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फैमली मैन में तमिल संघर्ष देखा, पर वो पूरा सच नहीं है

आज है 29 जुलाई और इस तारीख का संबंध है एक शांति समझौते से. अमेरिकी थियोलॉजियन रेनहोल्ड नीबहर का एक कथन है,

‘मनुष्य में न्याय करने की क्षमता है, इसी कारण लोकतंत्र सम्भव है. लेकिन मनुष्य का अन्याय की तरफ़ झुकाव है, इसलिए लोकतंत्र ज़रूरी है.’

आज के एपिसोड की इस कथन से शुरुआत क्यों. ये बताने से पहले थोड़ी गणित समझनी होगी. गणित की एक ख़ास बात ये है कि ये फ़ॉर्म्युले पर चलती है.

जैसे (a+b)^2= a^2 + b^2 +2ab.

आपकी समझ पर भरोसा करते हुए हम ये तो नहीं पूछेंगे कि ये 2ab कहां से आया. लेकिन एक बात की तरफ़ इशारा ज़रूर करेंगे. इस फ़ॉर्म्युले में आप दुनिया की कोई भी संख्या रख दें तो उत्तर हमेशा सही ही आएगा. जिसे हम जेनरलाइज़ेशन करना कहते हैं. और ये ख़ास बात केवल गणित में है. और किसी जगह नहीं.

इक्वेशन ऑफ़ डेमॉक्रेसी

गणित की पहेली सुलझाना कमोबेश आसान है. पर इंसानी समस्याएं इससे कहीं अधिक जटिल हैं. एक ऐसी ही समस्या है समाज के संगठन की व्यवस्था. जिसके समाधान के लिए हम हंटर गैदरर से लेकर कृषि व्यवस्था की ओर बढ़े. फिर राजशाही. वहां से सामंतवाद और फिर अंत में हम रुके लोकतांत्रिक व्यवस्था पर. इसी लोकतंत्र में एक ऐसा ही फ़ॉर्म्युला है जो सॉल्व तो कुछ नहीं करता लेकिन जिसकी इक्वेशन में अगर घटकों को डाला जाए तो हमेशा एक ही आउट्पुट आता है. क्या है ये फ़ॉर्म्युला?

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2009 में बीजिंग की आर्ट प्रदर्शनी में लगा एक साइन (तस्वीर: AFP)

मायनॉरिटी और मेजॉरिटी को एक जगह पर साथ जोड़िए. इन दोनों घटकों में अपने आप में कोई दिक़्क़त नहीं है. अब अगर एक साथ अलग-अलग सम्प्रदाय के लोग रहेंगे तो कोई संख्या में ज़्यादा होगा कोई कम. लेकिन अब इस जोड़ में थोड़ा सांप्रदायिकता मिला दीजिए तो वॉला, लो खड़ी हो गई दिक़्क़त. चाहे इजराइल हो या अमेरिका, पाकिस्तान हो या भारत. समय-समय पर या कभी-कभी तो हमेशा के लिए ही लोकतंत्र कम्यूनल मेजॉरिटेरी के रूल में तब्दील हो जाता है. या फिर ‘मायनॉरिटी इमपीज़मेंट’ में. लोगों में सांप्रदायिकता का ये ज़हर घोल देने से लोकतंत्र में मूलभूत दिक़्क़तें खड़ी हो जाती हैं. जिसे हम अब तक सॉल्व नहीं कर पाए हैं.

तमिल-सिंहल संघर्ष की शुरुआत  

कुछ देर युवल नोआह हरारी जैसा फ़ील कर लेने के बाद. आइए चलते हैं आज के किस्से पर. हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका. भारत के दक्षिणी छोर पे बसा ये आइलैंड नेशन इसी मेजॉरिटी-मायनॉरिटी के चलते एक संघर्ष भरे इतिहास का गवाह रहा है. श्रीलंका के मैप को देखें. श्रीलंका के उत्तर और पूर्व के इलाक़े में अंग्रेजों से पहले तमिल राजाओं का शासन हुआ करता था. इसी कारण यहां रहने वाले लोगों में ज़्यादातर संख्या तमिलों की है. जबकि दक्षिण के हिस्से में सिंहल लोगों की बहुलता है.

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श्रीलंका में स्व-शासन की शुरुआत होने पर आयोजित औपचारिक समारोह (फ़ाइल फोटो: श्रीलंका सरकार)

इन दो हिस्सों में रहने वाले लोगों की भाषा और धर्म भी अलग-अलग हैं. जब ब्रिटिशर्स ने भारतीय महाद्वीप पर क़ब्ज़ा किया तो उन्होंने इस पूरे इलाक़े को एक यूनाइटेड रीजन बना दिया. तब इसका नाम सिलॉन हुआ करता था. ब्रिटिश आए तो साथ में ईसाई मिशनरी भी आए. उत्तर में जाफ़ना का इलाक़ा भारत और समंदर के तट के नज़दीक था. इसलिए मिशनरी सबसे पहले यहां पहुंचे. उनका इरादा धर्म का प्रचार प्रसार हुआ करता था. इसलिए उन्होंने इस हिस्से में कई सारे कॉन्वेंट स्कूल और कॉलेजों की स्थापना की. तमिलों को इसका फ़ायदा मिला. वो शिक्षित तो हुए ही, अंग्रेज़ी भाषा में भी निपुण हो गए. जब अंग्रेजों ने प्रशासन का काम सम्भाला. तो सिविल सेवाओं और दूसरी नौकरियों में तमिलों को प्राथमिकता मिली. एक तो वो उच्च शिक्षा हासिल किए होते थे, दूसरा अंग्रेज़ी भाषा के कारण.

भाषा का इस कहानी में मुख्य रोल है. फ्रांसीसी दार्शनिक और भाषाविद जैक देरिदा ने कहा है,

‘कोई व्यक्ति जब किसी गणितज्ञ या फ़िज़िसिस्ट को नहीं समझ पाता, तो वो उस पर ग़ुस्सा नहीं होता. ना ही तब, जब कोई उसके सामने विदेशी भाषा बोलता हो. वो केवल तब ग़ुस्सा होता है जब कोई उसकी अपनी भाषा के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश करे.’

भाषा संस्कृति की पहली इकाई है. भाषा को खो देना मतलब अपनी ज़मीन को खो देना. ब्रिटिश साम्राज्यवाद का यह एक थोड़ा छुपा हुआ पहलू है. जो पहली नज़र में जान और माल के नुक़सान के सामने कम लगता है. लेकिन इस उपमहाद्वीप के बहुत से झगड़े इस भाषा से खिलवाड़ की देन हैं. और ये आज तक चल रहे हैं.

ख़ैर वापस कहानी पर लौटते हैं. तमिलों के सरकारी नौकरी में बढ़ते प्रभुत्व से पहले पहल तो सिंहल लोगों को कुछ ख़ास फ़र्क नहीं पड़ा. हालांकि वो संख्या में ज़्यादा थे. आज़ श्रीलंका में तमिलों की आबादी लगभग 15% और सिंहलों की आबादी लगभग 70-75% के आसपास है. तब भी क़रीब-क़रीब यही अनुपात हुआ करता था.

सिंहल दक्षिण में रहते थे और दक्षिण का इलाक़ा खेती के लिए उपयुक्त था. ऐसे में सरकारी नौकरियों के हाथ से निकल जाने से सिंहलों को कोई ख़ास फ़र्क़ पड़ता नहीं दिखाई दिया. लेकिन हालात बदले जब फ़रवरी 1948 में श्रीलंका आजाद हो गया. आज़ादी के साथ आया लोकतंत्र. और अब सिंहलों के सुर बदल गए थे. वो मेजॉरिटी में थे. इसलिए सरकार ने ऐसी पॉलिसीज़ बनाई जिससे सिंहलों को फ़ायदा हो. इस दिशा में सबसे पहला काम था सिंहल भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा देना. पहले ये दर्जा अंग्रेज़ी को मिला हुआ था. जिसका फ़ायदा तमिलों को होता था.

LTTE का जन्म 

कॉलेज और स्कूली शिक्षा में भी तमिलों के साथ भेदभाव बढ़ने लगे. नतीजा हुआ कि तमिल सरकारी नौकरी से बेदख़ल हो गए. ऐसी स्थिति में टकराव होना निश्चित था. 50 और 60 के दशक तक तो तमिल शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और राजनैतिक वार्ता से विरोध जताते रहे. लेकिन 70 के बाद कई सारे तमिल विद्रोही संगठन खड़े हो गए. इनमें सबसे प्रमुख था लिट्टे (LTTE). 1976 में ‘तमिल टाइगर्स’ यानि LTTE की स्थापना हुई. LTTE का लीडर था वेल्लुपिलाई प्रभाकरण.

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LTTE प्रमुख वेल्लुपिलाई प्रभाकरण (तस्वीर: AFP)

LTTE एक बहुत ही पेशेवर और अनुशासन युक्त संगठन था. ये छोटे-छोटे बच्चों को अपनी सेना में भर्ती करते और उन्हें बहुत सख़्त ट्रेनिंग देते थे. ताकि वो लड़ने के लिए तैयार हो सकें. बहुत से तमिल युवा भी सरकार से नाराजगी के चलते LTTE की तरफ़ आकर्षित हुए. लड़ाई के लिए ये गुरिल्ला तकनीक और आत्मघाती हमलों का इस्तेमाल किया करते थे. लिट्टे का हर सिपाही अपने गले में साइनाइड की गोली डला हुआ लॉकेट पहने रहता था. ताकि उन्हें किसी भी हालत में ज़िंदा ना पकड़ा जा सके.

जी हां! बिलकुल फ़ैमिली मैन 2 की तरह.

जहां बाक़ी तमिल संगठन चाहते थे कि तमिलों के अधिकार वाले उत्तर और पूर्व के इलाक़ों को स्वायत्तता मिले. वहीं LTTE का केवल एक मकसद था. अलग तमिल राष्ट्र की स्थापना. LTTE की अपनी नेवी और एयरफ़ोर्स थी. हालांकि उसमें केवल 4-5 जहाज़ हुआ करते थे. जिनसे ये हथियारों की स्मगलिंग किया करते और हमलों को अंजाम देते थे. इसके अलावा उत्तर में जाफ़ना और पूर्व के हिस्सों में LTTE एक शैडो सरकार चलाया करता था.

भारत की एंट्री

अब इस कहानी में भारत की एंट्री होती है क़रीब 1980 के दशक में. भारत में रहने वाले तमिल और श्रीलंकाई तमिलों के पुराने रिश्ते थे. जिसके कारण भारतीय तमिलों की हमदर्दी लिट्टे के साथ थी. अब जैसी जनता की मर्ज़ी वैसी नेता की अर्ज़ी. सो तमिलनाडु की राजनैतिक पार्टियों ने मांग रखी कि भारत सरकार श्रीलंकाई तमिलों की मदद करे.
सरकार को भी चिंता थी कि श्रीलंका में अस्थिरता से भारत की संप्रभुता को भी ख़तरा हो सकता है. इसलिए भारतीय इंटेलिजेन्स एजेन्सी रॉ ने लिट्टे को मदद देना शुरू किया. उन्हें हथियार मुहैया कराए गए और LTTE के सदस्यों को ट्रेनिंग दी गई.

1987 में श्रीलंका की सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन शुरू किया. जिसका मक़सद था जाफ़ना के इलाक़े से LTTE का ख़ात्मा करना. इससे श्रीलंका में गृह युद्ध छिड़ गया. हेलिकॉप्टर और ग्राउंड अटैक की मदद से सेना ने जाफ़ना पर क़ब्ज़ा कर लिया. लेकिन इस दौरान इलाक़े में रहने वाले बहुत से तमिल नागरिकों की मौत हो गई. भारत के तमिल मीडिया ने इसे ‘ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस’ (मानवीय संकट) का नाम देते हुए भारत सरकार से हस्तक्षेप की मांग की. जिसके चलते 2 जून, 1987 को भारत ने मानवीय सहायता के तौर पर उत्तरी श्रीलंका में निहत्थे जहाजों का एक काफिला भेजा. लेकिन श्रीलंकाई नौसेना ने उसे बीच में ही रोक कर वापस लौटा दिया.

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गृह युद्ध के चलते श्रीलंका से पलायन करते तमिल (सांकेतिक तस्वीर: AFP)

नेवल मिशन की विफलता के बाद भारत ने निर्णय लिया कि वो हेलिकॉप्टर द्वारा रसद की सामग्री पहुंचाएगा. और श्रीलंका सरकार को चेतावनी दी कि अगर इस मिशन को रोका गया तो भारत इसे युद्ध की कार्यवाही मानेगा. और सैन्य कार्यवाही से इसका जवाब देगा.

गृह युद्ध की स्थिति को देखते हुए श्रीलंका सरकार ने सोचा कि ऐसे में भारत से युद्ध करना ठीक नहीं होगा. श्रीलंका के राष्ट्रपति जे.आर. जयवर्धने ने राजीव गांधी सरकार के सामने वार्ता की पेशकश की. कई दौर की वार्ता के बाद आज ही के दिन यानि 29 जुलाई 1987 को इंडो-श्रीलंकन अकॉर्ड पर साइन हुए थे. इस समझौते के तहत तय हुआ कि श्रीलंका सरकार अलग अलग प्रांतों को स्वायत्तता देगी. उत्तर के इलाक़े से सेना पीछे हट जाएगी. एक शर्त ये भी थी कि तमिल विद्रोही अपने शस्त्र समर्पण कर देंगे, और इस काम में मदद के लिए भारत एक पीस कीपिंग फ़ोर्स भेजेगा. इस अकॉर्ड में LTTE शामिल नहीं था. भारत ने प्रभाकरण को इस समझौते के लिए मनाने की कोशिश की थी. जिसके लिए खुद राजीव गांधी प्रभाकरण से मिले थे. इसके आगे की कहानी अगले हिस्से में जानेंगे.


वीडियो देखें- कोमागाटा मारू और सेंट लुइस जहाज़ का कनाडा के नस्लभेदी इतिहास से क्या कनेक्शन है?

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