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संविधान दिवस: डॉ. आंबेडकर पब्लिक प्रोटेस्ट के ख़िलाफ़ थे!

आज 26 नवंबर है. और आज की तारीख का संबंध है भारत के संविधान से.

नई दिल्ली में संसद भवन में एक बक्सा रखा हुआ है. बक्से में भरी है हीलियम. ताकि अंदर रखी चीज़ को समय की दीमक से बचाया जा सके. इस बक्से के अंदर रखा है भारत के संविधान का मूल काग़ज़. जिसे लिखने की शुरुआत हुई थी, 9 दिसंबर 1946 को. संविधान सभा के प्रथम सभापति थे सच्चिदानंद सिन्हा. और बाद में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को सभापति निर्वाचित किया गया. डॉक्टर भीमराव भीमराव रामजी आम्बेडकर को ड्राफ़्टिंग कमेटी का अध्यक्ष चुना गया था. 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में भारतीय संविधान का निर्माण पूरा हो पाया. और लागू हुआ 26 जनवरी 1950 को.

इसीलिए इस दिन को हम गणतंत्र दिवस के तौर पर मनाते है. वो दिन जब दिल्ली वाले इंडिया गेट जाते हैं. और बाकी भारत साल में एक बार TV पर दूरदर्शन ऑन करता है. बढ़िया-बढ़िया झांकियों, हवाई जहाज के करतबों और परेड के वास्ते.

संविधान दिवस

हालांकि भारत का संविधान इससे दो महीने पहले, आज ही के दिन यानी 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो चुका था. और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इसे स्वीकार भी कर लिया था.

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संविधान की मूल प्रति (तस्वीर: Wikimedia Commons)

यहां पर UPSC का एक सवाल तो हम ही आपसे पूछ लेते हैं. जब 26 नवंबर को ही संविधान बन गया था तो फिर लागू होने में दो महीने का समय क्यों लिया गया? एक जवाब तो ये है कि चूंकि 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज की मांग के साथ तिरंगा फहराया गया था. इसलिए 26 जनवरी की तारीख़ को संविधान लागू करने के लिए चुना गया. और दूसरा जवाब ये है कि संविधान चूंकि अंग्रेज़ी में लिखा हुआ था. इसलिए इसे हिंदी में ट्रांसलेट करने और बाकी औपचारिकता निभाने के लिए वक्त लिया गया.

2015 से पहले 26 नवंबर को सिर्फ़ नेशनल लॉ डे के रूप में मनाया जाता था. डॉक्टर आम्बेडकर की 125वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में 2015 से केंद्र सरकार ने इसे संविधान दिवस के रूप में मनाना शुरू किया. संविधान क्या है, उसमें क्या-क्या निहित है? हमारे मूल अधिकार और शासन-प्रशासन के नियम क़ायदे क्या है? इस सबके बारे में बहुत बात होती है और होनी भी चाहिए. लेकिन आज हम बात करेंगे, संविधान सभा में डॉक्टर आम्बेडकर के अंतिम भाषण की. जिसमें उन्होंने भावी पीढ़ी को कुछ चेतावनियां दी थी. ‘ग्रामर ऑफ़ एनार्की’ नाम से मशहूर इस भाषण में डॉक्टर आम्बेडकर ने आने वाली पीढ़ी के नाम तीन संदेश या कहिए चेतावनी दी थी.

‘ग्रामर ऑफ़ एनार्की

25 नवंबर 1949 की सुबह संविधान सभा की बैठक शुरू हुई. संविधान बनकर तैयार हो चुका था. लेकिन संविधान और संविधान सभा को लेकर बहुत से सवाल भी उठे थे. जिनके जवाब देने के लिए डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर खड़े हुए. सबसे पहले उन्होंने इस आलोचना का जवाब दिया जिसमें कहा जा रहा था कि संविधान बनाने में काफ़ी वक्त ज़ाया हुआ है. और पैसे की बहुत बर्बादी हुई है. यहां तक कि संविधान सभा की तुलना नीरो से करते हुए कहा गया कि देश जल रहा है, और संविधान सभा बंसी बजा रही है.

डॉक्टर आम्बेडकर ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा,

“याद रखने लायक बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माताओं को संशोधनों की समस्या का सामना नहीं करना पड़ा. वे जिस रूप में प्रस्तुत किए गए, वैसे ही पास हो गए. इसकी तुलना में इस संविधान सभा को 2,473 संशोधनों का निपटारा करना पड़ा. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विलंब के आरोप मुझे बिलकुल निराधार लगते हैं और इतने दुर्गम कार्य को इतने कम समय में पूरा करने के लिए यह सभा स्वयं को बधाई तक दे सकती है”

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अम्बेडकर, 25 नवंबर 1949 को राजेंद्र प्रसाद को भारतीय संविधान का अंतिम मसौदा प्रस्तुत करते हुए (तस्वीर: wikimedia Commons)

संविधान की कमियों और खूबियों पर अपना मत रखते हुए उन्होंने कहा,

“मैं संविधान की खूबियों पर बात नहीं करूंगा। क्योंकि मैं समझता हूं कि संविधान चाहे जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों.”

क्रांति का खूनी रास्ता

उनकी इस बात के प्रकाश में उन तीन चेतावनियों को देखा जाना चाहिए जो उन्होंने अपने भाषण के दौरान दी थीं. डॉक्टर आंबेडकर की पहली चेतावनी, लोकतंत्र में ‘विरोध के तरीकों’ के बारे में थी. उन्होंने अपने भाषण के दौरान कहा,

“हमें पहला काम यह करना चाहिए कि अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निष्ठापूर्वक संवैधानिक उपायों का ही सहारा लेना चाहिए. इसका अर्थ है, हमें क्रांति का खूनी रास्ता छोड़ना होगा. इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग और सत्याग्रह के तरीके छोड़ने होंगे.”

अब प्रश्न उठना ज़ाहिर है कि आम्बेडकर सत्याग्रह जैसे तरीक़ों का विरोध क्यों कर रहे थे. जबकि 1927 में अछूत समझे गए लोगों को उनका हक़ दिलाने के लिए उन्होंने महाड़ में सत्याग्रह का तरीक़ा ही अपनाया था. महाड़ सत्याग्रह 20 मार्च 1927 को महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के महाड़ स्थान पर हुआ था. तब डॉ. आंबेडकर ने हजारों की संख्या में अछूत कहे जाने वाले लोगों की अगुवाई की. और एक सार्वजनिक तालाब चावदार से पानी पी लिया था. सबसे पहले डॉ. आंबेडकर ने हथेली से पानी पीया. उनके पीछे हजारों दलितों ने उसी तालाब से पानी पीया.

आम्बेडकर की बात को अच्छी तरह समझने के लिए पहले हमें उनके द्वारा उपयोग किए गए ‘खूनी रास्ता’ शब्द पर ध्यान देना चाहिए. इस शब्द से उनका आशय था कि संविधान में जनता को किसी भी तरह से हिंसा का अधिकार नहीं है.

सत्याग्रह का रास्ता

इसी तरह सत्याग्रह को लेकर उनके विरोध को हमें आम्बेडकर के मूल लक्ष्य को समझना होगा. आम्बेडकर खुद कहते हैं कि संविधान सभा में शामिल होने का उनका एकमात्र लक्ष्य था, पिछड़ी जातियों को आज़ाद भारत में उनका हक़ और सम्मान दिलाना. वो नहीं चाहते थे कि संविधान में निहित ये हक़ समाज में मौजूद शक्तिशाली लोगों के दबाव में किसी तरह छीन लिए जाए.

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अगस्त 1923 को बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल ने क़ानून बनाया कि सभी ऐसी जगहें, जिनका निर्माण और देखरेख सरकार करती है, का इस्तेमाल हर कोई कर सकता है. इसी कानून को लागू करवाने के लिए महाड़ सत्याग्रह किया गया (तस्वीर: Commons)

समाज में उच्च जातियों के वर्चस्व के चलते उन्हें डर था कि भीड़ की शक्ति से पिछड़ों के अधिकारों पर कोई ख़तरा हो. आम्बेडकर की नज़र में संविधान एक बांध था, जो बहुमत के ज़ोर के आगे टूटे नहीं. उन्होंने कहा,

“जब आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का कोई संवैधानिक उपाय न बचा हो, तब असंवैधानिक उपाय उचित जान पड़ते हैं.”

एक आदर्श लोकतंत्र में ये उचित तर्क है कि अधिकारों की लड़ाई संवैधानिक तरीक़ों से लड़ी जाए. चूंकि तब सामाजिक हक़ की लड़ाई के लिए लोकतंत्र में संवैधानिक उपाय मौजूद रहेंगे. लेकिन जैसा कि पहले आम्बेडकर ने आगाह किया था. लोकतंत्र कैसा होगा, ये इस पर निर्भर करता है कि उसे चलाने वाले लोग कैसे होंगे.

इसके अलावा हमें ये भी समझना चाहिए कि संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) के तहत भारत के नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है. इसी के तहत शांतिपूर्वक प्रदर्शन का अधिकार भी है. इसलिए शांतिपूर्ण सत्याग्रह की बात असंवैधानिक तो वैसे भी नहीं हो सकती.

दूसरी चेतावनी

डॉक्टर आम्बेडकर की दूसरी चेतावनी व्यक्ति पूजा या सत्ता के आगे लोगों की नतमस्तक हो जाने की प्रवृति को लेकर थी. उन्होंने कहा

“हो सकता है कि धर्म में भक्ति, आत्मा के उद्धार का मार्ग हो. लेकिन राजनीति में, भक्ति या नायक की पूजा, पतन और अंततः तानाशाही के लिए मार्ग सुनिश्चित करती है,”

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संविधान सभा में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद बोलते हुए (तस्वीर: Getty)

यहां आम्बेडकर ने तर्क दिया कि आस्था भारत के जनमानस में रची बसी है. यहां धर्म का आधार ही भक्ति और आस्था है. धर्म और राजनीति के घालमेल से भारत की राजनीति में भी भक्ति और आस्था का जो प्रभाव पड़ता है. वैसा किसी और देश में पड़ने की सम्भावना कम है. और इसीलिए भारत की जनता को इसके प्रति आगाह किया जाना चाहिए. वो चाहें तो किसी महान व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर कर सकते हैं. लेकिन उसकी क़ीमत उनकी अपनी स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने आयरिश देशभक्त डेनियल ओ कॉमेल को क्वोट करते हुए कहा,

”कोई पुरूष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता, कोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता”

तीसरी चेतावनी 

इसके बाद डॉक्टर आम्बेडकर ने एक तीसरी चेतावनी दी. जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीयों को केवल राजनीतिक लोकतंत्र से संतोष प्राप्त नहीं करना चाहिए. भारतीय समाज में जो इन्हेरेंट या अंतर्निहित असमानता है, वो सिर्फ़ राजनीतिक लोकतंत्र प्राप्त कर लेने भर से खत्म नहीं हो जाती है.

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संविधान सभा (तस्वीर : commons)

उन्होंने कहा,

“अगर हम लंबे समय तक इससे (समानता) वंचित रहे, तो हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को संकट में डाल लेंगे”

और इससे बचने के लिए डॉक्टर आम्बेडकर ने सामाजिक प्रजातंत्र का तरीक़ा बताया. उन्होंने कहा,

“हमें हमारे राजनीतिक प्रजातंत्र को एक सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना चाहिए. जब तक उसे सामाजिक प्रजातंत्र का आधार न मिले, राजनीतिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता. सामाजिक प्रजातंत्र का अर्थ क्या है? वह एक ऐसी जीवन-पद्धति है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करती है”

इन सब चेतावनियों के अलावा उनका यह भी कहना था कि ये भावी पीढ़ी यानी हमें तय करना है कि हम संविधान का क्या करते हैं. उनका मत था कि संविधान के नीति निर्माताओं का काम यहीं पर ख़त्म होता है. हर पीढ़ी का अपना अलग राष्ट्र होता है और अगर हम सोचते हैं कि संविधान कभी बदला नहीं जा सकता. तो ये ऐसा होगा जैसे धरती पर मृत व्यक्तियों का हक है, जीवित व्यक्तियों का नही. अंत में उन्होंने संविधान को आजादी का दस्तावेज बताते हुए कहा,

“हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस स्वतंत्रता ने हमें महान जिम्मेदारियां दी हैं. स्वतंत्रता के बाद से हम कुछ भी गलत होने पर अब अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं. यदि यहाँ से चीजें गलत हो जाती हैं, तो हमारे पास खुद को छोड़कर, दोष देने के लिए कोई नहीं होगा”


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