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वो सुपरस्टार जिससे शादी करने के सपने लता मंगेशकर देखती थीं

के. एल. सहगल के बड़े फैन हुआ करते थे हिंदी फिल्मों के लैजेंड्स. सहगल हमारे सिनेमा की बुनियाद बनाने वालों में प्रमुख रहे.

“फिल्मी अदाकारी को या फिल्म में काम करने को लोग उस ज़माने में वक़ार या इज़्ज़त की नज़र से नहीं देखते थे. कुंदन लाल सहगल उन तारीख़ी हस्तियों में से हैं जिन्होंने अपने पेशे को आला वक़ार और ऊंचे मर्तबे पे मक़ाम दिया. जब कभी भी हिंदुस्तानी फिल्म इंडस्ट्री की तारीख़ लिखी जाएगी तो उन चंद हस्तियों में जिन्होंने इस इंडस्ट्री को हुस्न दिया, रुतबा दिया, आगे बढ़ाया, एक नया मोड़ दिया, उनमें सहगल मरहूम का नाम हमेशा पेश पेश रहेगा.”

दिलीप कुमार, एक रेडियो इंटरव्यू में सहगल को ट्रिब्यूट देते हुए.

जब फिल्मों का मतलब मेरी पीढ़ी के लिए चांदनी, दामिनी, हीरो नंबर वन, बॉर्डर, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, हम आपके हैं कौन और दिलजले जैसे नामों से था; जब इस एंटरटेनमेंट ने ऐसे बांध रखा था जैसे बहेलिया जाल में चिड़िया को बांध लेता है; जब फिल्मों और फिल्म बनाने वालों के काम को आंक पाने जितना ज्ञान नहीं हुआ था – ये इसके ही कुछ बाद की बात है जब आर्थिक उदारीकरण के प्राकट्य को सेलिब्रेट करता और उससे पहले के कलाकारों की मज़ाक उड़ाता एक एड टेलीविजन पर देखा था. धुंधली याद है. एड में कोई मायूसी से गाना गाता है – “जब दिल ही टूट गया, हम जीके क्या करेंगे”. इस आवाज में ब्लैक एंड वाइट एरा के संबंधित गाने (फिल्म – शाहजहां, 1946) और गायक के लिए उपहास है. उसके बाद प्रोडक्ट का नाम आता है और ‘कूल’ सी पंचलाइन के साथ विज्ञापन खत्म होता है.

तब हम यंग दर्शकों को पता नहीं था कि इस एड को कैसे लिया जाए? लेकिन अब पता है कि बनाने वालों को भी नहीं पता था कि जिस गायकी का उन्होंने मज़ाक बनाया है उसका जिक्र करते हुए हिंदी सिनेमा के लैजेंड्री एक्टर दिलीप कुमार का दिल धक्क से रह जाता रहा. ये वही गाना था जिसके बारे में संबंधित सिंगर अपनी वसीयत में लिख गया कि उसे श्मशान ले जाया जाए तो ये गाना ही बजे.

ऐसे बहुत से एड और फिल्में रही हैं जिसमें ब्लैक एंड वाइट एरा के अंदाज की गायकी को बोरिंग, स्टूपिड कहकर खारिज किया जाता है. जैसे ‘अछूत कन्या’ (1936) जैसी जबरदस्त फिल्म में अशोक कुमार और देविका रानी पर फिल्माया गया “मैं बन की चिड़िया बन के बन-बन बोलूं रे.” जिसे गाया भी दोनों लीड एक्टर्स ने ख़ुद था. जो आज जब आलिया भट्ट ‘हाइवे’ में करती हैं तो यंगस्टर्स के रोमांच का पार नहीं रहता. पूरी तरह संभव है कि सत्तर साल बाद की पीढ़ी आज के गानों को उसी दंभ से खारिज कर रही होगी.

जिन आलिया, वरुण, रणबीर, रणवीर को सलमान, शाहरुख, अक्षय, आमिर की पीढ़ी से नर्वसनेस होती है, उन सबको अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र की पीढ़ी से नर्वसनेस होती थी, और उन दिग्गजों को दिलीप कुमार से नर्वसनेस होती रही. दिलीप कुमार अशोक कुमार की पर्सनैलिटी और एक्टिंग स्टाइल से अवाक थे. वहीं वे, अशोक कुमार और उनके समकक्ष जिनके फैन थे उनका नाम था – के. एल. सहगल.

के. एल. सहगल फिल्म दुश्मन (1939) के अपने किरदार में.
के. एल. सहगल फिल्म दुश्मन (1939) के अपने किरदार में.

हिंदी सिनेमा में अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना जैसे पहचाने और लिखे गए प्रमुख सुपरस्टार रहे. इनका बड़ा क्रेज था. उन सबसे भी पहले ये रुतबा कुंदन लाल सहगल का था. वे हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार कहे जाते हैं. अगर ढंग से उनके बारे में जाना जाए और उनके काम का आंका जाए तो अचंभित हो जाते हैं. वे अपने ज़माने के रॉकस्टार थे. लोग उनकी सिंगिंग को लेकर क्रेज़ी थे और एक्टिंग के भी.

ये हफ्ता ख़ास उन्हीं को याद करने का है.

जम्मू रियासत के तहसीलदार अमरचंद सहगल के घर 11 अप्रैल 1904 को उनका जन्म हुआ था. जालंधर से वास्ता रखने वाले अमरचंद के दो बेटे थे – रामलाल और हज़ारीलाल. तीसरे का नाम रखा गया कुंदन लाल. सवा महीना बीता तो कुंदन की मां केसर अपनी देवरानी के साथ पहली बार घर से निकलीं. वहां तवी नदी के किनारे दोनों ने स्नान किया और पास में बनी मजार पर सलमान यूसुफ़ पीर के चरणों में कुंदन को रख दिया. वो एक पहुंचे हुए सूफी पीर और सूफी संगीत के ज्ञाता थे. कुंदन रोने लगा तो केसर चुप कराने लगी और पीर ने रोक दिया. कहा, उसे रोने दो. रोने से बच्चे का गला खुलता है, उसके फेफड़े मज़बूत होते हैं. कुछ देर के बाद उन्होंने कहा, ये बच्चा अपनी मां की तरह गायन वाले सुरीले संस्कार लेकर पैदा हुआ है और एक दिन बड़ा गायक बनेगा.

कुंदन बचपन से ही अपनी मां को रोज़ सुबह भजन गाते देखते थे. रात को उनसे लोरी सुनते तभी नींद लेते. स्कूल जाने लगे तो पढ़ाई में मन नहीं लगता लेकिन गाना सुनाने को कहो तो रेडी रहते थे. जंगल में चिड़िया का चहचहाना सुनते, गडरियों के लोकगीत सुनते, मजार पर सूफी गीत गूंजते, घऱ में भजन.. यहीं से संगीत उनमें परमानेंट हो गया. बड़े होने लगे तो मां के गाए भजनों को हूबहू वैसे ही गाकर सुनाने लगे. जीवन के आखिरी दिनों तक कुंदन धार्मिक रहे. उनके तीन बच्चे हो गए थे. वे सुनते रहते थे और कुंदन रोज भजन गाते थे. उन्हें शराब की बुरी लत लग चुकी थी लेकिन रोज सुबह उठकर हार्मोनियम लेकर बालकनी में बैठ जाते थे और दो भजन गाते थे – “उठो सोनेवालों सहर हो गई है, उठो रात सारी बसर हो गई है” और “पी ले रे तू ओ मतवाला, हरी नाम का प्याला.”

बचपन में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा नहीं ली लेकिन संघर्ष के दिनों में जरूर अलग-अलग जगह से सीखने की कोशिश करते रहे. कानपुर में वे पेट पालने के लिए दिन में रैमिंग्टन के टाइपराइटर बेचा करते थे. लेकिन शाम को उस्तादों के साथ संगत करते थे. भैरवी जैसे राग सीखते थे. इसी शहर में उनकी एक गुरु-मां बन गई थीं जिनसे वो ठुमरी और दादरा सीखते थे.

फिर वे कलकत्ता चले गए वहां घूम-घूमकर साड़ियां बेचने का काम किया. इसके बाद वे न्यू थियेटर्स स्टूडियो से जुड़े जहां से उनकी फिल्मी यात्रा शुरू हुई. यहां तक पहुंचने में सहगल को 13-14 साल लगे. कुछ वक्त बाद 16 जनवरी 1932 को फिल्मों में उनकी एंट्री हुई. वो फिल्म थी ‘मोहब्बत के आंसू’ से. वे हीरो भी थे और इसके गाने भी गाए थे. फिल्म नहीं चली. अगले साल उनकी चार फिल्में आईं जिनमें दो में उन्होंने भजन गाए थे. दो में एक्टिंग की. ‘पूरण भगत’ में उनके भजन बड़े लोकप्रिय हुए. लेकिन ये तीसरे साल आई फिल्म ‘चंडीदास’ थी जिसके बाद उन्हें पलटकर नहीं देखना पड़ा.

और ये 1935 का साल था जब एक सुपरस्टार के तौर पर उनका जन्म हुआ. फिल्म थी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के फेमस नॉवेल पर बनी ‘देवदास’.

फिल्म देवदास के पोस्टर में के.एल. सहगल और जमुना. (फोटोः फिल्म हैरिटेज फाउंडेशन)
फिल्म देवदास के पोस्टर में के.एल. सहगल और जमुना. (फोटोः फिल्म हैरिटेज फाउंडेशन)

उनकी फिल्मों के गानों ने भी पूरे भारत में लोगों को दीवाना किया हुआ था. जैसे 1937 में आई फिल्म ‘प्रेसिडेंट’ का ‘गाना इक बंगला बने न्यारा’.

इसके 32 साल बाद आई ब्लॉकबस्टर ‘दो रास्ते’ (1969) में बलराज साहनी का किरदार सहगल के इसी गाने को सुनता रहता है. कहानी भी घर बचाने के संघर्ष पर आधारित होती है. ये गाना उसका रेफरेंस पॉइंट था. इसी फिल्म में राजेश खन्ना भी थे जिन्होंने साहनी के सबसे छोटे भाई का रोल किया था. इस फिल्म में साहनी का पात्र जैसे फैन की तरह सहगल का ये गाना सुनता था, वो दीवानगी भारत भर के लोगों में रही.

सहगल के स्टारडम का पहला दशक चल रहा था और एक बच्ची थी जो उनकी दीवानी थी. नाम था लता. लता मंगेशकर. आज जिन लता मंगेशकर की सिंगिंग मौलिकता और विशुद्धता का बहुत ऊंचा पैमाना है, वे लता म्यूजिक सीखने के शुरुआती वर्षों में सहगल की तरह गाने की कोशिश करती थीं. घर में फिल्मी गानों को गाना पसंद नहीं किया जाता था लेकिन लता को छूट थी. वे अपने पिता के साथ सहगल के गाने गाती रहतीं. सहगल की वे ऐसी दीवानी थीं कि उनसे शादी करने के सपने देखती थीं. लता ने एक बार बताया, “जितना मुझे याद आता है, मैं हमेशा से के. एल. सहगल से मिलना चाहती थी. बच्चे के तौर पर मैं कहती थी – जब बड़ी हो जाऊंगी तो उनसे शादी करूंगी. तब मेरे बाबा मुझे समझाते थे कि जब तुम शादी करने जितनी बड़ी हो जाओगी तो सहगल साब शादी की उम्र पार कर चुके होंगे.” लता को ये अफसोस हमेशा रहा कि वे जीवन में कभी सहगल से नहीं मिल पाईं. वे एक तरह से उनके परोक्ष म्यूजिक गुरु भी थे. जैसे कि हिंदी सिनेमा के लैजेंडरी सिंगर-एक्टर किशोर कुमार भी सहगल के बड़े प्रशंसक थे. वे भी सहगल को अपना म्यूजिकल गुरु मानते थे. वे पहले-पहल बंबई आए ही इसलिए थे कि बस एक बार सहगल से मिल सकें.

सहगल का स्टारडम कैसा था इसे दिलीप कुमार के शब्दों में मुकम्मल रूप में जान सकते हैं. बॉम्बे टॉकीज़ में दिलीप कुमार अपनी फिल्म ‘मिलन’ (1947) की शूटिंग कर रहे थे. इसके डायरेक्टर नितिन बोस थे. पास ही में किसी और फिल्म का मुहुर्त चल रहा था. बोस और दिलीप भी वहीं थे. दिलीप साब ने इस अनुभव को यूं याद किया,

“मुझे अच्छी तरह याद है नितिन बाबू ने कहा था आओ हम तुम्हे किसी ख़ास दोस्त से मिलाते हैं. उस दिन मुहुर्त के मेहमानों में चंद्रमोहन साहब भी थे, अशोक भैय्या भी थे, और वहीं कहीं मोती भैय्या की हंसी भी गूंज रही थी. और सामने, दूर.. मेरे सामने ही सहगल साहब एक कुर्सी पर, सफेद कुर्ता और सफेद पायजामा पहनकर बैठे थे. अब इन तमाम बड़े-बड़े आर्टिस्टों के सामने से होकर सहगल साहब तक पहुंचना भी मेरे लिए एक मंजिल तय करने के बराबर था.

..जब नितिन बाबू ने मेरा तार्रुफ करवाया उनसे तो वो बड़ी ही शफक़त से मिले. मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बैठा लिया. मुख्तसर बातें कीं. उनकी उन बातों में बहुत ही अपनापन और सादगी थी. मुझे ऐसे लगा जैसे, अपने ही घर का कोई बुजुर्ग मुझसे बातें कर रहा हो. थोड़ी देर बाद वो किसी ख़याल में खो गए. और दूर आम के पेड़ों पर टकटकी लगाए यूं देख रहे थे जैसे मन ही मन में कुछ गुनगुना रहे हों.”

“कुंदन लाल सहगल के नाम से हर आम-ओ-ख़ास को एक दिली वाबस्तगी थी. एक साफ़दिल, अज़ीम और नेक इंसान थे वो. जैसे भीतर, वैसे ही बाहर. शायद इसीलिए उनकी एक्टिंग भी उतनी ही नेचुरल और सादा होती थी, लगता नहीं था कि एक्टिंग कर रहे हैं वो. हालांकि उन दिनों अदाकारी में चंद्रमोहन साहब, अशोक भैय्या और मोती भैय्या, पृथ्वीराज जी.. बहुत ऊंचे दर्जे के कलाकार माने जाते थे लेकिन सहगल साहब मरहूम के साथ उनकी आवाज का जादू भी शामिल था. जज़्बाती तौर पर लोग उनके काम से बहुत ही मुत्तासिर होते थे.”

नई पीढ़ी ने भले ही सहगल के गानों को मज़ाक का पात्र समझा हो लेकिन दिलीप साहब ने उसे यूं देखा था, “उनकी एक फिल्म थी जिसका नाम था ‘ज़िंदगी’. उस फिल्म का वो आखिरी दर्दनाक सीन मुझे कभी नहीं भूलता. जिसमें निहायत ही मतीन अंदाज में सहगल साब फिल्म की हीरोइन जमना की लाश के पास बैठे हुए थे और अपनी महबूबा की मौत का सारा कर्ब, सारी रूहानी तकलीफ उनके उस गाने में ढल गई, जो उन्होंने उस वक्त गाया थाः सो जा, सो जासो जा राजकुमारी सो जा.

इसी गीत को लता मंगेशकर ने भी गाया था, सुनते हुए रोएं खड़े होते हैं:

सहगल ने हिंदी, बंगाली और तमिल भाषा की 36 फिल्मों में अभिनय किया था. ज्यादातर हिंदी थीं. उन्होंने 185 के करीब गाने गाए. इनमें 110 हिंदी और बाकी ज्यादातर बंगाली थे. जब 1937 में उनकी पहली बंगाली फिल्म ‘दीदी’ रिलीज हुई तो सामान्य और संभ्रांत दोनों वर्ग के दर्शक उनके मुरीद हो गए. एक समय में जब पंजाबी होने के कारण उनसे बंगाली गाने गवाने और एक्टिंग करवाने को लेकर साफ मना कर दिया, उन्हीं के बंगाली गायन को इस फिल्म में इतना पसंद किया गया कि खुद रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, “तुम्हारा गला कितना सुंदर है.”

कलकत्ता और बंबई की फिल्म इंडस्ट्री में उन्होंने 15 साल काम किया. 1947 में उनकी आखिरी फिल्म ‘परवाना’ रिलीज हुई, उनकी मृत्यु के बाद. शराब ने उन्हें जिलाए भी रखा, और जीने भी नहीं दिया.

माना जाता है कि सहगल ने कभी कोई इंटरव्यू नहीं दिया था. 24 जनवरी 1947/48 को बंबई से निकलने वाली वीकली युगांतर में उनका आखिरी साक्षात्कार छपा जो शायद उनका पहला भी था. इसे 2008 में हर्षद सरपोतदार नाम के यूज़र ने ऑर्कुट पर शेयर किया था. इसे लिया था युगांतर के चीफ एडिटर वामन वासुदेव उर्फ बाल चिताले. वे अपने दोस्त जी. एन. जोशी की मदद से सहगल का इंटरव्यू ले पाए जो एक मराठी सिंगर और रेडियो अधिकारी थे और सहगल के बहुत अच्छे दोस्त भी थे. इंटरव्यू के अगले दिन ही सहगल स्वास्थ्य लाभ करने कुछ दिन के लिए जालंधर को निकले, लेकिन कभी नहीं लौटे. 

प्रस्तुत है सहगल का लास्ट इंटरव्यू.  एडिटर वामन लिखते हैं..

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सहगल माटूंगा में रहते थे. यहां एक नीले रंग का बंगला बना हुआ था जिसमें कॉर्नर वाले एक बड़े फ्लैट में उनका निवास था. जब मैंने अपने कॉमन फ्रेंड के साथ उनके लिविंग रूम में प्रवेश किया, उसके शालीनता और सादगी भरे इंटीरियर ने मुझे बहुत प्रभावित किया.

मैं कम से एक ऐसी दीवार की उम्मीद तो कर ही रहा था जिसमें इस सुपरस्टार के अलग-अलग किरदारों और स्टाइल वाली फोटो लगी हों. लेकिन मैं दंग रह गया, वहां दीवार पर सिर्फ दो फोटो लगी थीं. एक उनके पिताजी की, एक उनकी मां की.

कमरे के एक कोने में उनका पसंदीदा हार्मोनियम रखा हुआ था.

एक-दो पलों में सहगल वहां प्रस्तुत हुए. लंबे. पतले. गंजा सिर. मैं उनसे पहली बार मिल रहा था इसलिए उनकी सादगी और विनम्रता से पूरी तरह मुग्ध था.

उन्होंने सफेद कुर्ता-पायजामा पहन रखा था और एक मुस्कान के साथ हमारा स्वागत कर रहे थे.

(कुछ बातों के बाद) मैंने पूछा, “क्या इसे लिखने की इजाजत आप मुझे देंगे?” सहगल ने कहा, “बिलकुल” और तुरंत मुझे कुछ सादे काग़ज पकड़ाए.

अपने बेड की ओर बढ़ते हुए सहगल ने कहा, “मुझे याद नहीं आता कि मैंने अब तक कभी भी कोई इंटरव्यू दिया है.” उन्होंने एक कंबल निकाला, अपने शरीर पर ओढ़ा और लेट गए.

बोले, “उम्मीद है आप कृपा करके मुझे (लेटने की) इजाजत देंगे! कमजोर आदमी हूं. अभी तक पूरी तरह ठीक नहीं हुआ हूं.”

मैंने भी स्वतः जवाब दिया, “कहने की बात ही नहीं सर! मेरी कामना है कि आप जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे!”

फिर सहगल ने कहा, “थैंक यू! अब आप मुझसे जो भी पूछना चाहें पूछ सकते हैं.”

मैंने पूछा, “अच्छा सर. ये बताएं, आप अपनी फिल्मों के बारे में क्या सोचते हैं?”

उन्होंने अपने कंधों को उचकाते हुए कहा, “इस बारे में कुछ कह नहीं सकता. क्योंकि मैंने कोई देखी ही नहीं है.”

“कोई प्रिव्यू तो देखा होगा?”

“नहीं, कभी नहीं!”

उनके इस जवाब से मैं बहुत सरप्राइज हुआ. फिर मैंने पूछा, “आप बॉम्बे क्यों आए? आपको ऩ्यू थियेटर्स (कलकत्ता) के उन कलाकारों के हाल तो पता ही रहे होंगे जो आपसे पहले बंबई आए थे! फिर भी आपने इतनी हिम्मत कैसे जुटाई?”

ईमानदारी से उन्होंने कहा, “इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण था, पैसा. लेकिन मुझे कभी बढ़िया से फीस नहीं दी गई. मेरी उम्मीद जितनी भी नहीं. मुझे पक्का यकीन था कि बंबई मुझे कुछ और पैसा बनाने में मदद करेगी. लेकिन फ्रैंक होकर बोलूं तो न्यू थियेटर्स के निर्माताओं जितना काबिल बंबई में एक भी प्रोड्यूसर नहीं है.”

“बंबई में स्टूडियोज़ के बारे में आप सोचते हैं?” मैंने पूछा.

वे बोले, “उन्हें स्टूडियोज़ मत कहिए! वो तो बस फैक्ट्रियां हैं. और ये फैक्ट्रियां इतनी नाकाबिल हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते. और ये बात मैंने रणजीत के चंदूलाल सेठ को भी बहुत सीधे बोली थी. बंबई में प्रोड्यूसर कम से कम समय में फिल्म का निर्माण करने का ही सिंगल टारगेट रखते हैं, और फिल्म पूरी होने पर शेखी बघारते हैं.” (रणजीत मूवीटोन, वो कंपनी जिसके साथ सहगल का एक साल का अनुबंध हुआ था और वे कलकत्ता फिल्म इंडस्ट्री को छोड़ बंबई आ गए थे. इस अनुबंध के लिए उन्हें 1 लाख रुपये मिले थे.)

यह कहते हुए सहगल मुस्कुराए और अपनी आंखें भींच ली.

उसके बाद उन्होंने अपनी अनबुझी सिगरेट से एक नई सिगरेट जलाई और एक नए सवाल के लिए मेरी तरफ देखने लगे.

मैंने पूछा, “क्या आपको लगता है आप कलकत्ता में ज्यादा सफल थे?”

सहगल ने कहा, “मैं आपकी बात समझ गया! आपके कहने का मतलब है मेरे गानों ने कलकत्ता की तुलना में बंबई में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि सिर्फ अच्छे गानों और अच्छी मैलडी से एक अच्छी फिल्म बन जाती है.”

“अगर आप एक अच्छी फिल्म बनाना चाहते हो तो आपको पर्याप्त समय चाहिए. आपको पर्याप्त रुपये चाहिए. बंबई के प्रोड्यूसर बस तेजी से फिल्में खत्म करने वाले लोग हैं. उनके पास न तो पूरे पैसे हैं और न ही पर्याप्त वक्त है.”

“मैं यहां पर अपने बारे में बहुत सी अफवाहें भी सुनता हूं. कि ‘सहगल बहुत ज्यादा पीता है’, ‘वो कभी टाइम पर सेट नहीं पहुंचता’, ‘सहगल शाम को सहगल नहीं रह जाता’ वगैरह वगैरह.”

“सच तो यह है कि ज्यादातर वक्त तो ये प्रोड्यूसर खुद भी बहुत शराब पिए रहते हैं और अपने स्टूडियो का किराया तक नहीं चुका सकते हैं.”

मैंने पूछा, “आप फिल्म लाइन में इतने साल से काम करते आ रहे हैं. कभी आपके दिमाग में आता है कि इस लाइन को छोड़ दें और कुछ नई चीज करें?”

सहगल ने कहा, “नहीं. ये लाइन छोड़ने के बारे में कभी नहीं सोचा. पिछले साल मैंने इतना ज्यादा काम किया कि अब मेरे फिजिशीयन ने सलाह दी है कि अगले छह महीने तक मैं बेड रेस्ट करूं.”

“कल मैं अपने पैृतक स्थान जालंधर के लिए निकलूंगा.”

“जब मैं लौटूंगा तो खुद एक फिल्म प्रोड्यूस करने की कोशिश करूंगा. मुझे बहुत ही मजबूती से लगता है कि मुझे कुछ असली एजुकेशनल और जागरूकता वाली फिल्में बनानी चाहिए!”

..

कुछ देर में हम सहगल साब, उनकी पत्नी, बेटे और बेटियों के साथ डाइनिंग टेबल पर बैठे जिस पर एक बहुत ही साफ सफेद कपड़ा बिछा था.

सहगल ने अपना पहला निवाला लिया ही था कि मैंने एक नया सवाल सोच लिया.

मैंने पूछा, “आपकी आवाज का क्या? उसका खयाल कैसे रखते हैं?”

उन्होंने कहा, “आवाज तो भगवान की दी हुई चीज़ है! और इसे सहेज कर रखना कुछ और नहीं भगवान का ही कर्तव्य है. लेकिन अगर आप जानना चाहते हैं कि मैं ऐसा करने में भगवान का सहयोग कैसे करता हूं तो यहां देखिए!”

उन्होंने अचार के बर्तन की ओर इशारा करते हुए आगे कहा, “इन (अचार के) टुकड़ों की तरह, मैं भी अपनी आवाज मैलडी में डुबो देता हूं. क्यों न ये हमेशा के लिए सहेज कर रह जाएगी!”

कहने की जरूरत नहीं कि हम सब सहमति में जोर से हंसे.

अपने सामने बैठे लड़के और बच्चियों की ओर देखते हुए मैंने उनसे पूछा, “आपके बच्चे?”

सहगल ने उनकी ओर स्नेह भरी नजर डालते हुए कहा, “हां. तीन. और संयोग की बात है कि सभी आपकी सेवा में उपस्थित हैं! ये देहरादून से छुट्टियां मनाकर लौटे ही हैं.”

“बच्चों के लिए आपकी कोई योजना?” मैंने पूछा.

उन्होंने कहा, “नहीं. इन्हें अपने करियर के बारे में खुद ही फैसला करना होगा. मैं दखल नहीं दूंगा. लेकिन अगर वो मुझे पूछेंगे तो मैं उन्हें सलाह दूंगा कि कानून की पढ़ाई करें. इनके पिता को तो कानून की ए बी सी भी नहीं पता है!”

मैंने पूछा, “आपने इतनी सारी सुपरहिट फिल्में दी हैं और उनमें इतनी ज्यादा मेहनत की है कि अब तो आप रईस आदमी होंगे! और इससे इन बच्चों को निश्चित रूप से सपोर्ट मिलेगा कि वे जितना भी आगे तक चाहें अपनी पढ़ाई कर सकते हैं.”

अपने हाथ में लिए निवाले की ओर नजरें रखकर सहगल ने बोला, “फ्रैंकली कहूं तो रुपयों और धन को लेकर मेरे मन में कोई खास फीलिंग्स नहीं हैं.”

“इसका ये मतलब बिलकुल नहीं है कि मेरे पास पैसे नहीं हैं. मैंने अब तक एक या दो लाख रुपये बचत करके रखे हैं लेकिन वो भी अपने हालिया काम से. उसके लिए मुझे कम से चार फिल्मों में एक साथ काम करना पड़ा है. लेकिन ऐसा मैंने अपनी सेहत को दाव पर रखकर किया.”

“ये बंगला मैंने हाल ही में खरीदा है और इसका श्रेय में फिल्म इंडस्ट्री को देता हूं. लेकिन अब मुझे कुछ आराम चाहिए.”

भोजन करने के बाद हम लोग फिर से लिविंग रूम में आ गए.

कोने में रखे हार्मोनियम ने फिर से मेरा ध्यान खींचा और मैं सहगल को पूछने से खुद को रोक नहीं पाया, “इस हार्मोनियम पर आप प्रैक्टिस करते होंगे?”

सहगल ने कुछ इमोशनल होते हुए कहा, “नहीं.”

रुंधे हुए गले के साथ उन्होंने बताया, “लेकिन ये मेरे सबसे अजीज़ दोस्त का है. यह फिल्म चंडीदास के समय से ही मेरे पास है. अब मैं इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करता लेकिन मैं इसे हमेशा अपनी आंखों के आगे चाहता हूं. मेरे गुजरे हुए वक्तों की ये एक जिंदा मिसाल है!”

मुझे लगा कि अब बहुत हो चुका है और मैं इन बीमार जीनियस को और परेशान नहीं करना चाहता. वो तब तक बेड पर फिर से लेट ही चुके थे. तो मैं वहां से उठ गया. और उनके ठहाके के बीच जाने की इजाज़त ली.

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जीवन के अलग-अलग पड़ावों में सहगल. आखिरी फोटो फिल्म देवदास (1935) से.

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अगले दिन 26 दिसंबर 1946 को जालंधर जाने के लिए सहगल रवाना हुए. स्टेशन पर उनको छोड़ने आए थे उनके दोस्त और बड़ी-बड़ी आंखों और जोरदार आवाज वाले अभिनेता के. एन. सिंह. ट्रेन जाने तक वे वहीं खड़े रहे. सहगल भी डिब्बे में चढ़े लेकर भीतर नहीं गए, दरवाजे पर खड़े होकर के. एन. को देखते रहे. ट्रेन आंखों से ओझल हो गई.

ये बंबई में सहगल का आखिरी दिन था. फिर वे लौटकर नहीं आए.

कोई 22 दिन बाद 18 जनवरी 1947 को रेडियो पर पूरे भारत को समाचार सुनाया गया – “के. एल. सहगल नहीं रहे!”

दूरदर्शन पर एक इंटरव्यू देते हुए के. एन. सिंह ने रेलवे स्टेशन के आखिरी पलों को एक शेर में जाहिर किया थाः

“रुख़्सत के वाक़यात यहां तक तो याद हैं
देखा किए उन्हें हम, जहां तक नज़र गई.”

सहगल के आखिरी दिन जालंधर में कैसे बीते इसे लेकर उनकी भाभी ने कोई 32-33 साल पहले पंजाबी के बड़े लेखक बलवंत गार्गी को बताया था. उन्होंने याद करते हुए कहा था, “कुंदन बहुत ही अच्छे इंसान थे. अलग आदमी थे. आखिरी दिनों में बहुत बीमार थे और डॉक्टर ने उनको पूरे आराम की सलाह दी थी लेकिन वो हमें जोक्स सुनाते रहते थे और हंसाते रहते थे. वो गुजरे उससे कुछ दिन पहले अपना सिर शेव करवा लिया था और बोलने लगे कि जब बंबई वापस जाएंगे तो साधुओं और भक्तों के रोल करेंगे. लेकिन अचानक उनकी तबीयत बहुत बिगड़ गई और 18 जनवरी की सुबह उनकी मृत्यु हो गई.”

बहुत मार्मिक और प्रेरणा देने वाले किस्सों में के. एल. सहगल को फिर याद करेंगे.

जाते-जाते सुनें फिल्म ‘जिंदगी’ (1940) में सहगल साब के गाए गाने मैं क्या जानू.. को लता मंगेशकर का ये ट्रिब्यूट. अनुपम!

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(First published on April 5, 2017.)

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सात साल पहले केजरीवाल ने वो बात कही थी जो आज वो ख़ुद नहीं सुनना चाहते

बरसों पुरानी इस बात की वजह से सोशल मीडिया पर घेर लिए गए हैं.

क्या भारत सरकार से पूछे बिना पाकिस्तान चली गई इंडियन कबड्डी टीम?

अब ढेरों खेल-तमाशा हो रहा है.

बजट का कितना ज्ञान है, ये क्विज़ खेलकर चेक कर लो!

कितना नंबर पाया, बताते हुए जाना. #Budget2020

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.

क्रिकेट के पक्के वाले फैन हो तो इस क्विज़ को जीतकर बताओ

कित्ता नंबर मिला, सच-सच बताना.