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कश्मीर में आम नागरिकों पर बढ़ते हमले आतंकियों के किस नए पैटर्न की तरफ इशारा कर रहे हैं?

श्रीनगर के साथ साथ अब दक्षिण कश्मीर में भी आम नागरिकों को आतंकी निशाना बना रहे हैं. सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. (फोटो- PTI)

जनवरी 1990 का कश्मीर हममें से कई लोगों ने नहीं देखा, सिर्फ किताबों में पढ़ा है और लोगों से सुना है. कि कैसे लाखों लोग रातों रात अपने घर से भागकर जान बचाने के लिए जम्मू पहुंचे थे. लेकिन जम्मू कश्मीर में अब जो हो रहा है वो हम अपनी आंखों से देख रहे हैं. इतिहास जम्मू कश्मीर में खुद को दोहराता दिख रहा है. 17 अक्टूबर की रात से वो तस्वीरें, वीडियो आए, जिनमें मज़दूर अपनी जान बचाने के लिए कश्मीर घाटी से भाग रहे हैं. अपने बीवी-बच्चों को लेकर रातों-रात UP, बिहार के सैकड़ों मज़दूर जम्मू आ गए हैं. कोई ईंट भट्टे पर काम करता था, कोई लकड़ी का काम करता था, कोई गोलगप्पे की रेहड़ी लगाता था, कोई सेब के बाग में मज़दूरी करता था. कितने ही लोग बिना अपनी पूरी दिहाड़ी-मज़दूरी लिए, रात को ही जम्मू भाग आए. कई लोग ऐसे हैं जिनके पास खाने तक के पैसे नहीं हैं. बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं. लेकिन कश्मीर से बाहर निकलकर राहत महसूस कर रहे हैं.

यहां से जाने वालों में राकेश दास भी शामिल हैं. वो कहते हैं कि डर लग रहा है इसलिए अब यहां से जा रहे हैं. इंडिया टुडे के पत्रकारों ने और भी मजदूरों से बात की. उन्होंने बताया कि रात में 12 बजे, 1 बजे मज़दूरों को उनके मालिकों ने मार-मारकर भगा दिया. उनका अब तक का जो पैसा हुआ था, वो भी नहीं दिया. ये सब बताते-बताते कई मजदूरों का गला भर आता है. ये मजदूर छोटे-छोटे बच्चों को लेकर अब बस स्टेशन पर, रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं. उन्हें नहीं पता कि अब आगे क्या करेंगे.

कश्मीर से इनको भागना क्यों पड़ा?

बरसों से कश्मीर के आतंकियों के लिए ये कहा जाता रहा है कि वो टूरिस्ट या बाहर के लोगों को टारगेट नहीं करते हैं. सिक्योरिटी फॉर्सेज या उनकी मदद करने वालों को ही आतंकी निशाना बनाते रहे हैं. लेकिन अक्टूबर महीना शुरू होने के बाद से आतंकी लगातार आम नागरिकों की हत्याएं कर रहे हैं. अल्पसंख्यकों के अलावा जम्मू कश्मीर के बाहर से मज़दूरी करने वालों की हत्याएं हुई. 5 अक्टूबर को श्रीनगर के लाल बाज़ार इलाके में गोलगप्पे बेचने वाले वीरेंद्र पासवान को गोली मारी गई. इसके बाद द लल्लनटॉप की टीम कश्मीर गई थी. कई गोलगप्पे वालों और नॉन लोकल मज़दूरों से भी बात की थी. तब तक लोग ये ही कर रहे थे कि एक घटना हो गई है, लेकिन ऐसा होता नहीं है, इसलिए उनमें कोई ज्यादा डर नहीं था. यानी तब तक बाहर के लोगों को नहीं लग रहा था कि आतंकी उनके लिए खतरा हैं.

कई लोग ऐसे हैं जिनके पास खाने तक के पैसे नहीं हैं. बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं. लेकिन कश्मीर से बाहर निकलकर राहत महसूस कर रहे हैं. (फोटो- PTI)

आम लोगों पर लगातार हमले

लेकिन फिर 16 अक्टूबर को श्रीनगर के ईदगाह इलाके में एक और गोलगप्पे बेचने वाले अरविंद कुमार शाह को गोली मारी गई. अरविंद बिहार के बांका ज़िले का था. इसी दिन दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सगीर अहमद नाम के कारपेंटर को गोली मारी गई. वो यूपी के सहारनपुर से थे. 17 अक्टूबर को यानी कल आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर के ही कुलगाम ज़िले में मज़दूरों पर हमला किया. कुलगाम के वानपोह इलाके में अपने किराए के मकान में बिहार के कुछ मज़दूर खाना पका रहे थे. इसी दौरान करीब सवा 6 बजे अज्ञात बंदूकधारी घर में घुसे और ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. गोली लगने से बिहार के राजा रेशी देव और जोगिंदर रेशी देव की मौके पर ही मौत हो गई. तीसरे आदमी चुन चुन रेशी देव को कंधे पर गोली लगी. उसका अस्पताल में इलाज चल रहा है. कुलगाम में वानपोह के अलावा जम्मू-श्रीनगर हाइवे से लगते लारम, गासिपुरा, गांजीपुरा इन इलाकों में सैकड़ों की संख्या में बाहर के मज़दूर रह रहे थे. इस घटना के बाद मज़दूर यहां से निकल लिए.

क्यों आया TRF आतंकी संगठन का नाम?

कल की घटना के बाद खबर ये भी आई कि आईजी कश्मीर ने सभी नॉन लोकल मज़दूरों को पुलिस या आर्मी के कैंप में रखने के निर्देश दिए हैं. ऑर्डर की तस्वीर भी सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हुई. लेकिन फिर आईजी कश्मीर की तरफ से इस खबर को फेक बताया गया. हालांकि रात में ही खबरें आने लगी कि गांवों में रह रहे मज़दूरों को पुलिस या सीआरपीएफ के कैंप में जमा किया जा रहा है. और उत्तर कश्मीर के सोपोर से इस तरह के वीडियो आए, जिनमें मज़दूरों को सुरक्षित जगह पहुंचाया जा रहा है.

रविवार के हमलों के बाद यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट जम्मू एंड कश्मीर नाम के किसी संगठन की तरफ से पर्चा निकाला गया. जिसमें गैर-स्थानीय मजदूरों को घाटी छोड़ने की चेतावनी दी. हालांकि इस तरह के किसी संगठन का वजूद है भी या नहीं, इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं. इससे पहले जिन आम नागरिकों की हत्याएं हुई थी, उसकी जिम्मेदारी TRF नाम के संगठन ने ली थी. TRF लश्कर का ही बदला हुआ रूप बताया जाता है. अक्टूबर के पहले हफ्ते में हुई किलिंग्स के बाद सिक्योरिटी फॉर्सेज ने बड़े स्तर आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाया था. 9 एनकाउंटर हुए थे, जिनमें 13 आतंकियों को मारने का दावा पुलिस ने किया था. 500 से ज्यादा लोगों को हिरासत में भी लिया गया था. जिसके बाद एक हफ्ते तक कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई.

कश्मीर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. (फोटो- PTI)

शुरुआती घटनाओं के बाद जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने भी कहा था कि आतंकी खत्म होने की कगार पर हैं, इसलिए बौखलाहट में आम नागरिकों को निशाना बना रहे हैं. जब बड़े स्तर पर एनकाउंटर्स और गिरफ्तारियां हुई तो लगा कि शायद आम नागरिकों की हत्याओं का ये सिलसिला रोक पाने में सिक्योरिटी फॉर्सेज़ कामयाब हो रही हैं. लेकिन आतंकियों ने नए सिरे से ये सिलसिला शुरू कर दिया. श्रीनगर के साथ साथ अब दक्षिण कश्मीर में भी आम नागरिकों को आतंकी निशाना बना रहे हैं.

‘कश्मीर पॉलिसी’ पर सवाल

ताजा घटनाओं के बाद मोदी सरकार की कश्मीर पॉलिसी पर सवाल उठने लगे हैं. महबूबा मुफ्ती जैसे कश्मीर के नेता कहने लगे हैं कि सरकार की पॉलिसी फेल हो गई है, अब लोगों से बातचीत करनी चाहिए. कांग्रेस नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने भी अनुच्छेद 370 को लेकर सरकार को घेरा है. चिदंबर ने पूछा है कि 370 का निष्प्रभावी करने से क्या हासिल हुआ. क्या अमन आया? अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी किए जाने के वक्त जम्मू कश्मीर के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक का भी बयान आया. कहा कि मेरे वक्त आतंकी श्रीनगर में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे.

इन आतंकी घटनाओं पर गृह मंत्री अमित शाह या प्रधानमंत्री मोदी का कोई बयान, ट्वीट नहीं आया. जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का ट्वीट आया कि आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा. आज उपराज्यपाल के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स की जानकारी आई. और इत्तेफाक देखिए, आज ही मीडिया में ये जानकारी भी आई कि पिछले तीन महीने में जम्मू कश्मीर में 34 लाख पर्यटक आए. यानी आतंकी घटनाओं से खराब हुई छवि को काउंटर करने की कोशिश सरकार की तरफ से की जा रही है.

आतंकियों का नया पैटर्न

अगर इस अक्टूबर महीने से पहले की बात करें, तो आतंकी घटनाओं में आकंड़ों के हिसाब से कमी दिखती है. 2018 के मुकाबले 2019 और 2020 में आतंकी वारदात कम हुई हैं. कई बड़े आतंकियों को न्यूट्रैलाइज़ करने में भी सुरक्षा बलों को कामयाबी मिली है. इस साल अब तक 132 आतंकी मारे गए हैं. जबकि 254 को गिरफ्तार किया गया है. बड़े हथियारों की सप्लाई रोक पाने में भी सिक्योरिटी फोर्सेज़ कामयाब रही हैं. इस साल सितंबर तक फोर्सेज ने 105 एके-47 राइफल बरामद की हैं. जबकि 126 पिस्टल बरामद की. यानी आतंकियों के पास अब बड़े हथियारों के बजाय पिस्टल हैं, इसलिए हमलों के पैटर्न में भी बदलाव आया है. अब टारगेटेड किलिंग हो रही हैं. जिनमें आम नागरिकों को सॉफ्ट टारगेट बनाया जा रहा है. कश्मीर में 2019 से पहले आतंकी पिस्टल का इतना इस्तेमाल नहीं करते थे. 2019 में पुलिस ने सिर्फ 48 पिस्टल बरामद की थी. और 2018 में सिर्फ 27. जबकि इस साल सितंबर तक पुलिस 126 पिस्टल बरामद की हैं.

जम्मू कश्मीर प्रशासन और सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी कामयाबी ये मानी जा सकती है, कि अब आतंकियों के लिए उस तरह का सपोर्ट नहीं दिखता. जैसे पहले एनकाउंटर के दौरान आतंकियों को बचाने के लिए आम लोग पथराव शुरू कर देते थे, अब वैसी घटनाएं देखने को नहीं मिलती हैं. इसलिए एनकाउंटर्स में सुरक्षाबलों को कामयाबी भी मिल रही है. बावजूद इसके सिक्योरिटी फॉर्सेज नए आतंकियों का रिक्रूटमेंट नहीं रोक पा रहे हैं, आतंकी हमले नहीं रोक पा रहे हैं.

क्या कदम उठाए जा रहे?

अब ताज़ा घटनाक्रम के बाद सिक्योरिटी ग्रिड में भी हलचल दिख रही है. इंडिया टुडे के सूत्रों के मुताबिक सीआरपीएफ और NIA के डीजी कुलदीप सिंह कश्मीर घाटी में हैं. इसके अलावा आईबी, एनआईए और सेना और सीआरपीएफ के बड़े अधिकारी जो अमुमन दिल्ली में रहते हैं, वो घाटी में कैंप कर रहे हैं, इंटेलिजेंस इनपुट को मॉनिटर करने में लगे हैं. गृह अमित शाह भी 23 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के दौर पर जाएंगे. तो सरकार खुले तौर पर ज्यादा कुछ नहीं कह रही है, लेकिन सरकार के माथे पर टेंशन दिख रही है. पूरे कश्मीर में सुरक्षा बढ़ा दी गई है. बाज़ारों, सड़कों पर लोगों की गहन जांच पड़ताल हो रही है, कई इलाकों में इंटरनेट बंद करने की खबर भी आ रही है. अब देखना है कि अगला हमला रोक पाते हैं या नहीं.

जम्मू में जवानों की शहादत

कश्मीर से अब जम्मू की तरफ आते हैं. जम्मू के पूंछ में चल रहा एनकाउंटर आज 8वें दिन में पहुंच गया है. एनकाउंटर में अब तक 9 जवान शहीद हो चुके हैं, जिनमें 2 जेसीओ भी शामिल हैं. किसी एक ऑपरेशन में ये हाल के सालों में सबसे बड़ा नुकसान है. अभी तक आंतकियों का कोई सुराग नहीं लगा. 6-8 आतंकी बताए जा रहे हैं, जो मेंढर इलाके के जंगल में छिपे हैं. जानकारी आ रही है कि करीब ढाई महीने पहले इन आतंकियों ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से भारत में घुसपैठ की थी. तब ये इसी इलाके में हैं. कल तीन स्थानीय नागरिकों को भी हिरासत में लिया गया था. उन पर आतंकियों की मदद करने का शक था. हालांकि आतंकियों को लेकर बड़ी जानकारी अभी नहीं आई है.

मेंढर इलाके के जंगल को सेना ने घेर रखा है. हजारों जवान लगे हैं. पैरा कमांडोज़ को ऑपरेशन में लगाया गया है. हेलिकॉप्टर और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है. सर्च ऑपरेशन के दौरान रविवार को थोड़े समय के लिए आतंकियों के साथ सेना का एनकाउंटर हुआ था, लेकिन आतंकी फिर जंगल में छिप गए. सेना के लिए ये ऑपरेशन बहुत ही चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है. पुंछ इलाके में ही 2003 में भी इसी तरह आतंकी जंगल में घुस गए थे. जिसके बाद ऑपरेशन सर्प विनाश चलाकर कई महीनों बाद सेना ने आतंकियों को मार गिराया था. ऑपरेशन सर्प विनाश की डिटेल में बात किसी और मौके पर. आज के लिए बस इतना ही.

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