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मुशर्रफ क्या ख्वाब दिखाकर नवाज़ शरीफ़ को कारगिल में जीत की गारंटी दे रहे थे?

26 जुलाई को भारत ने कारगिल युद्ध ख़त्म होने की अधिकारिक घोषणा की (तस्वीर: AFP)

आज है 26 जुलाई और आज ही के दिन कारगिल युद्ध में भारत ने ऑपरेशन विजय के तहत पाकिस्तान को पराजित किया था.

फतेह-ए-कश्मीर

शुरुआत 17 मई, 1999 से. पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित GHQ माने जनरल हेडकॉर्टर्स में एक मीटिंग चल रही है. जिसकी अध्यक्षता पाकिस्तान के (तत्कालीन) प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ कर रहे हैं. मीटिंग में (उस समय के) आर्मी चीफ जनरल परवेज़ मुशर्रफ और अज़ीज़ खान भी मौजूद हैं. यहाँ रक्षा मामलों पर एक जरूरी डिस्कशन चल रहा है. बीच प्रेजेंटेशन में मुशर्रफ एक नक्शा खोलकर वहां मौजूद एक टेबल पर बिछा देते हैं. नवाज़ शरीफ़ नक़्शे पर गौर फरमाते हैं. ये नक्शा आम नक्शों से कुछ अलग था. नक़्शे पर भारत-पाकिस्तान बॉर्डर और LOC की रेखाएं तो थीं. लेकिन जगहों के नाम नहीं लिखे थे. नक़्शे पर छड़ी फिराते हुए मुशर्रफ LOC के वर्तमान हालात बयान कर रहे थे. तभी उनकी छड़ी एक जगह पर जाकर रुक गयी. प्रधानमंत्री ने पूछा, जनरल, यहाँ ऐसा क्या है जो आप रुक गए? मुशर्रफ ने जवाब दिया,

‘जनाब, हमने इन चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया है. यहाँ से श्रीनगर-लेह हाईवे केवल 3 किलोमीटर के फासले पर है. इस पूरी सड़क पर हमारी बंदूकें निशाना लगाए बैठी हैं. आपकी इच्छा अनुसार कश्मीर की आजादी का प्लान आगे बढ़ चुका है. ऑपरेशन केवल 5 फेज में होगा. पहला फेज़ पूरा हो चुका है. और हम कामयाबी के बहुत करीब हैं.

परवेज़ मुशर्रफ (तस्वीर: getty)

कश्मीर का नाम सुनते ही नवाज़ शरीफ़ की आँखों में चमक आ गयी है. मुशर्रफ ये ट्रिगर पॉइंट अच्छे से पहचान गए. वो जनरल अज़ीज़ खान की तरफ देखते हैं. इशारा समझकर अज़ीज़ एक और पासा फेंकते हैं.

‘जनाब! खुदा ने आपको ये मौका दिया है कि आप कश्मीर को आजाद करा सकें. तारीख में आपका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा. आप फतेह-ए-कश्मीर के नाम से जाना जाएंगे. पूरे पाकिस्तान में क़ायद-ए-आज़म के बाद आपका ही ओहदा होगा.’

पान में चूना और कत्था लग चुका था. बस गुलकंद की कमी थी. वो कमी पूरी की मुशर्रफ ने. मुशरर्फ़ ने कहा,

‘जनाब! हम ऐसी जगह पहुंच चुके हैं जहाँ से वापसी नामुमकिन है. मेरा सारा तजुर्बा कहता है कि इस मिशन में जीत की पूरी गारंटी है.’

एक ऐसे बच्चे की तरह जिसे अफलातूनी सब्जबाग का भरोसा हो गया हो, नवाज शरीफ़ बोले,

‘तो आप कश्मीर पर पाकिस्तान का झंडा कब तक फहरा देंगे?’

इस सवाल का जवाब उस दिन किसी के पास न था. सवाल तो ये पाकिस्तानी सेना से पूछा गया था लेकिन जवाब दिया हिंदुस्तान की सेना ने. कैसे? ये समझने के लिए हमें इस घटना के एक साल पहले जाना होगा.

लाहौर वार्ता

साल था 1998. भारत का पड़ोसी चीन पहले ही परमाणु शक्ति से लैस था. और पाकिस्तान भी इसी कोशिश में लगा हुआ था. पड़ोस में बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत ने 11 और 13 मई को परमाणु परीक्षण किए. इन परीक्षणों को लेकर पाकिस्तान का रिएक्शन ‘एज़ एक्सपेक्टेड’ था. ठीक 15 दिन बाद उसने भी परमाणु परीक्षण किया. दोनों देशों के परमाणु हथियार संपन्न होने से रिश्तों में एक नया एंगल जुड़ चुका था. भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में खटास चल रही थी. ऐसे में जंग हो जाने पर स्थिति खतरनाक हो सकती थी. सो अगले कुछ महीनों में बैक डोर डिप्लोमेसी के जरिए पाकिस्तान से बात शुरू हुई.

अटल बिहारी बाजपेयी परवेज़ मुशर्रफ से मुलाक़ात करते हुए, साथ में जसवंत सिंह और लालकृष्ण आडवाणी (तस्वीर: Getty)

इसी शांति वार्ता के नतीजन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी फरवरी 1999 में पाकिस्तान पहुंचे. और 20 फरवरी, 1999 को लाहौर डिक्लेरेशन साइन हुआ. डिक्लेरेशन के तहत तय हुआ कि दोनों देश शिमला संधि की शर्तों को फॉलो करेंगे. और एकदूसरे के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. आगे की शांति वार्ता के लिए भी रोडमैप तय किए गए. यहाँ पर भारत और पाकिस्तान के हालात में अंतर समझना बहुत जरूरी है. भारत में सेना जनता की चुनी हुई सरकार के अधीन कार्य करती है. लेकिन पाकिस्तान में शक्ति के दो ध्रुव हैं. एक तो चुनी हुई सरकार और दूसरा पाकिस्तान का मिलिट्री इस्टाब्लिश्मेंट.

कोह-ए-पैमा

जहाँ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ एक तरफ लाहौर में शांति वार्ता कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना के जनरल ऑपरेशन कोह-ए पैमां को अंतिम रूप दे रहे थे. कोह का मतलब पहाड़. कोह-ए-पैमा का मतलब पवर्तारोही. पहाड़ पर चढ़ जाने वाला. इस प्लान के नाम में ही इसका मकसद छुपा हुआ था. मोटा-मोटी प्लान कुछ इस तरह था.

1) जाड़ों में नियंत्रण रेखा से सटे ऊंचे पहाड़ों पर हालात इतने ख़राब हो जाते थे कि सेना वहां से पीछे हट जाती थी. ये दोनों सेनाओं की बीच आपसी समझ थी कि दर्जनों फुट गहरी बर्फ में ज़िंदगियां गंवाने से अच्छा ठंड के मौसम में सैनिक पीछे हटें. बर्फ हटने पर फिर से चौकियों पर पहरा दें. दोनों तरफ से वादा कि कोई LoC से छेड़छाड़ नहीं करेगा. मुशर्रफ ने इस वादे को तोड़ने का फैसला किया.

2) मुशर्रफ ने तय किया कि पाकिस्तान कारगिल की इन ऊंची चोटियों पर कब्ज़ा जमाकर बैठ जाएगा और श्रीनगर से लेह तक जाने वाले हाइवे को निशाने पर ले लेगा. इससे फौज तक भारत रसद नहीं पहुंचा पाएगा. प्लान था कि इस स्थिति को जितना लम्बा हो सके, खींचा जाएगा. इससे मसला ए कश्मीर अंतरराष्ट्रीय पटल पर चर्चा में आ जाएगा. अंतरराष्ट्रीय दबाव से अगर युद्ध विराम लग भी गया तो नई LOC बन जाएगी. और पाकिस्तान की मैदानी स्थिति मज़बूत हो जाएगी.

नवाज़ शरीफ़(तस्वीर: Getty)

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि टैक्टिकली ये एक बहुत अच्छा प्लान था. लेकिन स्ट्रीजीकली या सामरिक नज़र से इसमें कई कमियां थीं. क्योंकि इसमें कई ऐसी कल्पनाएं कर ली गई थीं, जिनका कोई आधार नहीं था. जैसे –

1) एक बड़े युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान की हार निश्चित थी. लेकिन भारत परमाणु हथियारों की आड़ में एक बड़ा युद्ध नहीं करेगा.
2) भारत एलओसी के इतने करीब कभी अपनी वायुसेना को नहीं लाएगा.
3) चीन और भारत के तनाव भरे रिश्तों के कारण चीन पाकिस्तान का साथ देगा. और अमेरिका भी भारत के बनिस्पत पाकिस्तान की ही तरफदारी करेगा.
4.) भारत में उस समय केंद्र की सरकार अल्पमत में थी. इस राजनैतिक अस्थिरता में भारत योजनाबद्ध तरीके से कोई मजबूत कार्यवाही नहीं कर पाएगा.
5.अगर भारत ने लड़ाई का कोई दूसरा मोर्चा खोला तो अंतरराष्ट्रीय पटल पर वो आक्रमणकारी के तौर पर नज़र आएगा.
6.) पाकिस्तान दुनिया में ये मनवा लेगा कि कब्ज़ा कश्मीरी मुजाहिद्दीनों ने किया है. और वो केवल उनका समर्थन कर रहा है. इस तरह पाकिस्तान सारी जवाबदेही से बच जाएगा. और भारत सरकार अपनी हार स्वीकार कर लेगी.

फरवरी 1999 में पाकिस्तान ने इस प्लान को अमली जामा पहनाया. और मार्च 1999 तक कारगिल द्रास और बटालिक के करीब दो सौ किलोमीटर के इलाके में अपनी नॉर्दन लाइट इंफेट्री के जवानों को तैनात कर दिया. इसे कहा गया ऑपरेशन बद्र.

पाकिस्तान की नज़र से देखें तो, सबकुछ तब तक ठीक चला, जब तक ये कब्ज़ा छिपा रहा. भारतीय सेना को इस बात की भनक लगी अप्रैल के शुरुआती दिनों में. बटालिक सेक्टर के गारकोन इलाके में कुछ चरवाहे अपने जानवर ढूंढते हुए ऊपर की तरफ गए. तो वहां उन्हें कुछ लोग खुदाई करते हुए दिखे. उन लोगों के पास बंदूकें थीं. वापस लौट कर ये बात चरवाहों ने सेना को बताई. शुरुआत में सेना को लगा कि ये काम मुजाहिद्दीनों का है. लेकिन जब वो मुआयना करने पहुंचे तो उन्हें भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा. उन्हें समझ आ गया कि कब्ज़ा करने वालों के पास पेशेवर मिलिट्री ट्रेनिंग है. माने ये लोग उग्रवादी नहीं हो सकते. इसके बाद सेना जवाबी कार्रवाई शुरू की. इस ऑपरेश का नाम रखा गया ऑपरेशन विजय.

ऑपरेशन विजय

पाकिस्तानी सैनिक ऊँची चोटियों पर थे. वो वहां से भारतीय सेना की हरकत पर नज़र रख सकते थे. जब ये पक्का हो गया कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा, तो फौज ने अपनी पूरी ताकत लगा दी. और पाकिस्तान के सारे अनुमान एक के बाद एक गलत होने लगे. न सिर्फ जम्मू कश्मीर बल्कि देश के दूसरे हिस्सों से भी फौज कारगिल पहुंच गई. पाकिस्तान की तरफ से भारी गोलीबारी के बावजूद सेना ने श्रीनगर लेह हाइवे को हमेशा अपने काबू में रखा. पहाड़ों के नीचे से बोफोर्स तोपों ने सीधे पाकिस्तानी बंकरों पर गोले दागे. इसके बाद सेना की टुकड़ियों ने चोटी दर चोटी चढ़ाई की और पाकिस्तान की फौज को खदेड़ा.

पाकिस्तान को विश्वास नहीं हुआ जब भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरु कर दिया. वायुसेना के लड़ाकू विमानों और हेलिकॉप्टर्स चौबीसों घंटे दुश्मन के सिर पर मंडराने लगे. उसकी सप्लाई लाइन्स को काट दिया. चोटियों पर जमी पाकिस्तान की फौज अब हर तरफ से घिर गई थी. उस पर बोफोर्स के गोले गिर रहे थे. ऐसी चोटियां जो अच्छे खासे पर्वतारोहियों की परीक्षा ले ले, वहां सेना के जवान हथियारों के साथ न सिर्फ चढ़ जा रहे थे, बल्कि उसके बाद लड़ाई भी कर रहे थे. वो आसमान से भी नहीं भाग सकते थे, क्योंकि वायुसेना देखते ही उन्हें निशाना बना लेती थी.

डिप्लोमेटिक टैक्टिक्स

इस बीच भारत डिप्लोमेटिक चैनल से लगातार पाकिस्तान पर दबाव बड़ा रहा था. यूं तो पाकिस्तान अभी भी मानने को तैयार नहीं था कि कारगिल में उसके सैनिक हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वो बार बार युद्ध विराम की अपील कर रहा था.

ऊंचाई पर छिपे दुश्मनों पर वार करने के लिए बोफोर्स का सहारा लिया गया (तस्वीर: Getty)

इसी के चलते 28 जून को नवाज शरीफ़ चीन के दौरे पर गए. चीन कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की तरफदारी करता था. पर कारगिल के मुद्दे पर पाकिस्तान को चीन से कोई सपोर्ट नहीं मिला. अपनी जमीन पर हमला होने के बावजूद भारतीय सेना ने LOC पार नहीं की. प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अमेरिका के राष्ट्रपति क्लिंटन को लिखी एक चिट्ठी में कहा.

‘भारत शांति चाहता है लेकिन ऐसे हालत में वो बहुत दिनों तक युद्ध नहीं टाल सकता.’

नवाज शरीफ़ पर बहुत दबाव था. एक तो जंग के मोर्चे पर पाकिस्तान पिछड़ रहा था. दूसरी तरफ पाकिस्तान की अपेक्षा के विपरीत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि बेहतर दिख रही थी. पाकिस्तान आक्रमणकारी मुल्क के तौर पर नज़र आ रहा था. जबकि परमाणु हथियार संपन्न होने के बावजूद भारत एक जिम्मेदार देश दिखाई दे रहा था. 4 जुलाई को नवाज शरीफ़ राष्ट्रपति क्लिंटन से मिलने अमेरिका पहुंचे. क्लिंटन ने उनसे मिलने की ये शर्त रखी कि उन्हें पुरानी स्थिति पर आते हुए अपनी सेना को LOC के पीछे लाना होगा. उसी दिन टीवी पर फ़्लैश हो रहा था कि भारत ने टाइगर हिल पर कब्ज़ा कर लिया है.

कारगिल विजय

‘मरता क्या न करता’ की हालत में 12 जुलाई को नवाज शरीफ़ ने TV पर एक भाषण दिया. इसमें उन्होंने भारत से शांति वार्ता की बात की. और ये कहा कि वो कारगिल की चोटियों को खाली कर रहे हैं. यहाँ भी उन्होंने ये नहीं माना कि कारगिल में उनके सैनिक हैं. अटपटी बात ये थी कि अगर ये सैनिक पाकिस्तान के नहीं थे तो वो वापस किसे बुला रहे थे.

उधर पाकिस्तान न तो अपने जवानों तक रसद और साज सामान पहुंचा पा रहा था, न अपनी वायुसेना को भेज पा रहा था. मुशर्रफ ने इस प्लान को पाकिस्तान के वायुसेनाध्यक्ष और नौसेनाध्यक्ष से तक छुपाकर रखा था. अब हार या मृत्यु में से ही किसी को चुनना बाकी रह गया था. आखिरकार वाजपेयी ने फैसला लिया कि पाकिस्तान की फौज को लौटने का रास्ता दिया जाएगा. 14 जुलाई, 1999 को प्रधानमंत्री वाजपेयी ने आपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की. 26 जुलाई को कारगिल की लड़ाई अधिकारिक रूप से ख़त्म हो गई.

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