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भारत को परमाणु शक्ति से लैस बनाने वाली 'नीली अप्सरा' की कहानी

4 अगस्त. भारत के पहले परमाणु रिएक्टर से इस तारीख का खास संबंध है. क़िस्से की शुरुआत करते हैं 1945 से. 6 अगस्त की तारीख़. जापान में सुबह के सवा आठ बज रहे थे. एक ज़ोर का धमाका हुआ और कुछ ही मिनटों के अंदर एक हंसता-खेलता शहर राख के ढेर में तब्दील हो गया. हम दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान पर हुए परमाणु हमले की बात कर रहे हैं. इसके ठीक 3 दिन बाद यानी 9 अगस्त को दूसरा बम नागासाकी पर गिरा. और दुनिया हमेशा के लिए बदल गई. मानव युद्ध के इतिहास में पहली बार एक ऐसी शक्ति का उपयोग हुआ, जिसका ज़िक्र इससे पहले सिर्फ़ मिथिकल कहानियों में हुआ करता था.

दुनिया को समझ आ गया था कि इस नई महाभारत में ये इकलौता ब्रह्मास्त्र है. जिसके पास परमाणु हथियार हैं, वो ही शक्तिशाली है.

भारत को आज़ाद होने में अभी दो साल बाक़ी थे. लेकिन अंग्रेजों की वापसी तय हो गई थी. और अब आगे की राह भारत को खुद ही तय करनी थी. ऐसे में एंट्री हुई डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा की. वे कैम्ब्रिज से पढ़ कर आए थे. और न्यूक्लियर फिजिक्स के प्रति उनका लगाव जुनूनी स्तर तक था. मार्च 1944 में डॉक्टर भाभा ने सर दोराब टाटा ट्रस्ट में एक प्रपोज़ल सबमिट किया. ये एक न्यूक्लियर रिसर्च इंस्टिट्यूट बनाए जाने का प्रपोज़ल था. प्रपोज़ल को मंज़ूरी मिली और दिसंबर 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च की स्थापना हुई. और यहीं से भारत में परमाणु ऊर्जा पर रिसर्च का काम शुरू हो गया.

1947 में भारत आज़ाद हुआ. नई सरकार ने 15 अप्रैल, 1948 को एटॉमिक एनर्जी ऐक्ट पास किया. जिसके तहत इंडियन अटॉमिक एनर्जी कमिशन यानी IAEC का गठन हुआ. इसका उद्देश्य था, परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को अपने पैरों पर खड़ा करना.

IAEC  के गठन के मौक़े पर प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा,

“एटॉमिक ऊर्जा विकसित करने के पीछे हमारा उद्देश्य केवल शांति है. लेकिन एक देश के तौर पर अगर हमें मजबूर किया गया, तो हमें इसका इस्तेमाल और तरीक़ों से भी करना पड़ेगा. इस मसले पर हमारी भावनाएं कितनी ही पवित्र क्यों ना हो, लेकिन हम में से कोई भी इसके वाजिब इस्तेमाल से इंकार नहीं कर सकता.”

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया दो गुटों में बंट गई तो भारत ने नॉन अलायन्मेंट की नीति अपनाई. और हर वैश्विक मंच पर परमाणु हथियारों को रोकने की बात कही. लेकिन ये साफ़ था कि जब तक दूसरे देश न्यूक्लियर आर्म्स की होड़ में रहेंगे, भारत इससे पीछे नहीं हट सकता.

भारत का ‘लॉस एलामॉस’

इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए 3 जनवरी, 1954 को IAEC ने एक नया उपक्रम बनाया. एटॉमिक एनर्जी इस्टेबलिशमेंट, ट्रोम्बे. AEET. जिसे भारत का ‘लॉस एलामॉस’ कहा गया. लॉस एलामॉस, अमेरिका के न्यू मैक्सिको राज्य में वो जगह है, जहां अमेरिका ने मैनहैटन प्रोजेक्ट के तहत परमाणु बम का आविष्कार किया था. इसके कुछ ही महीने बाद DAE यानी डिपार्टमेंट ऑफ़ अटॉमिक एनर्जी का गठन हुआ. प्रधानमंत्री नेहरू ने डॉक्टर भाभा को DAE का सेक्रेटरी नियुक्त किया. देश में परमाणु ऊर्जा का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि ये डिपार्टमेंट सीधे प्रधानमंत्री को जवाब देता था और आज भी ऐसा ही होता है.

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डॉ. होमी जहांगीर भाभा (फ़ाइल फोटो: भारत सरकार)

मार्च 15, 1955 को एनर्जी कमीशन की मीटिंग में तय हुआ कि ट्रोम्बे में एक छोटा न्यूक्लियर रिएक्टर बनाया जाए. लेकिन इस तरह के रिएक्टर के लिए एनरिच्ड यूरेनियम की जरूरत थी. और भारत में रिसर्च अभी इस स्थिति तक नहीं पहुंचा थी कि वो यूरेनियम को एनरिच कर सके. ऐसे में डॉक्टर भाभा को कैम्ब्रिज के एक दोस्त की याद आई. ये थे जॉन कॉकरोफ़्ट जो कैम्ब्रिज में वैज्ञानिक हुआ करते थे. उनकी मदद से अक्टूबर 1955 में यूनाइटेड किंगडम एटॉमिक एनर्जी अथॉरिटी और DAE के बीच एक समझौता हुआ. जिसके तहत UK ने भारत को एनरिच्ड यूरेनियम की सप्लाई करना शुरू किया.

ईंधन की सप्लाई के अलावा इस रिएक्टर का बाक़ी सारा काम भारत में ही हुआ. मसलन इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स की असेम्ब्ली और रिएक्टर के अलग-अलग हिस्सों का निर्माण. यूं तो अमेरिका और यूरोप की नज़र परमाणु ऊर्जा से रिलेटेड सभी गतिविधियों पर रहती थी. लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि अभी-अभी आज़ाद हुआ एक देश परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कुछ ख़ास आगे बढ़ पाएगा. यहां तक कि डॉक्टर भाभा के दोस्त जॉन कॉकरोफ़्ट ने यूरेनियम दिलाने में मदद तो की. लेकिन जब डॉक्टर भाभा ने कहा कि हम एक साल के अंदर रिएक्टर बना लेंगे तो कॉकरोफ़्ट ने उनसे शर्त लगाई कि एक साल में ऐसा होना सम्भव ही नहीं है.

ये बात बेवजह भी नहीं थी. रिएक्टर को बनाने के दौरान कई दिक़्क़तें आईं. उदाहरण के तौर पर, जब वैज्ञानिक रिएक्टर को तैयार कर रहे थे, तो ट्रोम्बे में कोई सरकारी कैंटीन नहीं हुआ करती थी. सरकारी नियमों के अनुसार बाहर से खाना लाना मना था. ऐसे में वैज्ञानिकों को 24 घंटे की शिफ़्ट में ट्रैवल करना पड़ता था. इन हालात को देखते हुए डॉक्टर भाभा ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा,

‘सरकार के नियम और क़ानून इस काम में बहुत अड़चन पैदा कर रहे हैं. जबकि ये बहुत प्रेशर वाला काम है. और तेज गति से भी किया जाना ज़रूरी है. ऐसे में एक छोटी सी गलती भी हमें बहुत साल पीछे धकेल सकती है.

ख़त मिला तो प्रधानमंत्री नेहरू ने दो कारों का इंतज़ाम करवाया. ताकि वैज्ञानिक आसानी से ट्रैवल कर सकें. इसके अलावा प्राइवेट होटल से खाने की व्यवस्था कराई गई. जिससे लंच और डिनर रिएक्टर बिल्डिंग के अंदर ही पहुंचाए जा सकें.

नीली अप्सरा

भारतीय वैज्ञानिकों की पुरज़ोर मेहनत के बल पर एक साल में रिएक्टर बनकर तैयार हो गया. योजना के अनुसार 31 जुलाई, 1956 को रिएक्टर क्रिटिकल स्थिति पर पहुंच जाना चाहिए था. लेकिन कंट्रोल रॉड की गड़बड़ी के कारण ऐसा नहीं हो पाया.

Bhabha (right) At The International Conference On The Peaceful Uses Of Atomic Energy In Geneva, Switzerland, 20 August 1955 (1)
डॉक्टर भाभा (दाएं) जिनेवा, स्विट्जरलैंड में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर मुद्दे पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में
(तस्वीर: wikimedia)

क्रिटिकल स्थिति पर पहुंचने से क्या मतलब है?

इसके लिए हमें न्यूक्लियर रिएक्टर के अंदर के रिएक्शन को समझना होगा.

दरअसल रिएक्टर के अंदर जब न्यूट्रॉन यूरेनियम के परमाणु से टकराते हैं तो उसमें ऊर्जा के साथसाथ बहुत सारे न्यूट्रॉन भी निकलते हैं, जो बाकी बचे हुए यूरेनियम परमाणुओं से टकराते हैं.और इसी तरह एक चेन रिएक्शन बनती है.लेकिन रिएक्शन के दौरान निकलने वाले न्यूट्रॉन की गति बहुत तेज़ होती है.जिन्हें नियंत्रित किया जाना जरूरी होता है.इसके लिए हेवी वॉटर या ऐसे ही किसी और मॉडरेटर का उपयोग किया जाता है.जब न्यूट्रॉन की गति को इतना नियंत्रित कर लिया जाए कि रिएक्शन सस्टेंड हो जाए और नियंत्रित रूप से ऊर्जा पैदा होने लगे तो इसे क्रिटिकल स्थिति कहते हैं.

इसके 4 दिन बाद आज ही के दिन यानी 4 अगस्त, 1956 को 3.45 PM पर ट्रोम्बे रिएक्टर क्रिटिकल स्थिति पर पहुंच गया. इस स्थिति में पहुंचने वाला ये एशिया का पहला न्यूक्लियर रिएक्टर था. नेहरू ने जब इस रिएक्टर को देखा तो उसे ‘अप्सरा’ नाम दिया. इस नाम के पीछे भी बहुत दिलचस्प कहानी है. जिसके लिए दुबारा हमें रिएक्टर के अंदर जाना होगा.

जैसा की आपको पहले ही बताया था. न्यूक्लियर रिएक्शन के दौरान बहुत तेज गति से न्यूट्रॉन निकलते हैं. इस दौरान पानी के अंदर इनकी गति लाइट से भी तेज हो जाती हैं. अब आप कहेंगे स्पेशल रिलेटिविटी का क्या. लाइट की स्पीड तो सबसे तेज होती है. तो समझिए कि अगर माध्यम का रीफ़रेक्टिव इंडेक्स (refractive index) एक से कम हो तो लाइट की स्पीड वैक्यूम से कम होती है, जिसके कारण ऐसा सम्भव हो पाता है. ऐसे में एक नीली रंग की रोशनी पैदा होती है जिसे ‘चर्नकोव रेडिएशन’ कहा जाता है.

इसी नीले रंग की रोशनी को देखकर ही नेहरू ने इस न्यूक्लियर रिएक्टर को अप्सरा नाम दिया था. अप्सरा का मतलब जलकन्या भी होता है. और चूंकि ये एक पूल रिएक्टर था. इसलिए उन्होंने कहा कि ये सुंदर नीले रंग का है, और पानी से भी जुड़ा है. तो इसके लिए अप्सरा ही सबसे उपयुक्त नाम होगा.

डॉक्टर भाभा की मृत्यु

‘अप्सरा’ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की पहली बड़ी उपलब्धि थी. जिसके चलते आगे जाकर भारत परमाणु हथियार सम्पन्न देश बन पाया. इस उपलब्धि में सबसे बड़ा हाथ डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा का था. जिनका 1966 में एक प्लेन दुर्घटना में निधन हो गया.

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अख़बार में छपी प्लेन क्रैश की खबर (तस्वीर: टाइम्स ऑफ़ इंडिया )

इस प्लेन हादसे की कहानी भी कम कौतुहल से भरी नहीं है.

अक्टूबर 1965 में ऑल इंडिया रेडियो को दिए एक इंटर्व्यू में डॉक्टर भाभा ने कहा था कि अगर उनको ग्रीन सिग्नल दिया जाए तो भारत 18 महीनों में एटॉमिक बॉम्ब बना सकता है. ठीक 3 महीने बाद 24 जनवरी, 1966 को बॉम्बे से न्यू यॉर्क जाते हुए उनकी फ्लाइट क्रैश हो गई. इसमें सभी 117 यात्री मारे गए. इस प्लेन हादसे को लेकर 2008 में TBRNews.org नाम की न्यूज़ वेबसाइट ने एक खबर छापी. इसमें दावा किया गया था कि ये प्लेन दुर्घटना केवल एक हादसा नहीं थी. रिपोर्ट के अनुसार एक CIA ऑफ़िसर रॉबर्ट क्राउली ने पत्रकार ग्रेगरी डग्लस को इस बारे में बताया था.

क्राउली ने ग्रेगरी से कहा,

‘तुम्हें पता है, 60’s में जब भारत ने एटॉमिक बॉम्ब पर काम करना शुरू किया. हम मुसीबत में पड़ गए थे. क्योंकि वो रशियन्स के साथ थे.’

आगे बोलते हुए उसने प्लेन हादसे के बारे में कहा,

‘यक़ीन करो, वो बहुत ख़तरनाक था. भाभा न्यूक्लियर मामले में विएना जा रहे थे. और इससे और बड़ी दिक़्क़तें खड़ी हो सकती थीं. तभी उनके प्लेन के कार्गों में एक बम विस्फोट हुआ और प्लेन क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई’

डॉक्टर भाभा की मृत्यु में कोई षड्यंत्र था, या इसके पीछे CIA का हाथ था, इस बात की कोई पुष्टि नहीं हो पाई. तत्कालीन फ़्रेंच इन्वेस्टिगेशन के अनुसार ये एक दुर्घटना थी और बम फटने जैसी कोई वारदात नहीं हुई थी. ख़ैर हुआ जो भी हो. दुनिया छोड़ने से पहले डॉक्टर भाभा भारत को परमाणु शक्ति बनाने में बड़ा योगदान दे गए थे. वहीं, अप्सरा की बात करें तो 50 साल से भी ज़्यादा वक्त तक इसमें परमाणु रिसर्च का काम चला. साल 2009 में इसे डीकमीशन कर दिया गया. इसके बाद 2018 में इसे दुबारा चालू किया गया और वर्तमान में ये दोगुनी क्षमता से काम कर रहा है.


वीडियो देखें: नवाबों और निज़ामों की जंग में अंग्रेज कैसे बाज़ी मार ले गए? 

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