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कोरोना वायरस से ठीक हुए 'लल्लनटॉप' के साथी, बेहद ज़रूरी तीन टिप्स बता रहे हैं

साल 2019 में एक फिल्म आई थी. छिछोरे. इस फिल्म का एक बहुत ही फेमस डायलॉग है-

ज़िंदगी में अगर कुछ सबसे ज़्यादा इम्पॉर्टेंट है, तो वो है खुद ज़िंदगी.

इस डायलॉग की चर्चा सबसे ज्यादा तब हुई, जब 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की खबर आई. लेकिन इस घटना से पहले ही 10 जून को ये डायलॉग मेरे कानों में गूंजने लगा. जब मेरे कोरोना वायरस टेस्ट का रिजल्ट आया. जब लैब टेक्नीशियन ने फोन पर बताया-

‘आप पॉजिटिव हैं.’

जीवन में अब तक जितने भी लोग मिले, सभी से सुना कि ‘बी पॉजिटिव’, मतलब हमेशा पॉजिटिव रहो. लेकिन 10 जून की तारीख को जब कानों में ये ‘पॉजिटिव’ शब्द गए, तो मानो पैरों के नीचे की ज़मीन ही खिसक गई. लगा कि अब ज़िंदगी कुछ दिनों की मेहमान है, सब कुछ बस खत्म होने वाला है. कोरोना पॉजिटिव होने के बाद दिमाग में ऐसे खयालों का घूमना लाज़िमी था. क्योंकि तीन महीने से कोरोना से जुड़ी खबरें करने और देखने के बाद दिमाग ने खुद ही कोरोना का कनेक्शन मौत से जोड़ लिया था.

बिल्कुल शुरू से शुरू करते हैं

कोरोना पॉजिटिव होने के बाद अगर इस सवाल के जवाब को तलाशेंगे कि ये वायरस आपको कहां से लगा या फिर किसके ज़रिये आपके शरीर में गया, तो ऐसा करना बेमानी होगा. क्योंकि जिस रफ्तार से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, वैसे में आपको इस सवाल का जवाब मिले, ये थोड़ी नामुमकिन-सी चीज़ लगती है. इसका जवाब मुझे भी नहीं मिला.

बहरहाल, मैं 20 मार्च 2020 से ही वर्क फ्रॉम होम कर रहा था. मैं क्या, संस्थान के ज्यादातर लोग इसी तारीख से अपने-अपने घरों से की-बोर्ड पीट रहे हैं. कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच जितनी सावधानियां बरतनी चाहिए, मैंने लगभग सभी को फॉलो किया.

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वर्क फ्रॉम होम की शुरुआती दिनों की तस्वीर.

लेकिन 4 जून वो तारीख है, जिस दिन सारी सावधानियां धरी की धरी रह गईं. इस दिन मुझे बहुत तेज़ सिरदर्द हुआ, इतना तेज़ कि सहा नहीं गया और काम से छुट्टी ले ली. शाम होते-होते बुखार चढ़ गया.

शरीर में कोरोना की एंट्री हो चुकी थी

लेकिन मैं बुखार को नॉर्मल फ्लू मानकर जनरल मेडिसिन खा रहा था. दवाइयों से कुछ समय के लिए बुखार उतरता, लेकिन रात होते-होते फिर चढ़ जाता. फिर अगले दिन यानी 5 जून को बुखार, सिरदर्द के साथ बदन-दर्द की भी शुरुआत हुई. मेरे साथ रहने वाले साथी नीरज ने कहा-

‘दवा खाकर आराम कर लो, ठीक हो जाओगे.’

शुक्रवार को मैंने फिर से दफ्तर से छुट्टी ली. सोचा अब बुखार उतर जाएगा. शनिवार और रविवार को वीकेंड की छुट्टी थी, लेकिन वो छुट्टी मेरी थी, बुखार की नहीं. बुखार दिन-दोपहर-रात बदस्तूर अपनी शिफ्ट में काम करता रहा और मेरे शरीर को लगातार कमज़ोर करता रहा. इसी बीच रविवार को लूज़ मोशन हुआ, जिसने शरीर को पूरी तरह से निचोड़ लिया. दवाई का किसी तरह फायदा न होता देख मैंने 8 जून को अपनी कॉलोनी के ही एक डॉक्टर से संपर्क किया. उन्होंने कुछ दवाइयां तो दीं, लेकिन साथ में कोविड टेस्ट की सलाह दे दी. 9 जून को मैंने अपना कोविड टेस्ट करवाया और 10 जून को रिपोर्ट पॉजिटिव आई.

यहां से शुरू हुई वायरस से लड़ाई

कई तरह के उमड़ते-घुमड़ते खयालों के बीच मैंने एक लंबी सांस ली. खुद के लिए कुछ फैसले किए. फिर दफ्तर में सौरभ द्विवेदी सर और अमित चौधरी सर को इसकी जानकारी दी. दोनों ने हरसंभव मुझे समझाने और मेरी एंग्ज़ाइटी कम करने की कोशिश की. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. समय के साथ बेचैनी, एंग्ज़ाइटी मेरे ऊपर हावी होता चला गया. शाम से कब रात हुई और कब रात से देर रात, मुझे पता ही नहीं चला. खाना खाने और दवाई खाने के बाद रात 12 बजे बुखार चेक किया, तो कांटा 102.9 को पार कर चुका था.

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कोरोना के दौरान 103 डिग्री बुखार नॉर्मल हो जाता है.

खुद के लिए जो फैसले लिए, उनका ज़िक्र ज़रूरी

1- घरवालों को कुछ नहीं बताऊंगा: मैंने घरवालों को कुछ भी नहीं बताने का फैसला लिया, क्योंकि दिल्ली में अकेला रहता हूं और परिवार 1000 किलोमीटर दूर. इसकी जानकारी उन्हें लगती, तो सभी भागे-भागे दिल्ली चले आते. ऐसे में उन्हें कोरोना का खतरा और बढ़ जाता. और ऐसा मैं किसी हाल में होने देना नहीं चाहता था.

2- शरीर कमज़ोर पड़े तो पड़े, अंदर से कमज़ोर नहीं पड़ूंगा: चूंकि कोरोना में बुखार 102 और 103 तक चला जाता है, ऐसे में शरीर का टूटना लाजिमी था. आप बेहद कमज़ोर पड़ जाते हैं, एक गिलास पानी भी खुद से लेकर नहीं पी पाते हैं. लेकिन यहां तो स्थिति दूसरी थी. यहां मुझे खुद से खाना भी बनाना था (कोरोना के अंदेशा को देखते हुए तीन-चार दिन पहले ही खाना बनाने वाली, सफाई करने वाली सभी की छुट्टी कर दी थी) और खुद ही खुद का खयाल भी रखना था. मैंने तय किया, कुछ भी हो जाए, अंदर से खुद को कमज़ोर नहीं पड़ने दूंगा.

3- इस बीमारी से हर हाल में जीतूंगा: एक डॉक्टर से मैंने बात की थी, तो उन्होंने कहा था-

कोरोना से कुछ फीसदी लोग इसीलिए भी मर रहे हैं, क्योंकि कोरोना होते ही उनके अंदर मौत का डर समा जाता है, जिसके बाद उनकी इस वायरस से युद्ध करने की शक्ति कमज़ोर पड़ जाती है.

मैंने फैसला किया कि कोरोना को अपने ऊपर हावी नहीं होने दूंगा. मैं मानसिक रूप से मज़बूत रहूंगा. हर हाल में इस बीमारी से जीतूंगा.

युद्ध का पहला दिन

यानी कि 11 जून. इस दिन भी मेरे साथ पहले की ही तरह बुखार का आना और जाना लगा रहा. सिरदर्द और कमज़ोरी में भी 100 ग्राम की बढ़त हो चुकी थी. इसी बीच मुझे सांस लेने में भी कुछ दिक्कत शुरू हुई. मुझे समझ में नहीं आया कि एंग्ज़ाइटी की वजह से ऐसा हुआ या फिर कोविड मेरे ऊपर हावी हो रहा था. मैंने फैसला किया कि मैं अस्पताल में भर्ती होऊंगा.

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अस्पताल में भर्ती होने के लिए जाने के दौरान ऊपर से लोगों ने तस्वीरें खींची और ‘ऑल द बेस्ट’ बोलकर हौंसला आफजाई की.

11 जून को दोपहर ढाई बजे अस्पताल में भर्ती होने के साथ मेरी सांस की दिक्कत जा चुकी थी. डॉक्टरों ने ऑक्सीमीटर से बॉडी का ऑक्सीजन लेवल चेक किया, तो 98 था, जिसे सामान्य माना जाता है. अस्पताल पहुंचने के साथ मेरी ट्रीटमेंट की शुरुआत हुई. चूंकि मैं पहली बार अस्पताल में इलाज़ के लिए भर्ती हुआ था और 30 अलग-अलग तरह के कोरोना पेशेंट के बीच मौजूद था, ऐसे में खुद को सामान्य रखना मेरे लिए बड़ी चुनौती थी. इस दौरान मैंने देखा, कहीं लोगों की सांसें उखड़ रही थीं, कहीं लोग बेचैन हो रहे थे, कहीं लोग बुखार में बेड पर तड़प रहे थे.

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अस्पताल पहुंच कर तरह-तरह के मरीजों से मुलाकात हुई, जिनका सामना करने के लिए आपको अंदर से मजबूत होना ज़रूरी है.

इन सबके बीच मेरी स्थिति थोड़ी बेहतर तो थी, लेकिन अंदर ही अंदर मौत का डर मुझे खाए जा रहा था. अस्पताल में बेड पर जाते ही मैंने कोविड से जंग के लिए तीन चीज़ों को अपनी ढाल बनाई.

1- मजबूत इच्छा-शक्ति
2- दृढ़ संकल्प
3- अनुशासन

इनमें से दो का ज़िक्र तो ऊपर ही कर चुका हूं, लेकिन अस्पताल पहुंचने के साथ मैंने अनुशासन को भी अपने शस्त्रों में जोड़ लिया. अनुशासन इसीलिए भी, क्योंकि बिना अनुशासन में रहे इस बीमारी से जंग जीतना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.

11, 12 और 13 जून मेरे लिए बिल्कुल सामान्य रहा. मैं जिस स्थिति में घर पर था, अस्पताल में भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही बनी रही. बुखार का आना और दवाई खाने के बाद रूठकर चले जाना. फिर शाम में बिछड़े प्रेमी की तरह लौट आना. ऐसा लगातार चल रहा था. इसी बीच 14 जून को अस्पताल में सुशांत सिंह राजपूत की मौत की खबर मिली. दोपहर में मैं सो रहा था, तभी फोन के नोटिफिकेशन से नींद टूटी और दुनिया भर दूसरे लोगों के साथ मैं भी इस खबर से कुछ देर के लिए परेशान हो गया.

कभी नहीं भूलूंगा 14 जून की रात

कोशिश तो यही रहेगी कि इस रात को अपने जीवन रूपी किताब के पन्ने से फाड़ कर अलग कर दूं, लेकिन मुमकिन नहीं है. 14 जून को अलग-अलग दोस्तों से बात करने के बाद देर शाम मेरी तबीयत खराब होनी शुरू हुई. सांस लेने में दिक्कत के साथ बेचैनी और बुखार-सिरदर्द, सभी के कॉम्बिनेशन ने एक साथ मेरी ऊपर अटैक किया. मेरी बॉडी ऐसे कमज़ोर पड़नी शुरू हुई, जिसे मैं शायद शब्दों में नहीं बता सकता. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरी पूरी ताकत निचोड़ ली हो. ऐसा बुरा अनुभव, जैसा मैंने अपने जीवन में कभी महसूस नहीं किया था.

तभी मेरे पड़ोस के बेड पर लेटे मनीष नाम के एक युवक की नज़र मुझ पर पड़ गई. वो पास आए बोले-

अभिषेक कमज़ोर नहीं पड़ना है.

मैंने फिर से अपनी हिम्मत जुटाई. रात 9 बजे खाना खाया और दवाई खाने के बाद बेहोश हो गया. डॉक्टर्स आए. उन्होंने क्या किया, मुझे नहीं याद है. बेहोश होने से पहले बस इतना याद है कि मैं पसीने से तरबतर था और शरीर का तापमान लगभग 103 डिग्री था.

रात पौने दो बजे के बीच मेरी नींद टूटी. बगल में ऑक्सीजन मास्क गिरा पड़ा था. मेरी टी-शर्ट पूरी तरह से भीग चुकी थी. वो इतनी गीली थी कि उतार कर निचोड़ देता, तो आधी बाल्टी पानी निकल जाता. पूरी तरह ड्रेन होने के बाद मैंने लगभग डेढ़ लीटर पानी पिया. बुखार चेक किया, तो देखा कि कांटा 97 पर रुका हुआ है. थोड़ी तसल्ली मिली और उसके बाद मैं सो गया.

रात दो बजे के बाद जो मैंने नींद ली, वो पिछले 10 दिनों में सबसे सुकून वाली नींद थी. उसके बाद जब 15 जून की सुबह नींद टूटी, तो आस पास के लोगों ने बीती रात की पूरी कहानी बताई. सबने बताया कि मैं कितना बेचैन था और कितना संघर्ष कर रहा था. सभी की बातों के बीच मैं 15 जून की सुबह अपने शरीर में एक अलग ही हल्कापन महसूस कर रहा था. ऐसा लग रहा था कि शरीर से कोई बड़ा बोझ उतर गया.

इस दिन मुझे बीते 10 दिनों की तरह आदतन बुखार नहीं चढ़ा. दिनभर में मैंने लगभग 25-30 बार बॉडी टेंपरेचर चेक किया. हर बार के नतीजे चेहरे पर मुस्कान देने वाले थे. इस दिन के बाद फिर मुझे पलटकर बुखार नहीं हुआ.

लेकिन लड़ाई अभी बाकी थी

11 जून को अस्पताल में भर्ती होने के साथ ही मैंने योग, टाइम पर खाना, टाइम पर काढ़ा-गर्म पानी पीना, टाइम पर दवाई और खाने के बाद हॉल में हल्के वॉक को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था. आसान भाषा में कहें, तो खुद को अनुशासित बना लिया. एक भी दिन ऐसा नहीं बीता, जिस दिन मैंने किसी पहर का योग स्किप किया.

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अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान बिल्कुल अनुशासित रूप से दोनों पहर योग किया.

एक भी दिन दवाई नहीं छोड़ी. कोरोना के दौरान मुंह का स्वाद बिल्कुल चला जाता है, खाने का एक-एक निवाला बड़ी मुश्किल से जाता है, इन सबके बावजूद मैंने एक भी पहर का खाना स्किप नहीं किया.

अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने लगातार मेरी सेहत का जायजा लिया. 16 जून से एसिम्प्टोमैटिक का टैग लगने के बाद 25 जून के दिन मुझे अस्पताल से विदा कर दिया गया. क्योंकि इस दरम्यान कमज़ोरी और मुंह के बिगड़े स्वाद को छोड़कर मेरे शरीर में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी. 25 जून को अस्पताल से निकलने के साथ मेरा कोविड सैंपल लिया गया, जिसके नतीजे के इंतजार में मैंने अपनी गाड़ी घर की तरफ बढ़ा दी.

अस्पताल की बात भी ज़रूरी

अस्पताल से छूटने के दौरान राजीव गांधी सुपर स्पेशियैलिटी अस्पताल के नोडल ऑफिसर अजित जैन से मेरी लगभग 45 मिनट बातचीत हुई. उन्होंने अस्पताल में मरीजों को लाने और ठीक किए जाने की पूरी कहानी बताई. डॉक्टरों की छोटी-सी टीम के साथ नोडल ऑफिसर कैसे बिना घर गए अस्पताल को चला रहे हैं, उस पर विस्तार से बात हुई. कई मुद्दों पर बात हुई, जिसका निष्कर्ष ये निकला कि डॉक्टरों की टीम दिन-रात लगी हुई हैं, मरीजों को बचाने और उन्हें बेहतर सुविधा देने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं.

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दिल्ली के राजीव गांधी अस्पताल के नोडल ऑफसर अजित जैन, पिछले 3 महीनों से बिना थके मरीजों के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं.

बातचीत के दौरान ही मेरी नज़र कोविड वेटिंग वार्ड के कोने पर पड़ी, जहां पानी के कैंपर के साथ पैक्ड ठंडी कॉफी और बिस्किट भी रखे गए थे. सरकारी अस्पताल में ऐसी व्यवस्था को देखकर मैं हैरान हुआ. इसकी चर्चा मैंने नोडल ऑफिसर से की, तब उन्होंने कहा-

‘अभिषेक जी, सरकार जितना पैसा सुविधाओं पर खर्च करती है, उनमें अगर ऐसी छोटी-छोटी चीज़ें जोड़ देने से अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की 20 प्रतिशत बीमारी वहीं खत्म हो जाती है. यहां उनकी बीमारी पर हमारी मनोवैज्ञानिक जीत होती है, जब उन्हें लगता है कि वे अच्छी जगह आए हैं और उनका इलाज बेहतर होगा.’

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सरकारी अस्पताल में भर्ती होने आए पेशेंट्स के लिए ऐसी सुविधा मेरे लिए थोड़ा चौंकाने वाला था.

अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान राजीव गांधी अस्पताल के बाकी डॉक्टर भी इतने ही सपोर्टिंग निकले. एक डॉक्टर, जिनका नाम डॉक्टर लिनसन था, उन्होंने मेरे सवाल और मेरी चिंताओं को देखते हुए, मुझे डिस्चार्ज स्लिप देने के दौरान अपना नंबर दे दिया और कहा-

‘किसी तरह की कोई भी दिक्कत हो, तो आप मुझे फोन कर लेना.’

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दिल्ली के राजीव गांधी अस्पताल के डॉक्टर लिनसन, जिन्होंने किसी मरीज की देख-रेख में कोई कमी नहीं छोड़ी.

दिल्ली सरकार की बात कैसे छोड़ दें?

नोडल ऑफिसर ने बातचीत के दौरान दिल्ली सरकार की तारीफ की. उन्होंने बताया कि अस्पताल चलाने के लिए जिन भी खर्चों का ज़िक्र हुआ, मरीजों की बेहतरी के लिए जैसे भी एक्सपेंसेज़ जोड़े गए, दिल्ली सरकार की तरफ से किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं आई.

दिल्ली सरकार के साथ आम आदमी पार्टी के नेता भी बेहतर काम कर रहे हैं. मेरे अस्पताल में भर्ती होने के दिन से लेकर डिस्चार्ज होने तक AAP नेता दिलीप पांडे लगातार मेरे संपर्क में रहे. उन्होंने लगातार मेरी तबीयत के साथ व्यवस्थाओं के बारे में पूछना जारी रखा.

साथियों ने साथ नहीं छोड़ा

चाहे लल्लनटॉप के एडिटर सौरभ द्विवेदी हों या फिर मैनेजर अमित चौधरी या फिर हम सभी के प्यारे श्री श्री मुबारक अली, सभी ने तबीयत का जायजा लेना नहीं छोड़ा. हद तो तब हो गई, जब सुबह के तमाम फॉरवार्डेड मैसेज में सौरभ सर का भी गुड मॉर्निंग मैसेज मिला. कुल मिलाकर, सभी की दुआओं और प्यार की वजह से जल्दी रिकवर कर गया.

ICMR की गाइडलाइंस के मुताबिक, एसिम्प्टोमैटिक होने के 10 दिन के बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी तो मिल गई, लेकिन दिल को चैन नहीं मिला. क्योंकि निगेटिव रिपोर्ट मेरी हाथों में नहीं थी. निगेटिव रिपोर्ट मेरे हाथों में आई 27 जून की रात 9 बजे, जिसके बाद मेरे चेहरे पर कई दिनों के बाद मुस्कान आई. मैंने राहत की एक लंबी सांस ली और ऊपरवाले का शुक्रिया अदा किया.

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27 जून को आई इस रिपोर्ट के बाद मेरी खुशियों का ठिकाना नहीं था.

आपके लिए भी टिप्स 

भगवान न करे, किसी को कोरोना हो जाए, लेकिन हो जाने की स्थिति में घबराने की ज़रूरत बिल्कुल भी नहीं है. बचने का पूरा फॉर्मूला ऊपर तो बता ही दिया है. अस्पताल जाने से पहले कुछ चीज़ें साथ में ज़रूर रख लें, क्योंकि लोग हड़बड़ी में ऐसी चीज़ें भूल जाते हैं, जिसकी ज़रूरत अस्पताल में बहुत पड़ती है. जैसे-

घर के कपड़ों के दो-तीन सेट
तौलिया
ब्रश-मंजन
तकिया
पानी गर्म करने के लिए कैटल
काढ़े का सामान
ड्राई फ्रूट्स
थोड़े से फल (रोज़ अगर कोई घर से थोड़ा-थोड़ा फल भेज दे, तो बेहतर)

कुल मिलाकर, कोरोना से लड़ाई मुश्किल ज़रूर है, नामुमकिन नहीं. अगर आपने मजबूत इच्छा-शक्ति, दृढ़ संकल्प और अनुशासन को अपनी ढाल बना लिया, तो कोई कोरोना आपका एक भी बाल बांका नहीं कर पाएगा. बाकी घर पर रहें, सुरक्षित रहें, अपना और अपनों का खूब खयाल रखें.


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