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धान खरीद के मुद्दे पर बीजेपी की नाक में दम करने वाले KCR की कहानी

धान खरीद के मुद्दे पर केंद्र और तेलंगाना सरकार की तकरार खत्म नहीं हो रही थी कि इस बीच मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (KCR) ने एक बड़ी घोषणा कर दी. मंगलवार 12 अप्रैल को उन्होंने कहा कि राज्य सरकार खुद एक-एक किसानों का पूरा धान खरीदेगी. KCR ने बताया कि राज्य सरकार इसके लिए हर गांव में धान खरीद केंद्र बनाएगी. उन्होंने एमएसपी के तहत पूरे धान को खरीदने का वादा किया है. सीएम का कहना है कि इससे राज्य के खजाने पर 3,500 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा.

इस मुद्दे पर तेलंगाना और केंद्र के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है. राज्य सरकार केंद्र से मांग कर रही थी कि वो मौजूदा रबी सीजन में राज्य का पूरा धान खरीदे. साथ ही किसानों से उसना (सेला) चावल भी खरीदे. लेकिन केंद्र का कहना है कि एफसीआई के पास सरप्लस स्टॉक होने के कारण वो अतिरिक्त चावल की खरीद नहीं कर सकता. उसने कहा कि इस बारे में तेलंगाना सरकार को काफी पहले बता दिया गया था.

केंद्रीय खाद्य सचिव सुधांशु पांडे ने हाल में कहा था कि केंद्र किसी भी राज्य से धान की खरीद नहीं करता है. सरकार सिर्फ पीडीएस की मांग के अनुसार कच्चे चावल और बहुत कम मात्रा में सेला चावल खरीदती है. एक अप्रैल तक एफसीआई के पास करीब 40 लाख टन उसना चावल का स्टॉक था. खाद्य सचिव का कहना है कि पीडीएस के तहत इस अनाज की ज्यादा मांग नहीं है.

केंद्र ने पिछले साल दिसंबर में लोकसभा में एक आंकड़ा पेश किया था. उसने बताया था कि साल 2020-21 में केंद्रीय पूल के लिए तेलंगाना से खरीफ और रबी सीजन में 94.53 लाख टन चावल की खरीद की गई थी. ये पंजाब के बाद सबसे ज्यादा मात्रा थी.

लेकिन धान खरीद के मुद्दे पर KCR दिल्ली पहुंचे गए. तेलंगाना भवन में पार्टी नेताओं के साथ 11 अप्रैल को प्रदर्शन किया. उन्होंने धान खरीद के मुद्दे पर केंद्र को 24 घंटे की डेडलाइन दे दी. केंद्र से जवाब नहीं मिला. इसके बाद केसीआर ने राज्य के सभी किसानों से धान खरीदने की घोषणा कर दी. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट को सौंपना चाहती है.

2014 में तेलंगाना की सत्ता में आने के बाद टीआरएस का दिल्ली में ये पहला बड़ा विरोध प्रदर्शन था. लेकिन ऐसा नहीं है कि KCR सिर्फ इसी मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेर रहे हैं. पिछले कुछ समय से वे लगातार बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहे हैं. इसके पीछे की वजह KCR  की राष्ट्रीय राजनीति में दिलचस्पी भी है.

क्या है KCR का मकसद?

KCR की केंद्र से अदावत नई नहीं है. वे अब खुद को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं ये भी किसी से छिपा नहीं है. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले वे खुद को एक मजबूत किरदार के रूप में उभारना चाहते हैं. पिछले महीने उन्होंने घोषणा की थी कि वे देश में ‘बदलाव’ के लिए राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ काम कर रहे हैं. इन सबके साथ चर्चा बढ़ी कि क्या KCR एक तीसरा मोर्चा बनाने में सफल होंगे. क्या वे अपनी महत्वाकांक्षा पूरी कर पाएंगे?

क्या है KCR  की कहानी?

KCR. पूरा नाम कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव. 17 फरवरी 1954 को मौजूदा तेलंगाना के मेडक जिले के चिंतमडका में जन्म हुआ. हैदराबाद के ओस्मानिया यूनिवर्सिटी से तेलुगू साहित्य में एमए की डिग्री ली. बहुत जल्दी राजनीति में भी कदम रख दिया. साल 1970 में सिर्फ 16 साल की उम्र में यूथ कांग्रेस से जुड़ गए. आंध्र प्रदेश में 1950 के दशक से ही तेलुगू भाषी लोग अलग राज्य के लिए आंदोलन कर रहे थे. इस मुद्दे ने उन्हें शुरू से आकर्षित किया. तेलंगाना मुद्दे पर कांग्रेस से मोहभंग हुआ. 1983 में पार्टी छोड़ दी. तेलुगू देशम पार्टी (TDP) में शामिल हो गए. KCR टीडीपी के सबसे शुरुआती सदस्यों में एक थे.

Kcr
केसीआर (फाइल फोटो)

1983 में ही सिद्दीपेट से पहला विधानसभा चुनाव लड़ा. लेकिन चुनाव में हार मिली. 1985 में फिर इसी सीट से चुनाव में उतरे. इसके बाद शुरू हुआ जीत का सिलसिला ऐसा चला कि अब तक KCR को विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हार नहीं मिली है. 1985 से 2004 तक वो सिद्दीपेट से विधायक रहे. 1997-99 तक राज्य में मंत्री पद पर भी रहे. लेकिन धीरे-धीरे टीडीपी से भी दूरियां बनने लगीं. तेलंगाना अलग राज्य मुद्दे को लेकर KCR गंभीर थे. 27 अप्रैल 2001 को चंद्रशेखर राव ने आंध्र प्रदेश विधानसभा से डिप्टी स्पीकर और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. उसी वक्त टीडीपी को भी छोड़ दिया और एक नए संगठन तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) की घोषणा कर दी. टीआरएस को गठन करने का एकमात्र उद्देश्य अलग तेलंगाना राज्य की मांग को बताया गया.

तेलंगाना का गठन और KCR

तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का ये आंदोलन आंध्र प्रदेश के गठन के बाद से ही चल रहा था. कई बार केंद्र और राज्य सरकार ने आंदोलन को दबाने की कोशिश की. सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई. साल 2003 में KCR को अलग राज्य के लिए बने फ्रंट का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया. इस वक्त तक वो राज्य में एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे. 2004 में वो तेलंगाना को राज्य बनाने के वादे पर कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ते हैं. करीमनगर से पहली बार लोकसभा के लिए चुने जाते हैं. यूपीए-1 की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बनते हैं. लेकिन गठबंधन की ये दोस्ती ज्यादा दिन तक नहीं चली. KCR ने 2006 में यूनियन कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया. आरोप लगाया कि केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार तेलंगाना के मुद्दे पर गंभीर नहीं थी.

इसके बाद उन्होंने लोकसभा से भी इस्तीफा दे दिया. उसी साल करीमनगर सीट पर उपचुनाव हुए. KCR को दोबारा जीत मिली. तेलंगाना की मांग को लेकर वो और उनकी पार्टी केंद्र पर लगातार दबाव बना रही थी. 2009 के लोकसभा चुनाव में टीआरएस पार्टी टीडीपी से गठबंधन करती है. टीडीपी अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर बिना शर्त समर्थन देने का वादा करती है. आंदोलन धीरे-धीरे और तेज होता है. 29 नवंबर, 2009. केसीआर तेलंगाना के मुद्दे पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करते हैं. इसका प्रभाव राज्य भर में देखा गया. कई जगहों पर हिंसक प्रदर्शन हुए. 11 दिनों तक भूख हड़ताल के कारण KCR की तबीयत बिगड़ गई. इसके बाद 9 दिसंबर 2009 को केंद्र सरकार अलग तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा करती है.

केंद्र की इस घोषणा के बाद भी KCR को 4 साल का और इंतजार करना पड़ा. फरवरी 2014 में संसद से आंध्र प्रदेश पुनर्गठन बिल-2013 पारित हुआ और तेलंगाना राज्य अस्तित्व में आया. इसी साल अप्रैल-मई में पहला विधानसभा चुनाव हुआ और टीआरएस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. 119 विधानसभा सीटों में टीआरएस ने 63 सीटों पर जीत हासिल की. केसीआर नए राज्य तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने. आने वाले सालों में उन पर आरोप लगे कि उन्होंने लोगों से किए वादे पूरे नहीं किए. कार्यकाल पूरा होने से 9 महीने पहले ही राव ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और विधानसभा को भंग करवा दिया.

अंधविश्वासी KCR!

KCR घनघोर धार्मिक व्यक्ति हैं. वे वास्तु और अंक शास्त्र में गहरी आस्था रखते हैं. ‘6’ को अपना लकी नंबर मानते हैं. इसलिए उन्होंने 6 सितंबर 2018 को ही विधानसभा भंग करने की घोषणा की थी. और उसी दिन टीआरएस ने 105 उम्मीदवारों की एक सूची भी जारी कर दी थी. संयोग देखें तो 105 का जोड़ भी 6 ही होता है.

नवंबर 2016 में केसीआर ने आलीशान घर में शिफ्ट हुए थे. नए घर और ऑफिस को वास्तुशास्त्रियों की निगरानी में बनाया गया था. इससे पहले वे इसी घर के पीछे दूसरे मकान में रह रहे थे. कहा जाता है कि KCR के मुताबिक उनका पुराना घर और ऑफिस वास्तु नियमों में फिट नहीं बैठता था. इस आलीशान घर को बुलेटप्रूफ बताया जाता है. करोड़ों रुपये के घर में रहने के लिए उस वक्त विपक्ष ने KCR की काफी आलोचना की थी.

Kcr Telangana (1)
केसीआर (फाइल फोटो- IANS)

विधानसभा भंग होने के बाद दिसंबर 2018 में दोबारा विधानसभा चुनाव हुए. टीआरएस ने 88 सीटों पर जीत दर्ज कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई. KCR भी गजवेल से चुनाव जीत गए. राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में दोबारा उनकी ताजपोशी हुई. कहा जाता है कि इस जीत के लिए उनकी कई कल्याणकारी योजनाएं भी मददगार रहीं. ग्रामीण इलाकों तक बिजली पहुंचाने, किसानों की मदद के लिए रायथू बंधू योजना, लड़कियों की शादी के लिए पैसे जैसी योजनाओं से लोगों ने दोबारा भरोसा जताया था.

केसीआर ने अपने परिवार के लोगों को भी राजनीति में एंट्री दी है. उनके बेटे एनटी रमा राव राज्य सरकार में आईटी और शहरी विकास मंत्री हैं. रमा राव तेलंगाना के सिरसिला सीट से विधायक हैं. KCR की बेटी कविता भी एमएलसी हैं. वो निजामाबाद से लोकसभा सांसद भी रह चुकी हैं. इसके अलावा तेलंगाना सीएम के भतीजे हरीश राव भी राज्य सरकार में मंत्री हैं. इन सबके कारण KCR पर परिवारवाद की राजनीति करने का आरोप लगता है.

बीजेपी के खिलाफ आक्रामक

वापस KCR की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और उनके केंद्र और बीजेपी से चल रही तकरार पर आते हैं. बीजेपी से उनकी ये तकरार पहले ऐसी नहीं थी. नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों पर उन्होंने केंद्र का समर्थन किया था. अगले साल तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं. फिर 2024 में लोकसभा चुनाव. बीजेपी और कांग्रेस KCR पर लगातार हमलावर है. इस साल 5 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तेलंगाना गए थे, लेकिन KCR उनके स्वागत में एयरपोर्ट नहीं पहुंचे थे. उन्होंने इस साल के यूनियन बजट को ‘दलित विरोधी’ बताया था. तीन कृषि कानूनों पर भी उन्होंने केंद्र के खिलाफ स्टैंड लिया.

बीजेपी से KCR की तल्खी बढ़ने की कोई एक वजह नहीं है. बड़ी वजह तेलंगाना में बीजेपी की बढ़त भी मानी जाती है. पिछले साल हुजूराबाद सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को जीत मिली थी. इससे पहले 2020 में ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में भी बीजेपी ने 48 वॉर्ड में जीत हासिल की थी. ये राज्य में बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि थी. क्योंकि इससे पहले बीजेपी के पास सिर्फ 4 वॉर्ड थे. टीआरएस की सीटें 99 से खिसककर 55 हो गई थीं. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी 4 सीटें जीतने में कामयाब रही थी.

क्या सफल होगी राष्ट्रीय रणनीति?

इसके अलावा पिछले कुछ दिनों में तेलंगाना आंदोलन के कई नेता बीजेपी में शामिल हुए हैं. जो खुलकर KCR के खिलाफ बोल रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में तेलंगाना ज्वाइंट एक्शन कमिटी के चेयरमैन रहे सीएच विट्टल बीजेपी में चले गए थे. उनके साथ चंदू श्रीनिवास राव, टी श्रीनिवास राव और सीएच विवेक जैसे नेता भी बीजेपी में शामिल हो गए. सीएच विट्टल ने KCR पर आरोप लगाया था कि तेलंगाना में 2 लाख सरकारी वैकेंसी हैं लेकिन बजट होने के बावजूद कोई भर्ती नहीं हो रही. बीजेपी ने इस दौरान आरोप लगाया कि KCR ने तेलंगाना आंदोलन में अपना सबकुछ गंवाने वाले लोगों को भी किनारे कर दिया.

Kcr Uddhav Thackeray
उद्धव ठाकरे के साथ केसीआर (फोटो- पीटीआई)

KCR की खासियत ये है कि अंग्रेजी और तेलुगू के अलावा वे अच्छी हिंदी भी बोलते हैं. इस साल जब उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति के प्रति अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर की थी तो उन्होंने तेलुगू और अंग्रेजी के अलावा हिंदी में भी बोला था. दक्षिण भारत के दूसरे चर्चित नेताओं की तुलना में इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता मजबूत मानी जाती है. हालांकि केसीआर ने इससे पहले 2019 लोकसभा चुनाव के वक्त भी गैर-बीजेपी, गैर-कांग्रेस फ्रंट बनाने की कोशिश की थी. लेकिन वे सफल नहीं हो पाए थे.

KCR एक बार फिर इसी कोशिश में जुटे हैं. दो महीने पहले आरजेडी प्रमुख लालू यादव ने KCR को बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में नेतृत्व करने की अपील की थी. इसी मुहिम में पिछले दिनों वे उद्धव ठाकरे, शरद पवार, एमके स्टालिन, तेजस्वी यादव और लेफ्ट के नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं. वे अखिलेश यादव और ममता बनर्जी से भी मिलने की कोशिश कर रहे हैं. केसीआर का कहना है कि उनकी कोशिश राष्ट्रीय राजनीति में बने ‘निर्वात’ को भरने की है. प्रशांत किशोर पर भी उन्हें भरोसा है. पिछले महीने उन्होंने यहां तक कह डाला कि 2024 से भारत ‘क्रांति’ के एक नए रास्ते पर होगा.


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