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सावित्रीबाई फुले: स्कूल पढ़ने वाली हर लड़की आज इनकी ऋणी है

18 वीं और 19 वीं सदी के भारत के लिए डॉक्टर भीम राव आम्बेडकर अपनी किताब ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ में लिखते हैं,

“पेशेवाओं के शासनकाल में, जिस सड़क पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो, उस सड़क पर अछूतों को चलने की आज्ञा नहीं थी. अछूतों को आदेश था कि अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधे, ताकि हिन्दू इन्हें भूल से ना छू लें. पेशवाओं की राजधानी पूना में तो अछूतों के लिए यह आदेश था कि कमर में झाड़ू बांधकर चलें, ताकि इनके पैरों के निशान झाड़ू से मिट जाएं. और कोई हिन्दू इनके पद चिन्हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाएं. अछूत अपने गले में हांडी बांधकर चले और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़ें हुए अछूत के थूक पर किसी हिन्दू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा.’

हमारे महान गौरव शाली इतिहास का एक काला सच भी ये है. और इससे पहले कि दिमाग़ में ख़याल उठे कि ये तो 200 साल पहले की बात है. तो एक और किस्सा सुनिए. साल 1998 के आस पास की बात है. इतिहास में शामिल नहीं है. ना ही ऐतिहासिक है. लेकिन एक अनुभव ज़रूर है. 8 साल का एक बच्चा तब शहर से गांव गया था. गर्मियों की छुट्टी या शायद किसी के शादी समारोह में.

इस दौरान किसी घर में एक वृद्ध महिला की एंट्री होती है. बालक ने जैसा सीखा था, अपने बड़े को देखकर चरण छू लिए. वृद्ध महिला चली जाती है. घर का एक शख़्स बालक से पूछता है, तुमने पैर क्यों छुए. इससे पहले बालक जवाब दे पाता, घर का एक दूसरा सयाना कहता है, ‘अरे पैर नहीं छू रहा था, चाय का गिलास उठा रहा था.’ 8 साल का बालक समझ नहीं पाता. उसने तो पैर ही छुए थे. जाति की इस सच्चाई से गांव में वो पहली बार रूबरू हो रहा था. फिर भी छोटा सा बाल मन इतना तो समझ ही जाता है कि कुछ ऐसा हुआ है, जिस पर डांट पड़ सकती है. बचने के लिए वो सयाने की हां में हां मिलाते हुए कहता है, “हां गिलास ही उठाया था”

अनुभव किसका है, ये सवाल नहीं है. किसका नहीं है, ये सवाल है. कम से कम गांव क़स्बों से रूबरू हर व्यक्ति इस सच्चाई को जानता है.

सावित्रीबाई फुले का जन्म

19 वीं सदी में एक ऐसी शख़्सियत का जन्म हुआ जिसने भारत में जाति प्रथा के ख़िलाफ़ एक हथियार उठाया था. कलम का हथियार, और स्याही का तेज. जिसे हम शख़्सियत कहकर बुला रहे हैं. उनके जीवन काल में उन्हें साधारण इंसान से भी नीचे समझा गया.

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सावित्रीबाई फुले (फ़ाइल फोटो)

हम बात कर रहे हैं सावित्रीबाई फुले की. जिनका जन्म हुआ था आज ही के दिन यानी 3 जनवरी 1831 के रोज़. जन्मस्थान- महाराष्ट्र के सातारा जिले का नायगांव इलाक़ा. 9 साल की उम्र में उनकी शादी ज्योतिराव फुले से हो गई. ससुराल में कदम रखते वक्त उनके पास एक अमूल्य निधि थी. एक किताब, जो उन्हें एक ईसाई मिशनरी दी थी. युवा दिनों से ही ज्योतिराव जाति के सवाल से जूझ रहे थे. अपनी किताब की किताब ‘ग़ुलामगिरी’ में ज्योतिबा फुले लिखते हैं,

“ब्राह्मण-पंडा-पुरोहित लोग अपना पेट पालने के लिए, अपने पाखंडी ग्रंथों के माध्यम से, जगह-जगह बार-बार अज्ञानी शूद्रों को उपदेश देते रहे, जिसकी वजह से उनके दिलो-दिमाग़ में ब्राह्मणों के प्रति पूज्यबुद्धि उत्पन्न होती रही. इन लोगों को ब्राह्मणों ने, उनके मन में ईश्वर के प्रति जो भावना थी, वही भावना अपने लिए समर्पित करने के लिए मजबूर किया. यह कोई मामूली अन्याय नहीं है. इसके लिए उन्हें ईश्वर को जवाब देना होगा.”

युवावस्था में ज्योतिराव को अमेरिकी क्रांति के जनक थॉमस पेन की किताब, ‘राइट्स ऑफ़ मैन
पढ़ने का मौक़ा मिला. इस किताब में पेन लिखते हैं,

“अगर मानव के अधिकार किसी क़ानून या राजनैतिक चार्टर से प्रदान होते हैं, इसका मतलब है उन्हीं क़ानूनों से अधिकारों को वापस भी लिया जा सकता है. और तब वो मानवाधिकार ना होकर विशेषाधिकार होंगे.”

लड़कियों के लिए पहला स्कूल

ज्योतिराव ने समझा कि मानव के अधिकार किसी नीतिशास्त्र या धर्म की पुस्तक ने नहीं निकलते. क्योंकि तब किसी भी शास्त्र में कुछ भी लिखकर मानव के अधिकारों को छीना जा सकता है. ज्योतिराव को जाति व्यवस्था और बाकी कुरीतियों से लड़ने का एक ही रास्ता दिखा, शिक्षा. शुरुआत उन्होंने अपने घर से ही की. दिन भर काम के बाद रात को वो सावित्रीबाई को अपने साथ बिठाते और पढ़ाते. आगे चलकर फुले दम्पति ने 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवार पेठ के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के पहले स्कूल की शुरुआत की. और महज़ 17 साल की उम्र में सावित्रीबाई ने इस स्कूल में बतौर शिक्षिका पढ़ाना शुरू किया. शुरुआत में स्कूल में सिर्फ़ 9 लड़कियां पढ़ने के लिए राज़ी हुई. फिर धीरे-धीरे इनकी संख्या 25 हो गई.

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सावित्रीबाई के स्कूल में अधिकांश लड़कियां ऐसे समुदाय या वर्ग से थी, जिन्हें निचली जातियों की श्रेणी में गिना जाता था (तस्वीर: mahatmaphule.net)

1851 तक दोनों ने मिलकर पूने में 3 ऐसे स्कूल खोले जिनमें लड़कियों को शिक्षा दी जाती थी. स्कूल के करिकुलम में गणित विज्ञान और समाजशास्त्र भी सम्मिलित था. इन तीनों स्कूलों को मिलाकर छात्रों की संख्या 150 थी. पढ़ाने का तरीक़ा भी सरकारी स्कूलों से अलग था. लेखिका दिव्या कंदुकुरी लिखती हैं, “फुले दम्पति के स्कूल में पढ़ाई का स्तर इतना बेहतर था कि सरकारी स्कूल के मुक़ाबले पास होने का प्रतिशत ज़्यादा हुआ करता था”

लेकिन ये सब शांति से नहीं हुआ. एक पिछड़ी जाति की महिला खुद पढ़े, और दूसरों को भी पढ़ाए, ये धर्म के ठेकेदारों को मंज़ूर नहीं था.

साम-दाम-दंड-भेद सब आज़माए गए. सबसे पहले घर से ही शुरुआत हुई. लोगों ने ज्योतिराव के पिता गोविंदराव को धमकाया, आपका लड़का धर्म के ख़िलाफ़ जा रहा है.दबाव में गोविंदराव ने ज्योतिबा को स्कूल बंद करने को कहा. ज्योतिराव नहीं माने और तब उनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया. घर से निकलकर भी ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने पढ़ाने का काम जारी रखा.

लोगों ने गोबर और कीचड़ उछाला

घर से निकलकर सावित्रीबाई स्कूल को जाती तो विरोधी उन्हें परेशान करने की कोशिश करते. गंदी गालियां देकर अपमानित करने की कोशिश करते. ज्योतिराव से कहा जाता, सावित्री के हाथ का खाना कीड़ों में तब्दील हो जाएगा. जब ये तय हुआ कि बातों और अफ़वाहों से काम नहीं चलेगा. तो सावित्रीबाई पर रास्ते में कीचड़ और गोबर उछाला गया. लोग उनका पीछा करते, डराते और धमकी देते.

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सावित्रीबाई के स्कूल में अधिकांश लड़कियां ऐसे समुदाय या वर्ग से थी, जिन्हें निचली जातियों की श्रेणी में गिना जाता था (तस्वीर: mahatmaphule.net)

रिटायर्ड शिक्षाविद ललिता धारा, जिन्होंने फुले दम्पति और डॉक्टर आंबेडकर पर में कई किताबें लिखी हैं, लिखती हैं,

“लोग पीछा करते तो सावित्रीबाई रास्ते में रुककर इन लोगों का सामना करती. शालीनता से उनसे कहती. मेरे भाइयों, मैं तुम्हारी ही बहनों को पढ़ा रही हूं. जो गोबर और पत्थर तुम मुझ पर उछाल थे हो, वो मेरे लिए फूलों के सामान है. मैंने अपनी बहनों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है. मैं तुम्हारे लिए भी प्रार्थना करूंगी.”

इसके बावजूद गालियों और अपमान का दौर चलता रहा. एक बार तो इन सब से थक हार कर सावित्रीबाई ने स्कूल ना जाने की ठान ली. तब उनके पति ज्योतिराव ने उनका हौंसला बढ़ाया. ज्योतिराव ने सावित्रीबाई को दो साड़ियां दी. एक को पहनकर वो स्कूल जाती. उस पर गोबर और कीचड़ उछाला जाता. तो स्कूल में वो गंदी साड़ी बदलकर दूसरी पहन लेती. जब घर जाने का वक्त आता तो दुबारा वही गंदी साड़ी पहन लेतीं. ऐसा ही चलता रहा. लेकिन एक दिन हद हो गई. ललिता धारा लिखती हैं,

एक मुस्टंडा एक दिन उनका रास्ता रोक कर खड़ा हो गया. उसने धमकी दी, अगर महार और मांघ जातियों को पढ़ाना नहीं छोड़ा तो गम्भीर परिणाम होंगे. भीड़ इकट्ठा हो गई. तमाशा देखने के लिए. तब सावित्री ने एक ज़ोर का तमाचा रसीद किया और मुस्टंडा वहां से रफ़ूचक्कर हो गया. भीड़ भी तीतर बितर हो गई. और उस दिन के बाद किसी ने सावित्रीबाई का रास्ता रोकने की हिम्मत नहीं की.

अंग्रेजी मैया का दूध पियो

1848 से 1852 के बीच फुले दम्पति ने लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. सावित्रीबाई फुले को समझ आ चुका था कि शिक्षा के बिना, खासकर अंग्रेजी शिक्षा के बिना शूद्र,अतिशूद्र मुख्यधारा के में शामिल नहीं हो सकते. इसलिए वह शूद्र- अति शूद्रों को अंग्रेजी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं और ‘अंग्रेजी मैया’ नाम की कविता में लिखती हैं,

‘अंग्रेजी मैया का दूध पियो, वही पोसती है शूद्रों को’

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सावित्रीबाई फुले की कविता अंग्रेज़ी मैया (फ़ाइल फोटो)

शिक्षा के अलावा लड़कियों को और बहुत सी धार्मिक कुरीतियों से रूबरू होना पड़ता था. तब बहुत सारी लड़कियां छोटी उम्र में ही विधवा हो जाती थीं. और उनके बाल काट कर उन्हें गंजा कर दिया जाता. तर्क ये कि लड़कियां कुरूप रहें. ताकि उनकी तरफ कोई पुरुष आकर्षित न हो सके. 7 दिसम्बर के एपिसोड में हमने आपको विधवा पुनर्विवाह क़ानून के बारे में बताया था. तब बंगाल में ईश्वर चंद्र विद्या सागर विधवाओं के पुनरुत्थान के लिए लड़ रहे थे. उसी किस्से में हमने ये भी बताया था कि किस प्रकार विधवा स्त्रियों और लड़कियों को हवस का शिकार बनाया जाता था.

यहां पढ़ें- किस हिंदू धर्मशास्त्र का सहारा लेकर विधवा पुनर्विवाह क़ानून बनाया गया?

विधवा गर्भवती स्त्री के पास सिर्फ़ दो रास्ते बचते थे. आत्महत्या या गर्भपात. गर्भपात के ख़िलाफ़ अंग्रेजों ने क़ानून बना रखा था. इस सब को देखते हुए ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने गर्भवती स्त्रियों के लिए एक केयर सेंटर शुरू किया. जिसका नाम था “बालहत्या प्रतिबंधक गृह”. यहां ऐसी महिलाओं की देखभाल कर उन्हें रहने खाने का ठिकाना मुहैया कराया जाता था. अगला नम्बर था विधवाओं को गंजा करने की कुप्रथा का. जिसका विरोध करते हुए सावित्रीबाई फुले ने नाइयों की हड़ताल कराई और इस प्रथा के ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से आवाज़ उठाई.

1897 का प्लेग

सिर्फ़ समाज के तौर पर भी नहीं, सावित्रीबाई ने इन मूल्यों को अपनी निजी ज़िंदगी में भी उतारा. एक बार ज्योतिराव ने महिला को आत्महत्या का प्रयास करते देखा, तो उसे रोका और अपने घर लेकर आ गए. सावित्रीबाई ने ना सिर्फ़ उस महिला को अपने घर में जगह दी. बल्कि उसके बच्चे को अपना नाम दिया और उसकी परवरिश की. यशवंत नाम के इस बालक को पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया. फुले दम्पत्ति ने अपने जीवनकाल में अनाथ बच्चों के लिए 52 बोर्डिंग स्कूल खोले.

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1987 में पूरे महाराष्ट्र में भयानक महामारी फैली, एक हॉस्पिटल (तस्वीर: Wellcome Collection)

1890 में ज्योतिराव की मृत्यु हुई तो सावित्रीबाई ने उनकी चिता को खुद आग लगाई. उस समय के हिसाब से ये क्रांतिकारी कदम था. सत्यशोधक नाम की संस्था, जिसे ज्योतिराव बना गए थे, उसका काम भी उन्होंने अपने ज़िम्मे लिया. अपने जीवन काल में उन्होंने दो काव्य पुस्तकें भी लिखीं. पहला कविता संग्रह ‘काव्य फुले’ 1854 में छपा, तब उनकी उम्र सिर्फ 23 साल की थी. कविताओं का दूसरा किताब ‘बावनकशी सुबोधरत्नाकर’ 1891 में आया, जिसको सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवनसाथी ज्योतिबा फुले की जीवनी के रूप में लिखा था. इस तरह वो आधुनिक भारत में मराठी की पहली कवियत्री बनी.

1897 में पुणे में प्लेग फैला. तब भी अपनी संस्था के ज़रिए उन्होंने मरीज़ों की मदद की. पोलिटिकल एक्टिविस्ट, प्रमिला दंडवते लिखती हैं कि इस दौरान उन्होंने हर दिन 2000 अनाथ बच्चों को भोजन मुहैया कराया. मरीज़ों की सेवा के दौरान उनको भी प्लेग ने पकड़ लिया और 10 मार्च 1897 को 66 वर्ष की उम्र में सावित्रीबाई फुले का देहांत हो गया.

एपिलॉग

अंत में एक कविता के साथ आपको छोड़े जाते हैं. दलित विमर्श पर लिखने वाले सुकीर्थरानी एक तमिल लेखक हैं. अपनी एक कविता के अंतिम पंक्तियों में वो लिखती हैं. हिंदी में सार है,

उन्हें लगता है, मैं, मेरा घर, मेरी गली और मेरा वजूद गांव के अंतिम छोर पे है
मैं कहती हूं
देखो! गांव वहीं से शुरू होता है.

बात हो रही है गांव के बाहर बसाए गए पिछड़े वर्गों के घरों की. दलित विमर्श पर लिखी गई इस कविता में एक छुपा संदेश है, जिसे तुम अंत कह कर खुद को ऊंचा समझ रहे हो, देखो कि वो शुरुआत भी तो हो सकती है.


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