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बुर्किना फ़ासो में राष्ट्रपति को किसने गायब कर दिया?

मोहब्बतें में अमिताभ बच्चन का एक मशहूर डायलॉग है,

परंपरा, प्रतिष्ठा, अनुशासन. ये इस गुरुकुल के तीन स्तंभ हैं. ये वो आदर्श हैं जिनसे हम आपका आने वाला कल बनाते हैं.

अगर इसे अफ्रीकी महाद्वीप की राजनीति के संदर्भ में कहा जाए तो कुछ यूं कहेंगे,

नरसंहार, विद्रोह, तख़्तापलट. ये इस महाद्वीप के तीन स्तंभ है. ये वो कारक हैं जिनसे यहां के लोगों का कल निर्धारित होता है.

इस चिर-परिचित स्क्रिप्ट का हालिया मंचन पूर्वी अफ़्रीका के देश बुर्किना फ़ासो में हुआ. पहले गोलियों की आवाज़ सुनाई दी. फिर तस्वीरें दिखी. राष्ट्रपति की क्षत-विक्षत गाड़ियों की. फिर पता चला कि राष्ट्रपति को गिरफ़्तार कर लिया गया है. सेना की एक टुकड़ी स्टेट टीवी के दफ़्तर पर मौजूद है. फिर ख़बर आई कि सेना ने संसद और संविधान को भंग कर दिया है. सरकार की जगह पर मिलिटरी हुंटा बिठा दी गई है. और, इस तरह तख़्तापलट का चक्र पूरा हुआ.

बुर्किना फ़ासो में तख़्तापलट क्यों और कैसे हुआ? बुर्किना फ़ासो का इतिहास क्या है? और, सैन्य तख़्तापलट के प्रमुख ट्रेंड्स क्या हैं?

बुर्किना फ़ासो वेस्ट अफ़्रीका में पड़ता है. ये पूरी तरह से ज़मीन से घिरा हुआ है. आइवरी कोस्ट, नाइजर, बेनिन, घाना, माली और टोगो इसके पड़ोसी हैं.

इतिहास में जाएं तो 11वीं सदी में पहली बार बसाहट शुरू हुई थी. इस इलाके पर अलग-अलग साम्राज्यों का नियंत्रण रहा. 1896 में ये इलाका फ़्रांस के नियंत्रण में आ गया. उसने यहां अपनी कॉलोनी बसाई. जैसी कि परंपरा थी, फ़्रांस ने बेहिसाब नरसंहार किया, संसाधन लूटे और अपनी तिजोरी भरता गया.

फ़्रांस ने अपने हिसाब से सीमाएं निर्धारित की. उसने इस इलाके को अपर वोल्टा का नाम दिया. 1960 में अपर वोल्टा को आज़ादी मिल गई. मौरिस यामोगो पहले राष्ट्रपति बने. उन्होंने देश में तानाशाही चलाने की कोशिश की. मौरिस ने एकदलीय व्यवस्था लागू की. विपक्ष की गुंज़ाइश खत्म कर दी गई. भ्रष्टाचार चरम पर था. इसके अलावा, उन्होंने हड़ताल और धरने पर भी पाबंदी लगा दी.

1965 आते-आते आर्थिक मोर्चे पर सरकार पस्त होने लगी थी. इससे निपटने के लिए बजट में भयानक फेरबदल किया गया. खज़ाना भरने के लिए नौकरीशुदा लोगों की सैलरी घटा दी गई और टैक्स अचानक से बढ़ा दिए गए. इससे नाराज़ लेबर यूनियन्स ने प्रोटेस्ट की धमकी दी. इस धमकी से बलपूर्वक निपटा गया. 30 दिसंबर 1965 को पूरे अपर वोल्टा में हड़ताल का ऐलान कर दिया गया.

इसके बावजूद सरकार की नींद नहीं खुली. सरकार अपनी धुन में मगन रही. एक जनवरी 1966 को आपातकाल लगा दिया गया. अगले दिन सभी सरकारी इमारतों पर सेना तैनात कर दी गई. सरकारी कर्मचारियों को कहा गया कि अगर हड़ताल पर गए तो अंज़ाम बुरा होगा. इस धमकी के बाद भी तीन जनवरी को प्रोटेस्ट चालू हुआ. सरकार ने सेना को आदेश दिया, जैसे भी हो इन्हें रास्ते से हटाओ. गोली चलानी पड़े या टैंक दौड़ाना पड़े, करो. हमें लोगों के मरने की परवाह नहीं है.

सेना ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया. उन्होंने प्रोटेस्टर्स पर गोली नहीं चलाई. सरकार सन्न रह गई. राष्ट्रपति को अपने पांवों के नीचे खाई दिख रही थी. उन्होंने सेना के अधिकारियों से समझौता करने की कोशिश की. बात नहीं बनी तो मौरिस रेडियो पर आए. रेडियो पर उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता बदल चुकी है. ये अच्छा है कि हमारे नए लीडर को सभी धड़े का समर्थन है. हमें सत्ता छोड़ने का कोई मलाल नहीं है.

इस संबोधन के बाद मौरिस ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

इस इस्तीफ़े के दो कारण बताए जाते हैं. पहला, जैसा कि मौरिस ने ख़ुद बताया कि उन्होंने ख़ूनखराबे से बचने के लिए अपना पद छोड़ दिया.

दूसरा कारण ये दिया जाता है कि मौरिस ने अपने चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ अबूबकर लमिज़ाना को मुंहज़ुबानी आदेश दिया था. प्रोटेस्टर्स पर गोलियां चलाने का. लमिज़ाना ने कहा, ये आदेश आप लिखकर दीजिए. राष्ट्रपति ने कहा कि मेरी ज़ुबान ही मेरा आदेश है. तब लमिज़ाना ने अपने मातहत काम कर रहे लोगों से संपर्क किया. उनमें से अधिकांश गोलियां बरसाने के ख़िलाफ़ थे. फिर लमिज़ाना ने राष्ट्रपति का आदेश मानने से इनकार कर दिया.

सच्चाई जो भी हो, अपर वोल्टा में सरकार बदल चुकी थी. लमिज़ाना ने संसद, सरकार और संविधान को भंग कर दिया. उन्हें लगभग हर धड़े का सपोर्ट मिला. इसी सपोर्ट की बदौलत उन्होंने 14 सालों तक सत्ता चलाई. नवंबर 1980 में कर्नल साए ज़ेरबो ने एक रक्तहीन क्रांति में उनका तख़्तापलट कर दिया.

दो साल बाद ही ज़ेरबो की कुर्सी भी चली गई. नवंबर 1982 में जॉन-बैपटिस्ट ओड्रोगो अपर वोल्टा के चौथे राष्ट्रपति बने. उन्हें सत्ता दिलाने में दो मिलिटरी अफ़सरों की अहम भूमिका थी. उनके नाम थे, थॉमस संकारा और ब्लेस कोम्पोर. संकारा और कोम्पोर दोस्त थे. उनकी पहली मुलाक़ात मोरक्को में हुई थी. मिलिटरी सरकार अपने तेज़तर्रार लड़कों को विदेश में ट्रेनिंग के लिए भेजा करती थी.

ट्रेनिंग के बाद कोम्पोर और संकारा लौटकर वतन लौटे. उन्हें आर्मी में बढ़िया पद मिला. दोनों ने मिलकर आर्मी के अंदर एक सीक्रेट टीम बनाई. कम्युनिस्ट ऑफ़िसर्स ग्रुप. इस ग्रुप ने ओड्रोगो को सत्ता दिलवाई थी. इस मदद का फ़ायदा संकारा को मिला.

जनवरी 1983 में उन्हें अपर वोल्टा का प्रधानमंत्री बना दिया गया. लेकिन कुछ समय बाद ही ओड्रोगो से उनका झगड़ा हो गया. ओड्रोगो ने संकारा को अरेस्ट करवा दिया. थॉमस संकारा युवा अफ़सरों के बीच खासे लोकप्रिय थे. उनकी गिरफ़्तारी हुई थो असंतोष पनपा. कोम्पोर ने उन्हें भड़का कर ओड्रोगो का तख़्तापलट करवा दिया. इस घटना को अपर वोल्टा के इतिहास में ‘अगस्त क्रांति’ के नाम से जाना जाता है.

अगस्त क्रांति के बाद संकारा नए राष्ट्रपति बने. उन्होंने सबसे पहले अपने मुल्क़ का नाम बदला. अपर वोल्टा बदलकर ‘बुर्किना फ़ासो’ हो गया. इसका हिंदी में मतलब होता है, ईमानदार लोगों की धरती. संकारा कम्युनिस्ट थे. उनके ऊपर चे ग्वेरा का प्रभाव था.

संकारा ने वेस्टर्न पावर्स की बजाय सोवियत संघ का साथ चुना था. उन्होंने भ्रष्टाचार रोकने के लिए सख्त कदम उठाए. दोषियों को कठोर सज़ा दी जाने लगी. इससे अफ़सरों का एक धड़ा नाराज़ हो गया. उन्हें अपने ऐशो-आराम पर ख़तरा नज़र आ रहा था.

फिर 15 अक्टूबर 1987 की तारीख़ आई. हथियारबंद सैनिकों का एक दस्ता थॉमस संकारा के दफ़्तर में घुसा और अंधाधुंध गोलियां बरसा दी. इस गोलीबारी में संकारा समेत 13 लोग मारे गए. हत्या के बाद संकारा की लाश को टुकड़ों में काटा गया.

फिर उसे किसी अनजान जगह पर दफ़ना दिया गया. संकारा के परिवार को जो डेथ सर्टिफ़िकेट मिला. उसमें मौत का कारण नेचुरल डेथ बताया गया था. हत्या वाली बात 1997 में सामने आई. फिर जांच शुरू हुई और बिना किसी नतीजे के उसे बंद कर दिया गया. 2015 में केस दोबारा खुला और एक नया दावा सामने आया.

तब कहा गया कि ब्लेस कोम्पोर भी अपने दोस्त की हत्या में शामिल था. उसी ने संकारा को रास्ते से हटाने की साज़िश रची थी. संकारा के बाद सत्ता कोम्पोर के पास आई. उसने अगले 27 बरस तक बुर्किना फ़ासो में सरकार चलाई. कोम्पोर ने आजीवन राज चलाने की पूरी व्यवस्था कर ली थी. लेकिन जनता और झेलने के लिए तैयार नहीं थी.

सेना भी कोम्पोर के ख़िलाफ़ हो चुकी थी. हार मानकर कोम्पोर ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद वो भागकर आइवरी कोस्ट चला गया. कोम्पोर तब से वहीं है. उसे बुर्किना फ़ासो लाने की कोशिशें अभी तक सफ़ल नहीं हो पाईं है.

खैर, कोम्पोर के भागने के बाद अस्थायी सरकार बनाई गई. मिचेल कफ़ांदो बुर्किना फ़ासो के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने. नवंबर 2015 में चुनाव कराने का ऐलान हुआ था. लेकिन उससे दो महीने पहले ही कफ़ांदो का तख़्तापलट हो गया. सितंबर 2015 में कोम्पोर के वफ़ादारों ने सरकार पलट दी. लेकिन एक हफ़्ते के भीतर ही कफ़ांदो को वापस कुर्सी पर बिठा दिया गया.

नवंबर 2015 में चुनाव हुए. इस चुनाव में रोच मार्क क्रिस्टियन कबोरे को जीत मिली. कबोरे 1994 से 1996 तक बुर्किना फ़ासो के प्रधानमंत्री रह चुके थे. 2020 में कबोरे लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव जीतने में कामयाब रहे. चुनावी नतीज़ों से यही पता चलता है कि कबोरे की लोकप्रियता बढ़ रही थी.

हालांकि, धरातल पर ऐसा नहीं था. कई मोर्चों पर कबोरे विफ़ल साबित हो रहे थे. इससे आम जनता का रोष बढ़ता जा रहा था.

इनमें सबसे बड़ा मोर्चा इस्लामिक आतंकियों का था. 2015 तक बुर्किना फ़ासो में शांति बरकरार थी. कबोरे के आने के बाद इस्लामिक आतंकी संगठनों का हमला बढ़ने लगा. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इन हमलों की वजह से अकेले 2021 में बुर्किना फ़ासो में 14 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए. इसी दौरान दो हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई. कबोरे पर आरोप लगते हैं कि वो इन हमलों पर रोक लगाने में असफ़ल रहे. जनता शांति की तलाश में थी.

फ़्रांस ने बुर्किना फ़ासो में अपनी सेना तैनात कर रखी है. इसके बावजूद हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही थी. माना जा रहा है कि कबोरे अपने लोगों का भरोसा खो चुके थे.

सेना ने उसी आक्रोश का फायदा उठाया. 23 जनवरी को कुछ छावनियों में गोलीबारी हुई. सरकार ने तख़्तापलट से मना किया. 24 जनवरी को आग प्रेसिडेंशियल पैलेस तक पहुंच गई. कबोरे ने फ़ेसबुक पर सेना से हथियार रखने की अपील की. हालांकि, उनकी अपील काम नहीं आई. मामूली झड़प के बाद कबोरे को गिरफ़्तार कर लिया गया. उन्हें अभी अज्ञात जगह पर रखा गया है.

कबोरे को अरेस्ट करने के बाद सैनिकों का एक दल स्टेट टीवी के दफ़्तर पहुंचा. वहां उन्होंने ऐलान किया कि सरकार और संविधान को भंग किया जाता है. अगले आदेश तक अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बंद रहेंगी. इसके अलावा, देशभर में नाइट कर्फ़्यू भी रहेगा.

अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि कबोरे के बाद कौन?

कबोरे का तख़्तापलट करने वाले लेफ़्टिनेंट-कर्नल पॉल हेनरी सैनदोगो दमीबा को नया राष्ट्रपति घोषित किया गया है. दमीबा को नवंबर 2021 में ही प्रमोशन मिला था. उन्हें बुर्किना फ़ासो की मिलिटरी के तीन कमांड्स में से एक का मुखिया बनाया गया था. दमीबा पूर्व राष्ट्रपति ब्लेस कोम्पोर की सुरक्षा में भी तैनात रहे. कोम्पोर की एलीट फ़ोर्स को बाद में भंग कर दिया गया था. लेकिन दमीबा का रुतबे में कमी नहीं आई. कबोरे सरकार ने उन्हें आगे बढ़ाना ज़ारी रखा. जानकारों का कहना है कि दमीबा के विद्रोह की एक वजह कोम्पोर के प्रति वफ़ादारी भी हो सकती है.

हालांकि, दमीबा ने कबोरे पर आरोप लगाया कि तख़्तापलट की एक वजह वो ख़ुद हैं. कबोरे ने देश को एकजुट करने की बजाय बांट दिया. इसी वजह से इस्लामिक आतंकी लगातार देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं.

बुर्किना फ़ासो की सत्ता से कबोरे के जाने का मतलब लोकतंत्र का पतन है. इसके बावजूद आम जनता इस तख़्तापलट से ख़ुश है. उन्हें ऐसा लग रहा है कि सेना कबोरे से बेहतर विकल्प है. इसका एक नज़ारा बुर्किना फ़ासो

की राजधानी में भी देखने को मिला. जब तख़्तापलट के बाद भी कोई प्रोटेस्ट नहीं हुआ. उलटा लोग सेना के समर्थन में रैली में जमा हुए. उन्होंने सैनिकों से हाथ मिलाया और कबोरे के जाने का जश्न भी मनाया.

अफ़्रीकी महाद्वीप में तख़्तापलट की पुरानी परंपरा रही है. अधिकतर मामलों में सेना ही असंतोष का फायदा उठाती है. जोनाथन पॉवेल और क्लेटन थाइन की रिसर्च के अनुसार, 1950 के बाद से अब तक अफ़्रीका में दो सौ से अधिक तख़्तापलट हो चुके हैं. बुर्किना फ़ासो में कुल आठ तख़्तापलट हो चुके हैं. इनमें से सात सफ़ल रहे. 1980 के दशक के बाद से तख़्तापलट के मामलों में कमी आ रही थी. लेकिन अब एक बार फिर इसमें बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है.

2021 में माली, गिनी, चाड और सूडान में तख़्तापलट सफ़ल हुआ. सूडान में अपवाद ये हुआ कि लोग वहां सैन्य सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने उतरे. वहां आज भी लोकतंत्र के समर्थन में प्रोटेस्ट हो रहे हैं. लेकिन अधिकतर मामलों में आम लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं. इसकी कई वजहें हैं. मसलन, लोकतंत्र में घटता विश्वास, भ्रष्टाचार, ग़रीबी, सरकारों की वादाख़िलाफ़ी आदि.

यूनाइटेड नेशंस और इकोवास समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और देशों ने इस तख़्तापलट की आलोचना की है. उन्होंने राष्ट्रपति कबोरे को रिहा करने की मांग की है. हालांकि, इस आलोचना या अपील का कोई असर होने की संभावना बेहद कम है. ज़िम्मेदार संस्थाओं को असली वजहों पर चोट करने की ज़रूरत है. वरना ये क्रम ज़ारी रहेगा.

बुर्किना फ़ासो की घटना एक उदाहरण भर है. अगर इससे सीख नहीं ली गई तो आगे भी ऐसे ही सत्ता परिवर्तन होते रहेंगे. उस समय हमें कतई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.


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