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हिंदी महोत्सव 16: 'हाय हिंदी' का रोना मत रोइए, हिंदी को Hi कहिए

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ध्येय वाक्य होते हैं ना. जिसे ध्यान में रखकर सारी मेहनत, सारी कवायद की जाती है. तो इस दौर की हिंदी का ध्येय वाक्य ये होना चाहिए. ‘hi हिंदी.’ इसमें यकीन रखता है ‘दी लल्लनटॉप’. इसलिए हम हिंदी के सारे लिहाफ उतारकर उसे साथ लिए हुए बढ़ रहे हैं.

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‘भेज रहे हैं नेह निमंत्रण, भूल न जाना आने को’ की भाषा से हमें परहेज नहीं. लेकिन लगे हाथ हमें समीर से उधार लेकर कहने दीजिए कि ‘जब दिल न लगे दिलदार, हमारी गली आ जाना.’ तो हमने बुलाया और बहुत सारे लोग हमारी गली आए.

गली खैर हमारी नहीं थी, पर उस गली में हमारा जलसा जरूर था. दिल्ली के कनॉट प्लेस में ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर है. यहां वाणी प्रकाशन ने रविवार को ‘हिंदी महोत्सव’ करवाया. हिंदी साहित्य के कई सेशन हुए और एक सेशन ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए था. इसका टाइटल था, ‘जवां ज़ुबां.’

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तो हमने जवानों की जुबान और जुबान की जवानी पर बात की. हमने यानी किनने? हिंदी बेस्टसेलर किताब कोठागोई के लेखक प्रभात रंजन, अद्वैता बैंड के लीड क्लासिकल सिंगर उज्ज्वल नागर और ‘बउआ’ फेम आरजे रौनक. ये तीन मेहमान थे और इनसे बात की ‘दी लल्लनटॉप’ के सरपंच सौरभ द्विवेदी ने.

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आरजे रौनक माने बउआ भी थे. तो बताने लगे बउआ पैदा कैसे हुआ था. ये भी बताए कि बउआ माने असल में होता क्या है. फिर बउआ के पीछे की साइकोलॉजी भी कि कैसे बउआ गलत होकर भी सही होता है.

पढ़ें आरजे रौनक का इंटरव्यू: ‘सड़कों पर पैंफलेट बांटता था, वहीं से लैंग्वेज और लोगों को जाना’


बात हिंदी की चली तो प्रभात रंजन ने मनोहर श्याम जोशी के हवाले से अज्ञेय जी का एक किस्सा सुनाया. और बताया हिंदी का लेखक क्या-क्या झेलता है.  महान बनने की दौड़ में उसे किन-किन तिकड़मबाजियों में फंसना पड़ता है.

पढ़ें प्रभात रंजन का इंटरव्यू: ‘बचपन से कोठों पर जाता रहा, पर GB रोड से डर लगता है’


उज्ज्वल नागर थे और हम इतने लालची लोग हैं कि पूरी बेशर्मी के साथ गाने वालों को बिना गवाए तो छोड़ते हैं नहीं. सो फरमाइशें आईं और उनने पूरी भी की.

पढ़ें उज्ज्वल नागर का इंटरव्यू: ‘क्लासिकल गाना मतलब जो आप लोग ‘आ आ’ करते हो वही ना?’

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