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वो महान गायिका, जो अपने अंतिम दिनों में मंच पर आई तो उन्हें दर्शकों ने पहचाना तक नहीं

गुरु दत्त. डायरेक्टर, राइटर, एक्टर. वो वाले जो दुनिया के महान फिल्मकारों में गिने जाते हैं. जिनके नाम की भभूत उनके बाद से सभी टॉप डायरेक्टर लगाते रहे हैं. उनकी ‘प्यासा’, ‘काग़ज के फूल’ कल्ट हैं. वे 39 की उम्र में मर गए. शराब के साथ नींद की गोलियां ले ली. उन्हें छोड़ किसी को नहीं पता जान क्यों दी? हालांकि उनके दोस्त अबरार अल्वी ने कहा कि वे सुसाइड करने के तरीकों पर उनसे पहले भी चर्चा कर चुके थे.

चार चीजें थीं जिनके दाब से उनका भेजा कुकर की तरह फटने को था.

ये दुनिया – जो मिल भी जाती तो क्या था. इसी के मसले उन्हें पाग़ल किए थे.

फिल्में – इस एक्सप्रेशन को लेकर उनके मन में बहुत कुछ था. लेकिन इतना आसान नहीं होता दुनिया और फिल्म माध्यम की शर्तों पर चलते हुए अपनी अभिव्यक्ति करना. कुछ जीवन की दुश्वारियों ने न करने दिया, कुछ हालातों ने.

वहीदा रहमान – जो उनकी म्यूज़ थी, शायद प्रेमिका भी थीं लेकिन तब इस रिश्ते का भविष्य न था. ये अध्याय केंद्र में था.

गीता दत्त – उनकी पत्नी. जिनसे बहुत प्यार था. लेकिन वे महत्वाकांक्षी, possessive और अशांत थीं. टूट भी चुकी थीं. अंततः दोनों इंसान ही थे, नहीं बचा पाए अपनी दुनिया.

जितनी महत्वपूर्ण और बेसब्र करने वाली कहानी गुरु दत्त की है, उतनी ही गीता दत्त की भी. उनके जीवन की हाइलाइट्स भी ऐसी ही रहीं. आज बात उन्हीं की. गीता दत्त का जन्म 23 नवंबर 1930 को फरीदपुर, बंगाल (बांग्लादेश) में हुआ था.

गीता दत्त.
गीता दत्त.

गुरु दत्त की बतौर डायरेक्टर पहली फिल्म ‘बाज़ी’ (1951) के एक गाने की रिकॉर्डिंग बंबई के महालक्ष्मी स्टूडियो में हो रही थी. गाना था “तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले”. इसे गाने आई थीं 20-21 साल की युवती गीता. वो युवती तब ही इतनी ऊंचाई पर बैठी थी कि गुरु दत जैसों का दायरा न था. गीता स्टार सिंगर थीं. तब तक कई भाषाओं में 400-500 या ज्यादा गाने गा चुकी थीं. भव्य लिमोज़ीन में घूमती थीं.

गुरु दत्त का बड़ा परिवार था. घर छोटा था. एक टेबल, एक कुर्सी थी जिस पर गुरु का सारा सृजन होता था. फाकामस्ती करते थे. वहीं गीता का पूरा नाम ही गीता घोष रॉय चौधरी था. जितना लंबा नाम उतना ही समृद्ध जमींदार परिवार. लेकिन फिर भी दोनों में प्यार हो गया था. जोरदार.

गीता की ननद ललिता लाज़मी थीं. गुरु दत्त की छोटी बहन. जो भारत की जानी-मानी आर्टिस्ट हैं. ‘रुदाली’ जैसी फिल्मों की डायरेक्टर कल्पना लाज़मी की मां. ललिता का कहना है कि गीता की खूबसूरती चकित कर देने वाली थी, ‘वो अजंता की गुफाओं में बनी पेंटिंग जैसी थी – डार्क और ब्यूटीफुल.’ वहीं गीता की बेटी नीना मेमन के मुताबिक, ‘मेरी मां बच्चों जैसी नटखट थीं. मौज में रहने वाली. उन्हें अपने दोस्तों के साथ बातें करना बहुत पसंद था. मैंने अपनी मां को कभी-कभार ही अकेले देखा. वे घर में ही रहना पसंद करती थीं. उनकी आदत थी कि वे बैठे-बैठे हारमोनियम पर हिंदी और बंगाली गाने गाती रहती थीं.’

तीन साल प्रेम के बाद दोनों ने शादी कर ली. साल था 1953. गोधूलि बेला में बंगाली रस्मों से दोनों का विवाह हुआ.

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शादी के दौरान गुरु और गीता दत्त.
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गीता को बधाई देने पहुंची लता मंगेशकर.

इसके बाद खार इलाके में एक किराये के फ्लैट में गीता-गुरु दत्त रहने लगे. दोनों के तीन बच्चे हुए.

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उसके बाद दोनों के संबंध खराब हो गए. कई वजहें थीं, कौन सी कितनी सच है नहीं पता. ललिता के मुताबिक, “दोनों में ईगो को टकराव था. साथ ही गीता शायद किसी बात से आहत थी. उनकी शादी 11 साल चली लेकिन दुखद चली. दोनों ही ब्रिलियंट आर्टिस्ट थे लेकिन निरंतर दरार बढ़ती रही. गीता एक्ट्रेस बनना चाहती थी. उसके लिए गुरु दत्त ने 1956-57 में कलकत्ता में ‘गौरी’ नाम की फिल्म बनानी शुरू की. लेकिन जल्द ही फिल्म को बंद करना पड़ा. गीता के साथ दिक्कत ये भी थी कि वो गुरु दत्त को लेकर बहुत पज़ेसिव थी. किसी भी वैवाहिक जीवन में ये बहुत खराबा करने वाली बात होती है. डायरेक्टर और एक्टर जैसे क्रिएटिव लोग कई एक्ट्रेस के साथ काम करते हैं. ये आभासी दुनिया है. उन्हें परदे पर प्यार करते दिखना होता है और उसे असली प्यार जैसे दिखाना होता है. गीता को गुरु दत्त के साथ काम करने वाली हर औरत पर शक़ था. अगर आप आदमी को हर वक्त सवाल करोगे तो अंत में आप उसे दूर भेज दोगे. वो उन पर हर वक्त नजर रखती थी. गीता की सिर्फ यही एक गलती थी. दोनों के बीच लगातार झगड़े होते रहते थे. वो बच्चों को लेकर अपनी मां के घर चली जाती थी. वो याचना करता था घर लौट आओ. अगले दिन गुरु दत्त डिप्रेशन में चले जाते थे और हमें फोन करते थे कि गीता बच्चों को लेकर चली गई है. ऐसा एक बार तब भी हुआ था जब दोनों की शादी नहीं हुई थी और अफेयर चल रहा था. गीता थोड़ी सी तकरार के बाद गायब हो गई थी. वो एक फ्रेंड के यहां नासिक चली गई थी और पीछे सब लोग चिंता करते रह गए. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि गुरु दत्त गीता को बहुत ज्यादा प्यार करते थे. गुरु दत्त की सुसाइड करने की प्रवृति नई नहीं थी, वो पहले भी दो बार कोशिश कर चुके थे. दूसरी बार उन्हें नानावटी हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया और वो तीन दिन के लिए कोमा में चले गए थे. एक दोपहर उन्हें होश आया तो जो पहला शब्द उनके मुंह से निकला वो था – गीता. लेकिन वे दोनों ही आत्म-विनाश के रास्ते पर निकल चुके थे.”

फिल्म चौदहवीं का चांद के कार्यक्रम में वहीदा रहमान, गुरु दत्त और गीता.
फिल्म चौदहवीं का चांद के कार्यक्रम में वहीदा रहमान, गुरु दत्त और गीता.

दूसरा पक्ष देखें तो कहा जाता है कि शादी के बाद गुरु दत्त ने गीता को कहा कि वे दूसरे निर्देशकों के लिए न गाएं और घर पर रहें. हालांकि इस बात की पुष्टि की कोई वजह नहीं है. लेकिन कहा जाता है इस कारण गीता डिप्रेशन में जाने लगीं. गुरु दत्त और वहीदा रहमान एक के बाद एक फिल्म में साथ काम कर रहे थे. उनके अफेयर के चर्चे चारों तरफ थे. गीता घर पर बेकार बैठी थीं. उनकी भी महत्वाकांक्षाएं थीं. उन्हें सिंगिंग के अलावा एक्टिंग में भी आगे बढ़ना था. इसीलिए ‘गौरी’ फिल्म शुरू की गई. लेकिन गुरु दत्त ने दो दिन में शूटिंग बंद कर दी. कारण बताया गया कि गीता का बर्ताव ठीक नहीं है. कि वे रिहर्सल पर नहीं आती हैं.

लेकिन वे ऐसा क्यों कर रही थी इसे लेकर बहुत निश्चिंत होकर कुछ भी कहना गलत होगा. एक इंसान प्रेम वाले रिश्तों में, दोस्ती में किन अदृश्य भावों से घिरा रहता है उन्हें शब्दों, कहानियों से कभी पूरी वस्तुपरकता से नहीं बताया जा सकता. जैसे सिर्फ इस एक स्थिति में सब पात्रों के मन को समझिए.

गुरु दत्त 1958 में अपनी फिल्म ‘काग़ज के फूल’ बना रहे थे. ये वो वक्त था जब उनके वहीदा रहमान से संबंधों के कारण घर में कलह चलती थी. गीता दुखी थीं. अब फिल्म की कहानी देखें. एक डायरेक्टर है जिसकी बीवी है. समृद्ध सामाजिक आर्थिक परिवार से है. दोनों के एक बच्ची है लेकिन वो पति को बच्ची से मिलने नहीं देती. एक दिन स्टूडियो में वो शूटिंग कर रहा होता है कि उसे एक युवती नजर आती है जो पहले भी मिल चुकी थी. वो कैमरा के सामने से उसे आते देखता है तो चौंक जाता है. उसमें अपनी म्यूज देखने लगता है. उससे प्रेम भी हो जाता है. लेकिन जमाना दोनों के रिश्ते को कुबूल नहीं करेगा इस सोच से वो कष्ट में रहता है. फिर फिल्म का एक अंत होता है.

अब ये पूरी कहानी, सिवा अपने अंत के, गुरु दत्त, गीता और वहीदा की कहानी है. त्रासदी देखिए कि इसी फिल्म में सारे फीमेल सॉन्ग गीता ने गाए. और यही गाने वहीदा पर फिल्माए गए. फिल्म में वहीदा का पात्र दुख से वो गाने गाता है, जिन्हें शायद उससे भी अधिक दुख के साथ गीता ने रिकॉर्डिंग स्टूडियो में गाया था.

ऐसा नहीं है कि गीता को गुरु दत्त से प्यार नहीं था. लेकिन पांच-छह साल बाद 1964 में गुरु दत्त अपने किराए के फ्लैट में मृत मिले. शराब और नींद की गोलियों के साथ उन्होंने दुनिया छोड़ दी.

गीता इस दुख से तबाह हो चुकी थीं.

उन्होंने शराब बहुत पीनी शुरू कर दी. ठीक अपने पति की तरह. नींद की गोलियों और दूसरी ड्रग्स का सहारा भी लिया. शादी के बाद जो गाने उन्हें मिलने थे वो आशा भोसले को मिलते रहे और आशा सफल हो गईं. गुरु दत्त की मृत्यु के बाद घर चलाने के लिए गीता को फिर काम शुरू करना पड़ा. छोटी-मोटी फीस के लिए वे स्टेज शो तक में परफॉर्म करने लगीं. शोज़ और रिकॉर्डिंग में उनके खूब शराब पीकर आने के किस्से भी सुनाई देते रहे.

1971 में गीता ने ‘अनुभव’ फिल्म में गाने गाए. जीवन में इतने तनाव और दुख को दौर में भी उन्होंने इसमें ‘मुझे जां न कहो मेरी जां’ और ‘कोई चुपके से आके’ जैसे गीत गाए जो आज भी यादगार हैं. अगले साल लिवर की बीमारी से गीता दत्त चली गईं. रेडियो पर उनके मरने की खबर उनके गाए गीत के साथ सुनाई गई – ‘याद करोगे एक दिन हमको याद करोगे’.

वे सिर्फ 42 साल की थीं.

ये भी ट्रैजेडी ही थी कि इसके दस साल बाद गीता के बड़े बेटे तरुण ने सुसाइड कर लिया. उस कमरे में गीता, गुरु दत्त की फोटो लगी थीं जिसमें वे और बच्चे खुश थे, मुस्करा रहे थे.

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गीता दत्त सिंगिंग की दुनिया में लता मंगेशकर से वरिष्ठ थीं. लेकिन गुरु से शादी के बाद उन्होंने ऐसा रास्ता ले लिया जिसका अंत कोई 45 साल पहले हो गया. लता उसके बाद भी गाती रहीं. उन्होंने परिवार नहीं बसाया और सिर्फ सिंगिंग पर केंद्रित रहीं. गीता ऐसा नहीं कर पाईं. जीवन के आखिरी पड़ाव में एक इवेंट में बहुत सारे सिंगर गाने के लिए जुटे. इसमें मोहम्मद रफी से लेकर लता मंगेशकर तब सब थे. लता जब मंच पर आईं तो भीड़ दीवानी हो गई. उनके गानों को भरपूर तालियां मिलीं. अंत में गीता मंच पर आईं. दर्शकों ने उन्हें पहचाना नहीं और उन्हें स्वागत नहीं मिला. वे आईं, अपना गाना गाया और चली गईं. तालियां और प्रशंसा उनके हिस्से नहीं आईं. एक आर्टिस्ट के साथ भीड़ का ये सबसे बर्बर और अमानवीय बर्ताव होता है. उस भीड़ को गीता की लैगेसी नहीं पता थी. वे लता से कहीं कम न थीं.

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