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धर्मांतरण वालों ने अपना धर्म थोपा तो ख़ुद भगवान बन गए बिरसा मुंडा

भारत सरकार के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 नवंबर, 2021 को एक निर्णय लिया. निर्णय ये कि अब से हर साल के एक विशेष दिन को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा. ये दिन वीर आदिवासी स्वितंत्रता सेनानियों की स्मृयति को समर्पित होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां देश के प्रति उनके बलिदानों के बारे में जान सकें. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कहा गया कि-

यह ‘जनजातीय गौरव दिवस’ हर साल मनाया जाएगा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और वीरता, आतिथ्य और राष्ट्रीय गौरव के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए आदिवासियों के प्रयासों को मान्यता देगा. संथाल, तामार, कोल, भील, खासी और मिज़ो जैसे कई जनजातीय समुदायों द्वारा विभिन्न आंदोलनों के जरिए भारत के स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत किया गया था. जनजातीय समुदायों के क्रांतिकारी आंदोलनों और संघर्षों को उनके अपार साहस एवं सर्वोच्च बलिदान की वजह से जाना जाता है. देश के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आदिवासी आंदोलनों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा गया और इसने पूरे देश में भारतीयों को प्रेरित किया.

 #जनजातीय गौरव दिवस’ के लिए 15 नवंबर की तारीख़ क्यूं चुनी गई है?

आज 15 नवंबर है. यानी वो तारीख़ जिसे वर्ष 2021 और आने वाने वर्षों में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा.

सवाल ये कि, क्या ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने के लिए 15 नवंबर रेंडमली चुन ली गई? नहीं! इस दिन एक भगवान का जन्म हुआ. ‘भगवान बिरसा मुंडा’. जिनसे ‘बिरसाहत धर्म’ की शुरुआत हुई. आज तारीख़ में बात उन्हीं की.

बिरसा मुंडा को आदिवासी अपना भगवान् मानते हैं. (फोटो सोर्स - ट्विटर मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स)
बिरसा मुंडा को आदिवासी अपना भगवान् मानते हैं. (फोटो सोर्स – ट्विटर मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेन्स)

बिरसा मुंडा का जन्म हुआ उलीहातू गांव में. जो अब झारखण्ड के खूंटी ज़िले में आता है. जन्म की तारीख़ थी- 15 नवंबर, 1875, यानी उनके पैदा होने तक 1857 की क्रांति कुचली जा चुकी थी. 1857 की वो क्रांति किस ख़ूनी अंदाज़ में कुचली गई थी इसके बारे में हमने तारीख़ के एक एपिसोड में विस्तार से बताया है. क्रांति बेशक कुचली जा चुकी थी, लेकिन दूध के जले अंग्रेज़ अब सतर्क थे. साथ ही अंग्रेजों के कई क़ानून अब भी भारतीयों को खून के आंसू रुला रहे थे. ख़ासतौर पर कृषि से जुड़े कई ऐसे क़ानून थे जिनके चलते किसानों और आदिवासियों की ज़मीन छीनी जा रही थी. ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था ने आदिवासी कृषि व्यवस्था के एक सामंती राज्य में परिवर्तन करना शुरू कर दिया. गैर-आदिवासी किसानों को छोटा नागपुर पठार पर बसने और खेती करने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा. छोटा नागपुर पठार का बिरसा मुंडा की कहानी से क्या संबंध है, इसे ऐसे समझें कि वर्तमान में झारखंड राज्य का ज्यादातर हिस्सा और पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़ का थोड़ा-बहुत भू-भाग छोटा नागपुर पठार के इलाके में आता है. इन सभी बदलावों से आदिवासियों की ज़मीन का या तो बंटवारा हो गया या वो छिन गयीं. साल 1874 आते-आते इस क्षेत्र की मुंडा और बाकी जनजातियों के अधिकारों को लगभग पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया. जैसा नाम से ज़ाहिर है बिरसा मुंडा, मुंडा जनजाति से आते थे. तो, इन सबकी जगह ली ऐसे किसानों ने जो जमींदारों द्वारा यहां पर रखे गए थे. ऐसे में कुछ गांवों में ये जनजातियां पूरी तरह से अपना मालिकाना हक़ खो चुकी थीं और खेतिहर मजदूर बनकर रह गयी थीं.

आदिवासी खेतिहर मजदूर (प्रतीकात्मक फोटो)
आदिवासी खेतिहर मजदूर (प्रतीकात्मक फोटो)

इसके अलावा धर्म परिवर्तन की इंतहां ये थी कि बिरसा तक को पढ़ाई की ख़ातिर अपना धर्म बदलना पड़ा. जर्मन मिशन स्कूल में एडमिशन लेने के लिए उनका नाम बदल कर बिरसा डेविड कर दिया गया, जो बाद में बिरसा दाऊद भी हो गया.

धर्म परिवर्तन के लिए ईसाई मिशनरी पूरे विश्व में कार्यरत रही हैं
धर्म परिवर्तन के लिए ईसाई मिशनरी पूरे विश्व में कार्यरत रही हैं

हालांकि कुछ ही वर्षों बाद स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित होकर उनकी मां ने उनको स्कूल से हटा लिया. परिवार ने जर्मन मिशन की सदस्यता भी छोड़ दी और ईसाई धर्म छोड़कर अपनी पारंपरिक आदिवासी धार्मिक व्यवस्था में वापस आ गए. लेकिन इस पूरे प्रकरण से साफ़ था कि धर्म और दमन को लेकर उपनिवेशवादी संस्कृति कैसे काम करती है. इस बारे में केन्या के लीडर जोमो केन्याटा ने एक बार लिखा था:

‘जब ब्रिटिश अफ्रीका आए, तो उनके हाथ में बाइबल थी और हमारे पास ज़मीन. उन्होंने हमसे कहा, चलो प्रार्थना करते हैं. हमने जब आंखें खोलीं तो हमारे पास बाइबल थी, और उनके पास हमारी ज़मीन.’

केन्या के लीडर जोमो केन्याटा, अफ्रीका में भी बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुआ था
केन्या के लीडर जोमो केन्याटा, अफ्रीका में भी बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हुआ था

# उलगुलान-

मोटा-मोटी ये थे वो कारण, जिन्होंने उलगुलान को जन्म दिया और बिरसा मुंडा को ईश्वर बनाया. दरअसल बिरसा मुंडा ने ही उलगुलान की शुरुआत की. उलगुलान का अर्थ होता है, ‘असीम कोलाहल’- ‘द ग्रेट ट्यूमुल्ट.’ वो विद्रोह जिसमें आदिवासियों ने अपने जल, जंगल और ज़मीन पर अपनी दावेदारी के लिए विद्रोह शुरू किया. आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा ने बिरसा की याद में एक कविता लिखी थी जो उलगुलान को बड़े कलात्मक ढंग से परिभाषित करती है-

मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूं
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता
उलगुलान! उलगुलान!! उलगुलान!!!

#‘अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना.’

1895 में, तमाड़ के चलकड़ गांव में, बिरसा मुंडा ने ईसाई धर्म त्याग दिया. तमाड़ और चलकड़ दोनों अब राँची में आते हैं. बिरसा ने खुद को ईश्वर का ऐसा पैगंबर घोषित किया जो अपने लोगों की खोई हुई सत्ता और सम्मान को वापस लाने वाले थे.
उन्होंने लोगों से कहा कि महारानी विक्टोरिया का शासन समाप्त हो गया है और मुंडा राज शुरू हो गया है. उन्होंने नारा दिया- ‘अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना.’ यानी, रानी का ख़त्म करो और अपना राज स्थापित करो. उन्होंने रैयतों (किरायेदार किसानों) को लगान न देने का आदेश दिया. इस सबके चलते उन्हें 24 अगस्त, 1895 को गिरफ़्तार कर लिया गया और दो साल की कैद की सजा सुना दी गई. 28 जनवरी, 1898 को जेल से रिहा होने के बाद, वो फिर से उन्हीं पुराने सामाजिक कार्यों में जुट गए. इस बार उनके प्लान में ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण को रोकना भी शामिल था. इससे ईसाई मिशनरियों का नाराज़ होना लाज़िमी था. और इसी के चलते बिरसा कुछ समय के लिए भूमिगत हो गए. लेकिन भूमिगत रहते हुए भी क्रांति की मशाल जलाए रखी. 28 जून, 1898 को सामाजिक बराबरी के लिए उन्होंने ‘चुटिया के मंदिर’ का अभियान शुरू किया.
साल 1899 में दिसंबर का महीना था. क्रिसमस के आसपास का वक़्त. लगभग 7,000 लोग उलगुलान की शुरुआत करने के लिए इकट्ठे हुए. ‘अबुआ दिसुन’ यानी स्वराज्य कायम होने की घोषणा कर दी गई थी. खुले तौर पर कहा गया कि असली दुश्मन ब्रिटिशर्स थे न कि ईसाई मुंडा. ये एक कमाल की रणनीति थी. क्यूंकि जैसा अभी तक की स्टोरी से साफ़ है कि धर्मांतरण उस वक्त अपने पीक पर था और कई आदिवासी, ईसाई धर्म अपना चुके थे. और इसलिए ही तो बिरसा को आदिवासी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का भी श्रेय दिया जाता है. उन्होंने चर्च और उसकी प्रथाओं जैसे टैक्स और धर्मांतरण का खुलकर विरोध किया. इस हद तक कि वो एक आदिवासी धर्म के प्रतिनिधि और प्रचारक बन गए. जल्द ही उन्होंने एक चमत्कारी उपदेशक की प्रतिष्ठा बना ली. मुंडा, उरांव और खारिया उन्हें देखने और आशीर्वाद पाने भर के लिए मीलों की यात्रा करके आते थे. वह आदिवासी लोगों के लिए एक संत, एक गुरु, एक ईश्वर बन गए थे. आज भी ढेरों लोकगीतों में बिरसा का अपने लोगों और अपने क्षेत्र पर जबरदस्त प्रभाव साफ़ झलकता है.

बिरसा मुंडा की मूर्ति
बिरसा मुंडा की मूर्ति

#बिरसा मुंडा की दोबारा गिरफ़्तारी और मौत

ख़ैर हम टाइमलाइन के हिसाब से चलें तो अबुआ दिसुन की घोषणा के बाद 5 जनवरी, 1900 को बिरसा के साथियों ने खूंटी के एटकेडीह गांव में दो पुलिस कांस्टेबलों की हत्या कर दी. दो दिन बाद उन्होंने खूंटी पुलिस स्टेशन पर हमला करके एक और कांस्टेबल की हत्या कर दी. इन घटनाओं के बाद बिरसा के सिर पर 500 रुपये का इनाम रख दिया गया था. बढ़ते विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों की 150 सैनिकों की टुकड़ी खूंटी पहुंच गई. स्थानीय आयुक्त, ए फोब्स, और उपायुक्त, एच.सी. स्ट्रेटफील्ड के निर्देश पर इन सैनिकों ने डुम्बारी हिल में शरण लिए इन क्रांतिकारियों पर हमला कर दिया. इसके बाद ब्रिटिश सेना ने डुम्बारी पहाड़ी पर वैसा ही एक काण्ड किया, जैसा जलियांवाला बाग में हुआ था. सैकड़ों लोग मारे गए. मंजर ये था कि पहाड़ी पर लाशें छितरी हुई थीं. इस जनसंहार के बाद लाशों को खाई में फेंक दिया गया. बहुत से लोगों को जिंदा जला दिया गया.

क्रांतिकारी आदिवासियों को मार दिया गया, यह नरसंहार जलियांवाला बाग़ से कम भयावह नहीं था
क्रांतिकारी आदिवासियों को मार दिया गया, यह नरसंहार जलियांवाला बाग़ से कम भयावह नहीं था

हालांकि इस छोटी सी झड़प में क्रांतिकारी हार गए थे लेकिन मुंडा बच निकलने में सफल रहे. और उन्होंने सिंहभूम की पहाड़ियों में शरण ले ली.
लोग कहते हैं कि बिरसा शायद इसके बाद कभी पकड़ में न आते. लेकिन बिरसा के एक क़रीबी के लिए शायद 500 रुपए का लालच, अपने अजीज़ नेता से बढ़कर था. जिसने खबरची का काम किया और उन्हें पकड़वा दिया. 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर के पास उनकी गिरफ्तारी हुई. उनकी गिरफ्तारी का किस्सा महाश्वेता देवी ने अपनी किताब अरण्येर अधिकार (जंगल के दावेदार) में बताया है:

‘बिरसा के हाथों में हथकड़ियां थीं; दोनों ओर दो सिपाही थे. बिरसा के सिर पर पगड़ी थी, धोती पहने था. बदन पर और कुछ नहीं था—इसी से हवा और धूप एक साथ चमड़ी को छेद कर रहे थे. राह के दोनों ओर लोग खड़े थे. सभी मुंडा थे. औरतें छाती पीट रही थीं, आकाश की ओर हाथ उड़ा रही थीं. आदमी कह रहे थे: जिन्होनें तुम्हें पकड़वाया है वे माघ महीना भी पूरा होते न देख पायेंगे. वे अगर जाल फैलाये रहते हैं तो उस जाल में पकड़े शिकार को उन्हें घर नहीं ले जाने दिया जायेगा.’

किंतु बिरसा उन पर खफ़ा नहीं हुए, ‘पकड़वा दिया; क्यों न पकड़वा देते ? डिप्टी –कमिश्नर ने उन्हें गिनकर पांच सौ रुपये नहीं दिये क्या ! पांच सौ रुपये बहुत होते हैं ! किसी भी मुंडा के पास तो पांच सौ रुपये कभी नहीं हुए; नहीं होते. मुंडा अगर रात में सोते-सोते सपना भी देखता है, तो सपने में बहुत होता है तो वह महारानी मार्का दस रुपये देख पाता है. उन्हें पांच सौ रुपये मिले हैं- क्यों न बिरसा को पकड़वा देते?’

उलगुलान की आग में जंगल नहीं जलता; आदमी का रक्त और हृदय जलता है ! उस आग में जंगल नहीं जलता ! मुंडा लोगों के लिए जंगल नये सिरे से मां की तरह बन जाता है-बिरसा की मां की तरह; जंगल की संतानों को गोदी में लेकर बैठता है.

बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया
बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया और जेल भेज दिया गया

धरती आबा, यानी धरती के पिता के नाम से फ़ेमस बिरसा के पिता का नाम कर्मी हाटू मुंडा और मां का नाम सुगना मुंडा था. उनका प्रारंभिक जीवन एक पारंपरिक मुंडा बालक से बहुत अलग न था. लोककथाएं बताती हैं कि वो अपने दोस्तों के साथ रेत और धूल में लोटपोट और मस्ती करता था. बड़े होने पर वो काफ़ी मजबूत और सुंदर दिखने लगा था. वो जंगलों में भेड़ चराता था.’

महाश्वेता देवी का लिखा किस्सा जो अभी आपने सुना, इसके अलावा भेड़ों को चराने वाली बात और अपने ही अनुयायी द्वारा धोखे से पकड़वा दिए जाने की बात. ये बातें सुनकर क्या आपको किसी और ईश्वर की याद आती है? साफ़ है कि एक ईश्वर कभी दूसरे ईश्वर का, एक धर्म कभी दूसरे धर्म का विरोध नहीं करता. कर ही नहीं सकता. जितने विरोध हैं, जितनी दिक़्क़तें हैं वो धर्म के अनुयायियों से हैं, उनके ठेकेदारों से हैं, प्रवर्तकों से नहीं.

अंत में बताते हैं कि चक्रधरपुर के पास हुई उनकी गिरफ़्तारी के बाद बिरसा के साथ क्या हुआ. दरअसल, ज़्यादा कुछ नहीं. गिरफ़्तारी के चार महीनों के भीतर, 9 जून, 1900 को बिरसा की जेल में मृत्यु हो गई. सुबह खून की उल्टी हुई, और उसके बाद मौत. कई लोग कहते हैं कि अंग्रेज सरकार ने ही उन्हें मीठा ज़हर दे दिया. लेकिन ऑफ़िशियल वर्ज़न ये था कि, ‘उनकी मौत हैजे से हुई.’

पश्चिमी देशों में क्लब 27 बहुत फ़ेमस है. मृत लोगों का क्लब है ये. इसमें ऐसे कलाकार, पॉप आर्टिस्ट और एक्टर शुमार हैं, जो 27 वर्ष की छोटी सी उम्र में ही मारे गए गए, लेकिन अपनी मौत से पहले हद फ़ेमस हो गए. पर सोचिए ज़रा, फ़ेमस होना एक बात है और ईश्वर हो जाना दूसरी बात. वो भी उस उम्र में, जब मुझ जैसे आम लोग इंटर्नशिप ख़त्म करके अपना करियर शुरू ही कर रहे होते हैं.

और इसलिए ही इस क्रांतिकारी, समाजसेवी और भगवान् को वर्ष का एक दिन समर्पित किए जाने से हर भारतवासी गौरवान्वित महसूस करता है. आप सबको भी ‘जनजातीय गौरव दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएं. ताकि सनद रहे, ताकि ‘ज़रा याद करो क़ुर्बानी’ जैसे गीत या ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे’ जैसे शे’र हर बार हमारी आंखें नम कर जाएं, ताकि हममें से कोई भी, कभी भी, आज़ादी को ‘टेकन फ़ॉर ग्रांटेड’ न ले.


इस स्टोरी को लिखने में प्रेरणा के एक आर्टिकल की मदद ली गई है.

पढ़ें: उलगुलान: विद्रोह की वो ताकतवर आवाज़ जिसे दबाने में अंग्रेजों के पसीने छूट गए


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