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उस क्रिकेटर की कहानी, जिसने रिचर्ड्स, मियांदाद जैसे फिनिशर्स को धुंधला कर दिया!

23 दिसंबर, 2004. चेन्नई में इंडिया और बांग्लादेश का मैच. एक लंबे बाल वाले विकेटकीपर को पहली बार नीली जर्सी में देखा गया. नाम सभी जानते हैं. महेन्द्र सिंह धोनी. दुनिया के सबसे बड़े फिनिशर का नाम अगर आज किसी बच्चे से भी पूछा जाए, तो वो ये ही नाम लेगा. लेकिन 23 दिसंबर, 2004 के दिन जब दुनिया का सबसे बड़ा फिनिशर खेलने उतर रहा था, तो उससे 10 महीने पहले एक खिलाड़ी अपना आखिरी मैच खेल रहा था. मैच था ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के बीच. उसने क्रिकेट की डिक्शनरी में ‘फिनिशर’ शब्द को जगह दिलवाई थी.

उस खिलाड़ी का नाम है माइकल ज्वुइल बेवन. 08 मई, 1970 को ऑस्ट्रेलिया के बेलकोनन में जन्मा. साल 1994 में ऑस्ट्रेलिया के लिए डेब्यू किया. उसके बाद मैच को अंजाम तक कैसे पहुंचाया जाता है, ये इसने पूरी दुनिया को बता दिया.

स्टीव वॉ, मार्क टेलर, मार्क वॉ, माइकल स्लैटर जैसे खिलाड़ियों के खेलकर थक जाने के बाद बल्लेबाज़ी का मौका मिलने पर भी इस खिलाड़ी ने अपना नाम बनाने की ज़िद नहीं छोड़ी. नंबर छह पर उतरकर भी हर मैच में एक-सी बैटिंग कैसे की जाती है. ये बेवन ने दिखाया. इस वजह से उसकी टीम के साथियों ने उसका नाम ‘दि टर्मिनेटर’ रख दिया.

टीम के गेंदबाज़ और ऊपरी के क्रम के बल्लेबाज़ों का काम होता है मैच बनाना, जबकि मैच को जिताने का काम निचले क्रम के बल्लेबाज़ों पर होता है. माइकल बेवन उसी ख्याति के बल्लेबाज़ थे. एक नहीं, अनेक मौकों पर उन्होंने बने हुए मैचों में टीम को जीत दिलाई. बने हुए छोड़िए, उन्होंने तो खुद मैच बनाए और जिताए भी. 1996 से 2004 तक बेवन ऑस्ट्रेलियन टीम की असली ताकत थे. उन्होंने कई बार अपनी टीम को जीत दिलाई. इसकी गवाही उनके आंकड़े देते हैं. माइकल बेवन का वनडे एवरेज़ 53.58 का रहा. किसी भी बल्लेबाज़ का औसत 50 से ऊपर होने का साफ-साफ मतलब है कि वो ना जाने कितनी बार नॉट-आउट गया होगा.

Bevan New
माइकल बेवन. फोटो: cricket australia

अपने करियर के पहले मैच में उन्हें बैटिंग का मौका नहीं मिला. लेकिन दूसरे मैच में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ उन्होंने 63 गेंदों में 39 नॉट-आउट रन बनाए. उन्होंने क्रीज़ पर रहते हुए टीम को मैच जिता दिया. अपने पहले 10 मैचों में ही वो चार बार नॉट-आउट लौटे, जिसकी वजह से उनका एवरेज शुरुआत में ही 50 को पार कर गया.

बेवन की जीती हुई टीमों से छीनी हुई बाज़ी

#196 पारियों में 67 बार नॉट-आउट लौटना ही बताता है कि बेवन ने कितने मौकों पर ऑस्ट्रेलिया की नैय्या पारी लगाई है. इनमें सबसे ऐतिहासिक मैचों की बात की जाए तो 1996 वर्ल्डकप सेमीफाइनल उनमें एक है. वेस्टइंडीज़ के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया की टीम ने 15 रन पर 4 विकेट गंवा दिए थे. मार्क वॉ, टेलर, पोन्टिंग और स्टीव वॉ सब आउट होकर लौट गए. तब बेवन ने 69 रनों की पारी खेल टीम को 207 रनों तक पहुंचाया था. बाद में ऑस्ट्रेलिया ये मैच जीती भी.

# इसके अलावा 1997 में सेंचुरियन में साउथ अफ्रीका ने 284 रन बनाए. लेकिन ऑस्ट्रेलिया फिर से 58 रन पर तीन विकेट खोकर लड़खड़ा गई. बेवन ने 103 रन बनाकर यहां भी टीम को जीत दिलाई थी.

# 1999 वर्ल्डकप सेमीफाइनल में भी साउथ अफ्रीका के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया 68/4 विकेट खोकर लड़खड़ा गई थी. तब बेवन ने वॉ के साथ मिलकर टीम को पार लगाया था. उनकी मदद से टीम को 213 रनों का स्कोर मिला. बाद में ये मैच टाई हुआ ऑस्ट्रेलिया ने फाइनल खेला और जीता भी.

#2003 के ऐतिहासिक विश्वकप में भी इंग्लैंड के खिलाफ 205 रनों का पीछा करते हुए ऑस्ट्रेलिया 135/8 हो गई थी. लेकिन बेवन ने आखिर तक जमे रहकर ऑस्ट्रेलिया को इस मैच में जीत दिलाई.

माइकल बेवन के 10 साल लंबे करियर में ऐसे अनेक मैच और अनेक मौके रहे. लेकिन जिस एक मैच ने दुनिया को बताया कि क्रिकेट में ऐसा बल्लेबाज़ आ गया है, जो मैच बनाता नहीं, जिताता है, उस मैच की कहानी भी दिलचस्प है. आइये बताते हैं.

AUSvsWI एक जनवरी 1996

ऐसा नहीं है कि शुरुआत करते ही बेवन का करियर परवान चढ़ गया. शुरुआती 10 मैचों में 50 के औसत के बावजूद. पाकिस्तान दौरे के बाद बेवन को वनडे और टेस्ट दोनों टीमों से बाहर कर दिया गया. लेकिन उनकी किस्मत बदली बेन्सन एंड हेजिस वर्ल्ड-सीरीज़ में. जहां न्यू ईयर के दिन सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ के बीच मैच खेला गया.

बारिश की वजह से 43 ओवर के मैच में. वेस्टइंडीज़ की टीम पहले खेलते हुए 172 रन ही बना सकी. शेन वॉर्न और पॉल रिफल ने उन्हें रोक दिया. अब ऑस्ट्रेलिया को इस स्कोर को चेज़ करना था. लेकिन ऑस्ट्रेलियन टीम ने मार्क टेलर, माइकल स्लेटर, रिकी पोन्टिंग, स्टुअर्ट लॉ, मार्क वॉ, शेन ली और इयान हेली के विकेट भी गंवा दिए. वो भी सिर्फ 74 रनों पर.

माइकल बेवल नंबर छह पर उतरे थे. ली और हेली भी बेवन का साथ देने की बजाए जल्दी-जल्दी आउट होकर लौट गए. जीत के लिए अब भी 99 रनों की ज़रूरत थी. लेकिन विकेट सिर्फ तीन बचे. वो भी उन्हें छोड़कर बाकी सारे गेंदबाज़. बेवन को आउट करने के लिए वेस्टइंडीज़ ने एक बेईमानी वाली अपील भी की. रॉडर हार्पर ने बेवन को कॉट एंड बोल की अपील की, जबकि गेंद उनके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गई थी. लेकिन बेवन डंटे रहे. कैमरे ने भी ये सब पकड़ लिया था. अंपायर ने बेवन को नॉट-आउट दे दिया.

मैच धीरे-धीरे आगे बढ़ा. बेवन ने रेफल के साथ 83 रनों की अहम साझेदारी की. लेकिन रेफल स्कोर से 15 रन पहले आउट हो गए. बेवन अब भी क्रीज़ पर थे. आखिर में ऑस्ट्रेलिया को जीतने के लिए सात गेंदों में 11 रनों की ज़रूरत थी. बेवन ने चौका मारकर इस अंतर को कम कर दिया. अब आखिरी ओवर में 6 गेंदों में 7 रन. लेकिन पहली गेंद पर ही शेन वॉर्न आउट हो गए. स्ट्राइक मैक्ग्रा पर. ओवर की दूसरी गेंद पर एक रन लेकर मैक्ग्रा ने स्ट्राइक बेवन को दे दी.

अब चार गेंदों में छह रनों की दरकार. बेवन ने तीसरी गेंद पर एक रन लिया और स्ट्राइक फिर से मैक्ग्रा के पास. अब तीन गेंदों में पांच रनों की ज़रूरत. लेकिन मैक्ग्रा ने जैसे-तैसे गेंद को बल्ले से टच करके स्ट्राइक बेवन को लौटा दी.

अब ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए दो गेंदों में चार रनों की ज़रूरत. बेवन सीधा शॉट खेलते हैं. लेकिन गेंद सीधे गेंदबाज के हाथों में चली जाती है. कोई रन नहीं. अब आखिरी गेंद पर सिर्फ चौके की दरकार. बेवन ने वो कर दिया जो ऑस्ट्रेलिया को चाहिए थे. उन्होंने सीधे बल्ले से सीधा तेज़ शॉट मारा. और ये चौका. बेवन ने अपना बल्ला और हेलमेट दोनों उतारकर हवा में लहरा दिया.

बेवन 78 रनों पर नॉट-आउट लौटे. और ऑस्ट्रेलिया ने हारी हुई बाज़ी को अपने नाम कर लिया.

स्टैट्स के मामले में किससे आगे, किससे पीछे

माइकल बेवन भले ही टेस्ट क्रिकेट में ज़्यादा कुछ नहीं कर पाए, लेकिन वो वनडे क्रिकेट के फुलटाइम बैट्समेन थे. उन्होंने अपने करियर में तीन वर्ल्डकप खेले, जिसमें उनकी टीम ने 1996 और 2003 के विश्वकप पर कब्ज़ा किया. बेवन ने अपने करियर में कुल 232 मैचों में 6912 रन बनाए, जिसमें उनका औसत 53.58 का रहा.

ऑस्ट्रेलिया ने 1994 से 2004 के बीच जिन पहले फील्डिंग करते हुए मैचों में जीत दर्ज की. उसमें बेवन का औसत 86.25 का रहा. उन्होंने लक्ष्य का पीछा करते हुए जीते हुए मैचों में 1725 रन बनाए.

Michael Bevan
माइकल बेवन बाएं हाथ के सबसे सफलतम बल्लेबाज़ों में से एक रहे.

इतना ही नहीं, भले ही जीत हो या हार हो, सेकंड बैटिंग करते हुए उनका औसत पहले से बेहतर ही रहा. उन्होंने लक्ष्य का पीछा करते हुए अपने करियर में 112 मैच खेले, जिसमें उन्होंने 56.50 के औसत से 2882 रन बनाए.

बेवन के क्रिकेट में एंट्री से पहले वैसे तो फिनिशर शब्द क्रिकेट की डिक्शनरी में नहीं आया. लेकिन विवियन रिचर्ड्स और जावेद मियांदाद ऐसे बल्लेबाज़ माने जाते थे, जो मैच खत्म करके लौटने की काबिलियत रखते थे. विवियन ने अपने करियर में 187 वनडे मैचों में 47 के औसत से 6721 रन बनाए, जिसमें वो 24 बार नॉट-आउट लौटे. विवियन एक ग्रेट बल्लेबाज़ थे, लेकिन मैच फिनिश करके लौटने के मामले में वो बेवन से पीछे ही रहे.

वहीं जावेद मियांदाद ने अपने वनडे करियर में 41.70 के औसत से 7381 रन बनाए हैं, जिसमें वो 41 बार नॉट-आउट लौटे, जबकि लक्ष्य का पीछा करते हुए मियांदाद 21 बार नॉट-आउट लौटे. बेवन 30 बार लक्ष्य हासिल करते हुए नॉट-आउट लौटे.

एमएस धोनी vs माइकल बेवन

जब बेवन का करियर खत्म हुआ, तब धोनी का करियर शुरू हुआ. धोनी क्रिकेट इतिहास के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर माने जाते हैं. जब भी फिनिशिंग लाइन क्रॉस करनी होती है, तो टीम इंडिया माही की तरफ ही देखती है. ये बातें स्टैट्स भी बताते हैं. धोनी ने अपने करियर में कुल 350 वनडे खेले हैं, जिसमें वो 84 बार नॉट-आउट लौटे हैं. लक्ष्य का पीछा करते हुए उनका औसत 51.04 का रहा है, जिसमें वो 50 बार नॉट-आउट लौटे हैं.

महेंद्र सिंह धोनी
महेंद्र सिंह धोनी

इतना ही नहीं, पहले फील्डिंग करते हुए जिन मैचों को इंडिया ने जीता है. उसमें उनका औसत 102.71 का रहा है, जबकि बेवन यहां धोनी से पिछड़ जाते हैं. क्योंकि पहले फील्डिंग करने वाले जीते मैचों में बेवन ने 86.25 के औसत से रन बनाए हैं. हालांकि बेवन का कुल मैचों में नॉट-आउट लौटने का औसत धोनी से बेहतर हैं. क्योंकि बेवन कुल 232 मैचों की 196 पारियों में 67 बार नॉट-आउट लौटे हैं. जबकि धोनी कुल 350 मैचों की 297 पारियों में 84 बार नॉट-आउट लौटे हैं.

खैर, कौन बेहतर फिनिशर रहा, ये सिर्फ कागज़ों का फेर है. वरना मैदान पर उतरकर इन सभी खिलाड़ियों ने अपनी-अपनी टीम को जिताने में महारथ हासिल किया है.

माइकल बेवन का करियर जितना शानदार रहा, अंत उतना अच्छा नहीं हो सका. साल 2004 में श्रीलंका के खिलाफ आखिरी मैच के बाद वो चोटिल होकर टीम से बाहर हो गए. उनकी शॉर्ट गेंदों की कमज़ोरी भी अब जग-जाहिर हो चुकी थी. इसके बाद वो फिर कभी भी टीम में नहीं लौट सके. टीम से विदाई के तीन साल बाद 2007 में उन्होंने क्रिकेट जगत को अलविदा कह दिया.


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