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पापा के ज़माने की वो हीरोइन, जिसका सबसे बड़ा डर हार्ट अटैक था

आशा पारेख. यानी पापा के ज़माने की मशहूर हीरोइन. 1960 के दौर में आशा पारेख का नाम घर-घर पहचाना जाता था. इस हीरोइन ने अपने पत्रकार दोस्त मोहम्मद खालिद के साथ मिलकर अपनी बायोग्राफी लिखी है. इस किताब के जरिए अपने जीवन के हर एक पहलू को शेयर किया है. किताब का नाम है ‘Asha Parekh The Hit Girl’ इस किताब के अंश हम आपको पब्लिकेशन की इजाज़त से पढ़वा रहे हैं. 


 

मैंने उस दिन अपने साइकैट्रिस्ट को घर पर चाय के लिए बुलाया था. जिसने कि मेरी दवाइयों की डोज को काम कर दिया था. मैंने उन्हें बता दिया था कि मेरे बुलाने का मकसद ये जानना है कि क्या मेरा केस बहुत मुश्किल था? क्या मेरी ज़िंदगी खत्म हो सकती थी? शुरुआत में वो थोड़ा हिचक रहे थे. पर 2 कंडीशन पर माने. पहला की प्रोफेशनल एथिक्स के कारण उनका नाम न लिया जाए और दूसरा की वो बिल्कुल खरा बोलेंगे. मैंने दोनों ही शर्तें मान ली. मैं तो बस पूरी बात जानना चाहती थी.

मैं इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि वो जब बोल रहे थे तो बड़े विनम्र थे और संभल कर बोल रहे थे. फिर भी उनका ऑब्जर्वेशन मेरे लिए बेहद ज़रूरी थे. उनके अनुसार मैं साइकेट्रिक ट्रीटमेंट के लिए तैयार थी. 60 के उम्र के दूसरे लोगों की तरह मैंने भी रामबाण उपायों की उम्मीद की थी.

ये शायद मेरे लड़ाई की आधी जीत थी. अगर मैं इससे बचने की कोशिश करती तो जितना मेरे जिंदगी में सुधार हो पाया है उसका एक फीसदी भी नहीं हो पाता. कई और कारण से भी मेरा डिप्रेशन बढ़ गया था. मुझे हार्ट अटैक का डर लगा रहता था. क्या ये हेरिडिटरी था? नंदा के अचानक हार्ट अटैक के कारण गुजर जाने के बाद शायद मैं हर बात पर ओवर रिएक्ट कर रही थी.

अभिनेत्री- नंदा
अभिनेत्री नंदा

मेरे समय के मेरे हीरो अब इस दुनिया में नहीं थे. गुरुदत्त, भारत भूषण, प्रदीप कुमार, राजेंद्र कुमार, जॉय मुखर्जी और सुनील दत्त. सारे इस दुनिया से जा चुके थे. शम्मी कपूर के जाने से मैं टूट सी गई थी. कई सालों तक डायलिसिस पर रहने के बाद वो भी चले गए थे. और उनके साथ हमारा एक हिस्सा भी चला गया था. अकेला होना मुझे कुछ खास नहीं खल रहा था, क्योंकि ज्यादातर शादियां टूट चुकी थीं या फिर लोग अपनी शादी से खुश नहीं थे. और इस बात से मैं संतुष्ट थी. मेरे अनुसार प्यार और साथ दोनों तरफ से बिना किसी शर्त के होना चाहिए, प्यार वही है जो चले.

मैं एक बात से बहुत दुखी थी. जब मैं 35 साल की थी तो एक बच्चे को गोद लेना चाहती थी. जिसके लिए मेरे माता-पिता ने भी हामी भर दी थी. दादर के शिवाजी पार्क के पास एक वेलफेयर सेंटर था. जिसके एक दो साल के बच्चे से मुझे लगाव हो गया था. लेकिन शायद भगवान को यह मंजूर नहीं था. मुझे उस बच्चे को गोद लेने से मना कर दिया गया क्योंकि उसे कोई जानलेवा मेडिकल दिक्कत थी. जिसकी वजह से वो ज्यादा दिन नहीं जी सकता था. इससे मेरा दिल टूट गया था. वो बच्चा मेरी तरफ देखकर मुस्कुराता और मेरी ऊंगलियों को जकड़ लेता. वो मुझे जाने नहीं देना चाहता था. इस मौके के हाथ से जाने के बाद मैं कभी भी अडॉप्शन की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई. और मैं पूरी तरह हार गई.

आशा पारेख
आशा पारेख

मुझे फ्लाइट से डर लगने लगा. लंबी दूरी की फ्लाइट में अचानक से लगता था कि मेरी सांस बंद हो रही है. यह तब दूर हो सका जब साइकैट्रिस्ट ने कहा कि अगर जरूरी हुआ तो वो फ्लाइट में मेरे साथ आएंगे. इसके बाद मैंने हिम्मत जुटाकर दोस्तों और परिवार वालों के साथ रहने के लिए बर्मिंघम और उसके अगले साल न्यूयॉर्क की फ्लाइट ली.

फ्लाइट का डर तब खत्म हो गया. मैं उस वक्त या तो फ्लाइट में सोने की कोशिश करती, या फिर किताब पढ़ने की या फिर प्रार्थना करने की. पर उन दो ट्रिप के बाद मैं फिर आराम से फ्लाइट लेने लगी. नई जगह जाना और अपने आस-पास नए माहौल से ऐसा लगा मानो जीना फिर से आ गया हो. मुझे खुद से लड़ने की जरूरत नहीं लगने लगी. जिंदगी के लिए मेरी सोच और मेरा नजरिया ही बदल गया. और अगर कुछ कमी भी रह गई है तो उसे सच मान कर एक्सेप्ट करने लगी थी. मां के जाने के बाद जिस तरीके से मैं खुद का ध्यान नहीं रखती थी, वैसे जीना मैंने छोड़ दिया था. उस वक्त मैं ठंडी पड़ गई थी, शांत हो गई थी. आंसू आते ही नहीं थे और अगर आते फिर तो हफ्तों नहीं रुकते थे.

जिस देने मेरी मां का देहांत हुआ था, अमजद खान शोक जताने आए थे. पर मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए कमरे के बाहर भी नहीं आ पाई थी. अमजद भाई सुबह से लेकर आधी रात तक घर में थे. पर अपने बेटे के जन्मदिन के कारण उनको जाना पड़ा. जाने से पहले उन्होंने घर पर किसी से कहा था कि वो आए थे. ऐसा मुझे बता दें. करीब एकाध महीने बाद जब मैंने उन्हें कॉल कर माफी मांगी, उन्होंने कहा- ‘अपना ध्यान रखना, तुम्हारी मां भी यही चाहती थीं.’

फिल्म हस्तियों को अक्सर ऐसा माना जाता है कि वो अपने ही बनाए हुए बादल में खोए रहते हैं. अपने लार्जर दैन लाइफ वाले माहौल और अवार्ड के कलेक्शन में डूबे रहते हैं. पर एक बार फिर सोचिए. अगर हम ऐसे चीजों में डूबे रहे तो यह तब ही होगा जब हम पिछले दिनों को याद कर रहे हो.

मैं खुश हो जाती हूं जब फैन्स मेरे कोई भूले-बिसरे फोटो को भेज देते हैं. मैं यह भी नहीं मानती कि ट्रॉफी और सम्मान को छिपाना चाहिए. वो मेरे वजूद का हिस्सा है. वो मेरे लिए सबसे ज्यादा यादगार हैं. जो मुझे सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि ‘क्या मैंने सच में ऐसा जबरदस्त काम किया है? क्या मैं ऐसे शोहरत को डिजर्व करती हूं? शायद मैं इससे भी बेहतर कर सकती थी.’ कोई भी कलाकार अपने काम से कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता है. हमेशा यह लालच रह ही जाता है कि हम इससे बेहतर कर सकते थे. मुझे लगता है कि आज के सितारों को तो हमारे जमाने के कलाकारों से ज्यादा मेहनत करनी होती है.

अब पहले से कहीं ज्यादा स्ट्रेस, ग्रूपिज्म और कॉम्पटीशन है. एक नए फिल्म को कई शहरों में जमकर प्रमोट करना होता है. असुरक्षा हम सब को प्रभावित करता है. मैं शुरू में इनसिक्योर नहीं थी, लेकिन बुढ़ापे में एक अच्छे लाइफ स्टाइल को मेंटेन करके रखना मेरे लिए परेशान होने वाली बात जरूर थी. इसलिए मैं पैसे के मामले में बहुत प्रैक्टिकल हूं.

मैं एक स्टार की तरह नहीं जीती. मैं अपने साधनों के अंदर ही जीती हूं. इसलिए चमकदार गाड़ी, गैजेट या फिर मंहगे डिजाइनर कपड़े का शौक नहीं है. हां अगर में कभी तैयार होती हूं तो तब जब मुझे किसी महफ़िल या पार्टी में जाना हो.

 


 

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