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रंगरूट: लाखों फीस देकर MBBS करने गए थे, कॉलेज बंद हो गया, अब 2 साल से कोर्ट के चक्कर काट रहे

मध्य प्रदेश की भर्तियां हों, सरकार हो या पढ़ाई, बीच में कभी भी ब्रेकर पर अटक सकती है. अबकी बार मामला पढ़ाई-लिखाई का है. यहां के एक मेडिकल कॉलेज के 23 MBBS स्टूडेंट्स को अचानक से एक साल के बाद पता लगा कि वो अब यहां नहीं पढ़ सकते. हैरानी ये कि इन स्टूडेंट्स ने साल भर की फीस भी भरी है. एक साल पढ़ाई भी की है और सरकार के सारे मानकों पर बतौर स्टूडेंट खरे भी हैं.

क्या है पूरा मामला?

मध्य प्रदेश के गुना में है साक्षी मेडिकल कॉलेज. सत्र 2016-2017 में एमबीबीएस की 150 सीटों पर स्टूडेंट्स का एडमिशन लिया जाना था. इनमें गवर्नमेंट कोटे की 127 सीटें थीं और NRI कोटे की 23. कॉलेज ने तय तिथि तक 126 सीटों पर एडमिशन लिया. फिर 30 सितंबर 2016 को एक लिस्ट निकाली. कहा कि अब हमारे यहां NRI कोटे से एडमिशन के लिए सीटें खाली हैं. स्टूडेंट्स प्रवेश ले सकते हैं. दरअसल NRI कोटे में सीट खाली रहने पर कॉलेज फिर से काउंसलिंग करवा के एडमिशन ले सकते हैं. इसमें NEET की परीक्षा पास कर चुके स्टूडेंट्स ने काउंसलिंग के लिए अर्जी दी. उनकी काउंसलिंग हुई. और फिर 24 सितंबर 2016 को मेरिट लिस्ट जारी कर दी गई. इनमें 23 स्टूडेंट्स मेरिट में थे. इन 23 स्टूडेंट्स ने 29 सितंबर को 5 लाख रुपये फीस भरी और फिर डॉक्टरी की पढ़ाई करने लगे.

यह कॉलेज मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर से एफिलिएटेड था. स्टूडेंट्स ने 27 अप्रैल 2017 तक एनरॉलमेंट भी करा लिया. 1 लाख 44 हजार की फीस भरी. फिर एग्जाम फॉर्म भी भरा. यानी सब कुछ संवैधानिक रूप से चलता रहा. इसी बीच, एक आरटीआई डाली गई, जिसमें मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) से साक्षी मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे स्टूडेंट्स की जानकारी मांगी गई. 20 जून 2017 को MCI ने बताया कि साक्षी मेडिकल कॉलेज में कुल 143 स्टूडेंट्स हैं, जिनमें से 126 गवर्मेंट कोटे से हैं और 17 NRI कोटे से.

यह तस्वीर देखिए-

RTI, जिसके जवाब में आया कि कुल 126 स्टूडेंट्स ही पढ़ते हैं.
RTI, जिसके जवाब में बताया गया कि कुल कितने स्टूडेंट्स पढ़ते हैं

अब जब RTI में कुल 7 स्टूडेंट्स कम बताये गये तो स्टूडेंट्स ने कॉलेज प्रशासन से पूछा. हमसे बातचीत में कई स्टूडेंट्स ने कहा भी कि तब कॉलेज प्रशासन ने कहा था कि यह उनका और MCI का आंतरिक मामला है, वो इसे देखेंगे. आप सब पढ़ाई करें.

फिर भी सब कुछ चलता रहा.

इसके बाद स्टूडेंट्स ने एग्जाम दिया. वह पढ़ाई कर रहे थे और इसी बीच 14 सितंबर 2017 को NRI कोटे से पढ़ रहे सभी स्टूडेंट्स के लिए कॉलेज के पास MCI की तरफ से डिस्चार्ज लेटर आ गया. डिस्चार्ज लेटर, यानी इन स्टूडेंट्स को कहें कि अब वे नहीं पढ़ सकते. इसमें MCI ने कॉलेज को कहा कि-

हमने पाया है कि कॉलेज ने अपनी तरफ से तीन बार तीन अलग-अलग लिस्ट भेजीं, जिसमें हर बार एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स की संख्या अलग बताई गई.

MCI के द्वारा भेजे गए लेटर का एक हिस्सा
MCI की ओर से भेजे गए लेटर का एक हिस्सा.

MCI ने आगे कहा-

DME, M.P. की तरफ से भेजी गई लिस्ट के अनुसार, सत्र 2016-17 के लिए 126 स्टूडेंट्स थे. इनमें से एक लिस्ट में नहीं था. अत: कॉलेज ने कुल 125 एडमिशन ही कराए हैं. ऐसे में एग्जिक्यूटिव कमेटी ने तय किया है कि बाकी के 25 स्टूडेंट्स को डिस्चार्ज नोटिस भेज दिया जाए. इनमें 8 स्टूडेंट्स वो जो DME की लिस्ट में नहीं थे और 17 स्टूडेंट्स, जिनकी लिस्ट 22 नवंबर 2016 तक नहीं भेजी गई थी.

MCI के लेटर का पीडीएफ देखें.

लेकिन DME कुछ और ही कह रहा

DME. यानी Directorate of Medical Education (चिकित्सा शिक्षा संचालनालय, भोपाल ). यहां दायर की गई एक RTI का जवाब आया जनवरी 2019 में. जवाब में कहा गया कि साक्षी मेडिकल कॉलेज में NRI कोटे से प्रवेश लेने वाले स्टूडेंट्स की सूची DME  में जमा है. जमा करने की तारीख 4 अक्टूबर 2016 बताई गई.  इसका मतलब यह है कि स्टूडेंट्स ने तय समय के भीतर ही एडमिशन ले लिया है. और आगे की सारी जवाबदेही प्रशासन की है.

ये जवाब देखें-

ये RTI, DME द्वारा issue की गई है.
ये RTI, DME द्वारा जारी की गई है.

 

फिर कॉलेज पहुंचा कोर्ट. 

इसके बाद कॉलेज प्रशासन ने कोर्ट-कचहरी शुरू की. अपनी अर्जी हाई कोर्ट में लगाई. हाई कोर्ट ने कॉलेज की बात नहीं मानी और कॉलेज को तुरंत सील करने के आदेश दे दिए. अब हुआ ये कि बाकी बचे 126 स्टूडेंट्स, जो गवर्नमेंट कोटे से पढ़ाई कर रहे थे, उनकी अर्जी पर उनका कॉलेज शिफ्ट कर दिया गया. यानी उनको साक्षी मेडिकल कॉलेज से हटाकर राज्य के अन्य कॉलेजों में पढ़ने की व्यवस्था करा दी गई. अधर में लटक गए बाकी 17 छात्र. हमने इस पूरे मामले पर कॉलेज के लीगल एडवाइजर रहे चंद्रशेखर रघुवंशी से बात की. उन्होंने कहा-

यह सब मामला MCI का फंसाया हुआ है. आप बताइये, जब वो ये मान रहे हैं कि दूसरी बार 143 स्टूडेंट्स की लिस्ट दी गई थी तो फिर वो कैसे 126 स्टूडेंट्स को ही पढ़ने के लिए वैलिड मान सकते हैं? और हमने एडमिशन प्रक्रिया दो बार में पूरी की. दूसरी बार 15 नवंबर को हमने 150 स्टूडेंट्स की लिस्ट DME को भेजी. अब DME और फिर उसके बाद हमें पत्र मिला कि हम बाकी के 17 स्टूडेंट्स को डिस्चार्ज कर दें. हम कोर्ट गए, लेकिन वहां भी हमारी बात नहीं सुनी गई और कॉलेज बंद करने का आदेश दे दिया गया. मैं इस मामले से पिछले 9-10 महीने से अलग हो गया हूं.

मामला उलझता देख स्टूडेंट्स सुप्रीम कोर्ट गए. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2018 में कहा कि आप पुन: हाई कोर्ट जाएं और मामले पर पुनर्विचार कराएं. स्टूडेंट्स लौटकर आए. अप्रैल 2019 में पुनर्विचार के लिए याचिका डाली. फिर तारीखों का इंतज़ार कर रहे हैं. डिस्चार्ज हुए एक स्टूडेंट सौरभ ने हमें बातचीत में बताया-

हम सबने 2 अप्रैल 2018 को ग्वालियर हाई कोर्ट में याचिका लगाई. लेकिन हमारी याचिका बिना हमारा पक्ष सुने खारिज कर दी गई. उसके बाद हम सुप्रीम कोर्ट गए. वहां से हमें पुनर्विचार याचिका दायर करने की इजाजत मिली. हम सब फिर से हाई कोर्ट आए और पिटिशन लगाई. मामला तब से लंबित है. लगभग एक साल बीत चुका है. इस पूरे मामले में हमारी कोई भूमिका नहीं है. हमारा काम पढ़ना है लेकिन हम इन सब कानूनी भागदौड़ में लगे हैं. इतने जिम्मेदार लोगों की गलतियों का खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है.

MCI की प्रक्रिया पर ही स्टूडेंट्स के सवाल.

हमारी बात कॉलेज से डिस्चार्ज की गई स्टूडेंट साक्षी से हुई. साक्षी ने कहा कि अपनी ही RTI के जवाब को MCI नहीं मान रही. उन्होंने कहा-

हमने RTI लगाई थी, जिसमें MCI खुद मान रही है कि वो ऐसी लिस्टिंग के आधार पर हमें डिस्चार्ज नहीं कर सकते. लेकिन दो साल होने को हैं और अब तक कहीं सुनवाई का नतीजा नहीं निकला है. हम कहां जाएं, किससे मिलें, कुछ नहीं सूझ रहा.

इस RTI के जवाब की बात कर रही हैं साक्षी
इस RTI के जवाब की बात कर रही हैं साक्षी.

 

हमने इस मामले में एक अन्य स्टूडेंट प्रिया से बात की. प्रिया भी उन 23 में से हैं, जिनको MCI ने डिस्चार्ज  कर दिया है. प्रिया ने आरोप लगाया कि-

इस सारे मामले में कॉलेज, DME और MCI की आपसी समस्या थी. इन लोगों ने आपस में कम्यूनिकेशन नहीं रखा. अब जब मामला कोर्ट में है, तो भी ये सब लोग रिप्लाई फाइल नहीं करते हैं. ना ही कोर्ट की कार्यवाही में मदद करते हैं. इस कारण हमारा समय खराब हो रहा है. हम दो साल की फीस दे चुके हैं. दो साल से केस चल रहा है. हम पढ़ना चाहते हैं और वह हमें नसीब नहीं हो रहा.  

इस पूरे मामले पर हमने कॉलेज का पक्ष लेना चाहा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. MCI और DME से भी संपर्क करने की लगातार कोशिशें कीं. हैरानी की बात ये कि इन दोनों संस्थानों की वेबसाइटों पर दिये गए किसी भी नंबर से संपर्क नहीं हो सका. हमने अपने स्तर से भी फोन नंबर निकाले, लेकिन संपर्क नहीं हो सका. हमने ईमेल और अन्य माध्यमों से दोनों संस्थाओं के सामने स्टूडेंट्स का पक्ष रखा है. जवाब का इंतजार है. हम इस पूरे मामले पर नज़र बनाए हुए हैं. किसी भी तरह का ज़रूरी अपडेट मिलने पर दी लल्लनटॉप आपको अवगत कराएगा.


रंगरूट. दी लल्लनटॉप की एक नई पहल. जहां पर बात होगी नौजवानों की. उनकी पढ़ाई-लिखाई और कॉलेज-यूनिवर्सिटी कैंपस से जुड़े मुद्दों की. हम बात करेंगे नौकरियों, प्लेसमेंट और करियर की. अगर आपके पास भी ऐसा कोई मुद्दा है तो उसे भेजिए हमारे पास. हमारा पता है YUVA.LALLANTOP@GMAIL.COM.


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