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मस्जिद में टॉयलेट साफ करने की ख्वाहिश रखने वाले मोईन अली की वो कहानी, जो हर कोई नहीं जानता

समरसेट में एक ट्रायल मैच खेला जाना था. एक कश्मीरी पिता अपने बेटे को उन ट्रायल्स में ले जाने के लिए परेशान हो रहा था. परेशानी की वजह थी कि उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो अपनी गाड़ी में पेट्रोल डलवा सके और उसके खाने का इंतज़ाम भी कर सके. उस पिता ने परेशान होकर पूरे घर का सामान उथल-पुथल कर दिया. कभी सोफे के नीचे तो कभी अलमारी, सब जगह खंगाला. बचे-खुचे कुछ सिक्के निकाले. पेट्रोल भरवाने और एक सैंडविच खरीदने जितने पैसे जुट गए. पिता ने वो एक सैंडविच बेटे के हाथ में थमाया और उसे ट्रायल्स के लिए ले गया. ट्रायल्स के दौरान जब ब्रेक हुआ तो बेटा वापस पिता के पास आया. उस सैंडविच में से आधा अपने पिता को खाने के लिए दे दिया. उस पल को देखकर पिता को ये एहसास हो गया कि

‘भले ही मेरा बेटा अच्छा क्रिकेटर ना बने लेकिन वो एक अच्छा इंसान ज़रूर बनेगा. 

इस कहानी वाले पिता का नाम था मुनीर अली, और बेटा मोईन अली. मोईन, इंग्लैंड क्रिकेट टीम के स्टार.

इंग्लिश क्रिकेट के इतिहास में अंग्रेजों के अलावा ढेर सारे गैर-ईसाई क्रिकेटर्स ने भी नेशनल टीम में जगह बनाई. लेकिन मोईन अली ऐसे पहले एशियाई मूल के हैं, जिन्होंने इंग्लैंड की टी20 टीम की कप्तानी की है.

मोईन इस वक्त IPL खेलने के लिए भारत में महेन्द्र सिंह धोनी की CSK के कैम्प में हैं. मोईन ने यहां एक शराब की कम्पनी का विज्ञापन अपनी जर्सी पर करने से इनकार कर दिया. उसे लेकर विवाद में घिर गए. बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने मोईन अली पर बड़ा विवादित ट्वीट कर डाला, कहा-

”क्रिकेट में ना फंसते तो मोईन अली ISIS जॉइन करने सीरिया चले गए होते.”

दाढ़ी बढ़ाने और शराब का विज्ञापन नहीं करने की वजह से मोईन अली के बारे में जो बातें कहीं जा रही हैं, असलियत में वो उनके आसपास भी नहीं हैं.

आइये जानते हैं मोईन अली के क्रिकेटिंग सफर और इस्लाम धर्म को लेकर उनके नज़रिये के बारे में.

कश्मीरी पिता और अंग्रेज मां के बेटे हैं मोईन अली

मोईन अली के अब्बा मुनीर POK यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से आते हैं. उनकी अम्मी इंग्लैंड के बैटी शहर की रहने वाली थीं. मोईन के पिता 11 साल की उम्र तक कश्मीर के मीरपुर के ददयाल गांव में रहे. इसके बाद इंग्लैंड चले गए. उनका परिवार बहुत गरीब था. बर्मिंघम में मुनीर तीन लोगों के साथ मकान के नीचे बेसमेंटनुमा रूम में रहते थे. मोईन के पिता ने मुश्किलों वाला जीवन गुज़ारा. शादी के बाद मुनीर के चार बच्चे हुए.

इंग्लैंड के जिस इलाके से मोइन आते हैं, वहां से 1990 के बाद से अब तक 16 प्रोफेशनल क्रिकेटर निकल चुके हैं.
इंग्लैंड के जिस इलाके से मोईन आते हैं, वहां से 1990 के बाद से अब तक 16 प्रोफेशनल क्रिकेटर निकल चुके हैं.

क्रिकेट से परिवार का जुड़ाव

मोईन के परिवार का क्रिकेट लंबा जुड़ाव रहा है. बताते हैं मोईन के चचेरे भाई कबीर अली जब पैदा हुए थे तो उनकी खाट पर एक क्रिकेट बॉल थी. मोईन की बहन के जन्म के समय उनके पिता बर्मिंघम के करीब एक लीग खेलने गए हुए थे. कबीर ने बाद में इंग्लैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट भी खेला. कबीर और मोईन के अलावा उनके भाई उमर अली भी क्रिकेट से जुड़े रहे हैं. मोईन के पिता और उनके जुड़वां भाई एक साथ ही रहते थे. शादी के बाद भी. इन दोनों ने अपने घर के पीछे के गार्डन में नेट्स लगाए. वहां घंटों खेलने और कोचिंग देने में वक्त बिताते थे.

मोइन की मां इंग्लैंड की हैं जबकि उनके पापा पाकिस्तानी मूल के हैं. मोइन इंग्लैंड में ही पैदा हुए और वहीं पले-बढ़े हैं.
मोईन की मां इंग्लैंड की हैं जबकि उनके पापा पाकिस्तानी मूल के हैं. मोईन इंग्लैंड में ही पैदा हुए और वहीं पले-बढ़े हैं.

मोईन जब 13 साल के थे, तो पिता ने उनसे दो साल मांगे. साफ-साफ कह दिया कि अब से दो साल पूरी तरह से क्रिकेट को समर्पित कर दो. स्कूल से लौटने के बाद मोईन क्रिकेट में रम जाते, लेकिन ठीक से नहीं खेल पाते थे. कुछ लोगों ने मोईन के पिता से कहा कि-

”वो ये नहीं कर पाएगा. बर्मिंघम के बाहर रहने वाला एक गरीब एशियन परिवार प्रोफेशनल गेम तक कभी नहीं पहुंच पाएगा, क्योंकि ये गेम सिर्फ पब्लिक स्कूल के या फिर अमीर लड़कों के लिए है.”

मोईन बताते हैं कि बचपन के दिनों में घर के हालात खराब होने पर भी उन्हें अपने पिता से हमेशा सपोर्ट मिला. मोईन के बड़े भाई कदीर स्कूल में काफी अच्छे थे, इसलिए उनकी पढ़ाई पर पैसा खर्च हुआ. मोईन को क्रिकेट की तकनीक सुधारने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो उन्हें नील एबर्ले के साथ दस सेशन ट्रेनिंग के लिए पैसों का इंतज़ाम करके दिया गया.

धीरे-धीरे पिता के यकीन से उन दो साल ने मोईन की ज़िन्दगी बदल दी. मोईन के रास्ते में तमाम रुकावटें आईं लेकिन उनका विश्वास नहीं डिगा. और इसी की बदौलत उन्होंने क्रिकेट में इतना लंबा सफर तय किया.

क्रिकेट और धर्म ने मोईन को भटकने से बचाया

लंबी दाढ़ी रखने वाले मोईन अली मानते हैं कि अगर उनकी ज़िन्दगी में क्रिकेट और धर्म नहीं आता तो वो नशे की लत लगा लेते या गलत रास्तों पर चले गए होते. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि

”क्रिकेट ने मुझे बचा लिया. सच कहूं तो मैं नहीं जानता कि इसके बिना मैं क्या करता. मैं देखता हूं कि मेरे बहुत सारे दोस्त किस तरह से रह रहे हैं. उनके पास बहुत से मौके नहीं थे. उनमें से कई गैंग और ड्रग्स के नशे में लग गए. लेकिन मैं खुशकिस्मत हूं कि मैं उस दिशा में नहीं गया.”

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मोईन अली. फोटो: AP

कभी इबादत से पहले हाथ धोना भी नहीं आता था

मोईन अली शुरुआत में बहुत ज़्यादा धार्मिक नहीं थे. उन्होंने बताया था कि उन्हें ये भी नहीं पता था कि खुदा की इबादत कैसे की जाती है. कैसे इबादत से पहले हाथ धोए जाते हैं. लेकिन जब वो क्रिकेट खेलने लगे, और दुनिया देखने लगे तो अक्सर सोचने लगते. लंबे टूर पर जाते वक्त बस की खिड़की से बाहर देखकर सोचते थे कि किसी ने तो ये सब तय किया है. ये सब ऐसे ही नहीं हो गया.

मोईन ने धर्म के प्रति अपने झुकाव की वजह भी बताई थी. ये वजह थी एक वेस्ट इंडियन फैन.

जब मोईन 19 साल के थे, तब एक बार वार्विकशर के लिए वेस्टइंडीज़ ए के खिलाफ खेल रहे थे. उस दौरान वेस्टइंडीज़ के एक सपोर्टर से उनकी बातचीत हुई. उस शख्स का नाम था वैली मोहम्मद. उन्होंने उस दौरान ही इस्लाम धर्म अपनाया था.

वैली मोहम्मद के साथ इस मुलाकात से मोईन बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने बताया था-

”उस समय मैंने उनके साथ हुई बातों पर बहुत ज़्यादा विश्वास नहीं किया. लेकिन उन्होंने कुछ उन चीज़ों को समझने में मेरी मदद की, जिन्हें लेकर मैं असमंजस में रहता था. जैसे कि अरेंज मैरिज, जहां पर धर्म से कहीं ज़्यादा संस्कृति का प्रभाव होता है. उन्होंने मेरी ज़िन्दगी से बहुत सारी बाधाओं को हटा दिया.  मुझे चीज़ें बेहतर ढंग से समझाने में मेरी मदद की. वो मेरे लिए एक नई शुरूआत थी.”

विवादों पर क्या है मोईन का नज़रिया?

लंबी दाढ़ी रखने को लेकर मोईन अली पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. उन्होंने इस पर भी बात की. उन्होंने कहा कि लोग इसे उन पर एक ठप्पे की तरह देखते हैं. वो चाहते हैं कि लोग ये जानें कि वो एक मुस्लिम हैं, एक एशियाई हैं और एक ब्रिटिश हैं. वो अपनी किसी एक पहचान को ज़्यादा खास दिखाना चाहते हैं, ऐसा कुछ नहीं है.

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मोईन अली. फोटो: AP

एक इंटरव्यू में मोईन ने कहा था,

”ये मेरे लिए किसी तरह का दबाव नहीं है. अगर कुछ होता है तो वो (अल्लाह) मेरी मदद करता है. वो क्रिकेट में किसी ना किसी तरीके से मदद करता है. ये सब मुझे याद दिलाता है कि क्या ज़रूरी है. मेरा धर्म कहीं ज़्यादा ज़रूरी है. मैं टीम से ड्रॉप होने से या फिर क्रिकेट के बाद की ज़िन्दगी को लेकर नहीं घबराता. मैं सिर्फ एक बेहतर से बेहतर इंसान बनना चाहता हूं.

देखिए, मैं क्रिकेट को प्यार करता हूं. लेकिन अल्लाह को इससे फर्क नहीं पड़ता कि मैंने कितने शतक बनाए या कितने विकेट चटकाए. क्योंकि क्रिकेट के अलावा भी बहुत बड़ी ज़िन्दगी है. इस बात को जानना खेलते वक्त मुझे दबाव से बाहर रखता है.”

मोईन चाहते हैं कि इस्लाम की जो छवि इन दिनों समाज में है, उसे बेहतर बनाएं. मोईन का कहना है कि उनके जैसे दिखने वाले, दाढ़ी वाले मुस्लिमों की छवि अक्सर मीडिया में पॉज़ीटिव नहीं होती. अगर वो इसे थोड़ा भी बदल पाने में कामयाब रहे तो उन्हें खुशी होगी. वह ये सब सिर्फ मुस्लिमों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए करना चाहते हैं.

साल 2014 में साउथैम्पटन टेस्ट के दौरान एक रिस्ट बैंड पहनने के लिए मोईन को जान से मारने की धमकी मिली थी. मोईन के बैंड पर ‘सेव गाज़ा’ और ‘फ्री फलस्तीन’ लिखा था. मोईन ने इस बैंड पर हुए विवाद के बाद कहा था कि उनका ये स्लोगन मानवता के लिए था, ना कि किसी राजनीतिक भावना के लिए.

इससे मिलती है सबसे ज़्यादा खुशी

मोईन अली कहते हैं कि उन्हें सबसे ज़्यादा खुशी मस्जिद में नमाज़ पढ़कर, और वहां के टॉयलेट्स को साफ करके मिलती है. मोईन का कहना है कि उन्होंने बहुत क्रिकेट खेला है. लेकिन किसी ना किसी तरह से अब वो लौटकर उन लोगों की मदद करना चाहते हैं, जहां से वो निकलकर आए हैं.उन लोगों के साथ समय बिताना चाहते हैं. उनकी देखभाल करना चाहते हैं. इसमें उन्हें सबसे ज़्यादा खुशी मिलेगी.


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