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#NotInMyName का नारा जिसे लगाना चाहिए, वो तो जंतर मंतर पहुंचे ही नहीं

#OnYourName

नाम में क्या रखा है ?

#NotInMyName यूके के मुस्लिम युवाओं का ऑनलाइन अभियान था तीन साल पहले. जब दा’इश (ISIS) का आतंक बढ़ा और उसने इस्लाम के नाम पर इसे न्यायोचित ठहराना शुरू किया, तो निश्चय ही इसका एंटी-इफ़ेक्ट दुनिया के मुसलमानों पर पड़ना शुरू हुआ. शेष समाज के पूर्वाग्रह से बचने के लिए और खुद को आतंकी इस्लाम से अलग दर्शाने के लिए फिर यूके के पढ़े लिखे युवा मुस्लिम यह अभियान लेकर आए. यह अभियान अब भी चल रहा और ऑस्ट्रेलिया कनाडा अमेरिका भी पहुंचा है. इस अभियान का उद्देश्य और नामकरण प्रकट है.

मेरे नाम पर नहीं. हत्याएं तुम करो और फिर इस्लाम के प्रति शेष विश्व का पूर्वाग्रह हम झेलें, नहीं. नो ! नॉट इन माय नेम.

संयोग से यूके के अधिकांश लोग अंग्रेजी ही बोलते समझते भी हैं.

अभी मई में एक स्लोगन की तरह #NotInMyName साऊथ अफ्रीका पहुंचा. आदमियों का कोई जुलूस हुआ प्रिटोरिया में जहां उन्होंने औरतों से कहा कि हमपर भरोसा करो, हम तुम्हारे साथ हैं. यूके के उदाहरण और इस्तेमाल की तरह ज्यादा सेन्स नहीं निकला इस नारे का इस जुलूस में, लेकिन आशय लगभग यह रहा कि हम सब पुरुष इस पितृसत्तात्मक व्यवहार में भागीदार नहीं हैं और इसलिए एक प्रकार से पूरी पुरुष प्रजाति के नाम पर स्त्री के खिलाफ हिंसा बंद करो, मने ‘नॉट इन माय नेम.’ ठीक ही है. ओके.

इट्ज़ कैची मम्मा, ओ या ओ या…!

कैची चीजों को लेकर हम भारतीय बेहद उत्सुक लोग हैं. मीडिया का बाल-उत्साह तो और देखते बनता है. निर्भया नृशंस बलात्कार-हत्याकांड में गैंगरेप शब्द का अनिवार्य इस्तेमाल हुआ तो यह अचानक कैची वर्ड हो गया. तब से हिंदी अखबारों तक ने खुलकर ‘गैंगरेप’ शब्द का रोज़ाना इस्तेमाल शुरू कर दिया. शुरू में तो मैं घबराया कि अचानक इस देश को क्या हो गया है कि बलात्कार में सामाजिक सामूहिकता बढ़ गई है और गैंगिंग की ही सब बलात्कार खबरें हैं. फिर मैं समझ गया कि दृश्य, परिदृश्य तो पहले सा ही है, यह शब्द कैची होकर चुभ रहा है. बलात्कार अब भी पहले की तर्ज पर ही हो रहे थे, मसलन शौच के लिए गई चंपा को चार युवकों का उठा लेना या विधवा पेंशन के लिए भटकती बेवा का बड़ा बाबू, चपरासी से लेकर बाहर के सत्तू वाले तक द्वारा लगातार शोषण, अथवा प्रेम में पहली बार पड़ी मासूम क्लासमेट का पूरे दोस्त समूह का ‘लाभ’ उठाना. लेकिन अब गैंगरेप मुखर शब्द हो गया था. परिदृश्य में शब्द-प्रतिनिधित्व भर का अंतर आया था.

मोब-लिंचिंग ऐसा ही नया कैची शब्द है जो इस समय देश को उत्तेजित कर रहा. भीड़ ने हत्याएं कब नहीं की ! नोएडा के एंकरों से पूछिए कि हमने इन्हें कस्बों से भीड़ की अराजकता, आक्रमकता की कितनी ख़बरें भेजीं. मीडिया ने तो इसे निर्मित और नियंत्रित तक किया. हमने चोर और डायन बंधवाये, उन्हें भीड़ से पिटवाया, मोटरसाइकिल में बांधकर घसीटवाया, ताकि नोएडा के पत्रकार दिल्ली के बेवकूफों को अपने शो में बिठा इसपर चर्चा कर सकें.

भीड़ का कभी कोई चेहरा, आकार, धर्म, जाति, विचार नहीं होता. वे स्वयं प्रकार के कुंठित लोगों का तुरंत संगठित हुआ समूह होता है जो बकौल उनके ही शब्दों में ‘थोड़ा हाथ साफ़ कर लें’ की तर्ज पर प्रेरित होता है. और यह भीड़ वास्तविक समूह भर ही क्यों है, यह सोशल मीडिया पर ही इस उस विषय पर एकत्रित हुआ समूह भी क्यों नहीं है?

आभासी भीड़ का एक किस्सा कहता हूं. कुछ वर्ष पहले एक स्त्री ने पोस्ट लिख दी कि शायक ने मेरे साथ सहवास की इच्छा प्रकट की. बस. किसी ने न मुझसे कुछ पूछा, न कुछ सुना और मेरी लिंचिंग शुरू कर दी. उस भीड़ में जनवादी, प्रगतिशील, संघी, भंगी, स्वनामधन्य, लेखक, क्रांतिकारी, पतियों से पिटती पत्नियां, प्रेमियों से छली गई प्रेमिकाएं सब शामिल थीं. खुर्शीद अनवर की ऐसी ही मोब लिंचिंग हुई तो उन्होंने सुसाइड कर लिया. इस बार वही साले ज प्र सं भं ले क्रां प प्रे… शोक जता रहे थे कि हाय बहुत बुरा हुआ. खुर्शीद अनवर पर निर्भया आंदोलन की एक एक्टिविस्ट से रेप करने का आरोप था.

दिल्ली की उत्सवधर्मिता

दिल्ली की उत्सवधर्मिता मन मोहती है. एक तरफ सरकारी उत्सवधर्मिता दिखती ही रहती है तो दूसरी ओर प्रतिरोध भी उत्सवधर्मी कलेवर का है. योगा शारीरिक आध्यात्मिक क्रिया नहीं है, सरकारी उत्सव है. वेमुला पर किसी ने पोस्ट लिखी कि लड़की आई, कैंडल जलाया, एक सेल्फी ली, और चली गई. जंतर मंतर की अखबार में छपी तस्वीर कुछ और होती है और फेसबुक पर दिखती तस्वीरें कुछ और. ऐसे प्रतिरोध से लौटी मेरी कुछ प्रेयसियों के किस्सों में गोलगप्पा और ‘यार कित्ते मज़े आए’ भी होता है.

not in my name

मैंने कहा कि संवाद और प्रतिरोध के लिए जब आप ख़राब उदाहरण का दुरुपयोग करते हैं तो संवाद और प्रतिरोध को खराब करते हैं. अशोक वाजपेयी के असहिष्णुता आंदोलन के अंत में वाजपेयी की दांत-निपोर हंसी और वक्तव्य कि हमने यह ड्रामा किया था, के अलावे कुछ भी हाथ नहीं लगा.

वेमुला पर मैंने कहा कि शोर के अतिरिक्त महत्वपूर्ण यह है कि अधिक फोकस इस पर हो कि उस विश्वविद्यालय में दस सालों में नौ दलितों ने क्यों जान दी. जाहिर है कि उसके नौ कारण निकलते तो दिल्ली का वेमुला आंदोलन समीकरण बिगड़ जाता. लेकिन उन नौ कारणों से दलित छात्रों की नौ समस्याओं को देश के संज्ञान में ला सकारात्मक कार्रवाई हो सकती थी.

दिल्ली का #NotInMyName

पहला सवाल मेरे ज़हन में यही आया कि हूज नेम एंड हु द ब्लडी आर यू. मेरे नाम पर नहीं, यदि हिन्दुओं को कहना है क्योंकि अगर इसे आप हिन्दू फासिस्ट ताकतों की हरकतें मानते हैं, तो यह अभियान भी फिर उसी धार्मिक समूह का होना था. लेकिन इस अभियान में शामिल जिन लोगों को मैं जानता हूं, वे तो घोषित और प्रकट सेकुलर-चैंपियन हैं. हालांकि सेकुलर जैसा विराट और पवित्र शब्द इतना संक्रमित हो गया है इसके प्रयोग से इसका विलोम आशय ही प्रकट हो जाता है. तो मुझे दिल्ली के इस अभियान और इस स्लोगन के चुनाव में कोई सेन्स नहीं दिखा. एक तो अपने पॉइंट के लिए आपने जुनैद हत्याकांड का एक खराब उदाहरण चुना (अखलाक़, पहलू खान, उना आदि आदि सशक्त उदाहरण थे) और उसके बाद आपने #NotInMyName के कैची दुरुपयोग की राह पकड़ी.

हमारा मूल प्रतिरोध यह है कि इन हिन्दू अराजकों को न केवल सत्तासीन विचारधारा से प्रेरणा प्राप्त होती है और शह मिलती है बल्कि इनके विरुद्ध कड़ा संदेश जारी करने में यह सरकार राजनीतिक कारणों से बेईमान रही है. #NotInMyName का नारा मोदी, शाह, संघ, योगी और उनके विभिन्न सभाओं और सेनाओं की ओर से आना चाहिए.

जंतर मंतर के अभियान का नाम #OnYourName होना चाहिए था जिसका सीधा संदेश होता कि अपने विचार पक्ष के गुंडों पर लगाम कसे सरकार. तुम्हारे नाम, विचार और तुम्हारी शह पर देश में बढ़ी है भीड़ की यह अराजकता.


शायक आलोक
शायक आलोक

शायक आलोक नए लेखक हैं. फेसबुक पर अपने किस्से-कहानियों-कविताओं-प्रतिक्रियाओं और कारस्तानियों से छाए रहते हैं. बेगूसराय से हैं, अभी फिलहाल दिल्ली में एक लेखक होने के तेवर के साथ रहते हैं. हिंदी की नई ठसक लगते हैं. फोटोग्राफी भी करते हैं. 


 

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