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क्या मोदी सरकार ने बजट में 1.70 लाख करोड़ रुपए का झोल किया है?

बजट माने हिसाब-किताब. कई लोग घर के खर्च का हिसाब-किताब रखते हैं तो सरकार देश का. मगर यही हिसाब अगर किताब में गलत दिखे तो खटकता है. कुछ लोग इसे लोचा कहते हैं. कुछ की नजर में ये झोल है. अब यही झोल दिख रहा सरकार की दो किताबों में. एक आर्थिक सर्वे में. दूसरा बजट में. आर्थिक सर्वे गुजरे साल का सरकार का आमदनी और खर्च का हिसाब-किताब होता है. और बजट में आने वाले साल के खर्च के अनुमान के साथ बीते साल का हिसाब भी होता है. आर्थिक सर्वे में सरकार की आमदनी कम दिखाई गई है. और बजट में ज्यादा. दोनों के आंकड़ों में फर्क है. आर्थिक सर्वे में बीते साल यानी 2018-19 में सरकार की आमदनी 15.6 लाख करोड़ रुपए बताई गई है. और बजट में 17.3 लाख करोड़. दोनों आंकड़ों में 1 लाख 70 हजार करोड़ रुपए का अंतर है. सरकारी किताबों में पकड़ी गई इस गड़बड़ी को लेकर जानकारों ने मोदी सरकार के आंकड़ों पर एक बार फिर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. क्या है ये पूरा मामला आइए समझते हैं आसान भाषा में.

सवाल-1 क्या होता है आर्थिक सर्वे और क्या होता है बजट?
आर्थिक सर्वे इकॉनमी का हाल बताता है. बीते साल अर्थव्यवस्था ने कैसा प्रदर्शन किया, इसका लेखा-जोखा आर्थिक सर्वे में दिया जाता है. इसी तरह आम बजट में आने वाले साल के लिए खर्च अनुमान दिए जाते हैं. बजट में कुछ आंकड़े बीते साल के भी दिए रहते हैं. मसलन बीते साल सरकार को कितनी आमदनी हुई. कहां-कहां से पैसा आया और किस-किस मद में खर्च हुआ वगैरह-वगैरह. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक सर्वे और बजट में सरकार की आमदनी के अलग-अलग आंकड़े पेश किए गए हैं.

सवाल-2 क्या हैं सरकार की आमदनी के आंकड़े?
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं रथिन रॉय. इन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है. इसके मुताबिक इकनॉमिक सर्वे और बजट में सरकार की आमदनी अलग-अलग बताई गई है. इकनॉमिक सर्वे में सरकार का राजस्व माने आमदनी 15.6 लाख करोड़ और बजट में 17.3 लाख करोड़ रुपए बताई गई.

सवाल-3 आमदनी के इन आंकड़ों से क्या फर्क पड़ता है?
फर्क पड़ता है साब. असल में सब कुछ जोड़ने घटाने के बाद ही बजट बनता है. हिसाब-किताब लगाने के बाद ही कहा गया कि सरकारी खजाने में बीते साल यानी 2018-19 में 17.3 लाख करोड़ रुपए आए. रथिन रॉय के मुताबिक बजट में संशोधित अनुमान के बाद आमदनी के ये आंकड़े आए हैं. दूसरी तरफ, आर्थिक सर्वे के आंकड़े प्रावधानिक वास्तविक कहे जाते हैं. ये आंकड़े ज्यादा दुरुस्त माने जाते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि आर्थिक सर्वे के डेटा ज्यादा दुरुस्त है. और अगर ऐसा है तो सरकार की आमदनी हकीकत से कोसों दूर है. और जब सरकार कमाएगी कम तो खर्च भी कम ही करेगी.

सवाल- 4 सरकार के खर्च में क्या फर्क पड़ा है इससे?
रथिन रॉय की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार के खर्चों के आंकड़ों में भी गड़बड़ी दिख रही है. बजट में कहा गया कि 2018-19 के दौरान 24.6 लाख करोड़ रुपए खर्च किए गए. आर्थिक सर्वे में कहा गया कि खर्च 23.1 लाख करोड़ रुपए रहा यानी 1.5 लाख करोड़ रुपए कम.

सवाल-5 वित्तमंत्री ने क्यों कहा- टेंशन की बात नहीं?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पूरे मामले पर संसद में बयान दिया. और कहा कि सरकार ने जो भी आंकड़े पेश किए हैं, वो पूरी तरह दुरुस्त हैं. किसी तरह की टेंशन की बात नहीं है. इस गड़बड़ी के लिए अलग-अलग आंकड़े जिम्मेदार हैं. बजट के अनुमान 7 जनवरी को जारी राष्ट्रीय लेखा यानी NSSO के अनुमानों पर आधारित हैं. दूसरी तरफ इकनॉमिक सर्वे के आंकड़े 31 मई को आए रीयल आंकड़ों पर आधारित हैं.

सवाल-6 क्या सरकार कुछ छिपा रही है?
सिर्फ इसी आंकड़े पर ही नहीं. सरकार के जी़डीपी के आंकड़ों में भी गड़बड़ी दिख रही है. आर्थिक समीक्षा में कहा गया कि देश की आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी ग्रोथ 11 फीसदी है. और बजट में इसे 12 परसेंट बताया गया है. इस मसले पर 10 जुलाई के दिन कांग्रेस, सपा, बसपा और टीएमसी जैसे दलों ने संसद में हंगामा किया. इन दलों ने आरोप लगाया कि सरकार जीडीपी यानी देश की तरक्की किस रफ्तार से चल रही है इसकी सही जानकारी नहीं दे रही है. विपक्ष के हंगामे के बीच वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि कोई आंकड़ा नहीं छिपाया जा रहा है. लेकिन कुछ सदस्य वित्त मंत्री के जवाब से संतुष्ट नहीं हुए. उनकी टोकाटाकी के बीच उन्होंने कहा कि ‘बेशक चाहे लोग मेरी हंसी उड़ाएं, लेकिन कई बार मैं ऐसे बोलती हूं जैसे कि कक्षा में बैठे स्टूडेंट्स को शिक्षक पढ़ाती है. अगर ये काफी नहीं है तो मुझे खुशी होगी कि तो माननीय सदस्य मुझसे कमरा नंबर 36 (वित्त मंत्री का संसद में आफिस) में आकर चीजों को स्पष्ट कर सकते हैं.’

उनके इतना कहने पर विपक्षी दलों का हंगामा और बढ़ गया. नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ये कहते सुने गए कि वे चुने हुए प्रतिनिधि हैं. कोई स्टूडेंट नहीं. मंत्री की ओर से गलत जानकारी देने पर वे तो सवाल उठाएंगे. बाद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हालात को संभाला.
बहरहाल, आंकड़ों को लेकर मोदी की पहली सरकार भी अक्सर सवालों के घेरे में रहती थी. अब नई सरकार के सामने भी पहला संकट आंकड़ों को लेकर ही आया है.


वीडियोः मोदी सरकार के पहले बजट से मिडिल क्लास को क्या मिला? Episode 252

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