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जलियावाला बाग कांड: 20 की उम्र में ली शपथ, 21 साल बाद बदला

आज है 19 जुलाई. और इस तारीख़ का रिलेशन है उधम सिंह से, जिन्होंने विदेश जाकर भारत के लोगों पर हुए जुल्म का बदला लिया.

चलिए 19 जुलाई के दिन से ही शुरू करते हैं.

रिटर्न टु द होमलैंड (पार्ट-2)

साल था 1974. दोपहर का वक्त. पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह और कांग्रेस के अध्यक्ष शंकर दयाल शर्मा एयरपोर्ट पर एक प्लेन का इंतज़ार कर रहे थे. प्लेन इंग्लैंड से आ रहा था. ज़ैल सिंह और शंकर दयाल शर्मा के पीछे ही कुछ दूर पर बहुत से सरकारी ऑफ़िसर और नौकरशाह खड़े थे. खूब तेज़ बारिश हो रही थी, पर किसी को मौसम का ख़याल न था. सभी पर्याप्त नर्वस थे. लेकिन उत्साहित भी. कारण, कि उनकी सालों की मेहनत आज रंग लाने वाली थी. प्लेन एयरपोर्ट पर उतरा तो वहां मौजूद सभी लोगों के सिर श्रद्धा से झुक गए. उधम सिंह पूरे 34 साल बाद घर लौट रहे थे.

कुछ दूर कपूरथला हाउस में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके स्वागत के लिए रुकी थीं. छाता ओढ़े हुए इंदिरा ने ताबूत पर फूलों का हार चढ़ाया. उनके लौटने का उत्साह इस कदर था कि प्रधानमंत्री ने ये घोषणा करवाई कि उनकी अंतिम यात्रा पंजाब के हर मुख्य शहर से होकर गुज़रेगी.

स्पेशल प्लेन के साथ एक अमेरिकन पत्रकार ‘बर्नार्ड वेनरॉब’ भी आए थे. अगस्त 5, 1974 को न्यू यॉर्क टाइम्स के आठवें पन्ने पर उनकी रिपोर्ट छपी. जिसमें इस नज़ारे को कुछ यूं बयान किया गया-

‘फूलों की मालाओं से सजा उधम सिंह का ताबूत पंजाब की सपाट, गीली सड़कों पर धीरे-धीरे चल रहा है. लंबी दाढ़ी और पगड़ी पहने हज़ारों सिख अपने अमर शहीद के चारों ओर लाइन लगाकर खड़े हैं. वो शहीद जिसे 1940 में दूर विदेश में फांसी दे दी गई. आज 34 साल बाद जो अपने देश की अंतिम यात्रा पर जा रहा है. चारों तरफ़ बस एक ही शोर है. उधम सिंह ज़िंदाबाद! उधम सिंह अमर रहे!’

31 जुलाई को उधम सिंह की अंतिम यात्रा अपने गांव सुनाम में जाकर ख़त्म हुई. सुनाम पंजाब के संगरूर में पड़ता है. सुनाम की धरती अपने सबसे प्यारे बेटे के इंतज़ार में पलके बिछाए बैठी थी. फूलों और मालाओं से पूरा गांव सजाया गया था.

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5 अगस्त, 1974 का न्यू यॉर्क टाइम्स अख़बार (तस्वीर: न्यू यॉर्क टाइम्स)

2 अगस्त को ज्ञानी ज़ैल सिंह ने उधम सिंह की चिता को आग दी. उनकी राख को 7 हिस्सों में बांटकर कलश में रखा गया. एक कलश हरिद्वार गंगा में विसर्जन के लिए भेजा गया. दूसरा कीरतपुर साहिब और तीसरा कलश रोज़ा शरीफ भेजा गया जहां सूफ़ी फ़क़ीर अहमद-अल फ़ारूक़ी की मज़ार है.

दो कलश आज भी सुनाम में उधम सिंह आर्ट्स कॉलेज लाइब्रेरी में में रखे हुए हैं. आख़िरी कलश को ‘जलियांवाला बाग’ ले जाया गया. वहीं, जहां 13 अप्रैल, 1919 को ‘जलियांवाला बाग’ हत्याकांड हुआ था. यहीं खून से लाल हुई मिट्टी को उठाकर उधम सिंह ने प्रतिज्ञा ली थी कि वो इस हत्याकांड का बदला लेकर रहेंगे. इस शपथ को पूरा करने के लिए उन्हें 21 साल का लम्बा इंतज़ार करना पड़ा.

उधम सिंह की कहानी

जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद उधम सिंह बदले की आग में जल रहे थे. अपने मकसद में आगे बढ़ने के लिए वो क्रांतिकारियों के साथ शामिल हो गए. इन्हीं दिनों उन्होंने दुनिया भर में गरीब और मज़लूम लोगों पर हो रहे शोषण का अध्ययन किया. दुनिया में जहां-जहां भारतीय बसे थे, वो अपनी-अपनी तरह से भारत की आज़ादी के आंदोलन को बुलंद कर रहे थे. उधम सिंह इन सभी लोगों से मिलना चाहते थे.

1924 में वो मेक्सिको के रास्ते अमेरिका पहुंचे. यहां उनकी मुलाक़ात ‘ग़दर पार्टी’ के लोगों से हुई. ग़दर पार्टी एक राजनैतिक पार्टी थी. अमेरिका और कनाडा में रहने वाले प्रवासी भारतीयों ने 1913 में इसका गठन किया था. इस पार्टी का मक़सद था साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष और भारत की आज़ादी.

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जालियाँवाला बाग घटना ही भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की शुरुआत बनी (तस्वीर: आर्काइव)

बहरहाल, अमेरिका में उधम सिंह ने 3 साल बिताए. इस दौरान वे कभी सैन फ़्रांसिस्को, कभी न्यू यॉर्क और कभी शिकागो में रहे. यहां रहते हुए एक अमेरिकन शिपिंग लाइन के लिए काम किया, और अपना नाम रखा ‘फ़्रैंक ब्राज़ील’. अमेरिका में रहते हुए उन्होंने ग़दर पार्टी का प्रचार-प्रसार किया. उन्होंने अपनी भी एक पार्टी बनाई. नाम था- आज़ाद पार्टी.

रिटर्न टु द होमलैंड (पार्ट-1)

अमेरिका में कुछ साल बिताने पर उन्हें लगा कि भारत जाकर आज़ादी के संघर्ष को बेहतर ढंग से आगे बढ़ाया जा सकता है. जुलाई, 1927 में वो भारत वापस लौट आए. लौटने के कुछ दिनों के अंदर ही उन पर आर्म्स एक्ट लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया. इसी दौरान जेल में उनकी मुलाक़ात भगत सिंह से हुई. भगत सिंह से उम्र में बड़े होने के बावजूद उधम सिंह उन्हें अपना गुरु मानते थे. भगत सिंह से उनका बहुत स्नेह था. इतना कि उनकी एक फोटो हमेशा उनके पर्स में रहती थी.

1931 में वो जेल से रिहा हुए. इसके दो साल बाद, 1933 में उन्होंने इंग्लैंड जाने का निर्णय लिया. और एक जाली पासपोर्ट के ज़रिए लंदन पहुंच गए. लंदन में काम करने वाले भारतीयों का एक संगठन था ‘इंडियन वर्कर एसोसिएशन’. उधम सिंह ने इस संगठन की सदस्यता ले ली. और खर्चा चलने के लिए हौज़री (कपड़े-लत्ते) का काम शुरू किया. इस दौरान उन्होंने इटली, फ्रांस और जर्मनी की यात्रा भी की. इन देशों में वो उन लोगों से मिले जो भारत की आज़ादी का समर्थन करते थे. ब्रिटेन में रहते हुए उन्होंने अपना नाम ‘राम मोहम्‍मद सिंह’ रख लिया था. इसके दो कारण थे. एक तो वो सर्वधर्म संभाव में यक़ीन रखते थे. दूसरा ये उनका अंग्रेजों की ‘फूट डालो, राज करो’ नीति के विरोध का तरीका था.

द लोन एवेंजर इन ब्रिटेन

एवेंजर्स फ़िल्म में टोनी स्टार्क यानि आइरन मैन, लोकी से कहता है,

‘If we can’t protect the earth, you can be damn well sure we will avenge it.’ यानि, ‘अगर हम धरती को बचा नहीं पाए, तो उसका बदला ज़रूर लेंगे’

देखें तो ये बात उधम सिंह पर बिलकुल एप्ट बैठती है. जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के दिन उधम सिंह वहीं मौजूद थे. उस दिन तो वो अंग्रेजों को रोक नहीं पाए. लेकिन उन्होंने ठान लिया था कि वो इसका बदला ज़रूर लेंगे.

बदला लिया भी. 13 मार्च, 1940 को. दिन था बुधवार. उधम सिंह लंदन स्थित ‘इंडिया ऑफ़िस’ गए. कुछ पासपोर्ट के काम के सिलसिले में. सर हुसैन हैदरी, जो उस समय ‘सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फ़ॉर इंडिया’ हुआ करते थे. उस दिन ऑफ़िस में नहीं थे. उधम सिंह ने सोचा, चलो ख़ाली समय बर्बाद करने से बेहतर कुछ और करते हैं.

दरवाज़े से बाहर आते हुए उनकी नज़र एक नोटिस पर पड़ी. नोटिस में लिखा था कि उस दिन शाम को ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ और सेंट्रल एशियन सोसायटी के बीच लंदन के कैस्टन हॉल में एक मीटिंग होने वाली है. उधम सिंह ने मीटिंग की डिटेल्स नोट करके रख ली. और घर चले गए. घर जाकर प्लान बनाया कि ‘पॉल रॉबिसन’ की फ़िल्म ‘प्राउड वैली’ देखने चलते हैं.

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हत्याकांड के बाद डायर को उसके पद से हटा दिया गया था, लेकिन वह ब्रिटेन में एक नायक बना रहा

उधम सिंह पिक्चर देखने पहुंचे तो सिनेमा हॉल बंद था. सोचा के घर लौट चलें. तभी उनका ध्यान अपनी जेब में रखे उस नोट पर गया, जिस पर सुबह उन्होंने एक मीटिंग की डिटेल्स लिखी थी. उधम सिंह के दिमाग़ में एक और प्लान का ख़ाका तैयार हो गया. तो क्या था वो प्लान?

बताते हैं, पहले एक सवाल. क्या आपने फ़्रैंक डेराबॉन्ट (frank darabont) की मशहूर फ़िल्म शॉशैंक रिडेम्पशन (Shawshank Redemption) देखी है? नहीं देखी है तो आगाह कर रहे हैं, स्पॉइलर एलर्ट.

फ़िल्म में जेल का वॉर्डन एंडी को एक बाइबल देते हुए कहता है,

‘सैल्वेशन ले विदिन’ यानि ‘मोक्ष अपने ही अंदर मिलता है’

फ़िल्म के अंत में एंडी जेल में सुरंग बनाकर भाग जाता है. वॉर्डन को वही बाइबल एंडी के जेल सेल में रखी मिलती है. वो उसे खोलकर देखता है तो किताब के अंदर पन्नों को उसी आकर में काटकर एक हथौड़ी रखी होती है. साथ में एक नोट लिखा मिलता है.

‘डियर वॉर्डन, यू वर राइट. सैल्वेशन लाइज़ विदिन’ यानि ‘प्यारे वॉर्डन, तुम सही थे. मोक्ष खुद के अंदर ही है’.

वापस अपने प्रश्न पर लौटते हैं. तो क्या था उधम सिंह का उस दिन का प्लान?

फ़िल्म हॉल से घर लौटकर बिल्कुल इसी स्टाइल में उधम सिंह स्मिथ एंड वेसेन मार्क 2 की एक रिवॉल्वर को किताब में रख देते हैं. और बंदूक़ की 8 गोलियाँ निकालकर अपनी पैंट की जेब में डालकर कैक्सटन हॉल की तरफ़ चल पड़ते हैं.

कैक्सटन हॉल

हॉल में एक बैठक का अभी-अभी समापन हुआ था. पंजाब के पूर्व गवर्नर ‘माइकल ओ’ ड्वायर’ (Michael O’Dwyer) ने जो वक्तव्य दिया था उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए लोग अपनी कुर्सियों से उठ-उठ कर जा रहे थे. तभी दो गोलियों की आवाज़ आई. माइकल ओ’ ड्वायर नीचे गिरा पड़ा था. और बंदूक उधम सिंह के हाथ में थी. इसके बाद उधम सिंह ने भागने की बजाय आत्मसमर्पण कर दिया.

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कैक्सटन हॉल, लंदन

अधिकतर लोग ये मानते हैं कि उधम सिंह ने जिसे मारा. वो जलियांवाला बाग़ का गुनाहगार जनरल डायर था. पर ये सच नहीं है. हत्या का आदेश जिसने दिया था, उसका नाम था – रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर. 1927 में मस्तिष्क रक्तस्राव से उसकी मृत्यु हो गई थी. कैस्टन हॉल में जिसकी हत्या हुई, वो था माइकल ओ’ ड्वायर जो कि जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के वक्त पंजाब का गवर्नर था.

रेडी टू डाई

घटना के बाद पुलिस ने उधम सिंह का बयान दर्ज़ किया. 2 अप्रैल, 1940 को ये बयान ‘डेली मिरर’ अख़बार में छपा. अख़बार ने लिखा था,

‘Ready to die, says Indian. I am dying for my country’. यानि ‘भारतीय कहता है मरने को तैयार हूं. मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं’

4 जून को कोर्ट में उनका ट्रायल शुरू हुआ. केवल दो दिनों में जज ने अपना फ़ैसला देते हुए उन्हें फांसी की सजा सुना दी.

अंतिम दिनों में उधम सिंह को किसी की याद आती थी तो वो थे भगत सिंह. जेल में क़ैद होने के दौरान उन्होंने एक पत्र में लिखा –

10 साल हो गए मेरा दोस्त भगत सिंह मुझे अकेला छोड़ कर चला गया. मुझे यक़ीन है कि मरने के बाद मैं उस से मिलूँगा. वो मेरा इंतज़ार कर रहा होगा. उसको 23 मार्च को फांसी दी गई थी. मुझे उम्मीद है वो मुझे भी इसी दिन फांसी पे चढ़ाएंगे’.

31 जुलाई, 1940 की सुबह थी. पूरे लंदन में जर्मन विमानों द्वारा गिराए जा रहे बमों का शोर था. इसी शोर के बीच सुबह 9 बजे उधम सिंह को पेंटनविले जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया.


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