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बलबीर सिंह सीनियर का ब्लेज़र कहां है?

बलबीर सिंह सीनियर चले गए. 95 साल की उम्र में मोहाली में उनका निधन हो गया. बलबीर के साथ ही शायद उनके गायब ब्लेज़र की कहानी भी चली जाएगी. हम सभी के कपड़े गायब होते हैं. कभी सूखने को डालो तो उड़ जाते हैं. कभी बंदर उठा ले जाते हैं तो कभी कुछ और हो जाता है. लेकिन बलबीर का ब्लेज़र ना उड़ा और ना ही उसे बंदर ले गए. उस ब्लेज़र से बंदरों का इतना ही कनेक्शन है कि उसे ले जाने वाले बंदरों के वंशज थे.

सालों पहले, जब मैं स्कूल में था. मेरे स्कूल की चार क्रिकेट टीमें थीं, चौथी में सबसे कम उम्र, यानी कक्षा नौ के बच्चे खेलते थे. मैं उस टीम का कैप्टन था. हर टीम की तरह इसमें भी कुछ कोच के चमचे थे. उन चमचों में एक खास चमचा था. इतना खास कि हमारा सीजन का पहला टूर्नामेंट खत्म हुआ तो सारे सर्टिफिकेट कोच ने उसी को थमा दिए.

मैंने और मेरे दोस्तों ने बहुत कोशिश की, लेकिन उस चमचे की हमसे जाने क्या दुश्मनी थी कि वो सर्टिफिकेट उसने हमें कभी नहीं दिए. एकाध बार अपने घर भी ले गया और मेरे एक दोस्त को वो सर्टिफिकेट दिखाए भी. लेकिन दिए नहीं. उन सर्टिफिकेट्स में जाने क्या लिखा था. पता नहीं उससे जिंदगी में कोई फायदा होता भी या नहीं, लेकिन आज तक उनके जाने का ग़म है. जब भी कभी उनका ज़िक्र होता है तो बुरा लगता है.

# क़िस्सा क्या है?

ये क़िस्सा लिखते वक्त मैं यही सोच रहा हूं कि बलबीर को कैसा लगता होगा. जब वह अपने ब्लेज़र के बारे में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) नाम के सफेद हाथी से पूछते होंगे और बदले में उनसे एक नहीं, कई बार कहा गया होगा- हमें नहीं पता. ब्लेज़र खास क्यों था? क्योंकि बलबीर ने उसे 1956 मेलबर्न ओलंपिक के दौरान पहना था. वह उस ओलंपिक में इंडियन हॉकी टीम के कैप्टन थे. वह हॉकी टीम जिसने उसी ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत लगातार छठा ओलंपिक गोल्ड अपने नाम किया. पहले तीन गोल्ड जहां मेजर ध्यानचंद की हॉकी से निकले वहीं बाद के तीनों बलबीर ने भारत को दिए.

कहानी शुरू हुई 1985 से. भारतीय हॉकी अपने आज के (बदहाली के) दिनों की तरफ बढ़ रही थी. भारत क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत चुका था. अब क्रिकेट इस देश का सबसे प्रसिद्ध ‘Ball Game’ बन गया था. हॉकी और फुटबॉल जैसे बॉल गेम्स अब थर्ड-मैन की तरफ खड़े होने लगे थे. जहां कैमरे कभी-कभार ही जाते हैं. ऐसे हालात में SAI ने बलबीर से कहा कि वह नेशनल म्यूजियम ऑफ स्पोर्ट्स बनाने जा रहे हैं. यह दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बनना था.

म्यूजियम के लिए SAI ने बलबीर से कुछ यादगार चीजें मांगी. बलबीर ने अपने तीनों ओलंपिक गोल्ड और पद्म श्री पुरस्कार छोड़, बाकी सबकुछ दे डाला. इसमें एशियाड गोल्ड समेत कई मेडल्स, 1956 ओलंपिक में पहना अपना ब्लेज़र और लगभग 100 बेहद खास तस्वीरें थीं.

साल बीतते गए. हम हॉकी को भूलते गए. क्योंकि हॉकी राजेश खन्ना नहीं थी, जिनके फैंस उनसे कोई नहीं छीन सकता. फैंस छिने और हॉकी बर्बाद होती गई. कई साल बीते. आया 2012. लंदन में ओलंपिक गेम्स होने थे. गेम्स से पहले ओलंपिक म्यूजियम ने बलबीर से संपर्क किया. ओलंपिक म्यूजियम बलबीर द्वारा मेलबर्न ओलंपिक में पहने गए ब्लेज़र को ओलंपिक की ऑफिशियल प्रदर्शनी में लगाना चाहता था.

# ग़ायब हुआ ख़जाना

इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी (IOC) ने इस ओलंपिक के लिए कुल 16 आइकॉन्स का सेलेक्शन किया था. बलबीर इस लिस्ट के इकलौते भारतीय और एकमात्र हॉकी प्लेयर थे. अब बलबीर ने SAI से अपना ब्लेज़र मांगा. बलबीर के साथ ब्लेज़र की इस लड़ाई में लगातार शामिल रहे उनके नाती कबीर ने PTI से कहा था,

‘इसी वक्त हमने ब्लेज़र के लिए SAI से संपर्क साधा. क्योंकि नानाजी के पास लंदन ओलंपिक में अपने साथ ले जाने के लिए ओलंपिक गोल्ड मेडल्स के अलावा कुछ नहीं था. लेकिन SAI ने हमसे कहा कि वह नहीं जानते कि यह खज़ाना कहां है.’

PTI से बात करते हुए कई दशकों तक बलबीर के साथ रहे सुदेश गुप्ता ने इस बारे में कहा,

‘पिछले आठ सालों में अपनी उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के बावजूद बलबीर ने कई खेलमंत्रियों, स्पोर्ट्स सेक्रेटरियों और SAI ऑफिशल्स से मुलाकात की. इस दौरान मैं और कबीर उनके साथ रहे और हम दिल्ली से पटियाला तक हर जगह गए. यह शर्मनाक है. ये सामान हमारे खेलों से जुड़ी राष्ट्रीय विरासत का हिस्सा था.

हमने साल 2014 में यह मसला पूर्व खेल मंत्री सर्बानंद सोनोवाल के सामने भी रखा था. उन्होंने हमें भरोसा भी दिलाया था. अगर भारत के महानतम प्लेयर की अमूल्य धरोहर के साथ ऐसा हो सकता है, तो मुझे नहीं लगता कि इसे बस लापरवाही माना जाना चाहिए, लोगों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. इसे हमारे महान देश की आज़ादी के बाद के बेहतरीन खेल इतिहास के सबसे महानतम अध्याय से चोरी का आपराधिक षड्यंत्र माना जाना चाहिए.’

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के कुछ वकीलों ने इस मामले में कई RTI भी डाली. इनके जरिए कुछ चौंकाने वाले खुलासे भी हुए. 9 दिसंबर 2014 को फाइल हुई पहली RTI का जवाब SAI ने 5 जनवरी 2015 को दिया. इसमें वह इस बात से ही मुकर गए कि नेशनल स्पोर्ट्स म्यूजियम की स्थापना की बात भी कभी चली थी. साथ ही SAI ने यह भी कहा कि उन्होंने बलबीर से कोई भी सामान नहीं लिया.

# झूठ बोलते NIS और SAI

RTI के जरिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS) पटियाला से भी जवाब मांगे गए. उन्होंने भी बलबीर सिंह से कोई भी सामान मिलने की बात स्वीकार नहीं की. कबीर के मुताबिक SAI के जवाब से असंतुष्ट वकीलों ने RTI अपील दाखिल की. कबीर ने PTI से कहा,

‘इस अपील का जवाब 18 मार्च 2015 को मिला. इस जवाब ने हम सभी को चौंका दिया. इसमें 1998 में SAI द्वारा NIS पटियाला को सौंपे गए सामान की लिस्ट थी. इस लिस्ट के आइटम नंबर 23 में साफ लिखा था कि यह 1956 मेलबर्न ओलंपिक का ब्लेज़र था जो बलबीर सिंह सीनियर ने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम को सौंपा था.

यह वही ब्लेज़र था जो उन्होंने 1952 और 1956 ओलंपिक में भारतीय दल के ध्वजवाहक के रूप में पहना था. वह दो ओलंपिक में भारतीय दल के ध्वजवाहक बनने वाले इकलौते एथलीट थे.’

तमाम RTI, दिल्ली से पटियाला तक की दौड़, खेल मंत्रियों, खेलों से जुड़े नौकरशाहों से मुलाकात करते-करते बलबीर सिंह सीनियर ने दुनिया छोड़ दी. लेकिन सवाल आज भी बाकी है. बलबीर सिंह का ब्लेज़र कहां है?


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