताला लगाना पड़ा. उसके बाद क्रिकेट काउंसिल ने भी साउथ अफ़्रीका पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया.

इस प्रकरण के बाद बाकी टीमों ने भी साउथ अफ़्रीका का बायकॉट करने का फ़ैसला किया. ओलंपिक और फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप से उसे पहले ही निकाला जा चुका था. क्रिकेट में साउथ अफ़्रीका का बहिष्कार 1991 तक चला. उस साल रंगभेद की नीति को समाप्त कर दिया गया. बहिष्कार खत्म होने के बाद साउथ अफ़्रीका पहले टूर पर भारत आई. इससे पहले उसने सिर्फ़ इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यू ज़ीलैंड के साथ ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेला था.

ये कहानी सुनाने के पीछे दो कारण हैं. पहला, 21वीं सदी में भी रंग या नस्ल के आधार पर भेदभाव खत्म नहीं हुआ है. बस उसका चाल और चरित्र बदला है. मकसद वही है. किसी को भी उसकी पहचान के ज़रिए दोयम दर्ज़े का साबित करना.
और दूसरा, नस्लभेद का वायरस आज भी क्रिकेट के खेल को खोखला कर रहा है. और, अभी भी इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता.

अज़ीम रफ़ीक़ इन दोनों तथ्यों का ताज़ा उदाहरण हैं. रफ़ीक़ ने यॉर्कशायर क्लब के साथ खेलने के दौरान जो कुछ भोगा, वो कल्पना से परे है. वो 2008 से 2018 तक क्लब के साथ थे. हालांकि, अच्छे प्रदर्शन के बावजूद उनका कॉन्ट्रैक्ट री-न्यू नहीं किया गया.

फिर आया सितंबर 2020. रफ़ीक़ ने इएसपीएन-क्रिकइन्फ़ो को इंटरव्यू दिया. इसमें उन्होंने यॉर्कशायर क्लब पर आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि नस्लभेदी व्यवहार के चलते उन्हें कई बार आत्महत्या का ख़याल आया.

इसके बाद उन्होंने स्काई स्पोर्ट्स से बात की. इस बातचीत में उन्होंने सब खोल कर रख दिया. रफ़ीक़ ने बताया कि किस तरह से उन्हें बाकी लोगों से अलग-थलग रखा जाता था. टीम के व्हाइट प्लेयर्स को उनसे बात करने से रोका जाता था. रफ़ीक, राणा नवेद उल-हसन, आदिल रशीद, अजमल शहजाद को बार-बार ‘पाकी’ कहकर संबोधित किया जाता था. रफ़ीक ने ये भी बताया कि कई बार ऐसा भी हुआ कि ट्रेनिंग के बाद वो बालकनी में बैठकर रोते थे.

आरोप गंभीर थे. कार्रवाई की मांग उठी. अक्टूबर 2020 में यॉर्कशायर ने जांच बिठाई. लंबे समय तक कमिटी की रिपोर्ट ही नहीं आई. फिर अगस्त 2021 में क्लब ने रफ़ीक़ से माफ़ी मांगी. हालांकि, उन्होंने संस्थागत नस्लभेद की बात मानने से मना कर दिया. क्लब ने ये भी कहा कि बहुत से आरोप ऐसे थे, जिनकी पुष्टि नहीं हो पाई.

सितंबर में रिपोर्ट का कुछ हिस्सा पब्लिश किया गया. इसमें भी वही पुरानी बात दोहराई गई. क्लब ने पूरी रिपोर्ट बाहर लाने से भी मना कर दिया. क्लब ने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी खिलाड़ी या अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी. इस पर रफ़ीक़ ने कहा कि वो इतनी आसानी से पीछे नहीं हटेंगे. यॉर्कशायर क्लब ऐसा करके नस्लभेद को बढ़ावा दे रहा है.

इस बीच पूरी रिपोर्ट रिलीज़ करने की मांग चलती रही. क्लब मना करता रहा. फिर तीन नवंबर को रिपोर्ट लीक हो गई. लीक से पता चला कि नस्लभेद के आरोप सही हैं.

इसके बाद तो इंग्लिश क्रिकेट में हंगामा मचना तय था. हर तरफ़ से सख़्त कार्रवाई की मांग उठने लगी. ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्री साजिद जावेद ने ज़िम्मेदार लोगों को पद से हटाने की मांग रखी. प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने ECB से जल्द से जल्द जांच पूरी कर कार्रवाई का आदेश दिया.

चार नवंबर को ECB ने यॉर्कशायर को अंतरराष्ट्रीय मैचों की मेज़बानी से रोक दिया. हेडिंग्ले यॉर्कशायर का घरेलू मैदान है. अगले साल वहां एक अंतरराष्ट्रीय वनडे और एक टेस्ट होना था. अब वो किसी दूसरे वैन्यू पर खेला जाएगा. जब तक क्लब सभी मानकों पर खरा नहीं उतर जाता, तब तक ये बैन जारी रहेगा.

ताज़ा विवाद के बीच क्लब चेयरमैन रोजर हटन और सीईओ मार्क आर्थर ने इस्तीफ़ा दे दिया है. क्लब के बोलिंग कोच एंड्रयू गेल को छुट्टी पर भेज दिया गया है. कई स्पॉन्सर्स ने भी क्लब से सपोर्ट खींच लिया है. यॉर्कशायर को एक और गुमनाम शिकायत मिली है. एक एशियाई क्रिकेटर ने नाम न छापने की शर्त पर अपनी शिकायत दर्ज़ कराई है.

उसका आरोप है कि यॉर्कशायर के एक साथी खिलाड़ी ने उसके सिर पर पेशाब कर दिया था. और, कुछ सीनियर खिलाड़ी एक मुस्लिम प्लेयर के प्रेयर मैट को बर्बाद करने की प्लानिंग भी कर रहे थे.

इस मामले में नया क्या है?

16 नवंबर को अज़ीम रफ़ीक़ की पेशी थी. डिजिटल, कल्चर, मीडिया एंड स्पोर्ट कमिटी (DCMS) के सामने. ये ब्रिटिश संसद की एक सेलेक्ट कमिटी है. इसमें 11 सांसद होते हैं.

रफ़ीक ने कमिटी को अपने साथ हुए नस्लभेद के बारे में विस्तार से बताया. इस दौरान उन्होंने नौ क्रिकेटरों और टीम के अधिकारियों का नाम लिया. इसमें माइकल वॉन, गैरी बैलेंस, एंड्रयू गेल, टिम ब्रेसनन, मार्टिन मॉक्सन, अलेक्स हेल्स, मैथ्यू लोगार्ड, डेविड लॉयड और जो रूट का नाम शामिल है.

वॉन पर आरोप है कि उन्होंने एशियाई खिलाड़ियों को देख लेने की धमकी दी थी. वॉन इससे इनकार करते हैं. इस बीच बीबीसी ने उन्हें अपने शो से बाहर निकाल दिया है.

रफ़ीक़ का आरोप है कि गैरी बैलेंस की कप्तानी में यॉर्कशायर के ड्रेसिंग रूम का माहौल ख़राब हो गया था. बैलेंस ने बार-बार रफ़ीक़ को पाकी कहकर बुलाया. बैलेंस ही वो शख़्स था जिसने अश्वेत खिलाड़ियों के लिए ‘केविन’ शब्द का ईजाद किया. अलेक्स हेल्स ने अपने कुत्ते का नाम इसलिए केविन रखा, क्योंकि वो काला था.

बैलेंस ने अपने कहे के लिए माफ़ी मांगी है और कहा कि ये सब मज़ाक में कहा गया था.

रफ़ीक़ ने बाकी लोगों पर भी नस्लभेदी कमेंट पास करने के आरोप लगाए हैं. उन्होंने ये भी बताया कि चेतेश्वर पुजारा को जान-बूझकर ‘केविन’ नाम से बुलाया जाता था. यॉर्कशायर के व्हाइट प्लेयर्स ये बहाना बनाते थे कि उन्हें पुजारा का पहला नाम लेने में परेशानी होती है. जबकि सच ये था कि ‘केविन’ का इस्तेमाल एशियाई खिलाड़ियों का मज़ाक उड़ाने के लिए किया जाता था.

एक दिन पहले इंग्लैंड की टेस्ट टीम के कप्तान जो रूट ने बयान दिया था कि उन्होंने यॉर्कशायर में कभी भी नस्लभेद नहीं देखा. इस पर रफ़ीक ने कहा कि जो रूट अच्छे व्यक्ति हैं. लेकिन ये दुखद है. रूट, गैरी बैलेंस के हाउसमेट थे. उनके सामने मुझे कई बार पाकी कहा गया. उनका बयान ये साबित करता है कि ये सब कितना नॉर्मल है. इससे रूट को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन ये चीज़ मुझे हमेशा सालती रहेगी.

रफ़ीक़ के बयान के बाद क्या होगा?

आगे रोजर हटन और मार्क आर्थर से पूछताछ की जाएगी. इसके बाद DCMS कमिटी रिपोर्ट बनाकर सरकार को देगी. इसमें जांच के परिणाम के साथ-साथ आगे के लिए रास्ते भी सुझाए जाएंगे. सरकार के पास उस पर अमल करने के लिए 60 दिनों का समय होगा.

जानकारों का मानना है कि इससे यॉर्कशायर की इमेज पर बड़ा असर होगा. इससे खिलाड़ी क्लब के लिए खेलने से कतराएंगे. उम्मीद जताई जा रही है कि ये घटना संस्थागत नस्लभेद के ख़िलाफ़ बोलने वालों को प्रोत्साहित करेगी. 

आने वाले समय में कुछ और भी हैरान करने वाले खुलासे हो सकते हैं.

अपने बयान में रफ़ीक़ ने कहा,

‘मैं ये कभी नहीं चाहूंगा कि मेरा बच्चा क्रिकेट के आस-पास भी जाए. मैं अपने बच्चे को इस खेल से दूर रखूंगा. मैं उसे इन लोगों के बीच कतई नहीं छोड़ूंगा.’

इस समय क्रिकेट के लिए अगर सबसे ज़रूरी कोई बदलाव होगा तो वो है, क्रिकेट की भद्रता को फिर से कायम करना. क्या इंग्लिश क्रिकेट इस दिशा में आगे बढ़ पाएगा? ये देखना दिलचस्प होगा.

अज़ीम रफ़ीक़ के साथ हुआ नस्लभेद यकीनन दिल दहलाने वाला है. हालांकि, ये इकलौती घटना नहीं है. कुछ बड़ी घटनाओं के बारे में सुन लीजिए.

– भारत के पूर्व क्रिकेटर फ़ार्रूख़ इंजीनियर ने इसी साल एक इंटरव्यू में अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया था. उन्होंने बताया था कि भारत से होने के चलते उनको अजीब नज़र से देखा जाता था. उनके ऊपर नस्लभेदी टिप्पणियां की जातीं थी. लोग उनकी बोली का मज़ाक उड़ाते थे.

– एक उदाहरण तो हाल ही में समाप्त हुए टी-20 वर्ल्ड कप का है. साउथ अफ़्रीका के क़्विंटन डी कॉक ने ब्लैक लाइव्स मैटर के समर्थन में घुटने मोड़ने से मना कर दिया था. इसके बाद उन्हें टीम से बाहर बिठा दिया गया. डी कॉक ने बाद में माफ़ी मांगी और टेक अ नी वाली मुद्रा भी अपनाई.

घटनाएं और भी हैं. मसलन, 80 के दशक में वेस्ट इंडीज के कोलिन क्रॉफ़्ट को अश्वेत होने की वजह से ट्रेन से उतार दिया गया था. केन्या के ड्रेसिंग रूम में ब्रायन लारा के बयान पर मचा तहलका हो या मंकीगेट प्रकरण. लिस्ट लंबी है. फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे.


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