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साउथ अफ्रीका की सबसे बड़ी हार और उन्हें 'चोकर्स' का टैग मिलने की कहानी!

क्रिकेट की शुरुआत 16वीं शताब्दी से मानी जाती है. लेकिन 19वीं शताब्दी में साल 1877 में पहला आधिकारिक टेस्ट मैच इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेला गया. 12 साल क्रिकेट के मैदान पर तीसरी टीम की एंट्री हुई. दक्षिण अफ्रीका. साल 1889 में साउथ अफ्रीका की टीम ने इंग्लैंड के खिलाफ डेब्यू किया और इतिहास की सबसे पुरानी टीमों में से एक बनी.

लेकिन 1971 में जब वनडे क्रिकेट की शुरुआत हुई. उससे एक साल पहले यानी 1970 में साउथ अफ्रीका को इंटरनेशनल क्रिकेट से सस्पेंड कर दिया. क्यों? साउथ अफ्रीका सरकार की एक रेसिस्ट पॉलिसी की वजह से. ये पॉलिसी साउथ अफ्रीका को केवल गोरे देशों (न्यूज़ीलैंड, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया) के खिलाफ खेलने की इजाज़त देती थी. 22 साल बाद जब साउथ अफ्रीका ने वो पॉलिसी हटाई, तब जाकर इस टीम की 1992 इंटरनैशनल क्रिकेट में वापसी हुई.

1992 और 1996 विश्वकप में दक्षिण अफ्रीका:

1992 विश्वकप में सेमीफाइनल और फिर 1996 विश्वकप में क्वार्टर फाइनल में पहुंचकर भी साउथ अफ्रीकी टीम बाहर हो गई. पहली बार हारे तो ठीक है, 1996 में फिर हारे तो लोगों को लगा फिर से चूक हो गई. लेकिन फिर आया 1999 विश्वकप.

World Cup 1999
1999 विश्वकप टूर्नामेंट में सभी टीमों के कप्तान.

1999 विश्वकप:

इस विश्वकप में दक्षिण अफ्रीकी टीम के साथ कुछ ऐसा हुआ कि 1992 और 1996 की हार फिर लोगों ने कभी याद नहीं की. 17 जून, 1999 के दिन ही वो हादसा हुआ था जिसके चलते दुनिया के बेहतरीन टीमों में से एक दक्षिण अफ्रीक आज भी ‘चोकर्स’ कहलाती है.

1995 से 2000 के बीच साउथ अफ्रीका की टीम इतनी कंसिस्टेंट थी कि उन्हें हरा पाना आसान नहीं था. बॉब वूल्मर जैसे वक्त से आगे रहने वाले कोच के अंडर हैन्सी क्रोनिए, शॉन पोलॉक, जोन्टी रोड्स, जैक कैलिस जैसे खिलाड़ियों ने टीम को वनडे की बेहतरीन टीम बना दिया.

1999 में साउथ अफ्रीकी टीम ने टूर्नामेंट में चार जीत के साथ तूफानी एंट्री की. लेकिन इसके बाद वर्ल्डकप के बीच में साउथ अफ्रीकी टीम की राह थोड़ी डगमगा गई. बस यहीं से 1999 विश्वकप उनके लिए बदल गया.

लगभग 36 दिन चले इस टूर्नामेंट में एक आध मैच हारना कोई बड़ी बात नहीं थी. लेकिन दक्षिण अफ्रीका के साथ जो हुआ वो थी उनकी टाइमिंग. पहला मुकाबला वो उस ज़िम्बाबवे से हार गए. लेकिन दूसरी हार मिली ऑस्ट्रेलिया से. हालांकि साउथ अफ्रीकी टीम ने इसका ज़्यादा बुरा नहीं माना. क्योंकि वो एक ऐसी टीम से हारे थे, जो कि टूर्नामेंट में कमाल थी.

साउथ अफ्रीकी टीम को अब 17 जून के सेमीफाइनल में उतरना था. लेकिन सेमीफाइनल से पहले तीन दिन का बिना मैच वाला गैप था. पिचें ड्राई होने लगी थीं. लेकिन साउथ अफ्रीका को उस पिच और मैदान का पूरा अंदाज़ा था. क्योंकि उसी पिच पर न्यूज़ीलैंड को हराकर वो सेमीफाइनल में पहुंची थी.

Savsaus

1999 वर्ल्डकप सेमीफाइनल

17 जून, 1999 को क्या हुआ था:

एजबेस्टन के मैदान पर टॉस हुआ और साउथ अफ्रीका ने बोलिंग चुन ली. साउथ अफ्रीकी टीम का ये फैसला इसलिए था क्योंकि जैक कैलिस उस वक्त सिर्फ 24 साल के थे. वो टूर्नामेंट में पूरे जवानी के जोश से तेज़ रफ्तार स्विंग गेंदबाज़ी कर रहे थे. लेकिन फिर भी 1999 में इतने बड़े करो या मरो वाले मैच में चेज़ करना? ये फैसला सबकी समझ से बाहर था.

कोच बॉब वूल्मर ये बात अच्छे से जानते थे कि ऐसी परिस्थितियों में लक्ष्य का पीछा करते हुए सिर्फ पांच बार ही टीमों को जीत मिली है. लेकिन दक्षिण अफ्रीका ने फिर भी गेंदबाज़ी का फैसला किया.

इस फैसले के बाद ऑस्ट्रेलिया खेलने उतरा और उनकी पारी में ही मैच का मोमेंटम छह बार बदला.

शुरूआत में ऑस्ट्रेलिया: 3/1
फिर संभलते हुए : 54/1
इसके बाद देखते ही: 68/4
फिर संभलते हुए: 158/4
एक बार फिर पारी लड़खड़ाई: 207/6
और आखिर में: 213 पर ऑल-आउट

जब ऑस्ट्रेलिया की पारी खत्म हुई तो दक्षिण अफ्रीका का टॉस जीतकर पहले फील्डिंग का फैसला ऐतिहासिक लगने लगा. सभी को लगा इस बार दक्षिण अफ्रीकी टीम इतिहास रचने वाली है.

दक्षिण अफ्रीका की पारी शुरू हुई. 10वें ओवर के बाद स्टीव वॉ ने शेन वॉर्न को अटैक पर लगाया. फिर चीजें हर पांच ओवर में बदलने लगी. किसी पांच ओवर में ऑस्ट्रेलिया हावी हो जाती और किसी में साउथ अफ्रीका. क्योंकि इस मुकाबले में दोनों टीमों का सबकुछ दांव पर था. सबकुछ माने सबकुछ. क्योंकि क्रिकेट इतिहास में और एक क्रिकेटर के जीवन में विश्वकप से बड़ा कुछ नहीं होता.

अदला-बदली के इस खेल में कैलिस (53 रन), जोन्टी रोड्स(43 रन) और पॉलोक(20 रन) ने ऐसी पारियां खेलीं कि एजबेस्टन में साउथ अफ्रीकी ड्रेसिंग रूम में लगने लगा कि अब लॉर्ड्स  (उस साल का फाइनल का वेन्यू) दूर नहीं. इसी बीच ऐसा ये भी हुआ कि एक ऑस्ट्रेलियन ने साउथ अफ्रीकी ड्रेसिंग रूम के अंदर झांका और कहा,

”वेल डन’

Bob New
बॉब वूल्मर. फाइल फोटो: Twitter

देखते ही देखते मैच आखिरी ओवर में पहुंच गया. अब साउथ अफ्रीकी ड्रेसिंग रूम में माहौल बहुत ज़्यादा टेंशन का हो गया था. ड्रेसिंग रूम में बैठे कोच वूल्मर, गैरी कर्स्टन, पीटर पोलोक और डैरल कुलिनन सिर्फ ये ही दुआ कर रहे थे कि मैच के बीच में कुछ भी हो जाए और कुछ पल के लिए मैच और टेंशन की ये सिचुएशन ठहर जाए. लेकिन फिर क्लूज़नर ने दो गेंदों पर दो चौके लगाए और अब चार गेंदों पर साउथ अफ्रीका को एक रन की दरकार थी.

लेकिन आखिरी गेंद पर जो कुछ हुआ उसके बाद साउथ अफ्रीकी ड्रेसिंग रूम में पिनड्रॉप साइलेंस था. मैच टाई के साथ साउथ अफ्रीका ऑल-आउट हो चुकी थी.मैच टाई था ऐसे में रन रेट के आधार पर ऑस्ट्रेलिया को फाइनल में जाने का मौका मिला. साउथ अफ्रीका बाहर हो गई.

इस हार के बाद किसी ने किसी को कुछ नहीं कहा. ना ही किसी पर दोष मढ़ा गया और ना ही किसी को इसके लिए मुजरिम माना गया. क्योंकि विश्वकप जैसे बड़े मंच पर इतने प्रेशर वाली सिचुएशन में ऐसा किसी के साथ भी हो सकता था. लेकिन इस हार के साथ साउथ अफ्रीकी टीम को एक नया नाम मिला. वो नाम था ‘चोकर्स’ का.

चोकर्स इसलिए कि ये टीम छोट टूर्नामेंट्स में बेहतरीन प्रदर्शन करती है. लेकिन वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट्स में जीतते-जीतते हार जाती है.

ये नाम आज भी साउथ अफ्रीका के माथे  पर गुदा हुआ है.


खिलाड़ियों के हाथ पर ‘थूकने’ वाले जावेद मियांदाद की कहानी! 

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