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इंडिया के RCEP में न जाने की इन 8 वजहों को पढ़कर तय करें कि मौका गंवाया या बाल-बाल बचे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RCEP (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकॉनॉमिक पार्टनरशिप) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने 4 नवंबर को बैंकॉक पहुंचे थे. ये RCEP ट्रेड डील की टॉप लेवल मीटिंग थी. दुनिया के 16 देशों के शीर्ष नेता यानी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री इस मीटिंग में पहुंचे थे. इस मीटिंग के बाद भारत ने RCEP में शामिल होने से इनकार कर दिया है. विपक्ष, मझौले उद्योगों और मज़दूर-किसान संगठनों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया. सरकारी सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘अपनी आत्मा की आवाज़’ पर लिया फ़ैसला बताया है.

मोदी ने महात्मा गांधी का भी ज़िक्र किया. गांधी जी के जंतर और अपनी अंतरात्मा के कारण यह फैसला लेने की बात कही थी.
मोदी ने महात्मा गांधी का भी ज़िक्र किया. गांधी जी के जंतर और अपनी अंतरात्मा के कारण यह फैसला लेने की बात कही थी.

सरकार की ओर से वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 5 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने RCEP में भारत के शामिल न होने के कारण बताए.

RCEP में शामिल न होने के कारण

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, RCEP ट्रेड डील में रखे गए 70 विषयों में से 50 पर भारत सरकार को आपत्ति थी. भारत ने इन सब मुद्दों पर चर्चा की. लेकिन आखिर में कुछ ऐसे मुद्दे रह गए, जिनपर भारत और बाकी 15 देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई. ये मुद्दे थे-

1. ट्रेड डेफिसेट यानी व्यापारिक घाटे को संतुलित करना-

पीयूष गोयल के मुताबिक, भारत का मौजूदा व्यापारिक घाटा आसियान और बाकी देशों के साथ ज़्यादा है. इसे कम करने के लिए भारत ज़ोर दे रहा था. दूसरे देशों से बाज़ार खोलने की मांग की थी. लेकिन इस पर बाकी देशों की ओर से भारत को दी गई डील कबूल करने लायक नहीं थी.

2. विदेशी आयात से भारतीय उद्योगों को सुरक्षा मिले-

भारत कई क्षेत्रों में मज़बूत है. कुछ में बाकी देश भी मज़बूत हैं. खासतौर पर टेक्सटाइल और फार्मेसी सेक्टर में. अगर वैसे उत्पादों की भरमार भारत में होगी तो ये भारतीय उद्योगों के लिए अच्छा नहीं है. इसलिए जब तक सभी देशों में लग रहे शुल्क बराबर नहीं हो जाते, भारत को अपने घरेलू उद्योग को संरक्षण देने की इजाज़त मिले.

3.नॉन-टैरिफ बैरियर से गलत निर्यात न हों-

नॉन-टैरिफ बैरियर यानी दूसरे देशों से बिना शुल्क होने वाले निर्यात का ग़लत इस्तेमाल न हो. देश अपने ही उत्पाद भारत में भेजें. छद्म व्यापार का हिस्सा न बनें. किसी दूसरे देश के प्रभाव में आकर अपने देश को उनके सामान बेचने का माध्यम न बनने दें. पीयूष गोयल के मुताबिक, उत्पाद के स्रोत और छद्म व्यापार को रोकने के लिए RCEP डील में कुछ भी ठोस प्रावधान नहीं था. उदाहरण के तौर पर कह सकते हैं कि चीन वियतनाम के रास्ते भारत में अपने प्रॉडक्ट्स पहुंचा सकता है. RCEP डील होने पर सभी देशों के बीच शुल्क नहीं होगा या न के बराबर होगा. ऐसे में चीन अपना सामान भारत में बेचने के लिए छद्म रास्ता अख़्तियार कर सकता है.

4. भारत के गुड्स और सर्विस सेक्टर को अच्छे मौके मिलें-

भारत चाहता था कि अपने सर्विस सेक्टर का विस्तार दूसरे देशों तक हो. दूसरे देश भी गुड्स और सर्विस सेक्टर के लिए कम से कम उतना बाज़ार खोलें, जितना भारत ने खोला हुआ है. लेकिन इस मामले पर भी सभी के बीच सहमति नहीं बनी.

प्रधानमंत्री मोदी के साथ चीन के प्रधानमंत्री ली क्यांग के साथ.
प्रधानमंत्री मोदी के साथ चीन के प्रधानमंत्री ली क्यांग के साथ.

5. सभी RCEP देशों में आपसी व्यापार पर एक जैसे शुल्क हों-

भारत चाहता था कि RCEP में शामिल देशों में एक ही तरह के टैरिफ हों. ताकि भारत में दूसरे देश के रास्ते तीसरे देश का माल न आ सके.

6. 2019 को टैरिफ (शुल्क) का बेस इयर माना जाए-

पहले तय था कि 2016 तक RCEP बनेगा और 2014 को टैरिफ के लिए बेस इयर माना जाएगा. लेकिन भारत की मांग थी कि 2019 को बेस इयर माना जाए. पीयूष गोयल के मुताबिक,

‘2014 से 2019 के बीच भारत ने टैरिफ में बदलाव किए हैं. हम चाहते थे कि मौजूदा टैरिफ के आधार पर डील हो.’

7. MFN देशों को RCEP से अलग रखा जाए-

RCEP के बाकी देश चाहते थे कि सबसे तरजीही राष्ट्र यानी मॉस्ट फेवर्ड नेशंस से RCEP की शर्तों के तहत ही व्यापार हो. जैसे कुछ दिन पहले तक पाकिस्तान को भारत ने मॉस्ट फेवर्ड नेशन का दर्ज दिया हुआ था, अगर कोई RCEP देश पाकिस्तान से व्यापार करता है तो उसे भी भारत की तरह व्यापारिक फायदे मिलें. लेकिन भारत इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानता है. इसलिए MFN से जो भी व्यापारिक रिश्ता होगा, वो भारत का ही होगा, बाकी देशों का नहीं.

8. डेयरी और खेती को RCEP से अलग रखा जाए-

भारत सरकार का दावा है कि सरकार डेयरी और खेती को RCEP में शामिल करने के खिलाफ़ थी. भारत में भी इन्हीं सेक्टर के लोग सबसे ज़्यादा विरोध दर्ज करवा रहे थे. लेकिन डेयरी और खेती को बाहर रखने पर सहमति नहीं बन पाई.

भारत-आसियान के बीच व्यापारिक घाटे का आंकड़ा. <a href="https://commerce.gov.in/InnerContent.aspx?Id=74#" target="_blank">2013-14 में भारत-आसियान के बीच 74 बिलियन डॉलर का व्यापार था. 2019 में ये बढ़कर क़रीब 97 बिलियन डॉलर हो गया है</a>. व्यापार बढ़ने से व्यापारिक घाटा भी बढ़ा है. 2013-14 में व्यापारिक घाटा 8 बिलियन डॉलर था. वहीं 2018-19 में ये बढ़कर क़रीब 22 बिलियन डॉलर हो गया है.
भारत-आसियान के बीच व्यापारिक घाटे का आंकड़ा. 2013-14 में भारत-आसियान के बीच 74 बिलियन डॉलर का व्यापार था. 2019 में ये बढ़कर क़रीब 97 बिलियन डॉलर हो गया है. व्यापार बढ़ने से व्यापारिक घाटा भी बढ़ा है. 2013-14 में व्यापारिक घाटा 8 बिलियन डॉलर था. वहीं 2018-19 में ये बढ़कर क़रीब 22 बिलियन डॉलर हो गया है.

भारत सरकार ने अपनी कमी बताई

पीयूष गोयल ने पत्रकारों को एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि हमें अपनी लोकल मार्किट को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाना होगा. अगर भारत RCEP में जाता है तो बाहर के देशों से भारत में उत्पाद आएंगे. अगर भारत की लोकल मार्किट में प्रतिस्पर्धा ज़्यादा नहीं होगी तो उन्नत उत्पाद नहीं बन पाएंगे. इसके अलावा हम पहले से ही आसियान देशों के साथ व्यापार कर रहे हैं. इसलिए हमारे पास सिर्फ बाकी बचे 5 देशों से अच्छी डील करने का मौका था.

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल.
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल.

‘कांग्रेस के कांड ठीक कर रहे हैं’

RCEP से जुड़ी पुरानी फाइल के सहारे पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए गोयल ने कहा कि

कांग्रेस खुद RCEP डील करना चाहती थी. 2013 में ब्रुनेई में मिनिस्टर स्तर की बात हुई थी. उस वक्त कॉमर्स मिनिस्टर रहे (आनंद शर्मा) उत्साह में थे. अब कांग्रेस भ्रम फैला रही है. कांग्रेस पहले ही आसियान के साथ भारत के लिए ख़राब डील कर चुकी है. आसियान के लिए भारत ने 74 फीसदी उत्पादों पर ज़ीरो ड्यूटी (शुल्क) किया हुआ है. वहीं डील के समय भारत से भी अमीर रहे इंडोनेशिया ने भारत के लिए 50 फीसदी बाज़ार ही खोला था.

साउथ कोरिया और जापान के साथ भारत का फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) है. ये एग्रीमेंट जल्दबाज़ी में किए गए हैं. इनसे भारत को नुकसान हुआ है. 2004 में आज के RCEP देशों के साथ भारत का ट्रेड डेफिसेट 7 बिलियन डॉलर था. लेकिन 2014 तक आते-आते ये बढ़कर 78 बिलियन हो गया था. यानी क़रीब 1100 फीसदी ट्रेड डेफिसेट बढ़ा है.

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया कि

‘भारत फिलहाल के लिए RCEP जॉइन नहीं कर रहा. लेकिन अगर हमारी मांगें मान ली गईं, हमारे लिए अच्छी मार्किट खुली तो हर देश की तरह हम भी जुड़ेंगे. अभी के लिए हम शामिल नहीं हो रहे हैं. 2016 में लागू होने वाला RCEP अब तक लागू नहीं हुआ है. हमने लगातार मोलभाव किया. इसलिए अब तक बात चलती रही. हम अचानक RCEP से नहीं निकले हैं. हमने बातचीत की है. तर्क और तथ्य के आधार पर. सभी देशों ने इसे माना है.’

भारत के लिए ऐसी ही बात ऑस्ट्रेलिया के पीएम स्कॉट मॉरिसन ने कही है. मॉरिसन ने कहा कि भारत जब भी जुड़ना चाहता है, भारत के लिए दरवाज़े खुले हैं. RCEP देशों के साझा बयान में कहा है कि भारत के लिए RCEP खुला है. हम आपसी समझ के हिसाब से मोलभाव करेंगे और भारत की ओर से उठाई गई समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करेंगे.


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