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'हीरोइनों से बहुत ज्यादा हैं हीरो के नखरे'

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मुंबई में चर्चगेट के पास ऑक्सफर्ड बुक स्टोर में हुए दी लल्लनटॉप शो का दूसरा सेशन रहा ‘पत्रकार फिल्मकार’. इस सेशन में हमारे साथ ऐसे फिल्ममेकर्स थे, जो पहले तो जर्नलिज्म में थे, लेकिन जब अशांति का कीड़ा कुलबुलाया, तो पहुंच गए फिल्म इंडस्ट्री में. इस सेशन में हमारे साथ थे फिल्ममेकर रामकुमार सिंह, अश्विनी चौधरी, गौरव सोलंकी और अविनाश दास.

सेशन कॉर्डिनेट कर रहे सौरभ द्विवेदी ने इन चारों फिल्ममेकर्स से एक सवाल पूछा कि एक फिल्म बनाते समय जर्नलिस्टिक एक्सपीरियंस आखिर कितना काम आता है. इसके जवाब में इन फिल्ममेकर्स ने जो बातें बताईं, वो वाकई बहुत रोचक हैं.

रामकुमार ने बताया

‘मैं गांव से आता हूं. हाईस्कूल में सेकेंड डिवीजन पास हुआ था, तो पिताजी बहुत नाराज हुए थे. कॉलेज से मैंने पत्रकारिता शुरू की. फिर मैंने कहानियों को और साहित्य को दूसरे ढंग से देखना शुरू किया. लिटरेचर को जब आप पत्रकारिता में लाते हैं, तो नजरिया और फील्ड और बड़ी हो जाती है. पत्रकार होने पर आप अलग-अलग जगह जाते हैं. मुख्यमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस अटेंड करने से लेकर मुर्दाघर जाकर मरने वालों की गिनती करते हैं. ह्यूमन एंगल स्टोरी लाते हैं. इसके लिए हमेशा एक नई हिम्मत जुटानी पड़ती है. इससे अंदर जो संघर्ष चलता है, वो आपको मजबूत बनाता है. आप पत्रकार हैं, ये जानने पर लोग बात नहीं करते हैं. इन्हीं प्रेशर्स की वजह से आप सीखते हैं. आप बहुत विरोधाभासी चीजें देखते हैं. ऐसे में आप फिल्म बनाते समय आने वाली मुश्किलों को आसानी से झेलते हैं.’

अश्विनी चौधरी कहिन

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‘सिनेमा और पत्रकारिता दोनों अलग विधाएं हैं. सिनेमा पर लिखते समय शायद हमें गलतफहमी हो जाती है कि हम सिनेमा को जानते हैं. हमें लगने लगता है कि हम अच्छी तरह सिनेमा कह-दिखा सकते हैं. दोनों बहुत अलग चीजें हैं. जर्नलिज्म कई तरह का होता है, जिसमें सभी तरह के लोग आते हैं. जर्नलिज्म में रहते हुए लोगों को और अपने आसपास की चीजों को देखने का नजरिए जरूर पैना हो जाता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि सिनेमा में इससे कोई मदद मिलती है.

मैं भी गांव से आता हूं. मुझे याद है जब नानी हमें कहानी सुनाती थीं, तो हम तीन-चार घंटों तक सुनते रहते थे. राम गोपाल वर्मा से मैंने एक बार कहा था कि अगर मेरी नानी जिंदा होतीं, तो तुमसे अच्छी डायरेक्टर होतीं. अगर आपके पास कहानी है और कहानी सुनाना जानते हैं, तभी आप अच्छी फिल्म बना पाएंगे. वैसे में डायरेक्शन की बात कर रहा हूं, राइटर्स की नहीं. बिना साहित्य पढ़ा हुआ आदमी भी मुझसे बेहतर फिल्म बना सकता है.’

गौरव सोलंकी बोले

‘मैंने मीडिया में बहुत कम वक्त गुजारा है. मुझे लगता है कि जर्नलिज्म आपको कम्युनिकेशन के लिए तराशता है. वो आपकी ट्रेनिंग करता है. जर्नलिज्म की वजह से आपको पहले से पता चल जाता है कि कोई कहानी कहते समय आपको कहां दिक्कत आएगी. जो लोग सड़क चलते एक-आध मिनट का वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डाल देते हैं, उन वीडियो से मुझे बड़े इंट्रेस्टिंग कैरक्टर मिलते हैं. जर्नलिज्म में हम बहुत सारी कहानियां फर्स्ट हैंड देख पाते हैं. मेरे ढेर सारे दोस्त इन्वेस्टिगेटर जर्नलिस्ट हैं. उनके जरिए ढेर सारे किस्से और घटनाएं फर्स्ट हैंड सुनने को मिल जाती हैं.

जब हम लोग कहानियां और किरदार गढ़ते हैं, तो हमें वो लोग याद आते हैं, जिनसे हम रिपोर्टिंग के वक्त मिले थे. उससे हमें रियलिस्टक कैरक्टर गढ़ने में मदद मिलती है. मैगजीन में रहते हुए मैंने ये सीखा कि 800 शब्द की बात को 400 शब्द में कैसे कहा जाए. मैंने सीखा कि चार लाइन के डायलॉग को दो लाइन में कैसे बोला जाए.’

अविनाश दास कहे

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मेरी फिल्म की कहानी भी पत्रकारिता से जुड़ी है. कहानी होने पर आप ऐसे लोग ढूंढते हैं, जो आपकी फिल्म को आगे बढ़ा सकें. मैंने दो कहानियां लिखीं, जो जर्नलिज्म से बिल्कुल अलग थीं. कहानी को जर्नलिज्म से हटाकर कहानी बनाए रखने में हमने पूरी मेहनत की. लेकिन, जब हम काम करने निकलते हैं, तो हमें पता चलता है कि जो आप जानते हो, उससे ज्यादा बहुत सारे लोग जानते हैं. तो मीडिया से ये फायदा मिलता है कि कंटेंट के मामले में आप मजबूत होते हैं और आसपास के लोग आपको सपोर्ट करते हैं.


जब ये गंभीर वाली बातें बहुत हो गईं, तो सौरभ गुरू ने सवाल दागा कि अच्छा ये बताओ, कि आप में से कौन-कौन बच्चन अमिताभ से मिला है. हमें भी नहीं पता था कि इस सवाल में इतनी गुदगुदी है कि सबको हंसा देगी. खैर, सबसे पहले रामकुमार सिंह ने बताया कि वो एक बार बिग बी से मिले हैं. उस किस्से का जिक्र करते हुए रामकुमार ने बताया,

‘मुझे एक्साइटमेंट था कि हां मुलाकात होगी. मैं खड़ा था और सब लोग तैयार थे. जब उन्होंने एंट्री ली, तो गार्ड वगैरह उनके आसपास थे और मैं रोमांचित था. फिर एक दिन हमारी डायलॉग को लेकर बात हुई. वो बहुत ही विनम्र हैं… मैं क्या कहूं. मतलब सब लोग तो कहते हैं. मैं कहूंगा तो अच्छा नहीं लगेगा. उन्होंने मुझसे कहा, ‘यस सर’. मैंने कहा, ‘सर आप क्यों सर कह रहे हो.’ मुझे बड़ा अटपटा लग रहा है. वैसे मैं रोज सेट पर रहता था. जरूरत पड़ने पर चला जाता था, लेकिन बहुत ज्यादा बातचीत नहीं हुई.’

ये सुनते ही अश्विनी चौधरी ने तड़का मारते हुए कहा,

‘मैं एक बात कहूंगा. हमारी फिल्म इंडस्ट्री जो है, बड़ी फेक है. जिन्होंने बहुत ऊंचा मुकाम हासिल कर लिया है… मैं अमिताभ बच्चन की बात नहीं कर रहा हूं, लेकिन कई एक्टर्स और राइटर्स इस हद तक विनम्र हैं कि जब आप उनके सामने आएंगे, तो वो कहेंगे, ‘नमस्कार, मेरा नाम जावेद अख्तर है.’ तो मैं कहता हूं कि ये अति है विनम्रता की. इसकी जरूरत नहीं है.’

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इसके बाद ऑडियंस की डिमांड पर एक सवाल पूछा गया कि फिल्मों में हीरोइन सेलेक्ट करने का क्या प्रॉसेस होता है. लोगों को कौतूहल होता है कि क्या वाकई एक्ट्रेसेस इतनी खूबसूरत होती हैं या मेकअप और कैमरा एंगल से उन्हें खूबसूरत दिखा दिया जाता है. तो ये हीरोइन का पूरा प्रॉसेस क्या है? किरदार गढ़ने से लेकर उन्हें पर्दे पर दिखाने तक. मेल डॉमिनेंट इंडस्ट्री होने का कितना फर्क पड़ता है? इस पर अश्विनी चौधरी ने बताया,

‘ये थोड़ा ‘मायानगरी’ टाइप बातचीत हो गई. अब हीरोइन कैसे तय की जाती है, वो तो शायद मैं इतने लोगों के सामने नहीं बता पाऊंगा. बहुत सारे एलिमेंट होते हैं. वैसे मुख्य सवाल ये है कि मेल डॉमिनेंट इंडस्ट्री है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि इंडस्ट्री भी सोसायटी का हिस्सा है और हमारी सोसायटी ही ऐसी है. ये सालों से है और अब भी ऐसा ही है. कोई वुमन ओरिएंटेड फिल्म हिट हो जाती है, तो हौव्वा बना दिया जाता है कि ये ट्रेंड टूट रहा है, लेकिन ऐसा है नहीं. समाज में तब्दीली आने पर ये ट्रेंड भी अपने-आप सुधर जाएगा.’

‘नखरे को लेकर बात ये है कि महिलाओं के मामले में ‘नखरा’ लिखना बड़ा अच्छा लगता है. मैंने आठ फिल्में बनाई हैं और कई बड़े स्टार्स को जानता हूं. मेरा मानना है कि जो नखरे हैं, वो हमारे मेल एक्टर्स के साथ फीमेल एक्टर्स के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं, क्योंकि उनके पास स्टारडम ज्यादा है. सलमान खान की किसी भी फिल्म में कितनी भी बड़ी एक्ट्रेस हो, अगर शूटिंग का टाइम 10 बजे है, तो वो 10 बजे आ ही जाएगी, लेकिन सलमान भाई तो 2 बजे ही आएंगे.’

देखिए इस इवेंट का वीडियो…


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