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उलगुलान: विद्रोह की वो ताकतवर आवाज़ जिसे दबाने में अंग्रेजों के पसीने छूट गए

उन्होंने अपने जूड़े में

खोंस रखा है साहस का फूल

कानों में उम्मीद को

बालियों की तरह पिरोया है

धरती को सर पर घड़े की तरह ढोए

लचकती हुई चली जा रही हैं

उलगुलान की औरतें

धरती से प्यार करने वालों के लिए

उतनी ही खूबसूरत

और उतनी ही खतरनाक

धरती के दुश्मनों के लिए।

-‘उलगुलान की औरतें’ अनुज लुगुन

जब ब्रिटिश अफ्रीका आए, तो उनके हाथ में बाइबल थी और हमारे पास ज़मीन. उन्होंने हमसे कहा, चलो प्रार्थना करते हैं. हमने जब आंखें खोलीं तो हमारे पास बाइबल थी, और उनके पास हमारी ज़मीन. केन्या के लीडर जोमो केन्याटा ने जब ये लिखा, तो एक बार में साफ़ कर दिया कि उपनिवेशवादी संस्कृति कैसे काम करती है. किस तरह अपने पंजे किसी भूभाग पर गड़ा कर उसे तब तक नोचती रहती है, जब तक अस्थि-पंजर न बच जाएं.

जैसा ब्रिटेन ने किया. भारत के साथ. अपनी गुलामी में बंधे कई दूसरे देशों के साथ.

जंगली. असभ्य. अविकसित.

इसी तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उपनिवेशवादी ताकतों ने अपने द्वारा कब्जाए देशों की मूल जनता को धीरे-धीरे असहाय करना शुरू किया. कहा,

ये ‘बर्बर’ लोग हैं. इन्हें ‘सभ्य’ बनाने की ज़रूरत है. ये हम करेंगे.

इन्होने ज़मीन हथिया रखी है. हम उसपर कारखाने बनाएंगे. खेती करवाएंगे.

इनका कोई भगवान नहीं. ये कैसे असामाजिक हैं. हम इनको पूजना सिखाएंगे. भगवान क्या होता है, हम बताएंगे.

ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार के बहाने आई थी. जब देखा कि भारत में संसाधनों की प्रचुरता है, तो इसका शोषण करने का ख्याल उनके दिमाग में गहरे पैठ गया. 1764 में हुई बक्सर की लड़ाई ख़त्म होने के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल और ओडिशा से कर इकठ्ठा करने का अधिकार मिल गया था. इसके बाद इसकी जड़ें फैलती ही चली गईं.

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दीवानी के अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को देते हुए शाह आलम द्वितीय. बक्सर युद्ध के बाद कंपनी को बंगाल, बिहार, और ओडिशा की दीवानी दे दी गई. यानी अब यहां से ब्रिटिशर्स कर इकठ्ठा कर सकते थे. (तस्वीर: बीबीसी)

जब पहले स्वतंत्रता संग्राम की बात की जाती है, तो नाम लिया जाता है 1857 के ग़दर का. वो ग़दर जिसके बाद ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया को सीधे एम्प्रेस ऑफ इंडिया का खिताब देकर भारत उनके हवाले कर दिया गया था.

लेकिन हम उस ग़दर की बात नहीं करेंगे. हम बात करेंगे हाशिए पर चल रही एक ऐसी लड़ाई के बारे में, जिसने आज़ादी के मायनों पर सवाल खड़े कर दिए. हम बात करेंगे मुंडा विद्रोह की. बात करेंगे धरती आबा (पिता) बिरसा मुंडा की. जो डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी अपने लोगों के लिए भगवान की तरह पूजनीय हैं. बात करेंगे उलगुलान की.

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बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा था, और मां का कर्मी हातू. (तस्वीर: आजतक)

कहते हैं कि जब तक जीतने वालों का इतिहास लिखा जाता रहेगा, व्याधों के ही किस्से लिखे जाएंगे. उनके द्वारा मारे गए या घायल हुए जीवों के नहीं.(Until the lions have their own historians, the history of the hunt will always glorify the hunter.- Chinua Achebe)  1857 से पहले भारत की मुख्यधारा से परे कई विद्रोह शुरू हो चुके थे. लेकिन उनमें से अधिकतर को लूटपाट और डकैती करने वाले असामाजिक तत्वों द्वारा पेश की गई दिक्कत बता कर दबा दिया गया. 1830 के दशक में शुरू हुआ कोल विद्रोह और 1855 में हुआ संथाल विद्रोह इसके बड़े नमूने हैं. ये आदिवासी विद्रोह सिर्फ ब्रिटिश ताकतों के खिलाफ नहीं थे. बल्कि उनके साथ मिले हुए देशी शोषणकारियों और बिचौलियों के खिलाफ भी थे. जैसे ज़मींदार और महाजन, जो मूलनिवासी और जमीन के अधिकारी आदिवासियों को उनकी जगह से बेदखल कर रहे थे. इन महाजनों को मुंडा अपनी मातृभाषा में दिकू कहते थे.

इन्हीं आदिवासियों को एक दिशा में संगठित होने का पाठ सिखाने वाले थे बिरसा मुंडा. 1875 में तब के उलिहातू में पैदा हुए, जो आज झारखंड में पड़ता है. तब बंगाल प्रेसिडेंसी में पड़ता था. चाईबासा में पढ़ने गए और वहीं पर देखा और सीखा कि किस प्रकार आदिवासियों का शोषण किया जा रहा है. कोल विद्रोह और संथाल विद्रोह के बारे में पढ़-जानकर अन्दर का लोहा धधक उठा. नारा दिया, अबुआः दिशोम रे अबुआः राज. यानी अपनी धरती, उस पर अपना राज.

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भले ही मुंडा विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी जनजातियों का पहला विद्रोह न रहा हो, लेकिन ये सबसे बड़ा विद्रोह बनकर ज़रूर उभरा.

जल-जंगल और ज़मीन का उलगुलान

बिरसा मुंडा ने उलगुलान की शुरुआत की. उलगुलान का अर्थ होता है असीम कोलाहल. द ग्रेट ट्यूमुल्ट. वो विद्रोह जिसमें आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और ज़मीन पर अपनी दावेदारी के लिए विद्रोह शुरू किया. 1895 में शुरू हुए इस विद्रोह ने अंग्रेजों को बिरसा के पीछे लगा दिया. गिरफ्तारी और रिहाई का दौर चला. लेकिन एक बार बिरसा जेल से छूटे, फिर रुकने का नाम नहीं लिया. 28 जून, 1898 को सामाजिक बराबरी के लिए चुटिया के मंदिर का अभियान शुरू किया.

1899 में क्रिसमस के वक्त 7000 आदमी और औरतें इकट्ठा हुए और क्रांति की घोषणा की. जो जल्द ही खूंटी, तमार, बसिया और रांची तक फैल गई. 5 जनवरी, 1900 तक सारी मुंडा जनजाति ने हथियार उठा लिए. बहुत से पुलिस वाले मार दिए गए और करीब 100 इमारतों में आग लगा दी गई. अबुआ दिसुन यानी स्वराज्य कायम होने की घोषणा कर दी गई. इनसे लड़ने के लिए अंग्रेजों ने सेना भेजी. साथ में बिरसा को गिरफ्तार करने के लिए 500 रुपये का इनाम रखा गया. डुम्बारी पहाड़ी पर वैसा ही एक काण्ड ब्रिटिश सेना ने किया, जैसा जलियांवाला बाग के समय हुआ था. सैकड़ों लोग मारे गए. मंजर ये था कि सारी पहाड़ी पर लाशें छितराई हुई थीं. इस जनसंहार के बाद लाशों को खाई में फेंक दिया गया. बहुत से लोगों को जिन्दा जला दिया गया.

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अपनी लड़ाई में आदिवासी विषबुझे तीरों का इस्तेमाल भी करते थे. (तस्वीर: इंडिया टुडे)

बिरसा शायद पकड़ में न आते. लेकिन 500 रुपए का लालच शायद अपने अज़ीज़ नेता से बढ़कर था किसी की खातिर. घर का भेदी लंका ढाए वाली कहावत सच हुई. बिरसा के करीबी किसी व्यक्ति ने खबरची का काम किया और उन्हें पकड़वा दिया. 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर के पास उनकी गिरफ्तारी हुई. उनकी गिरफ्तारी का किस्सा महाश्वेता देवी ने अपनी किताब अरण्येर अधिकार (जंगल के दावेदार) में बताया है. आखिर कैसा था वो पल:

बिरसा के हाथों में हथकड़ियां थीं;  दोनों ओर दो सिपाही थे. बिरसा के सिर पर पगड़ी थी; धोती पहने था. बदन पर और कुछ नहीं था—इसी से हवा और धूप एक साथ चमड़ी को छेद कर रहे थे. राह के दोनों ओर लोग खड़े थे. सभी मुंडा थे. औरतें छाती पीट रही थीं; आकाश की ओर हाथ उड़ा रही थीं. आदमी कह रहे थे : जिन्होनें तुम्हें पकड़वाया है वे माघ महीना भी पूरा होते न देख पायेंगे. वे अगर जाल फैलाये रहते हैं तो उस जाल में पकड़े शिकार को उन्हें घर नहीं ले जाने दिया जायेगा.’ किंतु बिरसा उन पर खफ़ा नहीं हुए. पकड़वा दिया; क्यों न पकड़वा देते ? डिप्टी –कमिश्नर ने उन्हें गिनकर पांच सौ रुपये नहीं दिये क्या ! पांच सौ रुपये बहुत होते हैं ! किसी भी मुंडा के पास तो पांच सौ रुपये कभी नहीं हुए;  नहीं होते. मुंडा अगर रात में सोते-सोते सपना भी देखता है तो सपने में बहुत होता है तो वह महारानी मार्का दस रुपये देख पाता है. उन्हें पांच सौ रुपये मिले हैं- क्यों न बिरसा को पकड़वा देते ?

उलगुलान की आग में जंगल नहीं जलता; आदमी का रक्त और हृदय जलता है ! उस आग में जंगल नहीं जलता ! मुंडा लोगों के लिए जंगल नये सिरे से मां की तरह बन जाता है-बिरसा की मां की तरह; जंगल की संतानों को गोदी में लेकर बैठता है.

9 जून 1900 को पच्चीस साल की उम्र में कारागार में बिरसा मुंडा की मौत हुई. सुबह खून की उल्टी हुई, और उसके बाद मौत. कई लोग कहते हैं कि अंग्रेज सरकार ने ही उन्हें मीठा जहर दे दिया. लेकिन बताया कि हैजे से मौत हुई. बिरसा की मौत के बाद उलगुलान आंदोलन ठंडा पड़ गया. लेकिन आदिवासियों द्वारा उनके हक़ की जल, जंगल और जमीन की लड़ाई इस सदी में भी जारी है. शोषणकारी बदल गए हैं, शोषण वहीं का वहीं मौजूद है. आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा बिरसा की याद में कविता में लिखते हैं,

मैं केवल देह नहीं

मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूं

पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं

मैं भी मर नहीं सकता

मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता

उलगुलान!

उलगुलान!!

उलगुलान!!!


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