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'तस्वीर नंबर 2383' जिसने चांद और धरती के इश्क़ का सारा व्याकरण बदल दिया

तेईस तिरासी (2383). होने को ये महज़ एक नंबर है. लेकिन अगर इस नंबर के साथ नासा का नाम जोड़ दें, तो ये नंबर करिश्मा बनकर जिंदा हो जाता है. नासा माने ‘नैशनल एयरोनौटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’. अमरीकन स्पेस एजेंसी. ‘नासा 2383’ असल में एक तस्वीर का नंबर है.

साल था 1968 और अमरीका-सोवियत संघ के बीच चांद पर पहुंचने की रस्साकशी चल रही थी. नासा ने अपोलो मिशन लॉन्च किए. एक के बाद एक. 24 दिसंबर 1968 को चांद के बिल्कुल क़रीब जो अपोलो यान पहुंचा था, वो था ‘अपोलो 8’ मिशन. हर बार की तरह इसमें भी तीन अंतरिक्ष यात्री सवार थे. अपोलो 8 मिशन के ज़रिए चांद की कक्षा में तीन अमरीकी अंतरिक्षयात्री पहुंचे थे. फ्रैंक बोरमैन, जिम लॉवेल और बिल एंडर्स चांद के उस हिस्से की झलक देखने वाले थे, जो धरती से नहीं दिखता.

फ्रैंक बोरमैन, जिम लॉवेल और बिल एंडर्स (तस्वीर साभार NASA)
फ्रैंक बोरमैन, जिम लॉवेल और बिल एंडर्स (तस्वीर साभार NASA)

# लेकिन दिखा क्या?

उस दिन इन तीनों ने जो चांद देखा वो अगर ‘चांद सी महबूबा होगी …’ लिखने गाने वालों ने देखा होता तो माशुकाएं गश खाकर गिर जातीं. और चांद को देखकर कविता कहानी लिखने वाले लेखक ‘बंद गली का आख़िरी’ मकान बन जाते. आगे कोई राह नहीं. लेकिन ये नज़ारा तीन अंतरिक्ष यात्री देख रहे थे. गणित और विज्ञान के पाग में पगे दुनिया के सबसे क़ाबिल पायलट्स में से तीन.

अपने एक इंटरव्यू में इन तीनों में से एक फ्रैंक बोरमैन ने बताया कि ‘हमने अपने यान के इंजन को चार मिनट तक चालू रखा ताकि हम धीरे-धीरे चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर सकें. हम आधे रास्ते पर ही पहुंचे थे कि हमारी निगाह चांद पर पड़ी. चंद्रमा की सतह उल्कापिंडों, गड्ढों खाइयों और ज्वालामुखी विस्फोट के अवशेषों से भरी पड़ी थी. पूरा इलाक़ा बिल्कुल ही बेरंग था. सिर्फ़ भूरे, काले या सफ़ेद रंग की चट्टानें या सतह ही दिख रही थी.’

ऐसा खुरदुरा दिख रहा था चांद. (तस्वीर साभार NASA)
ऐसा खुरदुरा दिख रहा था चांद. (तस्वीर साभार NASA)

चांद के ऑर्बिट में अपोलो 8 स्पेसक्राफ्ट से चक्कर लगाते ये तीनों नीरस चांद की सतह निहार रहे थे. तस्वीरें ले रहे थे. तस्वीरें जो लैब की फ़ाइलों में दर्ज होनी थीं. लाखों लीटर तेल और अमरीकियों का पसीना जलाकर चांद के क़रीब पहुंच कर ली हुई तस्वीरें. उस सतह की तस्वीरें जो दुनिया के दो सबसे बड़े मुल्कों के बीच नाक का सवाल बन गई थी.

# और फिर

चांद के ऑर्बिट में रेंग रहा अपोलो 8 चांद के सतह की हर मुमकिन कोण से तस्वीरें ले रहा था. लेकिन रंगों की बदकारी कैमरे का पीछा नहीं छोड़ रही थी. आजमगढ़ के सरकारी मुर्दाघर में पड़ी किसी गुमनाम लाश को कितने भी कोणों से देखिए, वो मुर्दा ही लगती है.

कमांड मॉड्यूल को नियंत्रित कर रहे बिल एंडर्स ने अपने दाएं कंधे से जैसे ही अपनी ठुड्डी को मिलाया. उनका दिमाग़ कुछ सेकण्ड तक सुन्न रह गया.

सामने पृथ्वी थी. सियाह रात में से बरबस उगती हुई धरती. नीली सफ़ेद. ठीक उस वक़्त बिल एंडर्स ब्रह्माण्ड का वो शख्स भी बन गया जब उसने ब्रह्माण्ड का सबसे ख़ूबसूरत घर देखा था. हमारी अपनी धरती. चांद की बेजान सतह के बैकग्राउंड के तौर पर मायावी रौशनी से खिलती पृथ्वी. एंडर्स के बाक़ी दोनों साथी अभी भी चांद का कोण बनाने में मगन होने की कोशिश कर रहे थे. एंडर्स ने जिम लॉवेल की बाईं हथेली दबाते हुए सिर्फ़ इतना कहा ‘हे ईश्वर, वो हमारी धरती है जो उग रही है…बेहद ख़ूबसूरत. जिम मुझे एक रंगीन फ़िल्म तो दो.’

जिम लॉवेल ने एंडर्स को तस्वीर लेने के लिए फ़िल्म दी. जिम भी ये नज़ारा देखकर आंखें भर लेना चाहते थे. एंडर्स ने स्पेस कैमरे से उस पल वक़्त का सबसे ख़ूबसूरत क़तरा इंसानियत के नाम लिख दिया. तस्वीर नंबर तेईस तिरासी. ‘नासा 2383’ जो मानव इतिहास की सबसे ख़ूबसूरत, दार्शनिक, वैज्ञानिक, गणितीय और साहित्यिक तस्वीर बन गई. एंडर्स ने इस तस्वीर का नाम रखा ‘The Rising Earth.’ उगती हुई धरती. जिसके ठीक बीच में दिख रहा था अफ़्रीका.

इंसानियत की सबसे अहम तस्वीरों में से एक 'तेईस तिरासी' (तस्वीर साभार NASA)
इंसानियत की सबसे अहम तस्वीरों में से एक ‘तेईस तिरासी’ (तस्वीर साभार NASA)

# जो देखा वो दिखा दिया

एक महान फ़िल्मकार इस बात से ताउम्र छटपटाता रहा कि काश उसकी आंखें कैमरा होतीं. आइसक्रीम चुराते बच्चे से लेकर पतझड़ में ठूंठ बन चुके पेड़ को निहारते बुज़ुर्ग तक, उसने जैसी दुनिया देखी वैसी काश सबको दिखा पाता. लेकिन उस फिल्मकार के नसीब में बिल एंडर्स होना नहीं लिखा था.

बिल ने एक इंटरव्यू में बताया कि वो उस लम्हे का ‘दशमलव शून्य शून्य एक प्रतिशत’ भी छोड़ना नहीं चाहते थे. और उनकी तस्वीर में वो क्षण समूचा मौजूद है. ध्यान भटकाने के लिए कहीं कुछ नहीं है. धरती के चारों ओर अंधेरा है. चांद की ज़मीन पूरी तरह बेरंग और बंजर है. देखने के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ धरती है. ऐसा कितनी बार हो पाता है कि, दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर लेने से पहले आपको कुछ छोड़ने के विकल्प पर रत्ती भर भी ध्यान ना देना पड़ा हो. जैसा दिखा, वैसा दिखाया.

मूनवॉक, जब इंसान ने धरती पर पग धरे (तस्वीर साभार NASA)
मूनवॉक, जब इंसान ने धरती पर पग धरे (तस्वीर साभार NASA)

# और अंत में प्रेम

चांद की नीरस परत से उस दिन जो तस्वीर ली गई वो धरती की कई दीवारों पर लगी. आज भी लगी है. समय के भीतर समय जैसी तस्वीर. लेकिन अपने माशूक को धरती भी कहा जा सकता है ये ‘तेईस तिरासी’ ने बताया. प्रेम का ख़ालिस चेहरा है तेईस तिरासी. इतना ख़ालिस कि आप ‘I 2383 You’ भी कह सकते हैं. चिट्ठी के नीचे लिख सकते हैं ‘तुम्हारी तेईस तिरासी’

‘तेईस तिरासी’ तस्वीर ब्रह्माण्ड की उलटबांसी है. हम चांद के भांजे थाली परात में मामा की परछाई से रिश्तों की गुत्थी सुलझाते रहे. लेकिन ये नहीं सोचा कि वो हमारा मामा बाद में है, इस महादेश की मांओं का भाई पहले है. भाई, जो मुंडेर पर जलते दिए की तरह प्रेम की ठंडी हो चुकी रातों में रास्ता भटकी कई जहाज़ों का लाइट हाउस बना. चंदा मामा दूर के…


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