Submit your post

Follow Us

इंदिरा की इमरजेंसी ने पाकिस्तान को बदला लेने का मौक़ा दे दिया?

आज है 20 जुलाई. और इस तारीख़ का रिलेशन है 1975 की इमरजेंसी के एक किस्से से.

शुरुआत करते हैं अल्बेयर कामू के एक कथन से:

“सभी चीज़ों की तरह, बोलने की स्वतंत्रता का भी दुरुपयोग हो सकता है. यकीनन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि एक आज़ाद प्रेस अच्छी ही हो. वो बहुत बुरी भी हो सकती है. पर सरकार की ग़ुलाम पत्रकारिता बुरी के अलावा कुछ नहीं हो सकती. इस बात की पूरी गारंटी है.”

ये थी इस घटना की प्रस्तावना. अब आते हैं संदर्भ पर.

स्याही और कोरे पन्ने

तारीख: 21 जुलाई 1975. स्थान: संसद भवन नई दिल्ली. कुछ दिन पहले ही देश में इमरजेंसी लागू हुई है. संसद में इस बात पर चर्चा चल रही है. सरकार के मंत्री खड़े होकर इंदिरा सरकार का बचाव कर रहे हैं. राम मनोहर लोहिया ने जिसे ‘गूंगी गुड़िया’ का नाम दिया, वो आज भी चुप बैठी हुई हैं. लेकिन ‘बोल वो रहे हैं लेकिन शब्द हमारे हैं’ की तर्ज़ पर सरकार के सारे मंत्री इंदिरा का रटा-रटाया ही उगल रहे हैं. संसद के किसी भी आम दिन की तरह प्रेस गैलेरी में पत्रकार मौजूद हैं. जिसमें लगभग 300 भारतीय और 75 विदेशी पत्रकार हैं. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इमरजेंसी लागू होना, पिछले कुछ दिनों से सभी बड़े अंतर्राष्ट्रीय अखबारों की हेडलाइन बनी हुई है. मंत्रीजी ने जैसे ही बोलना शुरू किया, सारे पत्रकारों के नोटपैड पर शॉर्ट्हैन्ड दौड़ने लगी. लेकिन जैसे ही मंत्रीजी बोलना बंद करते. फॉउन्टेन पेन पर कैप लगाकर उसका मुंह बंद कर दिया गया.

Untitled Design (1)
इमरजेंसी की घोषणा के बाद पत्रकारों से घिरी हुई इंदिरा गांधी (तस्वीर: आर्काइव)

मैडम प्राइम मिनिस्टर धीर गंभीर मुद्रा में अपने स्थान पर काबिज़ हैं. लिटरली और मेटफॉर के रूप में भी. बीच-बीच में हाथ उठाती हैं. पर बोलने के लिए नहीं, बालों को अपने चेहरे से हटाने के लिए. आइरनी ये कि जैसे मैडम के काले बालों की कतारों के बाद, बालों की एक लट पे स्याही खत्म हो चुकी है. वैसी ही प्रेस गैलेरी में नोटपैड के काले पन्नों के बाद कुछ पन्ने सफेद छोड़ दिए जा रहे हैं. नज़ारा एकदम हैरान कर देने वाला है. विपक्ष के किसी भी नेता की कोई बात नोट नहीं की जा रही है. ये सब क्या हो रहा है और क्यों? ये समझने के लिए हमें इसके ठीक 3 दिन पहले यानि 18 जुलाई 1975 के घटनाक्रम को समझना होगा.

तिहाड़ या पालम

उस दिन देशी और विदेशी पत्रकारों को पास बांटे जा रहे थे. आगामी संसद सत्र की प्रोसीडिंग को कवर करने के लिए. लेकिन 24 घंटों के भीतर ही ये पास वापस जमा कर लिए गए. सरकार ने प्रेस को लेकर नए नियमों की घोषणा कर दी थी. नियम इस प्रकार थे-

1) सरकार द्वारा जेल में डाले गए राजनैतिक नेताओं का नाम नहीं छापा जा सकता.
2) ना ही यह बताया या लिखा जा सकता है कि नेताओं को जेल में डाला गया है.
3) संसद में केवल मंत्रियों के भाषणों को रिपोर्ट किया जा सकता है.
4) विपक्षी नेताओं के किसी बयान को नहीं छापा जा सकता है.
5) सुप्रीम कोर्ट में भ्रष्ट चुनावी प्रक्रियाओं के खिलाफ की गई प्रधानमंत्री की अपील के दौरान होने वाली प्रोसीडिंग को रिपोर्ट नहीं किया जा सकता.

लब्बोलुआब ये कि सरकार छोटी से छोटी निंदा को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थी.

Untitled Design (4)
समाचार पत्र में इमरजेंसी की खबर (तस्वीर: नेशनल हेरल्ड )

सभी पत्रकारों को इस बाबत एक शपथ पत्र दिया गया. जिन पत्रकारों ने शपथ पत्र पर साइन नहीं किए उन्हें पास नहीं दिया गया. दिल्ली के प्रेस हलकों में एक बात कही जाती है. अगर सरकार की लाइन नहीं ली तो विदेशी पत्रकारों को पालम की गाड़ी में बिठा दिया जाता है. और देशी पत्रकारों को तिहाड़ की. जेल जाने के डर से अधिकतर भारतीय पत्रकारों ने साइन कर दिया. पर सरकार में अभी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो विदेशी पत्रकारों को भी जेल में डाल दे. क्योंकि इससे एक बड़ा इंटरनेशनल संकट उत्पन्न हो सकता था.

बहरहाल बहुत से इंटरनेशनल पब्लिकेशन्स ने भी साइन कर दिया. इनमें शामिल थे, यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल, असोसिएटेड प्रेस(AP), लॉस एंजेलिस टाइम्स(Los Angeles Times), ABC और NBC. लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो जर्नलिज़म एथिक्स के नाम पर अड़े हुए थे. न्यू यॉर्क टाइम्स(New York Times), टाइम(Time) मैगज़ीन और CBS ने साइन करने से मना कर दिया.

CBS न्यूज के प्रेसीडेंट ने कहा:

“अगर हम साइन करते हैं, तो हम अपने पाठकों से झूठ बोल रहे होंगे.”

वेयर इज द लव लेटर

उन दिनों वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ‘द स्टेट्समैन’ के संपादक हुआ करते थे. पत्रकारों और अखबारों के खिलाफ सेंसरशिप पर उन्होंने इंदिरा गांधी को एक पत्र लिखा-

“मैडम प्राइम मिनिस्टर. क्या लिखा जाए और क्या न लिखा जाए. ये हमेशा ही किसी अखबार के लिए कठिन निर्णय होता है. इसमें हमेशा किसी को नाराज करने का रिस्क रहता है. जनता को क्या, कब और कितना बताना है, सरकारी पदों पर आसीन लोग समझते हैं कि केवल उन्हें ही ये पता है. आपने अपने भाषणों में कई बार फ्री सोसाइटी पर विश्वास जताया है. यह प्रेस की जिम्मेदारी है कि पब्लिक को सच बताया जाए. ये एक अनप्लेजेंट टास्क है लेकिन किया जाना जरूरी है. एक फ्री सोसाइटी का आधार ही फ्री इनफार्मेशन है. अगर प्रेस सरकार द्वारा जारी किए गए हैंडआउट ही छापेगी तो सरकार की कमी कौन बताएगा”

Untitled Design (2)
    कुलदीप नैयर (तस्वीर: फ़ाइल)

वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने अपनी किताब ‘पावर, प्रेस एण्ड पॉलिटिक्स’ में इस बाबत लिखा है. आलोक बताते हैं कि कुलदीप नैयर ने उन्हें बताया-

“इमरजेंसी की घोषणा के बाद कुछ एडिटर प्रधानमंत्री से मिलने गए थे. उन्हें बधाई देने. मुझे सबसे ज्यादा बुरा तब लगा जब उन्होंने इस मीटिंग मे एडिटर्स पर एक कमेंट किया. उन्होंने वहाँ मौजूद लोगों से पूछा ‘पत्रकारिता के बड़े नामों का क्या हुआ, क्योंकि अभी तक एक भी कुत्ता भौंका नहीं है’.

सेंसरशिप के खिलाफ नैयर ने दिल्ली प्रेस क्लब में एक मीटिंग बुलाई. वहाँ उन्होंने एक रेसोल्यूशन पर साइन कर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजा. रेसोल्यूशन में यह मांग थी कि प्रेस पर पाबंदी के नियम हटाए जाएं और बंदी पत्रकारों को रिहा किया जाए.

जैसे ही इस रेसोल्यूशन लेटर की बात फैली. सूचना और प्रसारण मंत्री वी.सी. शुक्ल ने नैयर को मिलने बुलाया. मिलते ही सबसे पहला सवाल पूछा.

लव लेटर कहाँ है?

शुक्ल उस लेटर की बात कर रहे थे जिसमें रेसोल्यूशन में साइन करने वाले पत्रकारों के नाम थे. कुलदीप नैयर ने हँसते हुए जवाब दिया,

“वो सेफ डिपॉजिट में है.”

ये सुनकर शुक्ल के तेवर एकदम बदल गए. उन्होंने लगभग धमकाते हुए नैयर से कहा,

‘तुम गिरफ़्तार हो सकते हो. इन दिनों तुम पीटर हेज़लहर्स्ट के साथ बहुत घुल मिल रहे हो. यह तुम्हारे लिए ठीक नहीं है.’

आपको बता दें कि पीटर हेज़लहर्स्ट टाइम्स, लंदन के संवाददाता थे. बांग्लादेश युद्ध के दौरान उन्हें पाकिस्तान से निकाल दिया गया था. और तब से वो भारत से रिपोर्टिंग कर रहे थे. इसके बाद शुक्ल ने आवाज ऊंची करते हुए कहा,

“इन विदेशी जर्नलिस्ट को ठीक करना होगा. इनको बहुत सर चढ़ा रखा है.”

कुलदीप समझ गये थे कि अमेरिका, यूरोप और इंग्लैंड से इमरजेंसी लागू होने पर जो प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं आई थीं. उन्होंने सरकार को चिंता में डाल दिया था.

20 जुलाई 1975

18 जुलाई 1975 को जो प्रेस सेंसरशिप पत्र जारी हुआ. अधिकतर भारतीय पत्रकारों ने उस पर साइन कर दिया था. जिन्होंने नहीं किया उन्हें बैन करवा दिया गया. कइयों को तो जेल भी भिजवा दिया गया. अब बारी थी विदेशी पत्रकारों की. सरकार उन्हें जेल में डालने का जोखिम तो नहीं उठा सकती थी. इसलिए 3 पत्रकारों को चुनकर एक उदाहरण सेट करने की योजना बनाई गई. ये तीन पत्रकार थे, लंदन टाइम्स के पीटर हेजलहर्स्ट (ये वही हेजलहर्स्ट हैं जिनके बारे में ऊपर कुलदीप नैयर वाले किस्से में आपको बताया था), डेली टेलीग्राफ के पीटर गिल और न्यूज़वीक के लॉरेन जेनकिंस.

पीटर हेजलहर्स्ट ने 20 जुलाई की घटना को कुछ यूं बयान किया है.-

“फ़ॉरेन रेजिस्ट्रेशन डिपार्ट्मेन्ट के 3 लोग और दिल्ली पुलिस के इन्स्पेक्टर मेरे होटल में आए और लाबी में मुझे डिपोर्टेशन ऑर्डर थमा दिया. मुझे बाद में बताया गया कि ये ऑर्डर हटा दिया जाएगा अगर मैं 24 घंटे के भीतर शपथ पत्र पे साइन कर दूँ.”

Untitled Design (5)
अख़बार में तीन विदेशी पत्रकारों को निकाले जाने की खबर (तस्वीर: डेटोना न्यूज़ जर्नल)

तीनों पत्रकारों ने शपथ पत्र पर साइन करने से मना कर दिया. इसके बाद तीनों पालम एयरपोर्ट पहुंचे. वहाँ पहुंचकर तीनों ने सिक्योरिटी के सामने सरेन्डर कर दिया. शुरूआत में उनसे बहुत अच्छे से व्यवहार किया गया. लेकिन जैसे ही फ्लाइट के डिपार्चर का समय नज़दीक आने लगा. कस्टम अधिकारियों के रुख में बदलाव आता गया. हेजलहर्स्ट आगे बताते हैं,

“हमारे बैग और कागज निकाल कर फैला दिए गए. हमारी तलाशी ऐसी ली जा रही थी जैसे हम अपराधी हों. हमारे नोटबुक, विजिटिंग कार्ड और डायरी को बार-बार चेक किया जा रहा था. हैरानी की बात थी कि उन्हें हमारे पास मौजूद पॉलिटिकल डॉक्युमेंट्स में कोई रुचि नहीं थी. लेकिन हमारे कान्टैक्ट और दोस्तों के नामों को नोट उन्होंने करके रख लिया.”

अगली सुबह उन्हें बेरूत की तरफ जाने वाली पैन-एम फ्लाइट मे बिठा दिया गया. ये तीनों कराची में उतर गए. पाकिस्तानी सरकार द्वारा उनका जोरदार स्वागत हुआ.
इतिहास खुद को दोहरा रहा था. या कहें कि खुद को आईने में देख रहा था क्यूंकी इस बार दोनों पलड़े अदल-बदल चुके थे. वो कैसे? आइए समझते हैं,

दरअसल ठीक 4 साल पहले 1971 में ये तीनों पत्रकार ठीक इसकी उल्टी यात्रा कर चुके थे. याहया खान की मिलिट्री रेजीम बांग्लादेश वॉर पर रिपोर्टिंग के चलते उन्हें पाकिस्तान से निकाल दिया था. अब इस काम के लिए वो लोकतान्त्रिक भारत की तरफ जा रहे थे. उस वक्त इंदिरा सरकार ने उनका स्वागत किया था. और तानाशाह पाकिस्तानी सरकार की प्रेस सेंसरशिप की निंदा की थी. पता नहीं ये विडंबना उस वक्त किसी को दिखाई भी दी थी कि नहीं. वैसे ही राजनेताओं की याददाश्त थोड़ा कमज़ोर होती है.


वीडियो देखें: 2013 में हुए मिड-डे मील हादसे की कहानी, जिस पर बनी फिल्म ऑस्कर पहुंची

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.