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अफगानिस्तान: दूतावास से सबको निकाल लाई भारत सरकार, बाकी फंसे भारतीयों को कैसे निकालेगी?

इस बात पर बरसों से बहस हो रही थी कि भारत की अफगान नीति आखिर है क्या. और तालिबान के लौटने पर सरकार क्या करने वाली है. इसके स्पष्ट जवाब मिलते, उससे पहले ही तालिबान के लड़ाके काबुल पहुंच गए. अब भारत को इस अभूतपूर्व मानवीय संकट के बीच ताबड़तोड़ फैसले लेने पड़ रहे हैं. भारत सरकार की पहली प्राथमिकता है अपने नागरिकों को सकुशल अफगानिस्तान से निकालना. इसके बाद अफगान शरणार्थियों का सवाल आएगा. इन दो मोर्चों पर कैसे फैसले ले रही है मोदी सरकार? चलिए देखते हैं.

क्या हो रहा है अफगानिस्तान में?

राजधानी काबुल से परेशान करने वाली तस्वीरें आ रही हैं, वीडियो आ रहे हैं, और उनसे नत्थी होकर खबरें आ रही हैं. काबुल में तालिबान को कब्ज़ा किए 48 घंटे से ज्यादा का वक्त हो गया है. तस्वीरों में तालिबान के लड़ाके कहीं सरकारी हथियार लूट रहे हैं, तो वो कहीं जिम और बच्चों के पार्क में घुसकर तफरी कर रहे हैं. तालिबान, काबुल पहुंचकर एंजॉय कर रहा है और आम लोग दहशत में हैं.

आज फिर एयरपोर्ट से विचलित करने वाली तस्वीरें आई. एक आदमी दीवार कूदकर एयरपोर्ट में दाखिल होने की कोशिश कर रहा था. लेकिन पीछे से तालिबान का लड़ाका उस पर गोली चलाता है. काबुल एयरपोर्ट से 7 महीने के बच्चे की तस्वीर आई. प्लेन में चढ़ने की भगदड़ में ये बच्चा अपने परिवार से बिछड़कर एयरपोर्ट पर ही रह गया. एक और तस्वीर आई अमेरिकी वायुसेना के मालवाहक विमान C-17 ग्लोबमास्टर के अंदर की. इसमें ठसाठस अफगान लोग भरे थे.

Kabul
अफगानिस्तानी न्यूज़ चैनल टोलो न्यूज़ के मुखिया लोतफुल्लाह नजाफिज़ादा ने ये तस्वीर ट्वीट की है. इसमें काबुल की दीवारों पर लगे महिलाओं के पोस्टर मिटाए जा रहे हैं.

करीब 640 लोग इस विमान में सवार थे. विमान ने काबुल से कतर के लिए उड़ान भरी थी. एयरपोर्ट की सैटेलाइट तस्वीरें भी आईं जिसमें सैकड़ों लोग एयरपोर्ट जुटे दिखते हैं. काबुल एयरपोर्ट के हालात अब भी ऐसे ही हैं. सैकड़ों महिलाएं, पुरुष, बच्चे एयरपोर्ट पर जुटे हैं. इस उम्मीद में कि कोई विमान उनको तालिबान की दहशत से दूर ले जाएगा.

भारत ने अपने दूतावास के स्टाफ को निकाला

इन सबके बीच एक अच्छी खबर आई भारतीय खेमे से. भारत ने अपने राजदूत समेत दूतावास के पूरे स्टाफ को आज अफगानिस्तान से निकाल लिया है. 120 एंबेसी स्टाफ और ITBP जवानों के अलावा कुछ पत्रकारों को लेकर विमान सुबह करीब साढ़े 11 बजे गुजरात के जाम नगर पहुंचा है और फिर वहां से शाम को दिल्ली पहुंचा. काबुल में मौजूदा हालात के बीच स्टाफ को निकाल लाना भारत के लिए बड़ी कामयाबी है.

तालिबान के काबुल में घुसने के बाद 15 अगस्त को ही भारत ने इंडियन एयरफोर्स का C-17 ग्लोबमास्टर विमान काबुल भेजा था. दूतावास से भारतीय स्टाफ को निकालने के लिए. लेकिन बड़ी अड़चन थी एबेंसी स्टाफ को एयरपोर्ट तक पहुंचाने में. एक रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान ने भारत के दूतावास पर नज़र बनाए रखी थी. तालिबान के हथियारबंद उस इलाके में घुस गए थे जहां भारत समेत बाकी देशों के दूतावास हैं. भारत का वीज़ा प्रोसेस करने वाली एक एजेंसी के दफ्तर में घुसकर वहां का कंट्रोल भी तालिबान ने ले लिया था. ऐसे माहौल में भारत के स्टाफ को एबेंसी से बाहर निकालना रिस्की था.

16 अगस्त यानी कल भारतीय स्टाफ के 45 लोग एयरपोर्ट के लिए निकले. लेकिन बीच में तालिबान के आतंकवादियों ने रोक लिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक कई भारतीयों का निजी सामान भी तालिबानी ले गए. हालांकि बाद में भारतीय स्टाफ के इस दल को एयरपोर्ट जाने दिया. ये 45 लोग कल ही भारत पहुंच गए थे. लेकिन अभी राजदूत रुद्रेंद्र टंडन समेत स्टाफ के ज्यादातर लोग दूतावास में फंसे थे.

Thousands Of Afghans Have Rushed Onto The Tarmac
काबुल एयरपोर्ट पर जुड़ी भीड़ की तस्वीर. (साभार- पीटीआई)

बाहर के हालात और खराब हो रहे थे. कल भारी भीड़ जमा होने के बाद उड़ानों को भी बंद कर दिया गया था. फिर रात को भारत और अमेरिका के बीच दो फोन कॉल हुए. पहला कॉल भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के बीच. सूत्रों के मुताबिक दूसरा कॉल भारत के NSA अजीत डोभाल ने अमरीकी NSA जैक सुलीवन को किया था.

कई भारतीय अभी भी फंसे हैं

भारतीय स्टाफ को निकालने में अमेरिका की मदद को लेकर ये फोन किए गए थे, ऐसी खबरें आई. किस तरह की मदद अमेरिका ने की होगी, ये हमें नहीं पता. लेकिन सुबह खबर आई कि राजदूत समेत पूरा डिप्लोमैटिक स्टाफ भारत ने काबुल से निकाल लिया है. हालांकि काबुल में हमारी चिंता यहीं खत्म नहीं होती. वहां काम करने गए कई भारतीय अब भी फंसे हैं. वीडियो बनाकर सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं.

ऐसा ही एक वीडियो आया काबुल की काम करने वाले 18 भारतीय लोगों का. सारे यूपी के हैं. कह रहे हैं कि कंपनी ने उनका पासपोर्ट भी रख लिया है, निकलने ही नहीं दे रहे. परेशान वो भी हैं जिनके अपने अफगानिस्तान में फंसे हैं. गाज़ीपुर के मुबारकपुर गांव के कन्हैयालाल शर्मा नौकरी के लिए काबुल गए थे. अब वहां फंसे रहे गए हैं. उनके परिवार ने अब प्रधानमंत्री से मदद मांगी है.

भारतीय नागरिकों के अलावा तालिबान का खौफ वहां के अल्पसंख्यकों में भी है. अफगानिस्तान का सिख समुदाय और हिंदू समुदाय मदद मांग रहा है. दोनों समुदायों के करीब 285 लोग काबुल के एक गुरुद्वारे में दुबके हुए हैं. सोमवार को तालिबान के नेताओं ने इनसे बात कर सुरक्षा का भरोसा दिया था. लेकिन वो भरोसा इनको नाकाफी लगता है, ये निकलना चाहते हैं.

Taliban In Afghanistan
काबुल शहर में तालिबान लड़ाके दाखिल हो चुके हैं. फोटो- आजतक

हालांकि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट कर कहा था कि वो सिख और हिंदू समुदाय से लगातार संपर्क में हैं. एक और ट्वीट में विदेश मंत्री ने कहा कि वहां मौजूद भारतीयों की भी उन्हें सटीक जानकारी है. एस जयशंकर ने कहा कि जो भारत लौटना चाहते हैं उनकी परेशानी हम समझते हैं, लेकिन एयरपोर्ट ऑपरेशन अभी बड़ी चुनौती है. मदद के लिए विदेश मंत्रालय ने स्पेशल अफगानिस्तान सेल भी बनाया है. एक मोबाइल नंबर जारी किया है. ये नंबर है- 97-17-78-53-79. अगर आप भारत के बाहर से फोन कर रहे हैं, तो इस नंबर के पहले +91 लगाएं.

अफगान नागरिकों की मदद कर रही भारत सरकार

ये तो बात हुई, उन भारतीयों की जो अफगानिस्तान में हैं और भारत लौटना चाहते हैं. जो अफगान नागरिक तालिबान से भागकर भारत आना चाहते हैं, भारत सरकार उनकी भी मदद कर रही है. भारत सरकार ने खास वीज़ा शुरू किया है. इसका नाम दिया गया है- ई इमरजेंसी, एक्स-MISC वीज़ा. ये सिंगल एंट्री ई-वीज़ा की एक कैटेगरी है. इसके तहत अफगान नागरिकों को सिक्योरिटी क्लियरेंस के बाद तुरंत वीज़ा मिल पाएगा. इस वीज़ा के लिए सभी धर्मों के नागरिक आवेदन कर पाएंगे.

ये वीज़ा 6 महीने के लिए वैलिड रहेगा. हालांकि 6 महीने के बाद उन नागरिकों का क्या होगा, क्या उन्हें वापस भेज दिया जाएगा, या नए सिरे से वीज़ा दिया जाएगा, इसकी जानकारी अभी आई है. पिछली बार जब तालिबान की सरकार आई थी तब भी भारत ने अफगान नागरिकों को शरण दी थी. उनमें से कई लोग अब भी भारत में रह रहे हैं.

तालिबान का समर्थन कौन कर रहा है?

तो ये तो हुई भारत के रेस्क्यू ऑपरेशन की बात. बाकी देश क्या कर रहे हैं. ज्यादातर देशों ने अपना स्टाफ निकाल लिया है. दूतावास खाली कर दिए हैं. काबुल में अब तीन देशों के राजदूत रह गए हैं- चीन, रूस और पाकिस्तान. इन तीनों देशों का तालिबान को लेकर क्या स्टैंड है एक-एक करके बात करते हैं.

पहले रूस की बात. रूस खुलकर तालिबान का समर्थन कर रहा है, तालिबान की तारीफ कर रहा है. रूस के अफगानिस्तान में राजदूत दिमित्री ज़िरनोव ने कहा है कि तालिबान के आने से काबुल ज्यादा महफूज़ हो गया है, राष्ट्रपति अशरफ ग़नी के राज से बेहतर हालात हैं. इससे रूस के विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी कर कहा है कि काबुल में दूतावास खाली करने का कोई प्लान नहीं है.

चीन की बात करते हैं. पिछली बार जब तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता में आया था तो चीन ने मान्यता नहीं दी थी. काबुल में चीन ने अपना दूतावास बंद कर दिया था. इस बार चीज़ें बिल्कुल अलग हैं. काबुल पर कब्जा करने से पहले तालिबान के दल ने चीन जाकर विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की थी. मुल्लाब अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में तालिबान का दल चीन गया था. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के ऐलान के बाद ये पहला मौका था, जब तालिबानी नेता चीन पहुंचे. अब काबुल पर तालिबान के कब्जा करते ही चीन ने कह दिया है कि हम सहयोग के लिए तैयार हैं. तो इस बार तालिबान की सत्ता को चीन का पूरा समर्थन है.

Afghanistan Women (4)
तालिबान लड़ाकों ने 15 अगस्त को राष्ट्रपति के महल में कब्ज़ा कर लिया. (फोटो- PTI)

अब बात पाकिस्तान की. पाकिस्तान तो तालिबान को सत्ता में लाया है, उसको क्या डर होगा. सोमवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने ट्वीट कर कहा था- काबुल में हमारा दूतावास पूरी तरह से काम कर रहा है और हर तरह की कॉन्सुलर सुविधा मुहैय्या कर रहा है, साथ ही गृह मंत्रालय के तहत एक विशेष सुविधा केंद्र भी बनाया गया है.” तो पाकिस्तान तो अब पहले से ज्यादा काबुल में सक्रिय है.

ईरान की बात करते हैं. पिछली बार ईरान को तालिबान से दिक्कत थी, इस बार ऐसा नहीं है. ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने अफगानिस्तान की नई सत्ता यानी तालिबान का समर्थन करने की बात कही है. इब्राहिम रईसी ने कहा,- अफगानिस्तान में फौज की शिकस्त और अमेरिकी वापसी को शांति और सुरक्षा बहाली के तौर पर देखा जाना चाहिए. ईरान अफगानिस्तान में स्थिरता बहाल करने में मदद करेगा.” तालिबान के साथ दोहा की बैठकों में भी ईरान शामिल रहा है.

यूएन का क्या स्टैंड है?

तो भारत को अफगानिस्तान से अभी निकलना पड़ रहा है लेकिन चीन, रूस जैसे देश काबुल में तालिबान के साथ काफी सहजता महसूस कर रहे हैं. जब दुनिया में इस तरह की कोई दिक्कत होती है, तो एक संगठन और याद आता है – यूएन. अफगानिस्तान में बिगड़ते हालात को लेकर यूएन की आलोचना हो रही है. कुछ ना करने का इल्ज़ाम लग रहा है. हालांकि सोमवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अफगानिस्तान की स्थित पर चर्चा के लिए विशेष बैठक बुलाई थी. अगस्त महीने के लिए सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष भारत है, तो अफगानिस्तान पर बैठक की अध्यक्षता भी भारत ने ही की.

पाकिस्तान इस बैठक में शामिल होना चाहता था, लेकिन रोक दिया गया. पिछले हफ्ते भी सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में पाकिस्तान को शामिल नहीं होने दिया था. पाकिस्तान ने इल्ज़ाम भारत पर लगाया. पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने ट्वीट किया. लिखा कि अफगानिस्तान की नियति तय होने के मौके पर भारत पक्षपात कर रहा है, बाधा डालने वाली हरकतें हो रही हैं. भारत ने पाकिस्तान के आरोप पर कुछ नहीं कहा.

हालांकि सुरक्षा परिषद की बैठक में भारत के यूएन में राजदूत टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि अफगानिस्तान में तेज़ी से हालात बदल रहे हैं. और ये भारत के लिए चिंता की बात है. भारत की तरफ से कहा गया कि अफगान महिलाओं, बच्चों और अल्पसंख्यकों के साथ सम्मान से पेश आने की मांग करता है. भारत ने कहा कि अफगानिस्तान की धरती अगर आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होगी तो इसके पड़ोसी सुरक्षित महसूस करेंगे. सुरक्षा परिषद की बैठक में तालिबान से अपील की कि वो इस संघर्ष का अंत राजनीतिक हल निकाल कर करे और अफ़ग़ानिस्तान को एक बार फिर चरमपंथियों की पनाहगाह ना बनने दे.” भारत ने अभी तालिबान को मान्यता देने को लेकर कुछ नहीं कहा है.

अब बात आती है कि तालिबान क्या कर रहा है. काबुल में क्या बदल रहा है. रिपोर्ट्स आ रही हैं उनके मुताबिक पूरे काबुल में तालिबान के लोगों की मौजूदगी है. कहीं भी गोली बारी जैसा या कोई फाइट नहीं चल रही है, लेकिन तालिबान पूरे काबुल में है. महिलाएं अब घरों से बाहर निकलती हैं तो इस्लामिक तरीके से बुर्के के साथ निकलती हैं. इन सबके बीच तालिबान ने भी सबको माफी देने का ऐलान किया है. और कहा है कि महिलाएं नौकरियों में लौट सकती हैं.

तालिबान के सांस्कृति कमेटी के सदस्य इनामुल्ला समानगनी का बयान आया है. उसने कहा है कि इस्लामिक अमीरात में महिलाओं को विक्टिम नहीं बनाया जाएगा. वो शरीया कानून के हिसाब से सरकार का हिस्सा बन सकती हैं. आगे उसने कहा है कि सरकार का स्वरूप अभी पूरी तरह से साफ नहीं है, लेकिन हर स्तर पर इस्लामिक लीडरशिप होगी.


वीडियो- अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद अमेरिका घेरा गया, फिर जो बाइडेन के जवाब ने नई बहस छेड़ दी

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