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पेशवा बाजी राव ने मथुरा में कैसे दिया नवाबों को चकमा?

कहानी कहती है जब मोहम्मद खान बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला किया तो उन्होंने कुछ चारणों को पुणे की ओर रवाना किया. पेशवा बाजीराव तब खाना ख़ा रहे थे. जब उन्होंने चारणों का ये गीत सुना,

जो गत गाह गजेन्द्र की, सो गत भई है आय
बाजी जात बुन्देलन की, राखो बाजी राय

जैसे गजेंद्र नाम के हाथी का पैर मगरमच्छ के जबड़े में फ़ंस गया था. वैसे ही बुंदेलों की हालत हो गई है. बाजीराव, आओ. मदद करो. पेशवा खाना बीच में छोड़कर उठ खड़े हुए. पत्नी से पूछा तो बोले, इतिहास कहेगा, बुंदेलखंड इसलिए गिर गया क्योंकि बाजीराव को खाने से फ़ुरसत नहीं थी. पेशवा बाजीराव ने बुंदेलखंड को खान बंगश से मुक्त कराया. और इसके बाद उनकी ज़िंदगी में एंट्री हुई मस्तानी की. ये कहानी आपने साल 2015 में रिलीज़ हुई फ़िल्म बाजीराव मस्तानी में देखी होगी. जिसमें पेशवा की निजी ज़िंदगी को तो अच्छे से उभारा गया. लेकिन उनके युद्ध कौशल के बारे में कम बात हुई. इतिहासकार यदुनाथ सरकार कहते हैं,

‘घुड़सवारों का कोई सैन्य लीडर अगर स्वर्ग से उतर आए तो वो पेशवा बाजीराव जैसा होगा. पेशवाओं के इतिहास में बाजीराव जैसा ना उनके पहले हुआ, ना बाद में.’

दिल्ली कैम्पेन की शुरुआत

शुरुआत 1736 से. 12 नवंबर के रोज़ पेशवा बाजीराव ने पुणे से दिल्ली की ओर कूच किया. 50 हज़ार घुड़सवारों की सेना के साथ. मराठा सेना बुंदेलखंड से होते हुए जमुना नदी के किनारे पहुंची. आगरा से सिर्फ़ 40 मील दूर. मराठा जनरल मल्हार राव होलकर जमुना पार करते हुए गंगा और जमुना के बीच के एरिया, दोआब में पहुंचे. और एक-एक क़स्बे पे कब्जा करते हुए आगरा से सिर्फ़ 11 मील की दूरी तक पहुंच गए.

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साल 2015 में रिलीज़ हुई फ़िल्म बाजीराव मस्तानी (तस्वीर: आईएमडीबी)

ये जानकर दिल्ली में बादशाह मुहम्मद शाह घबराए, और उन्होंने अपनी पूरी सेना जंग में उतार दी. अवध के गवर्नर सादत खान अपनी सेना लेकर दोआब में पहुंचे. जहां उसका सामना होलकर से हुआ. होलकर ने शाही सेना का वैन गार्ड देखा. उसमें 12 हज़ार घुड़सवार थे. यहां होलकर से एक गलती हो गई. उन्हें लगा सादत खान की सेना उनसे संख्या में कम है. उन्होंने सादत की सेना को घेरने की कोशिश की. लेकिन पता चला सादत की सेना 12 हज़ार नहीं, पचास हज़ार थी. इस जंग में होलकर की हार हुई और उन्हें वापस बाजीराव के कैम्प में लौटना पड़ा. जो तब ग्वालियर में डेरा जमाए हुए थे. सादत ख़ां अपनी सेना लेकर आगे बड़े और मथुरा में खान बंगश से जा मिले.

मथुरा से सादत खां ने बादशाह मुहम्मद शाह को एक ख़त लिखा. जिसमें उन्होंने कहा, मैंने मराठाओं को खदेड़ दिया है. और अब चंबल पार पहुंचकर ही वापस लौटूंगा. खबर पाकर बादशाह निश्चिंत हो गए और उन्होंने खुश होकर एक हाथी, एक शाही पोशाक और एक मोतियों का हार सादत के पास भिजवाया.

मथुरा में रंग में भंग

दरअसल ये पुराना मुग़ल दरबार नहीं था. मुग़लों की ताक़त दिनों-दिन घटती जा रही थी. दिल्ली दरबार में चाटुकारों का बोलबाला था. बादशाह को खुश करने के लिए दरबारी ऐसी खबरें लाते, जो बादशाह को खुश करतीं. खबरें उड़ाई गई कि पेशवा को एक मिस्त्री के भेष में दक्कन भागते देखा गया है. किसी ने कहा, मैंने उन्हें गधे के ऊपर बैठकर भागते देखा. बादशाह को लगा ये खुशख़बरी है. जो असल में सिर्फ़ खुशफ़हमी थी. इधर होलकर को हराने के बाद मथुरा में जश्न का माहौल था.

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सादत ख़ां (तस्वीर: Commons)

खान दौरां, सादत ख़ां और बंगश तीनों अपने टेंट में बैठकर जीत की ख़ुशी मना रहे थे. एक दिन ऐसा ही जश्न का दौर चल रहा था, जब एक सैनिक आया और सादत को खबर दी, जनाब, मराठे दिल्ली पहुंच गए हैं. सादत को यक़ीन न हुआ. दिल्ली जाने का रास्ता आगरा से जाता था. और बीच में वो कुंडली मार के बैठे थे. वो कुछ देर तो यही सोचते रहे कि मराठे दिल्ली तक कैसे पहुंच सकते हैं. खबर झूठी भी हो सकती थी. लेकिन सच-झूठ तय करने का वक्त नहीं था. सादत और दौरां ने अपनी सेना को तैयार किया और आनन फ़ानन में दिल्ली की ओर भागे.

अंग्रेज इतिहासकारों ने पेशवा बाजीराव को भारत का नेपोलियन कहा है. उन्होंने अपनी ज़िंदगी में 30 से ज़्यादा लड़ाइयां लड़ीं. और एक में भी हार का सामना नहीं किया. उसका कारण था पेशवा बाजीराव की सूझबूझ, इसीलिए बाजीराव को छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद मराठा साम्राज्य का सबसे धुरंधर योद्धा और रणनीतिकार माना जाता था. बाजीराव का दिल्ली अभियान उनकी इसी रणनीतिक समझदारी की बानगी था.

उन्होंने आगरा का रूट छोड़ते हुए मेवात के पहाड़ी रास्तों से दिल्ली का रुख़ किया. वो अपने साथ हमेशा हल्के बख्तर के घोड़े रखते थे. जो तेज़ी से ट्रेवेल कर सकें. 50 हज़ार घुड़सवारों के साथ अगले ही दिन पेशवा दिल्ली की सरहद तक जा पहुंचे. इस दौरान मराठा सेना ने 60 किलोमीटर की दूरी 2 दिन में पार की.

उस रात दरबार में कोई नहीं सोया

29 मार्च 1737 के रोज़ पेशवा अपनी सेना लेकर दिल्ली की सरहद पर पहुंचे. कालका जी मंदिर के पास. उन्होंने ताल कटोरा मैदान में डेरा डाला. शाही महल से सिर्फ़ 4 कोस दूर.बादशाह तक लूट-पाट की खबरें पहुंचीं तो उन्हें लगा, राजपूताना से कुछ छोटे-मोटे लुटेरे होंगे. बादशाह ने एक भिखारी के भेष में तालकटोरा में अपना गुप्तचर भेजा. गुप्तचर वापस लौटा और उसने बादशाह के आगे भीख में मिली वस्तुएं बिखेर दीं. इसमें कुछ अनाज, कुछ रोटियां और कुछ लाल मिर्च की गांठें थीं.

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मुहम्मद खान बंगश (तस्वीर: Wikimedia Commons)

आगे कुछ भी कहने की ज़रूरत न थी. बादशाह समझ गया कि मराठा दिल्ली पहुंच चुके हैं. इसलिए कि पिछले 20 साल के कैम्पेन में पेशवा और उनकी सेना की सिर्फ़ यही खुराक हुआ करती थी. बादशाह को लगा अगली सुबह तक ज़रूर मराठे हमला कर देंगे. लेकिन पेशवा का इरादा कुछ और था.

उन्होंने बादशाह के पास एक संदेश भिजवाया. मजमून कुछ इस तरह था कि मैं आपके दरवाज़े से सिर्फ़ कुछ मील दूर हूं. अगर अपने सैनिकों को आज्ञा दूं तो वो एक ही झटके में दिल्ली पर कब्जा कर लेंगे. मैं इस शहर के बाशिंदों को परेशान नहीं करना चाहता. इसलिए चलिए मिलकर शांति का रास्ता निकालते हैं. अगर कल दोपहर तक मुझे कोई जवाब नहीं मिला तो आप ज़िम्मेदार होंगे.

बादशाह ने जवाब भिजवाया कि पेशवा पांच लोगों सहित दरबार में पेश हों. पेशवा इतनी दूर पहुंचकर किसी ट्रैप में नहीं फ़ंसना चाहते थे. उन्होंने कुछ शर्तें रखीं. बादशाह से कोई जवाब नहीं आया. उस रात दरबार में कोई नहीं सोया. रात भर मंत्रणा चलती रही कि अगर मराठा फ़ौज ने हमला कर दिया तो क्या होगा. सादत और बंगश की सेना काफ़ी बड़ी थी. अगर पेशवा ने उन्हें हरा दिया था तो बादशाह के पास दो ही रास्ते बचे थे. या तो संधि कर लें या फिर नावों में बैठकर जमुना के रास्ते भाग निकलें.

जिन्नों को क़ाबू में कर रखा है

उसी रात आसपास की सारी नावों को मंगाया गया. और उन्हें महल की खिड़की तले इकट्ठा कर लिया गया. ताकि हमला हो तो बादशाह और मंत्रीगण निकल भागें. बादशाह लड़ाई के बारे में पूछते तो जवाब मिलता, जनाब, पेशवा ने आब और पानी के जिन्नों को क़ाबू में कर रखा है. सिर्फ़ एक शख़्स था जो असल में लड़ाई के बारे में सोच रहा था. दिल्ली ग़ैरिसन का कमांडर अमीर खां. उसके पास 12 हज़ार घुड़सवार सेना और 20 हज़ार पैदल सैनिक थे. दिल्ली कैंट की बेहतरीन आर्टिलरी थी, तोपें थीं. उसने मराठाओं का सामना करने का प्लान बनाया और बादशाह को लड़ाई का सुझाव दिया. बादशाह को अमीर खां की बात सुन कुछ भरोसा हुआ. और जंग की इजाज़त दे दी.

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दिल्ली का सांकेतिक दृश्य (तस्वीर: Wikimedia Commons)

अमीर की योजना डिफ़ेंस की थी. उसे पता था कि खुले मैदान में वो मराठाओं का सामना नहीं कर सकते. लेकिन अपनी मज़बूत आर्टिलरी के बल पर वो एक डिफ़ेन्सिव फ़ॉर्मेशन तैयार कर सकता था. जिसके ज़रिए मराठा सेना को कई दिनों तक रोका जा सकता था. इतिहासकार विलियम इर्विन अपनी किताब, ‘लेटर मुग़ल्स’ में लिखते हैं,

“अमीर खां का का प्लान अच्छा था. लेकिन कुछ अति उत्साही युवा सरदारों ने उसके प्लान को बर्बाद कर दिया.इनमें से मुख्य था, मीर हसन कोका. उसने बाकी युवा सरदारों को अपने साथ जोड़ा. और अमीर को डरपोक करार देते हुए, आगे बढ़कर हमला करने का फ़ैसला किया.”

अमीर हसन को देखते ही बाजीराव ने अपने सबसे तगड़े 500 घुड़सवारों को आगे भेजा. ताकि वो दुश्मन की ताक़त और पोजिशन का जायज़ा ले सकें. मीर हसन को लगा सिर्फ़ 500 घुड़सवार हैं. ये तो आसान शिकार होंगे. इर्विन लिखते हैं कि इन सरदारों की चाल से ही बाजीराव ने भांप लिया कि ये अस्थिर, अनुभवहीन हैं. पेशवा ने मीर हसन को लुभाने के लिए अपने घुड़सवारों को पीछे हटने को बोला. मीर हसन कोका और बाकी सरदारों को लगा, इससे अच्छा मौक़ा ना मिलेगा.

कोका कहकर ना बुलाओ!

मीर हसन ने यहां बहुत बड़ी गलती कर दी. मराठाओं पर हमले का मौक़ा तो ये नहीं ही था, इस उत्साह में वो ये भी भूल गया कि वो अमीर ख़ां के सुरक्षा घेरे से 2 कोस दूर चला आया है. मौक़ा पाकर रानोजी सिंधिया और मल्हार राव होलकर ने मीर हसन पर आक्रमण कर दिया. हसन को जब तक होश आया वो ज़मीन में ज़ख़्मी हालात में गिरा हुआ था. धूल से सराबोर. कुछ सैनिक आए. उसकी धूल झाड़ी. उसे कोका कहकर बुलाया. कोका मीर हसन को मिली उपाधि थी, जो स्वयं बादशाह ने उसे दी थी.

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अपने काल में पेशवा बाजी राव ने मराठा साम्राज्य को लगभग पूरे भारत में फैला दिया था (तस्वीर: Wikimedia Commons )

जैसे ही कोई सैनिक उसकी धूल झाड़ता, मीर हसन खुद पर और मिट्टी डालते हुए बोलता, कोका कहकर ना बुलाओ, मराठाओं से पहचान लिया तो जान से मार देंगे. मीर हसन की ये नासमझी मुग़ल सेना को बहुत भारी पड़ी. मैदान साफ़ हो चुका था. पेशवा अब आराम से महल तक जा सकते थे. उन्हें रोकने वाला कोई ना था. लेकिन तभी बादशाह के लिए मानो चमत्कार जैसा कुछ हुआ. आगे बढ़ने की बजाय पेशवा बाजीराव पीछे हट गए. और राजपूताना में एंटर करते हुए अजमेर चले गए.

ऐसा क्यों किया? इसका ब्योरा चीमा जी को लिखे गए बाजीराव के ख़तों में मिलता है. शुरुआत से वो नहीं चाहते थे कि दिल्ली में लूट-पाट हो. इसके अलावा पेशवा को मालूम था कि सादत ख़ां और खान दौरां की सेना दिल्ली पहुंचने वाली थी. और उनसे अकेले निपटना मुश्किल था. पुणे से इतनी दूर एक बड़ी लड़ाई करना मुश्किल था. पुणे से रिइंफ़ोर्समेंट बुलाने पर दक्कन में निज़ाम-उल-मुल्क रोड़ा अटका सकता था. ऊपर से दिल्ली पर राज करने की पेशवा की कोई योजना भी नहीं थी. उनकी राजधानी पुणे थी. और वो बस मालवा में मराठाओं का दबदबा क़ायम करना चाहते थे.

बाजीराव के दिल्ली कैम्पेन पर निज़ाम-उल-मुल्क की नज़रें गड़ी हुई थी. वो दक्कन में अपनी जागीर को मराठाओं और मुग़लों, दोनों से बचाकर रखना चाहते थे. इसलिए समय पड़ने पर किसी के भी पाले में जा सकते थे. बाजीराव को निज़ाम के इरादों का इल्म था. इसलिए उन्होंने चीमाजी को संदेश भिजवाया,

“अगर निज़ाम नर्मदा क्रॉस करने की कोशिश करे तो आगे बढ़कर उस पर नकेल डाल देना”

चीमाजी अपनी सेना के साथ तैयार थे. इस ख़तरे को देखते हुए निज़ाम ने कोई कदम नहीं उठाया. दिल्ली में हुए घटनाक्रम ने बादशाह मुहम्मद शाह को पूरी तरह तोड़कर रख दिया था. उन्हें अपने किसी भी जनरल पर भरोसा नहीं रह गया था. अहसास हो चुका था कि जनरल ना सिर्फ़ नाकारा बल्कि नमकहराम भी हैं. जो सिर्फ़ अपने फ़ायदे की सोच रहे हैं.

बस मराठों को मालवा और गुजरात से खदेड़ दो

इस लाचारी की हालत में उन्हें सिर्फ़ एक शख़्स का ख़्याल आया. दक्कन में निज़ाम-उल-मुल्क. निज़ाम के दिल्ली दरबार से रिश्ते कुछ पेचीदा ज़रूर थे. लेकिन मराठाओं के ख़िलाफ़ दोनों को एक दूसरे का साथ चाहिए था. बादशाह ने निज़ाम को दक्कन से दिल्ली आने का बुलावा भेजा. मजबूरी में निज़ाम दक्कन के रेवेन्यू में से मराठाओं को चौथ देने के लिए तैयार हो गए थे . लेकिन बादशाह के बुलावे में उन्हें एक सुनहरा मौक़ा दिखा. उन्हें लगा उनकी और बादशाह की ताक़त के आगे मराठा खड़े नहीं हो पाएंगे.

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मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जून 1737 में निज़ाम दिल्ली पहुंचें. खूब आवभगत हुई. तब दिल्ली में कोई और अमीर अपने ढोल नगाड़े नहीं बजा सकता था. लेकिन अब ना वो दिल्ली बची थी, ना मुग़लों की ताक़त ही पहले जैसी थी. खूब लाव लश्कर लेकर ढोल नगाड़ों के साथ निज़ाम दिल्ली में एंटर हुए. बादशाह मुहम्मद शाह ने अपने तख़्त से उतरकर निज़ाम का स्वागत किया. ढेर सारे तोहफ़े दिए. और सल्तनत की सर्वोच्च उपाधि, आसिफ़ जाह के नाम से नवाज़ा.

मुहम्मद शाह ने निज़ाम से कहा, अपनी पूरी सल्तनत के सारे संसाधन तुम्हें सौंपता हूं. जितना पैसा चाहिए, ले लो. बस मराठों को मालवा और गुजरात से खदेड़ दो. साथ ही बादशाह ने निज़ाम से एक और वादा किया. जिसके अनुसार मालवा और गुजरात की सूबेदारी निज़ाम के बेटे घजीउद्दीन को मिलनी थी. शाही सेना, और नए जोशो-खरोश के साथ, निज़ाम मालवा की ओर बढ़े. उनके साथ शाही आर्टिलरी भी थी. जिसे तब सबसे ताकतवर माना जाता था.

इस समय पेशवा पुर्तगालियों के साथ लड़ाई में लगे हुए थे. जैसे ही बाजीराव को निज़ाम के मालवा की तरफ़ कूच की खबर मिली. उन्होंने 80 हज़ार घुड़सवारों और पैदल सेना को इकट्ठा किया. और नर्मदा को पार कर उत्तर की तरफ़ वापस बढ़ चले. दिसम्बर 1737 में निज़ाम और पेशवा का आमना-सामना भोपाल में हुआ.

भोपाल की जंग

निज़ाम ने सेना सहित भोपाल के किले में डेरा जमाया. लेकिन उनकी पूरी सेना के लिए वो छोटा पड़ता था. इसलिए बाकी सेना को इस तरह जमाया कि उनका पिछला भाग झील से सुरक्षित रहे और सामने का भाग नदी नालों से. यानी पूरी तरह से डिफ़ेन्सिव पोजिशन.

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पेशवा बाजी राव और निज़ाम उल मुल्क आसिफ़ जहा (तस्वीर: Commons)

इसी हालत में वो बाजीराव के हमले का इंतज़ार करने लगे. मराठाओं ने वही किया जो इस स्थिति में सबसे वाजिब रणनीति होती. उन्होंने भोपाल को चारों तरफ़ से घेर लिया. रसद पहुंचने का रास्ता ब्लॉक हुआ तो खाने के लाले पड़ने लगे. निज़ाम के साथ सवाई जय सिंह की सेना भी थी. सवाई जय सिंह के बेटे लड़ाई में पहुंचे तो उन्हें मराठा सेना से मुंह की खानी पड़ी. इतने सैनिक मारे गए कि निज़ाम को अपनी सेना पीछे हटानी पड़ी. बाजी राव अपने ख़त में लिखते हैं,

“निज़ाम एक अनुभवी योद्धा है. उसकी सेना मज़बूत है. दुनिया की सबसे मज़बूत आर्टिलरी उसके पास है. मुझे बिलकुल समझ नहीं आता कि उसने किले में बंद होकर, खुद को मुश्किल में क्यों डाला हुआ है”

ध्यान रखें कि इस दौरान पेशवा बाजीराव के पास आर्टिलरी भी नहीं थी. निज़ाम की मदद के लिए अवध से सफ़दर जंग पहुंचा. सफ़दर जंग सादत खान का बेटा था. पेशवा ने सूझबूझ दिखाते हुए अपने जनरल होलकर को सफ़दर से निपटने के लिए भेजा. और सफ़दर को भोपाल पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया.

निज़ाम की ख़स्ता हालत

उधर भोपाल में लगभग कैद हो चुके निज़ाम की हालत दिनों-दिन ख़स्ता होती जा रही थी. राशन की कमी के चलते फ़ौज में बग़ावत के सुर उठने लगे थे. निज़ाम ने हैदराबाद में अपने बेटे नासिर जंग को मदद का संदेश भेजा. पेशवा यहां भी इक्कीस साबित हुए. उन्होंने चीमाजी को बोलकर नासिर जंग को ताप्ती नदी से पहले ही रोक लिया. बाजीराव के पास आर्टिलरी नहीं थी. इसलिए वो भोपाल का सुरक्षा घेरा तोड़ने में असमर्थ थे. लेकिन रॉकेट और मैचलॉक बन्दूकों से उन्होंने निज़ाम की सेना का जीना हराम किया हुआ था.

निज़ाम ने भोपाल से पीछे हटने की सोची. लेकिन मराठाओं ने इस कदर दबाव बनाकर रखा था कि निज़ाम एक दिन में सिर्फ़ 3 किलोमीटर पीछे हट पाए. कुछ दिन यूं ही चला तो अंत में निज़ाम को संधि के लिए तैयार होना पड़ा. इसके बाद आज ही के दिन यानी 7 जनवरी 1739 को निज़ाम और पेशवा बाजी राव के बीच दोराहा की संधि हुई. जिसमें निज़ाम के पक्ष से सवाई जय सिंह शामिल हुए. इस संधि के अनुसार मराठाओं को मालवा की जागीर तो मिली ही. साथ ही नर्मदा और चम्बल के बीच एक बड़े इलाक़े पर भी पेशवा का कब्जा हो गया. साथ ही निज़ाम को बतौर हर्ज़ाना 50 लाख रुपए की रक़म का भुगतान करना पड़ा. पेशवा के पास एक बेहतरीन मौक़ा था कि वो निज़ाम की शक्ति को ख़त्म कर सकते थे. लेकिन उन्होंने संधि का रास्ता चुना. इतिहासकार KM पणिकर लिखते हैं,

“बेहतर होता यदि पेशवा पहले दक्षिण में मराठा साम्राज्य को स्थापित करते. फिर उन्हें नर्मदा को पार कर उत्तर की ओर बढ़ना चाहिए था. इससे मराठा साम्राज्य को बेहतर स्टेबिलिटी मिलती. और इस तरह वो बाद में अंग्रेजों को भारत पर कब्जा करने से रोक सकते थे.”


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