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उत्तर कोरिया के इस बागी ने वहां के सुप्रीम लीडरों की अय्याशी की कहानी बताई है

किम जोंग-उन की शानो-शौकत का पैसा कहां से आता है?

आज की कहानी एक ‘सुप्रीम लीडर’ की है. जिसके राज में सब चंगा दिखता है. प्रोपेगैंडा में.

मुल्क़ में एक सड़क की मरम्मत भी हो तो उसके लिए सुप्रीम लीडर को शुक्रिया कहना पड़ता है. लेकिन वहां कुछ बिगड़ जाए तो माननीय अदृश्य हो जाते हैं.

सुप्रीम लीडर की एक खासियत और भी है. उनकी शानो शौकत. भले ही जनता भूख से मर जाए, लेकिन उनकी शान में खलल नहीं पड़ता. गांवों में लोग एक अदद निवाले के लिए तरसते हैं. और, राजधानी में चकाचौंध बढ़ती जाती है.

वहां बस एक सिद्धांत चलता है – Either you fall in line or you are dead. या तो आप सुप्रीम लीडर के साथ रहिए या गायब हो जाइए.

ये कहानी उत्तर कोरिया और वहां के तानाशाह किम जोंग-उन की है. उत्तर कोरिया इस समय भयावह आर्थिक संकट का सामना कर रहा है. अप्रैल 2021 में किम जोंग-उन ने कहा था कि उत्तर कोरिया तीन दशक पुरानी स्थिति में पहुंच गया है. 90 के दशक में आए अकाल ने दस लाख से अधिक लोगों की जान ले ली थी.

अप्रैल 2021 के बाद से स्थिति और बिगड़ी ही है. इसके बावजूद उत्तर कोरिया में भव्य सैन्य परेड का आयोजन चालू है. पड़ोसियों को दी जा रही धमकियों में रत्तीभर का अंतर नहीं आया है. नए हथियारों की नुमाइश बंद नहीं हुई है. सितंबर महीने में उत्तर कोरिया ने चार अत्याधुनिक मिसाइलों का परीक्षण किया. और तो और, किम जोंग-उन की सत्ता पर भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है.

उत्तर कोरिया के पास आख़िर पैसा आता कहां से है?

उत्तर कोरिया एक बंद मुल्क़ हैं. बाहरी दुनिया से उनका संपर्क न के बराबर है. उत्तर कोरिया के आम लोग देश के बाहर नहीं जा सकते. कुछ गिनती के देशों से उनका व्यापारिक संबंध है. आपके मन में अक्सर सवाल उठता होगा कि उत्तर कोरिया इतनी शानो शौकत दिखाता कैसे है? सुप्रीम लीडर की अय्याशी की फ़ंडिंग कहां से आती है?

अभी तक ये सब अनुमानों के आईने में क़ैद था. शंका थी कि उत्तर कोरिया ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के जरिए पैसा कमाता है. लेकिन अब शंका के बादल छंटने लगे हैं. कैसे?

दरअसल, उत्तर कोरिया के एक बागी किम कुक-सोंग ने कुछ राज़ खोल दिए हैं. बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उत्तर कोरिया के पास आख़िर पैसा आता कहां से है?

किम कुक-सोंग ने 30 सालों तक उत्तर कोरिया की सीक्रेट सर्विस में काम किया. उन्होंने सुप्रीम लीडर के आदेश पर जासूसी से लेकर हत्या तक की. 2013 में उन्हें अपनी जान का ख़तरा महसूस हुआ. इसलिए वो सपरिवार भागकर दक्षिण कोरिया आ गए. तब से वो सियोल में रह रहे हैं.

उत्तर कोरिया से निकलने के बाद कुक-सोंग का ये पहला इंटरव्यू था. इसमें उन्होंने और क्या-क्या बताया? उत्तर कोरिया की सत्ता कैसे चलती है? वहां की सीक्रेट सर्विस कैसे काम करती है? और, अवैध कमाई से आने वाला पैसा आख़िर जाता कहां है?

साल 1994. उत्तर कोरिया में भयानक अकाल पड़ा. तीन बरस पहले ही सोवियत संघ का विघटन हो चुका था. उसने मदद भेजना बंद कर दिया था. उत्तर कोरिया के एक और सहयोगी देश चीन ने भी हाथ पीछे खींच लिया. रही-सही कसर बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं ने पूरी कर दी. बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें खत्म हो चुकीं थी. अनाज का उत्पादन ठप पड़ गया था. जो स्टॉक बचा हुआ था, उसे राजधानी प्योंगयांग की तरफ़ भेज दिया गया.

नतीजा ये हुआ कि अकाल ने चार सालों में कम-से-कम दस लाख लोगों की जान चली गई. कई रिपोर्ट्स में ये आंकड़ा 35 से 40 लाख तक बताया जाता है. इस अकाल को नाम दिया गया, ‘द आर्डुअस मार्च’. हिंदी में बोलें तो ‘दुसाध्य सफ़र’. इससे उबरना यकीनन बेहद मुश्किल था. हालांकि, अमेरिका और बाकी देशों की मदद के सहारे उत्तर कोरिया इस स्थिति से निकल गया.

जिस समय देश की जनता एक अदद रोटी के लिए तरस रही थी, उस समय सुप्रीम लीडर की अय्याशी चरम पर थी. 1993 में उत्तर कोरिया की सत्ता किम जोंग-इल के हाथों में आ गई थी. उन्होंने अपने पिता किम इल-संग से दो चीज़ें विरासत में पाई थी – कुर्सी और प्रोपेगैंडा. अकाल के दौरान किम जोंग-इल ने ये प्रचार कराया कि वो आधा कटोरी चावल पर अपना गुज़ारा कर रहे हैं. लोगों को लगा, अगर सुप्रीम लीडर आधा कटोरी चावल खाकर जी रहे हैं तो सच में हालात बुरे हैं. हमें भी उनका अनुसरण करना चाहिए.

एक तरफ़ जनता उनसे प्रेरणा ले रही थी, दूसरी तरफ़ कुछ और ही खेल चल रहा था. कहते हैं कि किम जोंग-इल को बिना शराब के खाना गले से नीचे नहीं उतरता था. उनके शराबख़ाने में दस हज़ार से अधिक बोतलें रखी हुई थीं. दुनिया की सबसे महंगी शराब की किस्में उनके स्टॉक में थी. उनके लिए रोज़ाना अलग-अलग देशों की डिश पकाई जाती थी. दुनियाभर से बेस्ट शेफ़ उनके लिए खाना बनाने के लिए बुलाए जाते थे. उनका आदेश था कि चावल के दाने एक रंग और एक आकार के हों. इसमें थोड़ी सी भी गुस्ताख़ी मंज़ूर नहीं थी.

किम जोंग-इल को एक बार एक अलग प्रकार का केक खाने का चस्का लगा. केक लाने के लिए उन्होंने अपने कुक को जापान भेज दिया. इस केक के एक कौर की कीमत लगभग दस हज़ार रुपये थी.

प्योंगयांग में एक इंस्टिट्यूट सिर्फ़ और सिर्फ़ किम के खान-पान का ख़्याल रखने के लिए बनाया गया था. उसमें उत्तर कोरिया के सबसे बेहतरीन डॉक्टर्स की टीम इस पर रिसर्च करती थी कि सुप्रीम लीडर क्या खाएं और क्या पिएं.

जब उत्तर कोरिया में लोग भूख से मर रहे थे, तब सुप्रीम लीडर की अय्याशी का पैसा कहां से आ रहा था?

बीबीसी को दिए इंटरव्यू में किम कुक-सोंग ने इसके पीछे की कहानी बताई है. कुक-सोंग 90 के दशक में ऑपरेशंस डिपार्टमेंट में काम कर रहे थे. एक दिन उनके पास एक आदेश आया. चिट्ठी की शक्ल में. आदेश था कि सुप्रीम लीडर के लिए ‘रेवॉल्युशनरी फ़ंड’ बढ़ाओ.

इसके बाद कुक-सोंग विदेश गए. वहां से वे तीन लोगों को साथ लेकर आए. ये लोग क्रिस्टल मेथ नामक ड्रग बनाने में माहिर थे. फिर वर्कर्स पार्टी के एक दफ़्तर में ही मेथ की फ़ैक्ट्री डाली गई. ड्रग्स बनाकर बाहर के देशों में बेचा गया और फिर उससे मिले पैसे सुप्रीम लीडर के हवाले कर दिए गए. इनमें से कितना पैसा आम जनता के लिए था? शून्य. सारे पैसे किम जोंग-इल के ऐशो-आराम का सामान खरीदने में खर्च किए गए.

किम कुक-सोंग ने उत्तर कोरिया की कमाई का एक और अवैध रास्ता है. वो क्या है? हथियारों की तस्करी. उत्तर कोरिया सस्ते दामों में घातक हथियार बनाने में सक्षम है. 80 के दशक से ही उसने ईरान, मिडिल-ईस्ट और अफ़्रीका के छोटे-छोटे देशों में हथियारों की तस्करी शुरू कर दी थी. 1991 की एक इंटेलीजेंस रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर कोरिया ने बीते आठ सालों में लगभग तीस हज़ार करोड़ के हथियारों का निर्यात किया था. ये हथियार उन देशों को भी बेचे गए, जहां पर सिविल वॉर चल रहा था या तानाशाही सरकारें जनता पर अपनी मनमर्ज़ी थोपने की साज़िश रच रही थी.

फ़रवरी 2018 में यूनाइटेड नेशंस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उत्तर कोरिया ने सीरिया, म्यांमार, लीबिया और सूडान में हथियारों की सप्लाई की. यूएन ने चेतावनी भी दी थी कि इससे कई इलाकों में गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे.

किम कुक-सोंग ने इंटरव्यू में और क्या-क्या जानकारी दी?

– उत्तर कोरिया में इंटरनेट की सुविधा कुछ ही लोगों तक सीमित है. इसके बावजूद सरकार ने छह हज़ार एक्सपर्ट हैकर्स की टीम बनाई हुई है. प्योंगयांग की एक यूनिवर्सिटी देशभर से सबसे होनहार स्टूडेंट्स को चुनती है. फिर उन्हें छह सालों तक ट्रेनिंग दी जाती है. हैकर्स के ऑफ़िस का सीधा कॉन्टैक्ट सुप्रीम लीडर के दफ़्तर से जुड़ा है. हैकर्स को सीधे वहीं से आदेश आते हैं.

2017 में ब्रिटेन की कुछ सरकारी संस्थाओं का सिस्टम हैक हुआ था. उससे पहले 2014 में सोनी पिक्चर्स को भी निशाना बनाया था. जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि इन साइबर अटैक्स के पीछे लेज़ारस ग्रुप का हाथ था. ये ग्रुप उत्तर कोरिया का है.

– कुक-सोंग ने दावा किया कि उत्तर कोरिया के एक जासूस ने छह सालों तक ‘ब्लू हाउस’ में नौकरी की. उसके बाद वो वहां से वापस लौट आया. इसके बारे में कभी किसी को जानकारी नहीं हुई. ब्लू हाउस साउथ कोरिया के राष्ट्रपति का आधिकारिक आवास है.

कुक-सोंग ने ये भी कहा कि इस समय भी साउथ कोरिया की सरकारी संस्थाओं में उत्तर कोरिया के कई एजेंट्स काम कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने इस बारे में कोई जानकारी देने से मना कर दिया.

– एक और घटना सुनिए. साल 2009 में किम जोंग-इल बीमार पड़ गए. तब उनके बेटे किम जोंग-उन को शासन चलाने के लिए तैयार किया जाने लगा. उसी साल एक नई खुफिया एजेंसी बनाई गई. नाम रखा गया, रकोनेसेंस जनरल ब्यूरो. मई 2009 में एजेंसी के पास एक प्रोजेक्ट आया.

ये प्रोजेक्ट वांग जेंग-योप की हत्या से जुड़ा था. जेंग-योप एक समय उत्तर कोरिया के सबसे ताक़तवर लोगों में से थे. एक बार वे सुप्रीम लीडर की नीतियों से नाराज़ हो गए. जैसा कि जेंग-योप दावा करते हैं, उन्होंने ड्रग्स की तस्करी और हथियारों की अवैध खरीद-फ़रोख़्त की आलोचना की. नतीजतन सरकार उनके ख़िलाफ़ हो गई. सज़ा के डर से जेंग-योप भागकर साउथ कोरिया पहुंच गए. उत्तर कोरिया में आप तभी तक सांस ले सकते हैं, जब तक कि आप सुप्रीम लीडर की हां में हां मिलाते रहें. जिस दिन ये लय बिगड़ी, उस दिन यात्री अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदार स्वयं हो जाती है.

1997 में भागने के बाद भी उत्तर कोरिया ने जेंग-योप का पीछा नहीं छोड़ा. मई 2009 में किम जोंग-उन ने अपने पिता को सरप्राइज़ देने के लिए जेंग-योप की हत्या करने का फरमान जारी किया. साउथ कोरिया बागियों को हरसंभव मदद देता है. वो उन्हें नई शुरुआत का मौका देता है. इसी का फायदा उठाकर उत्तर कोरिया के दो एजेंट बागी बनकर दक्षिण कोरिया में घुस गए. हालांकि, जब तक वे अपने प्लान को अंज़ाम दे पाते, दोनों पकड़े गए. दोनों के ऊपर मुकदमा चला और उन्हें दस साल के क़ैद की सज़ा सुनाई गई.

आपने किम कुक-सोंग के बारे में सुना. अब उनका संक्षिप्त परिचय भी जान लीजिए.

कुक-सोंन ने उत्तर कोरिया में अपनी ज़िंदगी के बारे में कई दावे किए. उन्होंने बताया कि उन्हें किम जोंग-उन की चाची ने एक महंगी कार दी थी. वो सुप्रीम लीडर के लिए पैसे जुटाने के लिए विदेश यात्रा पर जाते रहते थे. उनकी ज़िंदगी मज़े में कट रही थी.

फिर एक दिन सब बदल गया. किम जोंग-इल की तबीयत खराब रहने लगी. उस समय हर तरफ़ चर्चा चल रही थी कि सत्ता उनके भाई जेंग सोंग-ताएक के पास आएगी. उन्हें कुर्सी का प्रबल दावेदार माना जा रहा था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. किम जोंग-उन ने उससे पहले ही अपनी पकड़ मज़बूत कर ली. किम जोंग-उन ने सत्तासीन होते ही उन लोगों की लिस्ट बनाई जिनसे उन्हें ख़तरा महसूस हो रहा था. दिसंबर 2013 में किम जोंग-उन ने अपने चाचा जेंग सोंग-ताएक को मरवा दिया.

उस समय किम कुक-सोंग विदेश में थे. उन्हें इस हत्या की जानकारी अख़बार से मिली. वो किम जोंग-उन के चाचा के करीबी थे. उसी समय उन्हें लग गया था कि देर-सवेर उनकी भी बारी आ सकती है. तभी उन्होंने परिवार के साथ उत्तर कोरिया छोड़ने का फ़ैसला कर लिया. 2014 में वो दक्षिण कोरिया आ गए.

किम कुक-सोंग ने तीस सालों तक उत्तर कोरिया की खुफिया एजेंसियों में अहम पदों पर काम किया. उन्होंने सुप्रीम लीडर के दिए हर आदेश को वफ़ादारी से निभाया. लेकिन उत्तर कोरिया में आपका पद या आपकी वफ़ादारी किसी काम नहीं आती. वहां सुप्रीम लीडर की नीयत ही सब तय करती है.

जब नॉर्थ कोरिया के सुप्रीम लीडर ने अपने चाचा जांग सोंग थाएक को मरवा दिया था

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