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गांधी राष्ट्रगान के दौरान क्यों खड़े नहीं हुए?

18 मई 1974 को भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया. पोखरण-1. इस ऑपरेशन का नाम था स्माइलिंग बुद्ध, यानी मुस्कुराते हुए बुद्ध. इसका पहला कारण तो ये कि उस दिन बुद्ध पूर्णिमा की रात थी. दूसरा इसी नाम से जुड़ा एक और मज़ेदार किस्सा. 18 मई को जब ये टेस्ट हुआ तो भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर BARC के डायरेक्टर, राज रमन्ना ने प्रधानमंत्री इंदिरा को एक मैसेज भेजा, ‘The Buddha has finally smiled’. यानी, ‘बुद्ध आख़िरकार मुस्कुरा दिए हैं.’ और इंदिरा समझ गईं.

जेन उंगली

भारतीय बौद्ध परम्परा से वाक़िफ़ कोई भी व्यक्ति ये समझ सकता है कि बुद्ध के मुस्कुराने के क्या मायने हैं. दरअसल जब बुद्ध के पास कोई भी ऐसे सवाल लेकर आते, जिनके उत्तर शब्दों में नहीं समझाए जा सकते. तो बुद्ध मुस्कुरा दिया करते थे. और ये ही आगे जाकर बुद्ध खासकर जैन-बौद्ध परम्परा बन गई. बुद्ध की ही परम्परा में नवीं सदी में एक जैन गुरु हुए. गुटी नाम के. जब भी उनका कोई शिष्य उनसे कोई सवाल पूछता. तो जवाब में गुटी अपनी एक उंगली उठा दिया करते. सवाल, जैसे ईश्वर क्या है, मरने के बाद क्या होता है, आदि. वैसे ही जैसे बुद्ध मुस्कुरा दिया करते थे.

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जेन गुरु गुटी और उनका शिष्य (तस्वीर: bluemountainzendo.org)

गुटी का एक शिष्य उनकी देखा-देखी में उनकी नक़ल करने लगा. जब भी कोई पूछता, तुम्हारे गुरु ने क्या सिखाया, तो वो एक उंगली उठा दिया करता. गुटी को इसकी खबर लगी तो उन्होंने उस लड़के को बुलावा भेजा. गुटी ने उसकी परीक्षा के लिए एक सवाल पूछा. तो लड़के ने हमेशा की तरह एक उंगली उठा दी. तभी गुटी ने अपनी जेब से एक छुरी निकाली और उसकी उंगली काट डाली. लड़का चिल्लाते हुए बाहर की ओर भागा. गुटी ज़ोर से चिल्लाए, रुको, सवाल का जवाब तो देते जाओ.

लड़का गेट तक पहुंचकर वापस मुड़ा. जवाब देने के लिए आदतन फिर उसने अपनी उंगली उठाने के लिए हाथ उठाया. लेकिन उंगली वहां थी ही नहीं. वो तो कट चुकी थी. उंगली यानी प्रतीक. जिसे रास्ते से हटा कर गुटी समझाना चाह रहे थे कि प्रतीक पर मत अटको. उंगली जिस तरफ़ इशारा कर रही है वहां देखो. zen परम्परा में कहते हैं कटी हुई उंगली उठाते ही उस शिष्य को ज्ञान प्राप्त हुआ और वो गुटी की बात का मतलब समझ पाया. इस कहानी से शुरुआत इसलिए की, क्योंकि जिस टॉपिक पर हम चर्चा करने जा रहे हैं. वो भी एक प्रतीक ही है.

राष्ट्रगान जॉर्ज पंचम के लिए लिखा गया?

1908 में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस कविता का पहला ड्राफ़्ट लिखा था. बांग्ला भाषा में. पहली बार ये एक कविता के रूप में ‘तत्वबोधिनी’ पत्रिका में छपी. भारत भाग्य विधाता, इस नाम से. तब इसमें पांच पद हुआ करते थे. अभी भी हैं लेकिन सिर्फ़ पहले स्टैंज़ा को राष्ट्र्गान के रूप में गाया जाता है.

पहली बार इसका गायन एक स्कूल में हुआ था. और इसके बाद आज ही के दिन यानी 27 दिसम्बर 1911 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में इसे पहली बार आधिकारिक रूप से गाया गया. राष्ट्रगान के तौर पर नहीं. बल्कि ईश्वर की स्तुति के तौर पर. हुआ ये कि राजा बनने के बाद जॉर्ज पंचम पहली बार भारत पधार रहे थे. उन्होंने बंगाल के बंटवारे को ख़त्म करने और अलग उड़ीसा राज्य बनाने का प्रस्ताव स्वीकार किया था. इसलिए कांग्रेस के अधिवेशन में उनके स्वागत और धन्यवाद प्रस्ताव का कार्यक्रम रखा गया था.

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जॉर्ज पंचम (तस्वीर: getty)

कार्यक्रम की शुरुआत हुई टैगोर की इसी कविता से. भारत भाग्य विधाता. चूंकि हिंदुस्तानी रिवाज है कि कार्यक्रम की शुरुआत में दीपक जलाकर ईश्वर की स्तुति गाई जाती है. इसीलिए भारत भाग्य विधाता नाम की इस कविता को वहां गाया गया. इसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ और जॉर्ज पंचम के सम्मान में एक हिंदी कविता भी पढ़ी गई. कविता का नाम था ‘बादशाह हमारा’. इसे लिखने वाले थे रामभुज चौधरी.

अगले दिन ब्रिटिश और कुछ लोकल अख़बारों में छपा कि ब्रिटेन के राजा की शान में रबींद्रनाथ टैगोर ने एक कविता लिखी. टैगोर जाने-माने कवि और साहित्यकार थे. कहा गया ‘भारत भाग्य विधाता’ से गुरुदेव का आशय जॉर्ज पंचम से ही था. यानी उन्हें भारत का भाग्य विधाता माना गया. तब से ये फ़ेक न्यूज़ तैयार हो गई कि भारत का राष्ट्रगान जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया और गाया गया.

टैगोर की सफ़ाई

1937 में टैगोर ने इस बात को क्लियर करते हुए कहा था:

“एक ब्रिटिश ऑफिसर मेरा दोस्त था. उसने मुझसे कहा कि ब्रिटिश सम्राट का गुण-गान करते हुए एक कविता लिख मारो. इस बात पर मुझे बहुत गुस्सा आया. इसीलिए मैंने ‘जन गण मन’ में ‘भारत भाग्य विधाता’ के बारे में लिखा था कि ये देश आदि काल से अपना भाग्य खुद लिख रहा है. वो भाग्य विधाता जॉर्ज पंचम तो कतई नहीं हो सकते. और वो ब्रिटिश अफसर मेरी बात समझ भी गया था.”

पर कुछ लोग इस मामले को बराबर उठाते रहे. चिढ़कर 1939 में टैगोर ने फिर कहा:

‘जॉर्ज चौथा हो या पांचवां, मैं उसके बारे में क्यों लिखूंगा? इस बात का जवाब देना भी मेरा अपमान है.’

‘भारत भाग्य विधाता’ बांग्ला में लिखी कविता थी. इसका हिंदी में अनुवाद किया एक आर्मी ऑफ़िसर, कैप्टन आबिद हसन सरफरानी ने. और कविता को हिंदी में नाम दिया ‘सब सुख चैन.’

राष्ट्रगान की धुन कैसे बनी

1919 में गुरुदेव को एक कॉलेज समारोह में आने का आमंत्रण दिया गया. नाम था, बेसंट थियोसोफिकल कॉलेज. ये आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले के मदनपल्ली शहर में पड़ता है. तब गुरुदेव का क़द भी बहुत बड़ा था और उनकी कविता ‘भारत भाग्य विधाता’ भी बहुत फ़ेमस थी. लेकिन थी बांग्ला में. इसलिए छात्रों को समझने में दिक़्क़त होती थी.

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गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और रामभुज चौधरी (तस्वीर: Getty)

छात्रों की गुज़ारिश पर गुरुदेव ने वहीं खड़े-खड़े इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद कर नाम दिया था, द मॉर्निंग song ऑफ़ इंडिया. तब इसे किसी निश्चित धुन में नहीं गाया जाता था. कॉलेज के प्रिंसिपल की पत्नी मार्ग्रेट कज़िन्स को कविता इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने गुरुदेव से इच्छा ज़ाहिर की कि वो इसकी धुन तैयार करना चाहती हैं.

उन्होंने एक-एक लाइन के मतलब को समझते हुए इसे म्यूज़िकल नोट्स तैयार किए. और टेगोर को गाकर सुनाया. टेगोर ने उसी पल इस पर सहमति जता दी. लेकिन UNESCO ने इसके 100 साल बाद , फ़ेसबुक और व्हाटसऐप आने के बाद इसकी महानता को माना. व्हाटसऐप पे आया था तो सच ही होगा.

प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रगान

अब थोड़ा ऐतिहासिक दृष्टि से राष्ट्रगान के महत्व पर थोड़ी नज़र डालते हैं. एक धड़ा है जो कहता है. राष्ट्रगान है. इस पर खड़े ना हुए तो जेल में डाल देना चाहिए. इस धड़े के हिसाब से यह बात सिर्फ़ राष्ट्रगान तक सीमित नहीं है. इसके विचार में नेहरू और पटेल आपस में दुश्मन हैं. और नेहरू और नेताजी बोस की आपसी दुश्मनी तो और भी तगड़ी है. एक दूसरा धड़ा भी है, जो कहता है, ये तो सिर्फ़ सिम्बल है. इसमें बड़ी बात क्या है? इसी तरह तिरंगा फेंका हुआ तो फेंका रहे. क्या फ़र्क़ पड़ता है.

पहला किस्सा दूसरे धड़े के लिए.

26 जनवरी को गणतंत्र की स्थापना होनी थी. संविधान लागू होना था. और उसी के तहत हमारा नेशनल एंथम भी घोषित हुआ था. राष्ट्रीय चिन्हों, चाहे वो राष्ट्रगान हो या राष्ट्रध्वज. नेहरू इन चीजों में बहुत सावधानी बरतते थे. आधिकारिक ऐलान के दो दिन पहले यानी 24 दिसम्बर के रोज़ प्रधानमंत्री नेहरू एक संगीतकार से मिले. इनका नाम था हर्बर्ट म्यूरिल. अपने जमाने के माहिर और प्रसिद्ध संगीतकार. नेहरू ने हर्बर्ट को राष्ट्रगान सुनाया और धुन पर उनकी राय मांगी.

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सुभाष चंद्र बोस जर्मनी में (तस्वीर: getty)

म्यूरिल ने राय दी कि ये थोड़ा स्लो था. तब हर्बर्ट ने नेहरू की इजाज़त पर फ़्रेंच नेशनल गीत ‘ला मरसेलीज़’ की तर्ज़ पर इसका टेम्पो थोड़ा तेज कर दिया. नेहरू जो कट्टर राष्ट्रवाद के सबसे बड़े निंदक थे. राष्ट्रीय चिन्हों के बारे में कितना ख़्याल करते थे. वो इस घटना से पता चलता है.

1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने यूरोप में फ़्री इंडिया सेंटर का उद्घाटन किया. तब उन्होंने कांग्रेस के तिरंगे झंडे को राष्ट्रीय ध्वज और जन मन गण को भारत का राष्ट्रगान घोषित किया. ऊंचे व्यक्ति थे. इतनी छोटी सोच नहीं थी कि जिस कांग्रेस से मतभेद है उसका झंडा राष्ट्रीय झंडा कैसे बन सकता है. यही बोस जब INA का गठन करते हैं तो उसकी एक विंग का नाम गांधी और ब्रिगेड और एक का नेहरू ब्रिगेड रखते हैं. और वही कांग्रेस जब 1950 में संविधान सभा का काम पूरा होता है तो सर्वसम्मति से नेताजी का मान रखते हुए जन गण मन को राष्ट्रगान का दर्जा देती है.

गांधी कलकत्ता में

13 अगस्त की तारीख़ के आर्टिकिल में हमने आजादी के कुछ दिन पहले का एक किस्सा आपको बताया था. आजादी से कुछ रोज़ पहले गांधी कोलकाता पहुंचे थे ताकि वहां हो रहे हिंदू- मुस्लिम दंगों को रोक सकें. इसी सिलसिले में 29 अगस्त को महात्मा गांधी ने एक मीटिंग रखी. हुसैन सुहरावर्दी, बंगाल के पूर्व प्रधानमंत्री और 1946 कोलकाता दंगो के मास्टरमाइंड भी इस मीटिंग में शामिल हुए. हिंदू मुस्लिम नेता सब मौजूद थे. चर्चा हुई.

यहां पढ़ें- आज़ादी के जश्न में महात्मा गांधी क्यों मौजूद नहीं थे?

गांधी आमरण अनशन पर तुले थे. कहते थे, या तो शांति आएगी वरना मेरी मृत्यु. दोनों में से एक ही होगा. मीटिंग ख़त्म हुई तो जैसा कि रिवाज था, अंत में बजा राष्ट्रगान. सुहरावर्दी समेत सब लोग खड़े हुए. सारे हिंदू और मुसलमान भी. गांधी फिर गांधी थे. राष्ट्र्गान बजता रहा. वो अपनी ट्रेडमार्क मुद्रा में बैठे रहे. उस दौरान तो किसी की हिम्मत नहीं हुई कि गांधी से कुछ कहें. राष्ट्र्गान ख़त्म हुआ तो लोगों ने पूछा, ‘बापू आप खड़े नहीं हुए राष्ट्र्गान के दौरान’. तो गांधी ने जवाब दिया,‘हमारे यहां इज्जत देने के लिए खड़े होने का रिवाज नहीं है. ये यूरोप से आयातित तरीक़े हैं.’

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कोलकाता में महात्मा गांधी और हुसैन सुहरावर्दी (तस्वीर: Wikimedia commons)

इसका मतलब ये नहीं कि गांधी राष्ट्र्गान को इज्जत नहीं देते थे. किंतु वो ये भी समझते थे कि राष्ट्र्गान सिम्बल है देश का. जो लोगों से बनता है. और सिम्बल को पकड़े रहने का मतलब नहीं है अगर जिस तरफ़ सिम्बल इशारा करता है, उसके प्रति हमारी निष्ठा ना हो. यानी लोगों के प्रति. भारतवासियों के प्रति. ख़ैर गांधी का राष्ट्रवाद अलग था. वो देशवासियों को देश मानते थे. इसीलिए उनके अनशन के चलते 4 सितम्बर के रोज़ दंगों के सरग़ना खुद गांधी के पास आए और उनके पैरों में हथियार रखकर क़सम खाई कि अब दंगे नहीं होंगे. दंगे रुके और फिर गांधी दिल्ली चले गए.

झरने का रास्ता: एक जैन कथा

अंत में इस पूरी बात पर रिब्बन बांधने के लिए एक छोटा सी जैन कथा और. मान लीजिए आप छुट्टियां मनाने किसी हिल स्टेशन पर जाते हैं. वहां आपको पता चलता है कि पहाड़ पर एक सुंदर झरना है. झरने की तरफ़ जाते हुए कुछ दूर पहुँचकर आप देखते हैं कि एक बोर्ड लगा है. जिसमें झरने के रास्ते को दिखाने के लिए एक तीर बना हुआ है. यानी साइन बोर्ड. हरे रंग का, जैसा आमतौर पर दिखता है.

अब आप देखते हैं कि एक व्यक्ति जाकर उस बोर्ड से चिपटा हुआ है. आप पूछते है. भाई क्या कर रहे हो? तो बोर्ड से चिपका व्यक्ति जवाब देता है, ये ही तो है उस महान झरने का सिम्बल. मिल गया मुझे. ये मेरे लिए बहुत आदरणीय है. और मुझे इसी की खोज थी. निश्चित ही आप उसे पागल मानेंगे और झरने वाला रास्ता पकड़ लेंगे.

यही उनकी हालत भी है जो राष्ट्रीय निशान को सब कुछ मानकर उनसे चिपट जाते हैं. और उसी को देश की आन-बान-शान समझ लेते हैं. जबकि वो राष्ट्रीय निशान, चाहे झंडा या राष्ट्रगान, बाद में आता है. पहले आता है देश, जो ज़मीन का नाम नहीं. लोगों का समूह है. निशान इसलिए आदरणीय नहीं है कि वो अपने आप में कुछ है. इसलिए आदरणीय है क्योंकि वो इस देश का प्रतीक है. इस देश के लोगों की आज़ादी और अधिकारों का प्रतीक है.


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