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काकोरी कांड से पहले बिस्मिल दस रुपये का नोट क्यों छाप रहे थे?

आज है 9 अगस्त और आज की तारीख़ का संबंध है काकोरी कांड से. आज ही के दिन 1925 में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खां और उनके 7 साथियों ने मिलकर काकोरी कांड को अंजाम दिया था.

बैकग्राउंड

1922 में चौरी चौरा कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. जिसने इस आंदोलन से जुड़े कई लोगों को रोष से भर दिया. राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक उल्ला खां भी इनमें शामिल थे. इसी के चलते बंगाल और उत्तर के राज्यों में कुछ नए संगठन तैयार हुए. मकसद इनका भी वही था, आज़ादी. लेकिन ये कांग्रेस और गांधी जी के तौर तरीक़ों से सहमत नहीं थे. इसलिए एक नई पार्टी बनाई गई. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, HRA.

जिस तरह अमेरिका ब्रिटेन से आज़ाद हुआ था, बिस्मिल उससे बहुत प्रभावित थे. इसलिए बिस्मिल ने जब HRA का मैनिफ़ेस्टो तैयार किया तो उसे नाम दिया, ‘The Revolutionary’. इस मैनिफ़ेस्टो के अनुसार HRA का उद्देश्य था, क्रांति के बल पर ‘Federal Republic of the United States of India’ की स्थापना.

अब क्रांति करनी थी तो बन्दूकों की भी ज़रूरत थी. और इसके लिए चाहिए थे पैसे. अंग्रेजों के डर से लोग चंदा देने से घबराते थे. इसलिए पहले-पहल तो इन लोगों ने तय किया कि अमीर और धनाढ्य लोगों को लूटेंगे. लेकिन इससे संगठन की बदनामी होती थी. एक बार लूट के दौरान गोली लगने से एक भारतीय की मौत हो गई. तो बिस्मिल ने निर्णय लिया कि अब से भारतीयों को नहीं लूटेंगे. लेकिन इससे पैसे की समस्या फिर खड़ी हो गई. बहुत से तरीक़े सोचे गए कि पैसों का इंतज़ाम कहां से हो.

नोट छापने की मशीन 

इसे लेकर बिस्मिल अपनी किताब में एक किस्सा बताते हैं. एक बार बिस्मिल के पास एक महाशय आए. बोले,

‘आप चिंता क्यों करते हैं. मैं नोट छापने की तरकीब जानता हूं. लेकिन इसमें आपकी तरफ़ से भी कुछ धन लगेगा.’

बिस्मिल ने कहा,

‘ठीक है. लेकिन नोट मेरे सामने ही छापे जाएंगे.’

सामान लाने के लिए वो महाशय बिस्मिल से कुछ रुपए लेकर चले गए. तय हुआ कि रात को ये काम किया जाएगा. रात में वो महाशय दवा की दो शीशियां लेकर आए. दवाइयों को पानी में मिलाया गया और कुछ सादे काग़ज़ उनमें भिगो दिए गए. फिर उन महाशय ने बिस्मिल से 10 रुपए का नोट मांगा. बिस्मिल ने अपनी जेब से निकालकर उन्हें दे दिया. महाशय ने भिगाए हुए सादे काग़ज़ों में 10 रुपए का नोट चिपकाया. और उसकी एक पुड़िया बनाकर उसे दूसरी दवा में भिगो दिया. उसके बाद महाशय ने इस पुड़िया को अपने साथी को देकर कहा कि जाकर आग में सुखा लाओ. कुछ देर में पुड़िया को सुखाकर लाया गया.

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दिसम्बर 2020 में किसान आंदोलन के दौरान काकोरी के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए (तस्वीर: Getty)

इसके बाद इस पुड़िया को एक शीशी में डाल दिया. और बिस्मिल से उन महाशय ने कहा कि कि दो घंटे में नोट तैयार हो जाएगा. बिस्मिल चूंकि प्रेस का काम जानते थे. इसलिए उन्हें शक तो ज़रूर हुआ कि ऐसे कैसे नोट छप जाएगा. लेकिन फिर भी वो चुप रहे कि देखूं तो सही पूरा माजरा क्या है. दो घंटे पूरे हुए तो महाशय ने शीशी खोली. और पुड़िया को एक और बार दवा में भिगोया. इसके बाद उन्होंने पुड़िया को खोलकर टेबल पर बिछा दिया. वहां एक के बजाय दो नोट थे. नोट बिस्मिल को दिखाकर वो महाशय बोले,

‘छोटे नोटों से पैसा बनाने में वक्त बहुत लगता है. आप बड़े नोट देंगे तो जल्दी बहुत सारे पैसे बन जाएंगे.’

बिस्मिल ने दोनों नोटों को हाथ में लिया और उन्हें चेक करने लगे. वैसे तो दोनों नोट एक से ही थे. लेकिन जब बिस्मिल ने दोनों का नम्बर मिलाया तो सारी चोरी पकड़ी गई. बिस्मिल ने रिवॉल्वर निकाल नोट बनाने वाले महाशय की छाती पर रख दिया. अब महाशय का सारा कॉन्फ़िडेन्स फुर्र हो चुका था. डर के मारे उन्होंने सारा खेल बिस्मिल को बता दिया. दरअसल जब उस महाशय ने पुड़िया को आग पर सुखाने भेजा था, तो उसके साथी ने सादे काग़ज़ की पुड़िया को नोटों की पुड़िया से बदल दिया था. और ऐसी ठगी उन दिनों आम थी.

ये सुनकर बिस्मिल को ग़ुस्सा तो बहुत आया. लेकिन उन्होंने क़सम खाई थी कि किसी हिंदुस्तानी को नहीं मारेंगे. उन्होंने उसे माफ़ कर दिया. लेकिन साथ ही साथ उससे एक काग़ज़ पर उसकी उंगलियों के निशान लगवाए. जिसमें लिखा था कि वो कभी दुबारा ऐसा काम नहीं करेगा. बिस्मिल कहीं से पैसे की मदद मांगते तो ऐसे ही धोखेबाज़ों से पाला पड़ता.

काकोरी कांड

एक दिन जब बिस्मिल रेल से जा रहे थे. उन्होंने देखा कि स्टेशन मास्टर एक थैली लाया और ट्रेन के गार्ड को पकड़ा दी. गार्ड ने वो थैली एक संदूक में डाल दी. बिस्मिल ने सोचा कि ज़रूर इस संदूक को ज़ंजीर से बांधकर उसमें ताला लगाया जाता होगा. लेकिन जब कुली संदूक उतार रहे थे तो उन्होंने देखा कि उसमें ना कोई ताला था ना ज़ंजीर. हिसाब लगाया कि संदूक में कम से कम दस हज़ार रुपए तो होंगे ही. वहीं उन्होंने इस संदूक को लूटने का प्लान बनाया.

पार्टी कार्यालय पहुंचकर उन्होंने अपने साथियों को ये बात बताई. और ट्रेन लूटने की पूरी योजना बना ली गई. तय हुआ कि किसी सुनसान जगह पर जाकर ट्रेन की ज़ंजीर खींचकर उसे रोक दिया जाएगा. पहले सोचा गया कि 10 लोग तीसरे डब्बे में चढ़ेंगे. लेकिन फिर बिस्मिल ने सोचा कि सरकार चाहे अंग्रेजों की है, पर है तो सरकारी गाड़ी ही. जिसका हाल भी सरकारी ही होगा. क्या पता तीसरे दर्जे की चेन काम करे भी या नहीं. इसलिए ये तय हुआ कि तीन लोग दूसरे दर्जे के डब्बे में चढ़ेंगे.

9 अगस्त 1925, रात का वक्त. सहारनपुर-लखनऊ एक्सप्रेस अपनी मंज़िल से कुछ ही दूर थी. लोग उतरने के लिए अपना सामान तैयार कर रहे थे कि अचानक किसी ने ट्रेन की चेन खींच दी. ये राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी थे. वह अपने दो और साथियों के साथ दूसरे दर्जे की बोगी में चढ़े थे. बाक़ी सात लोग तीसरे दर्जे में थे. चेन खिंचने के साथ ही इन सभी ने अपनी बंदूक़ें निकाल ली. लोगों को लगा कि ये लुटेरे हैं. पर लाहिड़ी ने लोगों से कहा कि वो केवल सरकारी माल लूटने आए हैं. इसलिए अगर सब लोग ख़ामोश रहे तो किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया जाएगा.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

ट्रेन रोककर ये लोग गार्ड केबिन में चढ़े. जहां एक संदूक रखा हुआ था. संदूक को नीचे उतारकर खोलने की कोशिश की गई. संदूक नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खां ने अपनी माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दी. और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए. कुछ लोगों को ट्रेन के किनारों पर खड़े होकर फ़ायरिंग करने को कहा गया था. इसी बीच मन्मथनाथ गुप्त ने भी माउजर का ट्रिगर दबा दिया. जिसकी गोली अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गयी. वह मौके पर ही ढेर हो गया.

संदूक तोड़कर तीन गठरियों में थैली बांधी गई. और वे लोग वहां से फ़रार हो गाए. लेकिन इस बीच जल्दबाज़ी में उनकी एक चादर वहीं छूट गई. तहक़ीक़ात के लिए पुलिस पहुंची तो उन्हें ये चादर मिल गई. चादर में धोबी का निशान था. जिसके ज़रिए पुलिस को पता लगा कि ये चादर शाहजहांपुर में धुली है. वहां जाकर पूछताछ की गई तो पता चला चादर बनारसी लाल की थी. बनारसी लाल बिस्मिल के साथी थे. पुलिस ने धमकाया तो उसने सारी कहानी बता दी.

किंग मेकर 

पुलिस को ये भी पता चला कि डकैती की रात HRA के कौन-कौन से मेम्बर शहर में नहीं थे और वो कब लौटे. इस मामले में पुलिस ने दबिश देनी शुरू की. और 26 सितम्बर, 1925 की रात बिस्मिल को गिरफ़्तार कर लिया गया. इसके अलावा भारत के कोने-कोने से 40 और क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया.

कोर्ट में जब मामला चला तो बिस्मिल ने सरकारी वकील लेने से इनकार कर दिया. और खुद ही जिरह करने लगे. उनकी दलीलों को सुनकर जज साहब ने बिस्मिल से पूछा,

Mr. Ram Prasad ! From which university you have taken the degree of law.

जिस पर बिस्मिल ने जवाब दिया,

Excuse me Sir! A king maker doesn’t require any degree.

काकोरी का ये मुक़दमा लखनऊ के रिंग थियेटर में चला. इसी भवन में अब लखनऊ का प्रधान डाकघर है. 10 महीने चले इस मुक़दमे के बाद 6 अप्रैल, 1927 को जज ने फ़ैसला सुनाया.

राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई. इसके अलावा 12 और क्रांतिकारियों को 5 से लेकर 10 साल तक की सजा हुई . इनमें से कई की सजा बाद में आजीवन कारावास में बदल दी गई.

बिस्मिल अपनी किताब में बताते हैं, फांसी मिलने से पहले उन्हें गोरखपुर की जिस जेल में रखा गया था. वो बीच मैदान में बनी हुई थी. जून की गर्मी में 12 घंटे छत तपती थी. आसपास कोई पेड़ भी नहीं था कि कोठरी पर कुछ छांव आ सके. 9*9 फ़ीट की कोठरी में बस दो फुट लम्बी और 1 फुट चौड़ी खिड़की थी. खाना-नहाना और सोना सब उसी कोठरी में होता था. रात में मच्छर सोने नहीं देते. कभी 1 घंटा नींद आ पाती, कभी दो घंटा. ओढ़ने बिछाने को भी सिर्फ़ दो कम्बल दिए गए थे.

इसके आठ महीने बाद 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दे दी गई. राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को इसके दो दिन पहले यानी 17 दिसंबर को ही फांसी दे दी गई थी.

एपिलॉग 

काकोरी कांड आज़ादी की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण चरण है. 1928 में HRA से भगत सिंह और बाक़ी क्रांतिकारी जुड़े और इसका नाम हो गया, Hindustan Socialist Republican Association. जो केवल एक क्रांतिकारी संस्था नहीं थी. सोशलिस्ट शब्द के पीछे मकसद था कि आज़ादी मिलने के साथ-साथ ये भी तय हो कि आज़ादी के बाद का भारत कैसा होगा. इसकी कहानी कभी और मौक़ा मिलने पर सुनाएंगे.

क्रांति के किस्से हमारे गौरवशाली इतिहास का हिस्सा हैं. ये सभी यक़ीनन महान लोग थे. लेकिन इतिहास में जब इनकी कहानियां बताई जाती हैं तो उसके साथ किवदंतियां भी जोड़ दी जाती हैं.

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राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह (फ़ाइल फोटो)

इसके लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द है Hyperbole यानी बढ़ा-चढ़ाकर बात पेश करना. ज़्यादा पुराने हो गए तो भगवान बना दिया जैसे बुद्ध और कबीर. और उतने पुराने नहीं हुए तो उन्हें ऐसे पेश किया, जैसे उन्हें कोई अलग ताक़तें मिली हों. पहली नज़र में लगता है कि इसका कारण उनके प्रति हमारी श्रद्धा है. कौन अपने प्रिय की तुलना चांद से नहीं करता. लेकिन महान लोगों को ऊंचे सिंहासन पर इसलिए भी बिठाया जाता है ताकि हमें उनसे खुद की तुलना ना करनी पड़े. ताकि हम खुद को बता सकें कि वो लोग कुछ और ही मिट्टी के बने थे, इसलिए ऐसा कर पाए. याद है ना जब डंबलडोर, हैरी पॉटर से कहते हैं,

‘हमारी क्षमताओं से कहीं ज्यादा हमारे चुनाव बताते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं’

बिस्मिल हों, अश्फ़ाक हों, भगत सिंह या राजगुरु. इन सबको भी मौत से उतना ही डर लगता था, जितना हमें. उनके भी मन में संशय उठता था. संगठन में मतभेद होते थे. कुछ लोग टूटकर अंग्रेजों से मिल जाते थे. कभी-कभी निराशा भी घेर लेती थी. और वो सभी मानवीय कमियां जो हर इंसान में होती हैं, इन सब में भी थी. लेकिन अपनी सभी कमियों के बावजूद वो महान काम कर पाए. सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने ऐसा करने का चुनाव किया.

लेकिन हम जिन्हें पूजते हैं, जिनके क्वोट शेयर कर इंस्टा-ट्विटर पर ‘कूल’ बनते हैं, उनकी तरह जीते नहीं. क्योंकि उसके लिए सही चुनाव करना पड़ता है. और सही चुनाव की क़ीमत भी अदा करनी पड़ती है. ये हिप्पोक्रिसी इतनी स्वीकार्य है कि भारत में एक आम कहावत है,

‘भगत सिंह पैदा हो, लेकिन मेरे घर में नहीं.’

बिस्मिल की जीवनी, जो उन्होंने जेल में रहते हुए लिखी थी, उसके अंतिम हिस्से को पढ़कर पता चलता है कि उस समय भी आम हिंदुस्तानी आज जैसा ही था. सिर्फ़ कुछ ही लोग थे जो आज़ादी के लिए जान देने को राज़ी थे.

बिस्मिल लिखते हैं,

‘मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किए, किन्तु बाहर से कोई सहायता न मिल सकी. यहीं तो हृदय पर आघात लगता है कि जिस देश में मैंने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राण रक्षा के लिये एक रिवॉल्वर तक न मिल सका. एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका. अन्त में फांसी पा रहा हूं. लेकिन फांसी पाने का मुझे कोई भी अफ़सोस नहीं है क्योंकि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि परमात्मा को यही मंजूर था’


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