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दिल्ली के उपहार कांड का असली दोषी कौन?

क्राइम एंड पनिशमेंट में फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की लिखते हैं,

 “अगर उसके पास अंतरात्मा है तो वह अपनी ग़लतियों के लिए कष्ट भुगतेगा. यही उसकी सजा होगी और साथ ही जेल भी”

उपन्यास के मुख्य किरदार का नाम है, रसकोल्निकोव. जो ग़रीबी से उबरने के लिए लूट के मकसद से एक बूढ़ी औरत की हत्या कर देता है. बूढ़ी औरत एक क्रूर और बेईमान साहूकार होती है. उसे लगता है, ऐसे व्यक्ति की हत्या कर वो समाज का भला ही करेगा.

रसकोल्निकोव पर हत्या का भी कोई इल्ज़ाम नहीं आता. पुलिस और समाज के लिए वो निर्दोष और इज़्ज़तदार व्यक्ति है. लेकिन इस क़त्ल के कारण उसकी अंतरात्मा उसे कचोटने लगती है. कहानी जो सवाल पूछना चाहती है, वो ये है.

न्याय अगर इंसान का बनाया कॉन्सेप्ट है तो क्या क़ानून की नज़रों में निर्दोष हो जाने से व्यक्ति दोषमुक्त हो जाता है? 

1997 के साल में एक ऐसा ही सवाल उठा, जब दिल्ली के एक थिएटर में आग लगी. 59 लोग मारे गए. मामला कोर्ट पहुंचा तो अभियुक्त एक दूसरे पर ज़िम्मेदारी थोपने लगे. पूरे 20 साल लग गए मामले के निपटारे में. और सवाल आज भी ज्यों का त्यों बना हुआ है कि दोष तो साबित हो गया लेकिन जो सजा दी गई, वो जुर्म के मुताबिक़ थी या नहीं?

मथुरा दास! भाग जा यहां से

वो मल्टीप्लेक्स का दौर नहीं था. सिंगल पर्दे पर फ़िल्म लगती थी. टिकट मिला तो क़िस्मत वरना ब्लैक का जुगाड़ करो या अगले दिन आओ. आज की तरह बॉलीवुड के सितारे गर्दिश में नहीं थे. उस साल शाहरुख़ की 3 फ़िल्में रिलीज़ हुईं.

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उपहार सिनेमा हॉल में तैनात पुलिसकर्मी (तस्वीर: Getty)

तीनों ने बॉक्स ऑफ़िस पर खूब पैसे कूटे. इनमें से एक ‘दिल तो पागल है’ थी,  लेकिन असल में पब्लिक पागल हुई जून 1997 में. JP दत्ता ने बॉर्डर का पोस्टर रिलीज़ किया और पब्लिक में कोहराम मच गया. फ़िल्म का शायद ही कोई शो रहा हो, जो हाउस फ़ुल ना गया हो. 13 जून 1997 के दिन शाम को फ़िल्म का पहला शो रखा गया था. दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार थिएटर में फ़िल्म शुरू हुई. इंटर्वल से कुछ पहले मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने मथुरा दास का कॉलर पकड़ा और चिल्लाकर कहा,

‘मथुरा दास इससे पहले कि मैं तुझे ग़द्दार करार देकर गोली मार दूं, भाग जा यहां से.’

मथुरा दास चला गया. कुछ लोगों को उस पर तरस आया तो कइयों को ग़ुस्सा. फ़िल्म के दूसरे हाफ़ में मथुरा दास लौटा. दूसरे थिएटरों में तब मथुरा दास के लिए खूब तालियां बजीं लेकिन उपहार थिएटर में सन्नाटा पसरा था. थिएटर का हाल ऐसा था कि मानो जंग के मैदान का धुआं पर्दे से निकलकर थिएटर में भर गया हो. ख़ुशक़िस्मत बाहर भाग चुके थे. जो नहीं भाग पाए, दम घुटने से तड़प-तड़पकर मारे गए.

ये सब कैसे हुआ, इसके लिए क्रोनोलॉजी समझिए,

सरकारी काम का क्लीशे

उपहार थिएटर के बेसमेंट में दो ट्रांसफ़ॉर्मर लगे हुए थे. 13 जून की सुबह 7 बजे शॉर्ट सर्किट हुआ और एक ट्रांसफ़ॉर्मर में आग लग गई. तुरंत दिल्ली विद्युत बोर्ड (DVB) और फायर ब्रिगेड को सूचित किया गया. सरकारी काम का क्लीशे उजागर करने में कोई ख़ुशी नहीं होती, लेकिन अब जो हुआ, सो बता रहे.

DVB के निरीक्षकों की देखरेख में ट्रांसफ़ॉर्मर की मरम्मत की गई. ट्रांसफ़ॉर्मर की केबल को ठीक तरीक़े से जोड़ने के लिए क्रिम्पिंग मशीन की ज़रूरत होती है. वो लाने की ज़हमत कौन उठाता. जुगाड़ से देश चल सकता है तो एक ट्रांसफ़ॉर्मर की क्या बिसात. सिर्फ़ एक डाई और हथौड़े से सारी मरम्मत कर दी गई.

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उपहार सिनेमा के ग्राउंड फ़्लोर में स्थित कार पार्किंग (तस्वीर: Getty)

‘सब चंगा सी’ कहते हुए DVB के लोग वहां से रफ़ूचक्कर हो लिए. शाम होने तक जुगाड़ ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. एक केबल ढीली होकर रेडिएटर से जा लगी. रेडिएटर में छेद हुआ और उससे तेल रिस कर नीचे बहने लगा. ट्रांसफ़ॉर्मर का डिज़ाइन बनाने वाले ने इसका भी ख़याल रखा था. रेग्युलेशन के हिसाब से तेल सोखने के लिए एक पैड बनाया हुआ होना चाहिए था. लेकिन जब भगवान ने इंसान को बिना स्टेपनी के भेज दिया तो एक ट्रांसफ़ॉर्मर के लिए इतना झंझट कौन उठाता. बिजली दे दी ये क्या कम है कि अब ट्रांसफ़ॉर्मर के लिए सौ और तामझाम करते माईबाप.

सिनेमा हॉल के अंदर

तेल रिसा तो केमिस्ट्री हरकत में आई. ट्रांसफ़ॉर्मर के तापमान ने पारे को तोड़ा और भभक कर आग लग गई. ये सब हो रहा था जब पब्लिक अंदर हॉल में पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक लेकर बैठी ही थी. ट्रांसफ़ॉर्मर की तह से शुरू हुई आग जा पहुंची बग़ल के पार्किंग एरिया में. डीज़ल से पेट्रोल मिला और आग ने लपटों का रूप ले लिया.

अब बारी थी फ़िज़िक्स की. हवा के साथ धुआं पहुंचा पहली मंज़िल पर. यहीं पर सिनेमा हॉल की ओर जाने वाली सीढ़ी थी. संकरे रास्ते से होकर धुआं सिनेमा हॉल तक पहुंचा और दरवाज़े, एयर कंडीशनिंग वेंट्स के थ्रू सिनेमा हॉल के अंदर घुस गया.

रेग्युलेशन के हिसाब से सिनेमा हॉल में एग्ज़िट डोर बना हुआ था. लेकिन पैसे कमाने के चक्कर में दरवाज़े के आगे 30-40 सीटें एक्स्ट्रा लगा दी गई थीं. ऊपर बालकनी के हालात और भी ख़राब थे. जहां एग्जॉस्ट फ़ैन होने थे, उस जगह को कार्डबोर्ड लगाकर बंद कर दिया गया था. जिन्हें सिनेमा हॉल में सुरक्षा की ड्यूटी मिली थी, वो अपनी जान बचाने के लिए भाग चुके थे. बिजली के तारों से आग और ना फैले, इस डर से सिनेमा हॉल की बिजली भी काट दी गई.

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लोगों को बाहर निकालते बचावकर्मी (तस्वीर: Getty)

ऐसी सिचुएशन के लिए भी रेग्युलेशन बनाए गए हैं. सिनेमा हॉल के अंदर neon साइन लगे होते हैं. जिन्हें बैटरी से चलाया जाना चाहिए. लेकिन उनको भी बिजली से जोड़ा गया था. बिजली कटी तो सिनेमा हॉल में घुप्प अंधेरा हो गया और लोगों में भगदड़ मच गई.

अंदर बैठे लोगों को धुएं के अलावा आग की कोई खबर नहीं थी. ना ही कोई फ़ायर अलार्म बजा, ना ही कोई अनाउन्समेंट हुआ. उपहार सिनेमा के प्रबंधन और कर्मचारियों को इस बात की जानकारी थी कि आग लग गई है. लेकिन सब नदारद थे. यहां तक की प्रोजेक्टर ऑपरेटर को भी आग लगने की जानकारी नहीं थी. लोग घुट-घुट के मरते रहे और पर्दे पर फ़िल्म चलती रही.

इस घटना में 59 लोगों की मृत्यु हुई और 100 से ज़्यादा लोग घायल हुए.

तहक़ीक़ात.

इसके बाद शुरू हुआ तहक़ीक़ात और कोर्ट केसों का दौर.

घटना की जांच के लिए एक कमिटी बनाई गई. जिसने 3 जुलाई 1997 को अपनी रिपोर्ट पेश की. रिपोर्ट में सिनेमा हॉल अथॉरिटी, दिल्ली विद्युत बोर्ड, अग्निशमन सेवा, दिल्ली पुलिस की लाइसेंसिंग शाखा और नगर निगम को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया गया.

सेशंस कोर्ट ने उपहार सिनेमा के मालिक सुशील अंसल, उनके भाई गोपाल, दिल्ली विद्युत बोर्ड के एक निरीक्षक और अग्निशमन सेवा के दो अधिकारियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया. कई दिनों तक गिरफ्तारी से बचने के बाद, 27 जुलाई को दोनों अंसल बंधुओं को गिरफ़्तार कर लिया गया. 20 नवंबर 2007 को इस मामले पर निचली अदालत ने फ़ैसला सुनाया. अंसल बंधुओं को 2-2 साल की सजा सुनाई गई. इसके अलावा उपहार सिनेमा के 3 मैनेजर और 3 DVB अधिकारियों को 7 साल की सजा सुनाई गई. इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा. जहां सजा को घटाकर एक साल कर दिया गया.

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आग बुझाते दमकल कर्मी (तस्वीर: Getty)

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फ़ैसला सुनाते हुए दोनों अंसल भाइयों पर 30 करोड़ का जुर्माना लगाया. दोनों की उम्र को देखते हुए ये रियायत दी गई कि अगर दोनों भाई जुर्माना चुका दें तो सजा को अब तक काटी गई सजा के बराबर मान लिया जाएगा. यानी जितने दिन दोनों भाई जेल में रह चुके, वही उनकी सजा होगी और वो रिहा हो जाएंगे.

पीड़ित परिवारों ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ दुबारा अपील दायर की. इस मामले में अंतिम आदेश आया 2017 में. कोर्ट ने अपने फ़ैसले को रिवाइज करते हुए छोटे भाई गोपाल अंसल को 1 साल जेल की सजा सुनाई. बड़े भाई सुशील अंसल को वृद्धावस्था के कारण रिहाई दे दी गई.

सिविल कंपन्सेशन केस

ये तो थी क्रिमिनल केस की बात. लेकिन इस मामले से जुड़ा एक सिविल केस भी दायर किया गया था. ऐसी दुर्घटनाओं के बाद आपने सुना होगा कि नेताजी ने या सरकार ने मुआवज़े की घोषणा की. जो कभी मिलता है तो कभी नहीं.

ये सिविल केस इस मामले में अनूठा था कि इसके तहत मुआवज़े की रक़म दोषियों से वसूल की जानी थी. घटना के बाद पीड़ित परिवारों ने मिलकर एक संगठन बनाया, ‘The Association of Victims of Uphaar Fire Tragedy’ (AVUT). जिसने उपहार सिनेमा के मालिकों पर सिविल कंपन्सेशन यानी नागरिक मुआवज़े का केस किया.

24 अप्रैल 2003 को इस मामले पर दिल्ली कोर्ट ने एक लैंडमार्क फ़ैसला सुनाया. कोर्ट ने तय किया कि दोषियों से मुआवज़े के तौर पर 25 करोड़ की रक़म वसूली जाएगी. जिसका 55% अंसल भाइयों से वसूल किया जाना था. और बाकी 45% रक़म दिल्ली विद्युत बोर्ड, MCD और लाइसेन्सिंग अथॉरिटीज़ को चुकानी थी.

बाद में ये केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और आज ही के दिन यानी 13 अक्टूबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में अपना फ़ैसला सुनाया. जिसके तहत मुआवज़े की रक़म को आधा कर दिया गया. प्यूनिटिव डैमेज की रक़म को भी 25 करोड़ से घटाकर 25 लाख कर दिया गया.

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सुशील अंसल कोर्ट से बाहर आते हुए (तस्वीर: Getty)

AVUT की अध्यक्ष नीलम कृष्णमूर्ति, जिनकी दोनों बेटियां इस हादसे में चल बसी थीं, उन्होंने कोर्ट के फ़ैसले पर संगठन की तरफ़ से नाराजगी जताई. उनका कहना था कि मुद्दा सिर्फ़ पैसे का नहीं बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा में जवाबदेही और कड़े सुरक्षा मानदंडों की मांग के बारे में है. कड़े दंड के अभाव में व्यापार मालिक अपने तरीक़ों में बदलाव लाएंगे, इसकी सम्भावना कम ही है. AVUT की लड़ाई इस मामले में जारी है. 2020 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई. जिसे कोर्ट ने निरस्त कर दिया. 23 साल चली इस लड़ाई के बाद भी सवाल ज्यों का त्यों रहा. हत्या का इरादा किसी का नहीं था. जिसके हिस्से की जितनी गलती थी, उसे कोर्ट ने अपने हिसाब से सजा सुना दी.

एपिलॉग

आग लग जाना या हादसा हो जाना किसी के हाथ में नहीं है. लेकिन हादसा होने की स्थिति में नुक़सान कम से कम हो, इसी के लिए रेग्युलेशन बनाए जाते हैं. उपहार मामले में एक भी रेग्युलेशन का पालन नहीं किया गया. सिस्टम कोई व्यक्ति नहीं है. इसलिए सिस्टम पे दोष डाल देने से हमें उंगली उठाने के लिए कोई मिल जाता है लेकिन न्याय नहीं होता.

सिविल कंपन्सेशन का ये मामला अपने आप में ऐतिहासिक है. क़ानून की कमी समझिए कि क्रिमिनल केस में अक्सर सालों लग जाते हैं और ऊंची पहुंच वाले दोषियों को सजा नहीं होती. सिविल कंपन्सेशन का केस मामले को पैसे से जोड़ता है और पैसा बोलता है.

रेग्युलेशन का पालन ना करने के पीछे अधिकतर कारण ये होता है कि लोग पैसा बचाना चाहते हैं. ऐसे में दोषियों से मुआवज़ा वसूले जाने की स्थिति में  रेग्युलेशन के पालन का इंसेंटिव बनेगा. और सिस्टम में सेल्फ़ करेक्शन की सम्भावना बढ़ेगी.

इससे एक फ़ायदा ये भी होगा कि सरकार या नेता मुआवज़े को राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. जिसे वसूलने के नाम पर कभी लोगों को निशाना बनाया जाता है तो कभी देने के नाम पर वोट कमाए जाते हैं.


वीडियो देखें- वो काला कानून, जिसमें पुलिस जाति के हिसाब से किसी को गिरफ्तार कर सकती थी

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