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वडाली ब्रदर्स: जब रियाज़ से बचने के लिए पूरनचंद ने अपने बाल कटा लिए

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जब इबादत करते थे, तो अपने खुदा से दुआ में यही मांगते थे कि उन्हें सच्चा सुर बख्श दिया जाए. जिस नौबतखाने में उनकी शहनाई की आवाज़ गूंज जाती थी, वो इबादतखाने में तब्दील हो जाता था. उसी सुर की तलाश में उन्होंने जिन्दगी बिता दी, जिनके रियाज़ की आवाज़ बनारस की मिट्टी में सुकून से बिछी हुई है.

सच्चा सुर क्या?

वो जो पारे को बांध दे. वो जो गले से निकले, तो कहीं रुके नहीं. कानों की ठौर न ले, सीधे दिल बींध दे. वो जिसे गाने वाला थमे, तो ख़ुदा सिर झुकाए सजदे में बैठा हो, और उसके हाथ पकड़कर कहे, ‘आ मेरी कुर्सी पर बैठ और मुझे सुनने दे, तू क्या कह रहा है. मेरे हाथों से प्याला ले, गला तर कर, और गाता जा’.

वो सुर, जो बेगम अख्तर छेड़ दें. वो सुर, जो फरीदा खानम टेर दें. वो सुर, जो पूरनचंद वडाली साहब अपने हारमोनियम पर मंद-मंद मुस्कान के साथ बिखेर दें, और गुनगुनाएं…

खुसरो रैन सुहाग की, जो मैं जागी पी के संग…

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बचपन में गाने में रुचि नहीं रखते थे ये भाई, लेकिन समय ने उन्हें उनकी तकदीर से मिला ही दिया. (तस्वीर: फेसबुक)

दौर 1974 -75 के आसपास का था, जब हरबल्लभ संगीत सम्मलेन, जालंधर में दो भाई सूफी कलाम गाने पहुंचे. उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें देखीं लोगों ने, और देखा उनका सादा-सा कुरता-चादर का पहनावा. कहा, ये क्या गाएंगे. कोई बन-ठन नहीं, कोई हवा बांधने वाली बात नहीं. वहां से लौटा दिए गए. दोनों भाइयों ने सोचा, पास में ही देवी तालाब मंदिर है, वहीं अपना गीत चढ़ा आएंगे चढ़ावे में. चले गए. उसके अहाते में गाना गाया. उन्हें नहीं मालूम था कि वहां कोई उनका इंतज़ार कर रहा था, जिसे खुद भी नहीं पता था कि वो किन लोगों को मौका देने वाला है. ख़ुदा ऊपर से देख मुस्कुरा रहा था.

हरबल्लभ मंदिर में उस दिन मौजूद थे ऑल इंडिया रेडियो, जालंधर के एनएम भाटिया. दोनों भाइयों का कलाम सुना, दिल दे बैठे. ले गए ऑल इंडिया रेडियो और उनका पहला गाना रिकॉर्ड किया.

ये भाई थे पूरनचंद वडाली और प्यारेलाल वडाली. अमृतसर के गुरु की वडाली गांव से आए दो भाई, जिनकी जिन्दगी में संगीत से दिल लगाने का शौक उनकी किस्मत साथ लेकर आई थी.

पूरनचंद को पहलवानी का शौक था. प्यारेलाल नाटकों में कृष्ण बनते थे. पिता ठाकुर दास ने जबरन संगीत सिखाया. पीढ़ियों से उनका परिवार गायकी में था. लेकिन पूरन और प्यारे को कोई ख़ास रुचि नहीं थी. पूरनचंद को जब गाने की इच्छा नहीं होती थी, तब पिता उन्हें उनके लम्बे-लम्बे बाल पकड़ घसीटकर ले जाते थे रियाज़ के लिए. पूरन ने रियाज़ से बचने के लिए बाल कटा लिए. रियाज़ फिर भी न छूटा. पिता के साथ रियाज पर बैठते, तो घंटों रोते थे.

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प्यारेलाल एक बार मौत के मुंह में जाकर लौट चुके थे. उसके बाद भी कई साल तक अपने बड़े भाई के साथ मिलकर गाया. (तस्वीर: ट्विटर)

एक दिन दस साल के पूरन बाबा सादिक शाह चिश्ती की मजार पर गए. वहां के माहौल में ऐसा डूब गए कि दिल खोलकर पहली बार वहां गाया. बोल थे, मिट्टी दियां मूरतां ने दिल साड्डा मोह लिया, उमरां दी कित्ते नूं पल विच खो लेया. वहां के लोगों ने तारीफों की बौछार कर दी. पूरन ने तय किया, अब वो गाएंगे. पहलवानी के साथ-साथ गायकी में रुचि जागी. उसके बाद उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान साहब और पंडित दुर्गा दास के शिष्य बनकर उन्होंने संगीत सीखा. जहां संगीत सुनते थे, कान लगा लेते थे, ताकि बारीकियों की पकड़ मजबूत हो.

उनके भाई प्यारेलाल के गुरु वही बने. भाइयों के जोड़े में गाने की परंपरा को आगे बढ़ाया. धीरे-धीरे पहचान बनी. लोग दूर-दूर से सुनने के लिए आने लगे. वडाली भाई बाजार की शर्तों पर नहीं चले. जब ‘पिंजर’ के डायरेक्टर उत्तम सिंह ने उनके तेवर को पैना रखने वाली धार को नमन कर उन्हें गाने को कहा, तब उन्होंने फिल्म के लिए गाने गाए. ‘पिंजर’ फिल्म के दो गाने- दरदा मारया माएया और वारिस शाह नूं उन्हीं के गाए हुए हैं. धूप फिल्म का गाना ‘चेहरा मेरे यार का’ भी उन्हीं की देन है.

2003 में ये जोड़ी शायद टूट जाती. लेकिन नियति को ये मंजूर नहीं था.

प्यारेलाल को दिमागी बुखार चढ़ा. उनको अस्पताल ले जाया गया. डॉक्टरों ने उनकी जान बचाई किसी तरह. प्यारेलाल घर वापस आए. अपने बड़े भैया के साथ शिमला समर फेस्टिवल में गाने बैठे. बुखार वापस चढ़ आया. इस बार डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. कहा, कुछ नहीं कर सकते हम. पूरनचंद उन्हें गुरु की वडाली ले आए. चार दिन तक उनके पास बैठे रहे. अन्न का एक दाना तक मुंह में नहीं डाला. पांचवें दिन बाबा मस्तान शाह की मज़ार से एक सूफी संत आए. प्यारेलाल को छुआ. कुछ कलाम गाए. कहा, ‘शामां नू बोल पाएगा’. प्यारेलाल मौत के मुंह से वापस आ गए.

वडाली भाइयों को शुरू-शुरू में माइक पर गाना पसंद नहीं था. आदत जो ठहरी थी दिल के सुर को गले से उतार सजदे में उछाल देने की. धीरे-धीरे माइक को जगह दी उन्होंने अपने संगीत में.

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वडाली ब्रदर्स और पूरनचंद के बेटे लखविंदर वडाली. (तस्वीर: फेसबुक)

सूफी गानों को अक्सर मोहब्बत के गानों की तरह मानकर उन्हें प्रेमी-प्रेमिका तक बांध दिया जाता है. लेकिन सच्चे सूफी गायक जब तान साधते हैं, तो वो सीधे उस ताकत के आगे झुकती है, जिसने दुनिया सिरजी और आप कोने में बैठ बस देख रहा है. वडाली भाइयों की विरासत उसी लहजे को बनाए रखे हुए है.

 

प्यारेलाल वडाली साहब का दिल के दौरे की वजह से 2018 में निधन हुआ. अब पूरनचंद वडाली साहब अपने बेटे लखविंदर वडाली के साथ गाते हैं. लखविंदर में एक तरह की चमक है. वो जो आज के दौर की पीढ़ी को खींचती है. उनके बड़े भाई आर्मी में रहे. चचेरे भाई यानी प्यारेलाल वडाली के बेटे सतपाल वडाली भी गाते हैं. लखविंदर कनाडा में पॉप म्यूजिक गाते थे, अब पिता का साथ देते हैं. परफॉरमेंस के बीच में उम्र के बोझ से झुकती अपने पिता की आवाज़ को हौले से संभाल आलाप देते हैं, और आस-पास के संगतकार झूमकर कुछ और शिद्दत से साथ देने में लग जाते हैं. पिता की आंखें बेटे से मिलती हैं और बेटा उनके पैरों में झुक जाता है. ये वो पल है, जब शायद संगीत खुद नम आंखों से एक बूढ़े आदमी के पैरों को पखार रहा होता है.

ये वो पल है, जिसे बार-बार देखने के लिए मैं भगवान से भी लड़ने को तैयार हूं. और मुझे पता है कि वो मुझे माफ़ कर देंगे, क्योंकि सच्चे सुर में डूबा इंसान ख़ुदा से भी बढ़कर हो जाता है. ऐसे इंसान के सामने झुकना, अनगिनत सजदों के बराबर होगा, मुझे यकीन है. क्योंकि,

तुझ बिन जीना भी क्या जीना, तेरी चौखट मेरा मदीना,

कहीं और ना सजदा गवारा

तू माने या ना माने दिलदारा.

असां ते तैनूं रब मनया !


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