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CAA विरोध से पहले के दुनिया भर के वो 7 स्टूडेंट प्रोटेस्ट, जिनसे सरकारें कांप गईं थीं

देखने के कई हिसाब होते हैं. बारिश के होने पर, कुम्हार और किसान का हिसाब. ईश्वर के होने पर, नास्तिक और धर्मगुरु का हिसाब. मगर इस देखने के अलग चरणों के बीच एक चीज़ साझा है. संघर्ष. वही संघर्ष जो अपनी मान्यता के लिए किसी भी स्तर तक चला जाता है. गज़ब तो यह कि संघर्षों का यह तौर, सत्ता के सामने हर बार बीस साबित होता है. चाहें सत्ता कोई भी हो. हर संघर्ष की तस्वीरें छप जाती हैं. छप कर तारीखों में अमर हो जाती हैं. और फिर कभी दिखती हैं, आंदोलन के होने पर, सरकार और छात्र के हिसाब की तरह.

खैर, हमने बीते दशकों के कुछ आंदोलनों को देखने की कोशिश की है. आप उनके संघर्ष को पढ़ें. सत्ता और मान्यता के हिसाब को समझें.

1. थियानमेन चौक आंदोलन, 1989

"टैंक मैन".  5 जून 1989 को थियानमेन चौक पर ली गई थी. साभार एसोसिएटेड प्रेस. फोटोग्राफर - जेफ विडेनर
“टैंक मैन”. फोटो 5 जून 1989 को थियानमेन चौक पर ली गई थी. साभार एसोसिएटेड प्रेस. फोटोग्राफर -जेफ विडेनर

कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव की हत्या

कैसा हो कि हर साल किसी खास समय में सरकार हज़ारों लोगों को एक ‘जरूरी’ काम पर लगा दे. वह काम हो, इंटरनेट से एक घटना से संबधित सभी जानकारी हटाने का. चीन ऐसा ही करता है. चार जून की तारीख नाजदीक आते ही चीन की सरकारी मशीनरी दस हजार लोगों को सक्रिय कर देती है. इनका बस एक ही काम होता है. इंटरनेट से थियानमेन चौक से जुड़ी सभी जानकारी को खत्म करना. थियानमेन चौक. साल 1989. चीन के हालात ठीक नहीं थे. सरकार आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक मामलों पर फेल हो गई थी. लोग परेशान थे. आंदोलन करने चीन के थियानमेन चौक पर इकट्ठा हो गए. इसी बीच अप्रैल के महीने में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हू याओबेंग की हत्या हो गई. फिर क्या था. छात्र भी सड़क पर आ गए. सड़क यानी थियानमेन चौक पर. हालात काबू से बाहर होते देख सरकार ने चीन में मार्शल लॉ लागू कर दिया. मार्शल लॉ यानी शासन और नियंत्रण व्यवस्था अब सेना के हाथ में. फिर क्या था, छात्रों को गिरफ्तार किया जाने लगा. मामला तब और बिगड़ गया जब मई, 1989 में चीन आए रूस की सामाजवादी सरकार के मुखिया मिखाइल गोर्बाचेव का आंदोलनकारी छात्रों ने घेराव कर दिया. अब मामला अंतरराष्ट्रीय हो गया. चीन के तत्कालीन मुखिया ली पींग इस बात से नाराज़ हो गये. और फिर आई 4 जून, 1989 की तारीख. शाम का वक्त. अचानक सामने से फौजी टैंक और सिपाही आते दिखे. आंदोलनकारीयों को चारों तरफ से घेर लिया गया. और फिर अचानक देर रात अपने ही देश के छात्रों पर सेना ने गोलियां चलवा दीं. सरकार कहती है इसमें 200 लोग मारे गए. लेकिन चीन में तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत एलन डॉनाल्ड ने अपने लंदन ऑफिस में एक टेलीग्राम किया और उससे पता चलता है कि इसमें तकरीबन 10,000 आम नागरिक मारे गए. इस नरसंहार के बाद चीन के संबध बाकी दुनिया से बिगड़ गए. कई देशों ने उस पर राजनैतिक और आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए.

2. वेलवेट क्रांति, 1989

दिसंबर 1989 में प्राग में वेलेव हवेल समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए. ये बाद में राष्ट्रपति भी बने. तस्वीर: रायटर
दिसंबर 1989 में प्राग में ‘वेलेव हवेल’ समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए.बाद में राष्ट्रपति बने साभार:रायटर

एक विरोध प्रदर्शन पर सरकार की तरफ से हिंसा.

एक ऐसा आंदोलन जिसमें हिंसा और खून का कोई स्थान नहीं था. सब कुछ बिना तनाव के आराम से होता चला गया.  1989 वो वक्त था जब चेकोस्लोवाकिया में रूस से समर्थित निरंकुश शासन व्यवस्था चालीस सालों से सत्ता में थी. चेकोस्लोवाकिया यूरोप का एक देश हुआ करता था. जो 1992 में चेक और स्लोवाक नाम के दो देशों में बंट गया. यह विभाजन इतने शांतिपूर्वक ढंग से हुआ कि इस घटना को ‘मख़मली तलाक़’ कहा जाने लगा. इस बंटवारे के कुछ ही बरस पहले (1989) एक छात्र आंदोलन हुआ जिसके प्रभाव से चेकोस्लोवाकिया के पूरे नेतृत्व को सामूहिक रूप से इस्तीफ़ा देना पड़ा. 17 नवंबर, 1989 (अंतरराष्ट्रीय छात्र दिवस) पर चेकोस्लोवाकिया के शहर प्राग में, छात्रों ने एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था. यह वो वक्त था जब चेकोस्लोवाकिया में रूस समर्थित निरंकुश शासन व्यवस्था चालीस साल से शासन कर रही थी. यह प्रदर्शन, प्राग विश्वविद्यालय के उन छात्रों की याद में आयोजित किया गया था जिन्हें 1939 में नाज़ी कब्जे के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान मार दिया गया था. वहां की कम्युनिस्ट सरकार को यह प्रदर्शन ठीक नहीं लगा. कम्युनिस्ट सरकार ने छात्रों पर लाठियां चलवा दीं. इसके बाद छात्र लोकतंत्र की मांग को लेकर सड़क पर आ गए और इसे वेलवेट क्रांति नाम दिया गया. इसकी कोमलता के लिए वेल्वेट नाम चुना गया था. 17 नवंबर से 26 नवंबर तक आधे मिलियन चेक और स्लोवाक, प्राग की सड़कों पर प्रदर्शन पर उतर आए. 28 नवंबर को चेकोस्लोवाकिया की कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता छोड़ने पर सहमति जताई और फिर 29 नवंबर को संविधान में संशोधन हुआ और आधिकारिक तौर पर चेकोस्लोवाकिया में कम्युनिस्ट शासन को समाप्त कर दिया गया.

3. एथेंस पॉलिटेक्निक विद्रोह,1973

यह मूर्ति विद्रोह की प्रतीक के तौर पर स्थापित की गई है
यह मूर्ति विद्रोह के बाद, प्रतीक के तौर पर स्थापित की गई है

फौज का निरंकुश शासन

क्या एक नाटक छह साल पुरानी फौजी हुकूमत गिरा सकता है. ऐसा ही हुआ यूरोप के ग्रीस में. ग्रीस में 1967 में सेना ने सरकार पर कब्जा कर लिया. सेना ने नागरिक अधिकारों को समाप्त कर दिया, राजनीतिक दलों को भंग कर दिया और नेताओं को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. लोगों में असंतोष चलता रहा. फिर छह बरस बाद आया 17 नवंबर, 1973 का दिन. इस दिन एथेंस पॉलीटेक्निक में लेफ्ट के एक स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ने नाटक किया. फौज को इसकी खबर लगी. उन्होंने नाटक देख रही भीड़ को तितर बितर करने के लिए टैंक भेज दिए. न सिर्फ भेजे, बल्कि उनसे गोले भी बरसाए. इसमें 24 नागरिक मर गए. और इसके बाद पूरे ग्रीस में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए और आखिरकार सेना बैरकों में लौटी और देश में चुनाव हुए. 17 नवंबर को तब से ग्रीस में एतिहासिक दिन के रूप में याद जाता है.

4. सम्पूर्ण क्रांति, 1974

जय प्रकाश नारायण (जेपी), पटना के गांधी मैदान में एक रैली के दौरान
जय प्रकाश नारायण (जेपी), पटना के गांधी मैदान में एक रैली के दौरान

इंजीनियिरंग कॉलेज की मेस फीस में बढ़ोतरी
दिसंबर 1973 में, मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज, गुजरात के कुछ छात्रों ने अपने भोजन के बिल में अत्यधिक वृद्धि के खिलाफ विरोध प्रकट किया था. धीरे-धीरे इस विरोध को समर्थन मिलने लगा, स्टूडेंट सड़कों पर आ गए. लोग भी सड़कों पर आ गए जो पहले से ही उस वक्त के कांग्रेसी मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल से नाराज थे. आंदोलन बढ़ा. सरकार बर्खास्त हो गई. फिर बिहार के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया. छात्र नेता मांग लेकर समाजवादी नेता जेपी के पास पंहुचे. जेपी ने शर्तें रखीं. फिर आंदोलन हुआ और फिर हुआ गफूर सरकार का लाठीचार्ज. अब बारी थी विपक्ष के लामबंद होने की. जेपी की दिल्ली में रैली हुई. जेपी ने भाषण में फौज से कहा, गलत हुकुम न मानें. फिर आई 12 जून, 1974. सुबह जस्टिस सिन्हा का फैसला आया. इंदिरा गांधी की रायबरेली से संसद सदस्यता समाप्त कर दी गई थी. इंदिरा गांधी ने 25 जून को इमरजेंसी लगा दी. सभी विपक्ष के नेता जेल में डाल दिये गए. दो साल बाद छात्र आंदोलन के नायक बाहर आए और मुख्यधारा की राजनीति में जगह बनाई.

5. ब्लैक लाइव मैटर्स, 2014

 सेंट पॉल पुलिस के खिलाफ ब्लैक लाइव्स मैटर का विरोध. 20 सितंबर 2015
सेंट पॉल पुलिस के खिलाफ ब्लैक लाइव्स मैटर का विरोध. 20 सितंबर 2015.

अमेरीका में 18 वर्ष के अश्वेत छात्र की हत्या

पुलिस की मनबढ़ी का ऐसा परिणाम पूरे अमेरिका को भुगतना होगा ऐसा किसने सोचा था. चौराहे पर डैरेन विल्सन नाम के सिपाही ने माइकल ब्राउन (Michael Brown) नामक 18 वर्षीय अश्वेत छात्र की हत्या कर दी. और फिर Black Lives Matter (अश्वेतों की ज़िन्दगी महत्व रखती है) एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया. पैट्रीस कुल्लर्स (Patrisse Cullors), एलिसिया गार्ज़ा (Alicia Garza)और ओपल टॉमी (Opal Tometi) नाम की तीन महिलाओं का शुरू किया. यह आंदोलन अब भी अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय में उत्पन्न हुए रंगभेद और नस्लवाद के खिलाफ जारी है. यह अब अभियान की तरह है. जरूरी बात यह है कि Black Lives Matter से नस्लीय पूर्वाग्रह और पुलिस के बल प्रयोग के बारे में राष्ट्रीय बातचीत पर एक जरूरी प्रभाव पड़ा है.

6. ईरान, 1999 

 तेहरान विश्वविद्यालय में आंसू गैस से घायल एक छात्र. जुलाई 1999. साभार-एसोसिएटेड प्रेस
तेहरान विश्वविद्यालय में आंसू गैस से घायल एक छात्र. जुलाई 1999. साभार-एसोसिएटेड प्रेस

एक अखबार के बैन होने पर
ईरान में एक अखबार निकलता था. सलाम. फारसी में. क्रांतिकारी अखबार एकदम. सात जुलाई 1997 को मंत्रालय की सीक्रेट रिपोर्ट छापने के जुर्म में उसे बैन कर दिया गया. इसके विरोध में आंदोलन शरू हुआ जो राजनीतिक सक्रियता का कारण बना. 8 जुलाई को इस बैन के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के दौरान ही पुलिस ने एक हॉस्टल में छापा मारा. इसमें कम से कम 20 लोग घायल हो गए. उसके बाद ईरान के 10,000 से अधिक छात्र सड़क पर आ गए. आंदोलन ने जोर पकड़ा तो राष्ट्रपति तक ने हमले की निंदा की. कार्रवाई का निर्देश दिया. लेकिन इसके परिणाम दीर्घकालिक थे. ईरान की 1979 की क्रांति के बाद से, छात्र आमतौर पर राजनीतिक दलों के सदस्य हुआ करते थे. 1999 के विरोध के बाद, यह मामला खत्म हुआ. छात्र सक्रियता अगल तरह से देखी गई.

7. हॉन्गकॉन्ग का अम्ब्रेला मूवमेंट, 2019

Hong Kong protests
Hong Kong protests. 2019

नया प्रत्यर्पण कानून
हॉन्गकॉन्ग ब्रिटेन का एक उपनिवेश था. ब्रिटेन ने इसे 1997 में चीन को स्वायत्तता की शर्त के साथ सौंपा था. ‘एक देश-दो व्यवस्था’ के साथ हॉन्गकॉन्ग को अगले 50 साल के लिए आजादी से सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था बनाए की गारंटी दी गई थी. मार्च, 2019 में हॉन्गकॉन्ग की सरकार ने नए प्रत्यर्पण कानून का प्रस्ताव रखा. वर्तमान कानून में हॉन्गकॉन्ग की ताईवान के साथ प्रत्यर्पण संधि है, नए कानून में मकाऊ और मेनलैंड चीन को भी शामिल किया गया था. इस बिल का बड़े स्तर पर विरोध हुआ. बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स सड़क पर आए. उनकी चिंता थी कि यह कानून हॉन्गकॉन्ग की ऑटोनॉमी पर असर डालेंगे. इसके विरोध में हुआ प्रदर्शन हॉन्गकॉन्ग के इतिहास के सबसे बड़े प्रदर्शनों में शामिल हो गया. विरोध के चलते इस बिल को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया.


यह आर्टिकल हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे शाश्वत ने लिखा है.


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