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अलकायदा के कश्मीर और तालिबान को लेकर दिए बयान पर भारत को चिंता करनी चाहिए?

अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने के बाद तालिबान को औपचारिक मान्यता मिलने की शुरुआत हो गई है. और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से जब इस आशय का प्रस्ताव पास हो रहा था, तो अध्यक्षता थी भारत के पास. हमने 31 अगस्त को ही आपको बता दिया था कि तालिबान से भारत अब औपचारिक रूप से बात करने लगा है. क्योंकि भारत की घरेलू राजनीति में तालिबान और तालिबानी का एक स्थापित अर्थ है, इसीलिए इन घटनाओं की समझ पैदा करना और ज़रूरी हो जाता है. ताकि आप इसमें फर्क कर सकें कि आपके नेता आपसे क्या कहते हैं, और नीति क्या बनाते हैं.

अफगानिस्तान में अमेरिका के निकलते ही कई घटनाएं एक साथ होती हैं. तालिबान से भारत की आधिकारिक बातचीत की खबर आती है. फिर यूएन में तालिबान पर प्रस्ताव आता है. अमेरिका, ब्रिटेन के प्रस्ताव पर चीन और रूस कमियां निकालते हैं. फिर कश्मीर को आज़ाद कराने को लेकर आतंकी गुट अलक़ायदा का बयान आता है. खबर ये भी आती है कि LoC पर आतंकियों के बड़े गुट ने कश्मीर में घुसपैठ की कोशिश की. तो इन सारी घटनाओं को हम जोड़कर देख सकते हैं. केंद्र इनका काबुल में है, लेकिन तपिश पूरी दुनिया तक है.

अफगानिस्तान पर दुनिया का क्या रुख है?

अमेरिका के निकलने से पहले तक काबुल एयरपोर्ट वो क़िला था, जो तालिबान नहीं जीत पाया. अमेरिका के एयरपोर्ट छोड़ते ही वहां भी अब तालिबान ने अपने झंडे लगा लिए. तालिबान जीत का जश्न मना रहा है. अब विदेशी फौज पूरी तरफ अफगानिस्तान से निकल गई तो तालिबान के सामने इस मोर्चे से कोई चुनौती नहीं बची है. हालांकि ब्रिटेन, अमेरिका समेत कई देशों के नागरिक अब भी अफगानिस्तान में फंसे हैं. उनके साथ गलत सलूक नहीं होगा, ये तालिबान के रहमोकरम पर है. और शायद पश्चिमी देशों में ये डर भी है कि तालिबान अपने वादे नहीं निभाएगा तो क्या होगा. तब इन देशों के पास क्या विकल्प बचता है. इसीलिए अब यूएन के छाते तले अफगानिस्तान में दखल की बात चल रही है.

हाल ही में फ्रांस के एक जर्नल में वहां के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां का बयान छपा था. उन्होंने कहा था कि ब्रिटेन और फ्रांस यूएन में एक प्रस्ताव लाएंगे जिसके तहत काबुल में यूएन के कंट्रोल वाला एक सेफ ज़ोन तैयार हो सके. और इस सेफ ज़ोन के ज़रिए मदद के ऑपरेशन्स चलाए जा सकें. उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि दुनिया का कोई देश इसका विरोध नहीं करेगा. इस बीच 31 अगस्त को यूएन में तालिबान और अफगानिस्तान पर एक प्रस्ताव आता भी है लेकिन इसमें सेफ ज़ोन की कोई बात नहीं. तो फिर किस बारे में है ये प्रस्ताव.

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ये तस्वीर 80 के दशक की है जब सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान के लोगों ने हथियार उठाए थे. फोटो- AP

प्रस्ताव का ड्राफ्ट अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने तैयार किया था. आप जानते होंगे हैं कि ये तीनों देश सुरक्षा परिषद की स्थाई समिति के सदस्य हैं. इस प्रस्ताव में लिखा था कि सुरक्षा परिषद ये उम्मीद करती है कि तालिबान, अफगानों और विदेशियों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से अफगानिस्तान से बाहर निकलने देगा. प्रस्ताव में 27 अगस्त के तालिबान के बयान का भी ज़िक्र है जिसमें अफगानों को विदेश जाने देने की बात कही थी. प्रस्ताव में लिखा है कि उम्मीद है तालिबान अपने सारे वादों पर खरा उतरेगा. इसके अलावा सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में लिखा है कि तालिबान अब अफगानिस्तान की धरती को किसी दूसरे देश को नुकसान पहुंचाने में इस्तेमाल नहीं होने देगा, और आतंकियों को पनाह भी नहीं दी जाएगी.

इंडियन एक्सप्रेस में शुभाजीत रॉय की रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में तालिबान शब्द का 5 बार इस्तेमाल हुआ. इसमें एक बार भी तालिबान के किसी कृत्य की निंदा नहीं नहीं की गई है. बल्कि तालिबान के वादों की बात की गई है. ये भी ज़िक्र नहीं है कि अगर तालिबान वादे पूरे नहीं करता है तो संयुक्त राष्ट्र की तरफ से क्या एक्शन लिया जाएगा. प्रतिबंध लगाए जाएंगे या कुछ और होगा. एक और अहम बात. इस प्रस्ताव का मतलब ये है कि यूएन सिक्योरिटी काउंसिल ने तालिबान को द फेक्टो (de facto) अफगानिस्तान की सरकार मान ली है.

द फेक्टो सरकार मानने का मतलब है कि कानूनी रूप से भले ही सुरक्षा परिषद ने तालिबान को मान्यता नहीं दी हो, लेकिन ये हकीकत मान ली है कि अब इस अफगानिस्तान का मुखिया तालिबान ही है, और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को उसी से बात करनी है. ये तालिबान को मान्यता देना नहीं हुआ, लेकिन मान्यता देने की शुरुआत कही जा सकती है. विडम्बना की बात ये है कि तालिबान का हिस्सा हक्कानी नेटवर्क भी है, जो अमेरिका के लिए आतंकी संगठन है, उसके मुखिया सिराजुद्दीन हक्कानी के सिर पर अमेरिका ने इनाम घोषित कर रखा है. पर ये सब भूलकर अभी अमेरिका तालिबान के वादों पर ऐतबार करना चाहता है.

अब इस प्रस्ताव पर वोटिंग की बात करते हैं. संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में 5 स्थाई और 10 अस्थाई देश हैं. यानी कुल 15. अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ये तीनों स्थाई देश प्रस्ताव लेकर आए थे तो जाहिर है ये समर्थन में ही थे. पीछे रह गए 12 देश. इनमें भारत समेत सभी अस्थाई देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. बच गए दो देश – रूस और चीन. दोनों सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य. इन दोनों देशों ने विरोध तो नहीं किया लेकिन वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया. यानी एबस्टेन किया. और ये एक तरह से शुरुआत है तालिबान पर यूएन में पश्चिमी देशों और रूस-चीन के टकराव की.

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तालिबान लड़ाके. फोटो- AP

ऐसा माना जा रहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ये टकराव कम से कम रखना चाहते थे. हो सकता है कि रूस या चीन के वीटो के डर से उन्होंने यूएन का सेफ ज़ोन बनाने वाली बात इस प्रस्ताव में नहीं जोड़ी. प्रस्ताव बिल्कुल भी तालिबान के खिलाफ नहीं जाता. फिर भी रूस और चीन ने कमियां निकाली. क्यों? रूस कह रहा है कि प्रस्ताव में उसकी चिंताएं शामिल नहीं हैं. आपत्ति ये जताई कि प्रस्ताव में अफगानिस्तान से कैसे आतंकी खतरों की बात हो रही है, ये बात स्पष्ट नहीं है. एक और आपत्ति ये कि अमेरिका ने अफगान सरकार के अमेरिकी खातों को फ्रिज कर दिया है, इसके अर्थव्यवस्था और मानवीय संकट पर असर की बात प्रस्ताव में नहीं है.

अब चीन पर आते हैं. चीन सारा इल्ज़ाम अमेरिका पर डाल दिया. कहा है कि एयरपोर्ट पर धमाके के बाद अमेरिका के ड्रोन हमले में आम नागरिकों की मौत हुई है. चीन ने कहा है कि अफगानिस्तान में अभी जो हालात हो रहे हैं, वो इसलिए हैं कि पश्चिमी देशों ने अव्यवस्थित ढंग से एक्ज़िट की वजह से है. चीन के यूएन में राजदूत जेंग शुआंग ने कहा है कि अफगानिस्तान के हालात में कुछ बुनियादी बदलाव हुए है, इसलिए ये ज़रूरी है कि विश्व समुदाय तालिबान से बातचीत करे, उन्हें गाइड करे. कुल मिलाकर चीन तालिबान की हिमायत भी कर रहा है, और ये भी दिखा रहा है कि वो अफगानिस्तान पर अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों के साथ नहीं है.

तालिबान को लेकर भारत का क्या रुख है?

अब आते हैं तालिबान को लेकर भारत के हिस्से की चिंताओं पर. बात दो हफ्ते पहले से शुरू करते हैं. 15 अगस्त को जब काबुल पर तालिबान का कब्जा हुआ, तो हमारे देश में भी तालिबान पर विमर्श का दायरा बढ़ा. न्यूज़ चैनलों की बहसों में तालिबान को क्रूर आतंकी साबित करने की होड़ सी लग गई. विधानसभाओं में तालिबान पर चर्चा हो रही थी. किसी ने तालिबान के पक्ष में कुछ कह दिया तो उनकी लानत मलानत हो रही थी. पुलिस केस दर्ज भी दर्ज हुए. कुल मिलाकर माहौल ऐसा था कि तालिबान तो बात करने लायक भी नहीं है. लेकिन भारत सरकार तालिबान को लेकर चुप थी.

अफगानिस्तान को लेकर नपे तुले से बयान आ रहे थे, वेट एंड वॉच वाले. लेकिन 31 अगस्त को आधिकारिक रूप से भारत ने तालिबान से बातचीत की जानकारी दी. क़तर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल और तालिबानी नेता शेर मोहम्मद अब्बास के बीच बातचीत हुई है. बातचीत के बाद तालिबानी नेता का भी बयान आया है कि भारत उनके लिए अहम है, दोनों के बीच रिश्ते रहेंगे. तो तालिबान के साथ भारत ने इंगेजमेंट तो शुरू कर दिया, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत ने तालिबान को मान्यता दे दी. उसके लिए तो भारत समेत पूरी दुनिया अभी तालिबान की सरकार बनने का ही इंतजार कर रहे हैं.

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शेर मोहम्मद अब्बास की गिनती तालिबान के ताकतवर नेताओं में होती है. (फोटो- India Today)

तो एक तरफ तालिबान से ये इंगेज़मेंट भारत का शुरू होता है, भारत हर अंतर्राष्ट्रीय मंच इस बात पर ज़ोर देता है कि अफगानिस्तान का इस्तेमाल आंतकी गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए. इसी बीच आतंकी गुट अल क़ायदा का बयान आता है. अल क़ायदा ने तालिबान को बधाई दी है और कश्मीर के लिबरेशन का भी ज़िक्र किया है. अल कायदा के प्रोपेगेंडा मीडिया अस-सहाब में आतंकी गुट की तरफ से बयान छपा है. इसमें लेवांत, सीरिया, यमन, कश्मीर और उत्तरी अफ्रीका के लिबरेशन की कामना की है. हालांकि अभी तालिबान और अलकायदा का कोई लिंक नहीं है.

काबुल पर कब्जा करने के बाद कश्मीर पर तालिबान का बयान न्यूज़ एजेंसी ANI ने छापा था. इसके मुताबिक तालिबान ने कश्मीर को द्विपक्षीय और आंतरिक मामला बताया था. यानी तालिबान की तरफ से अभी कश्मीर को लेकर भारत की चिंता बढ़ाने वाली कोई बात नहीं आई है. हालांकि तालिबान के भी कई गुट हैं. और अभी कहना मुमकिन नहीं है कि कश्मीर वाले फ्रंट पर अफगानिस्तान से आगे भारत को किस तरह की चुनौतियां मिलेंगी.

देश की अन्य बड़ी खबरें-

1. पहली सुर्खी में आज हम बात करेंगे कोरोना संक्रमण की. इधर कुछ दिनों में काफी डेवलपमेंट्स हुए हैं, जिन्हें आपको जानना चाहिए. शुरुआत करते हैं कोरोना संक्रमण के आंकड़ों से. पिछले चौबीस घंटों के दौरान देश में 41 हज़ार 965 नए मामले आए और 460 लोगों की मौत हुई. तकरीबन 34 हज़ार लोग ठीक भी हो गए. भारत में कोरोना के दैनिक आंकड़े काफी समय से इन्हीं संख्याओं के आस-पास झूलते रहते हैं. अब इसका मतलब दोनों तरह से निकाला जा सकता है. कि संक्रमण को इन आंकड़ों के करीब काबू कर लिया गया है, या वो काबू हो गया है.

और इन्हीं आंकड़ों का मतलब ये भी निकाला जा सकता है कि सरकार की तमाम कोशिशों और नाकामियों के नजीते में संक्रमण अब भी भारत में अपने पैर जमाए हुए हैं. इसीलिए लापरवाही अब भी घातक हो सकती है. विशेषज्ञ आगाह कर चुके हैं कि लापरवाही बनी रही तो आने वाले हफ्तों में तीसरी लहर भी आ सकती है लेकिन अब भी हमारे यहां राजनैतिक दल और उनके नेता धर्म के आधार पर त्योहारों को पतली गली से छूट देने की कोशिश में लगे हुए हैं. कोई बकरीद का बहाना बनाकर छूट दे देता है तो किसी को जन्माष्टमी पर छूट नहीं मिलती तो सवाल कर देता है कि सरकार को तालिबान से हुक्म मिल रहा है क्या? तो इस स्नानागार में सभी निर्वस्त्र थे और अब भी बने हुए है.

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बाजारों में भी ऐसी भीड़ दिखना सामान्य बात हो चला है. फोटो- आजतक

लेकिन एक अनपेक्षित राहत की खबर भी है. भारत का टीकाकरण. आखिरकार टीकाकरण अब उस रफ्तार को छूने लगा है, जिसकी ज़रूरत है. 27 और 31 अगस्त को एक करोड़ से ज़्यादा खुराक लगीं. टीकाकरण में भारत का अब तक सबसे बढ़िया प्रदर्शन था 19 से 25 जून के हफ्ते में. जब सरकार ने टीकाकरण दोबारा केंद्रीय खरीद के साथ शुरू किया था और स्लॉट बुकिंग जैसी शर्तों में ढील दी थी. इस हफ्ते में 4 करोड़ 12 लाख खुराकें लगी थीं. इसके बाद फिर ढाई महीने तक हम दोबारा इस आंकड़े को छू नहीं पाए. लेकिन 21 से 27 अगस्त तक के हफ्ते में टीकाकरण तेज़ी से हुआ और 4 करोड़ 72 लाख खुराकें लगाई गईं. अगर टीकाकरण को लेकर यही उत्साह बना रहा, तो ही हम समय रहते अपनी पूरी आबादी को इस घातक संक्रमण से सुरक्षा कवच दे पाएंगे.

विशेषज्ञों ने पहले ही बता दिया था कि कोरोना संक्रमण अब लंबे समय तक दुनिया का पीछा नहीं छोड़ने वाला. महामारी बीत जाएगी, लेकिन संक्रामक वायरस की मौजूदगी बनी रहेगी. बस नुकसान पहले की अपेक्षा कम होगा. भारत भी धीरे-धीरे इसी अवस्था की ओर बढ़ रहा है. महामारी की दूसरी लहर में वायरस के डेल्टा वेरिएंट ने तबाही मचाई थी. अब एक और नए वेरिएंट को लेकर चिंता है – C.1.2. इस साल मई में ये साउथ अफ्रीका में मिला था. लेकिन अब इसके मामले कॉन्गो, मॉरीशिस, न्यूज़ीलैंड और स्वित्ज़रलैंड तक मिल रहे हैं. अभी वैज्ञानिक इस वेरिएंट को लेकर समझ को बढ़ाने में लगे हुए हैं. जैसे ही कोई ज़रूरी अपडेट आएगा, हम आपको ज़रूर देंगे.

2. दूसरी सुर्खी बनाई है महंगाई ने. पेट्रोल, डीज़ल और सरसों के तेल के बाद अब रसोई गैस आपकी जेब की परीक्षा लेने पर तुली है. बिना सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत एक साथ 25 रुपए बढ़ा दी गई है. दो हफ्ते में कीमत दूसरी बार बढ़ी है. दर्शक जानते ही हैं कि पेट्रोल-डीज़ल की कीमत रोज़ तय होती है और LPG की कीमत महीने में दो बार – 1 और 15 तारीख को. और इस फॉर्मूले के तहत दाम लगातार बढ़ाए गए हैं.

1 सितंबर – 25 रुपए
18 अगस्त – 25 रुपए
1 जुलाई – 25 रुपए 50 पैसे

मतलब 2 महीने में आपकी जेब से उतनी ही गैस के लिए 75 रुपए अलग से लिए जाने लगे. और ये सिर्फ घरेलू गैस के मामले में है, जिसके सिलेंडर में 14 किलो 200 ग्राम गैस होती है. आज ही के दिन 19 किलो के कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में एक ही बार में 75 रुपए का इज़ाफा कर दिया गया है.

3. तीसरी सुर्खी बनाई है इनफोर्समेंट डायरेक्टोरेट – ED माने प्रवर्तन निदेशालय ने. एजेंसी ने नारदा स्टिंग केस में कोलकाता की प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट माने PMLA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी है. इसमें ममता कैबिनेट में परिवहन मंत्री फिरहाद हकीम, पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी, पूर्व मंत्री मदन मित्रा, कोलकाता के पूर्व मेयर सोवन चैटर्जी और आईपीएस अधिकारी SMH मिर्जा को नामज़द किया गया है. ED ने आरोप लगाया है कि इन लोगों ने अपने पद पर रहते हुए घूस ली और फिर घूस के पैसे की लॉन्ड्रिंग की.

माने काले धन से सफेद धन बना दिया. 2014 में पश्चिम बंगाल के नारदा न्यूज़ पोर्टल के सीईओ मैथ्यू सैम्युअल ने कई स्टिंग ऑपरेशन्स किए थे. इनके टेप्स में 12 लोग घूस लेते हुए दिखाई दिए जिनमें तृणमूल मंत्री, नेता और आईपीएस अधिकारी शामिल थे. ये टेप 2016 के पश्चिम विधानसभा चुनाव से पहले सामने आए थे. बावजूद इसके तृणमूल दो-तिहाई बहुमत से जीत गई थी.


वीडियो- तालिबान से भारत की पहली बैठक में आतंकवाद और अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर क्या बात हुई?

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