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‘चंद्रशेखर लिमिट’ देने वाले भारतीय वैज्ञानिक को ब्रिटेन में मिला धोखा

भारतीय मूल के जाने माने खगोल भौतिक विज्ञानी एस. चंद्रशेखर (तस्वीर: Getty)

वो कहानी तो आपने सुनी होगी, न्यूटन के सर पर सेब गिरा और उन्हें ग्रैविटी का तियां-पांचा समझ आ गया. लेकिन ये समझ अचानक तो पैदा हुई नहीं थी. इस समझ का फूल एक सवाल के बीज से उपजा था. सवाल ये कि पत्थर उछालो तो धरती पे क्यों आ गिरता है. और सवाल ये कि धरती आख़िर सूरज का चक्कर क्यों लगाती है.

न्यूटन ने उत्तर दिया, ग्रैविटी. एक ऐसा फ़ोर्स जो दो चीजों को एक-दूसरे की ओर खींचता है. न्यूटन द्वारा खोजे गए ग्रैविटी और मोशन के तीन नियमों ने आधुनिक भौतिकी की नींव रखी.

विज्ञान और वैज्ञानिक

अब सवाल ये कि क्या गति के नियम इसलिए काम करते हैं, क्योंकि उन्हें न्यूटन ने दिया था. अपना मोनु अगर गति के नियम दे चुका होता तो क्या वो काम नहीं करते. ज़ाहिर तौर पर करते. क्योंकि यही विज्ञान की खूबी है. विज्ञान में अथॉरिटी वैज्ञानिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक तरीक़ा है. जिसका ज़ोर जांचने-परखने और सवाल करने पर होता है.

ऐसा नहीं कि हर वैज्ञानिक सिद्धांत सही ही हो. समय-समय पर चीजें ग़लत भी साबित होती हैं. लेकिन सामान्य मानव व्यवहार के विपरीत यहां ज़ोर अपनी बात को सही साबित करने के बजाय, सही बात को खोजने पर होता है. इसलिए आप कितने की बड़े वैज्ञानिक हों. मूल्य इस बात का है कि सही तथ्य क्या है, ये नहीं कि आप किसे सही मानते हैं.

लेकिन ये सब बातें विज्ञान पर लागू होती हैं. वैज्ञानिकों पर नहीं. आम आदमी की तरह अभिमान, ईर्ष्या, राजनीतिक कुटिलता जैसे सारे दोष वैज्ञानिकों पर भी लागू होते हैं. आज जो किस्सा हम सुनाने जा रहे हैं. वो ऐसे ही एक वैज्ञानिक का है. जिसने अपने अभिमान और ईर्ष्या के चलते एक दूसरे वैज्ञानिक को आगे नहीं बढ़ने दिया.

चंद्रशेखर का जन्म एक तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था लेकिन वो पूरी तरह से नास्तिक थे (तस्वीर: Getty)

आज ही के दिन यानी 19 अक्टूबर 1910 को नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का जन्म हुआ था.

लाहौर में जन्मे चंद्रशेखर ने मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से ग्रैजुएशन किया. इसके आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने ब्रिटेन जाने की ठानी. भारत से ब्रिटेन तक की समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने भौतिकी का एक सिद्धांत दिया जिसे हम आज चंद्रशेखर लिमिट के नाम से जानते हैं.

चंद्रशेखर लिमिट

जैसे कि सबको मालूम है हमारा सूरज भी एक तारा है. जिसकी ऊर्जा से ही धरती पर जीवन सम्भव हो पाता है. ये ऊर्जा तब पैदा होती है जब सूरज के अंदर दो हाइड्रोजन अणुओं में फ़्यूज़न रिएक्शन होती है. हाइड्रोजन से हीलियम बनती है. ऐसे ही कार्बन, नाइट्रोजन, आयरन जैसे एलिमेंट्स बनते हैं.

लेकिन रसोई गैस की तरह सूरज का ईधन भी लिमिटेड है. ऐसा होने में हालांकि लाखों साल बाकी हैं, लेकिन कभी ना कभी तो सूरज का ईधन भी ख़त्म हो ही जाएगा. तब सूरज का क्या होगा?

तब ग्रैविटी अपना असर दिखाएगी. और तब सूरज सिकुड़ना शुरू कर देगा. ग्रैविटी अब भी असर दिखा रही है लेकिन फ़्यूज़न से पैदा होने वाली ऊर्जा के चलते एक आउटवर्ड प्रेशर भी बना हुआ है जो सूरज को सिकुड़ने नहीं देता. ईधन ख़त्म हो जाएगा तो आउटवर्ड प्रेशर के अभाव में सूरज या ऐसा ही कोई अन्य तारा सिकुड़ता चला जाएगा.

पहली नज़र में ऐसा लगता है कि ऐसा होते-होते तारे का घनत्व इतना ज़्यादा हो जाएगा कि उसके सारे एटम आपस में गुंथ जाएंगे. लेकिन यहां पर एंट्री होती है क्वेंटम मकैनिक्स की. राल्फ़ फ़ाउलर नाम के एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ने इस सब्जेक्ट पर अपनी थियरी में कहा कि कोई दो इलेक्ट्रॉन एक ही कक्षा में तो रह नहीं सकते. इसलिए तारे के अंदर भी कुछ इलेक्ट्रॉन ऊपरी कक्षा में जाते रहेंगे. ऐसे में तारे के भीतर जो बाहरी प्रेशर बनेगा, उसे कहा गया, इलेक्ट्रॉन डीजनरेसी प्रेशर .

जब ग्रैविटी और इलेक्ट्रॉन डीजनरेसी प्रेशर के बीच एक संतुलन बन जाएगा. तो तारा अंत में एक बौना तारा बनकर रह जाएगा. जिसे नाम दिया गया white dwarf star यानी सफ़ेद बौना तारा.

तारों के अंदर

20 साल की उम्र में ही चंद्रशेखर को इस बात एक झोल दिखाई पड़ा. तब तक आइंस्टीन रिलेटिविटी की खोज़ कर चुके थे. चंद्रशेखर ने ध्यान दिया कि तारे के अंदर इलेक्ट्रॉन लगभग प्रकाश की स्पीड से गति कर रहे होंगे. ऐसे में आइंस्टीन के रेलटिविटी के सिद्धांत को इंटरोड्यूस किए बिना पूरी पिक्चर साफ़ नहीं होगी.

एक व्हाइट ड्वॉर्फ़ तारा (फ़ाइल फोटो)

उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम में रेलटिविटी को जोड़ा और तब उन्हें एक विशेष बात पता चली. उन्होंने कहा कि हां, ये सच है कि इलेक्ट्रॉन डीजनरेसी प्रेशर के कारण कोई तारा सफ़ेद बौना तारा बनकर रह जाएगा. लेकिन ऐसा होने में एक पेंच है.

वो ये कि अगर किसी तारे का मास यानी द्रव्यमान एक लिमिट से ऊपर हो तो इलेक्ट्रॉन डीजनरेसी प्रेशर काम नहीं करेगा. और एक धमाके के साथ अंततः तारा एक न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल में तब्दील हो जाएगा.

यानी सिकुड़ते-सिकुड़ते तारे का घनत्व इतना हो जाएगा कि मानो 10 किलोमीटर के क्षेत्र में लगभग 10-20 सूरज समा गए हों. उदाहरण के लिए बता दें कि ऐसे एक चम्मच न्यूट्रॉन स्टार का भार 4 करोड़ टन के बराबर होगा. किसी तारे के द्रव्यमान का वो भार जिसके ऊपर वो न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल में तब्दील हो जाता है. उसे ही चंद्रशेखर लिमिट के नाम से जाना जाता है. और ये लिमिट हमारे सूरज के द्रव्यमान के 1.4 गुना के बराबर है.

पढ़ाई के लिए जब चंद्रशेखर ब्रिटेन की केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी पहुंचे तो उन्होंने राल्फ़ फ़ाउलर को ये रिसर्च दिखाई. लेकिन Ralph fowler ने इसे आगे पब्लिश होने के लिए भेजने से मना कर दिया. चंद्रशेखर ने और वैज्ञानिकों से सम्पर्क किया तो वहां से भी यही जवाब मिला. ऐसे में चंद्रशेखर की मुलाक़ात हुई ब्रिटिश अस्ट्रानमर सर आर्थर ऐडिंगटन से.

आर्थर ऐडिंगटन

आर्थर ऐडिंगटन की कहानी जानने के लिए वापस न्यूटन पर चलते हैं. लॉ ऑफ़ मोशन और ग्रैविटी की खोज़ के बाद जब न्यूटन से पूछा गया कि वो भौतिकी के क्षेत्र में इतना आगे कैसे बढ़ पाए, तो उन्होंने जवाब दिया,

“अगर मैं और आगे देख पाया तो सिर्फ़ इसलिए कि मैं दिग्गजों के कंधों पर खड़ा हुआ था.”

न्यूटन के 200 साल बाद एक और वैज्ञानिक उनके कंधे पर सवार हुआ. 1915 में आइंस्टीन ने जनरल रिलेटिविटी की खोज़ की. उन्होंने कहा कि ग्रैविटी कोई फ़ोर्स नहीं है. पत्थर धरती की तरफ़ इसलिए खिंचता है क्योंकि धरती के मास यानी द्रव्यमान के कारण स्पेस-टाइम में कर्व पैदा होता है. और पत्थर के पास इस कर्व को ट्रेस करने के अलावा कोई चारा नहीं है.

आर्थर एडिंगटन (तस्वीर: getty)

1915 में आइंस्टीन ने जब ये बात कही तो उसे यूं ही मान नहीं लिया गया. आइंस्टीन की थियरी को प्रूव करने की ज़रूरत भी थी. आइंस्टीन ने कहा कि किसी तारे के बग़ल से गुजरती हुई रौशनी में इस कर्व को देखा जा सकता है. जनरल रिलेटिविटी को प्रूव करने में योगदान दिया आर्थर ऐडिंगटन ने. 1919 में सूर्यग्रहण के दौरान ऐडिंगटन ने प्रकाश की दिशा में कर्व को प्रूव किया और आइंस्टीन रातों रात हीरो बन गए.

रॉयल ऐस्ट्रनामिकल सोसायटी

बहरहाल इन्हीं आर्थर ऐडिंगटन ने केम्ब्रिज के दिनों में चंद्रशेखर को उनकी रिसर्च के लिए मोटिवेट किया. साथ ही 1935 में रॉयल ऐस्ट्रनामिकल सोसायटी के सामने अपनी रिसर्च पेश करने के लिए आमंत्रित भी किया.

रॉयल ऐस्ट्रनामिकल सोसायटी के सामने पेश करने के लिए चंद्रशेखर ने अपना पेपर तैयार किया. मीटिंग से एक दिन पहले उन्हें पता चला कि ऐडिंगटन भी उसी टॉपिक पर अपना लेक्चर पेश करने वाले है. चंद्रशेखर को लगा कि ऐडिंगटन उनका समर्थन ही करेंगे. जैसा वो पहले करते आए थे. इसलिए उन्होंने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया.

11 जनवरी 1935 को मीटिंग के दौरान ऐस्ट्रोफ़िज़िक्स फ़ील्ड के सभी दिग्गज मौजूद थे. चंद्रशेखर ने मीटिंग में अपनी रिसर्च पेश की. इस दौरान उन्होंने ये बताया कि किस प्रकार एक निश्चित द्रव्यमान के ऊपर कोई तारा स्टेबल नहीं रह सकता. इसके बाद बारी थी ऐडिंगटन की.

स्पेस टाइम में कर्व के कारण प्रकाश की दिशा में परिवर्तन (तस्वीर: India Today)

ऐडिंगटन ने अपने लेक्चर के दौरान जो कहा उसे सुनकर चंद्रशेखर हैरत में पड़ गए. ऐडिंगटन ने कहा कि चंद्रशेखर की थियरी सिर्फ़ गणित की कुछ इक्वेशन्स तक सीमित है. और उसका असलियत से कोई सम्बंध नहीं है. ऐडिंगटन का दावा था कि लाखों टन का तारा शून्य में खो जाए, ऐसा सम्भव नहीं है. वैज्ञानिक कम्यूनिटी में ऐडिंगटन के क़द के कारण किसी ने उनका विरोध नहीं किया. यहां तक कि चंद्रशेखर को जवाब देने का मौक़ा तक नहीं दिया गया. जबकि नियम के अनुसार ये उनका हक़ था. आने वाले कई सालों तक ऐडिंगटन चंद्रशेखर का विरोध करते रहे.

ऐसा कोई एक्स्पेरिमेंट नहीं

सालों की जिरह के बाद जब उन्हें कोई तर्क नहीं मिला तो अंत में उन्होंने कहा, कि ऐसा कोई एक्स्पेरिमेंट नहीं जिससे चंद्रशेखर की बात साबित हो सके. उस समय के प्रख्यात ऐस्ट्रोफ़िज़िसिस्ट जेरार्ड क्वीप ने चंद्रशेखर की थियरी के समर्थन में सबूत भी रखे. लेकिन ऐडिंगटन को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ा. हालांकि ऐसे कुछ घटनाक्रम थे जिनसे लगता है कि शायद उनके मन में इस बात का कुछ गिल्ट भी बना रहा.

उदाहरण के लिए 1939 में पेरिस में एक मीटिंग के दौरान उन्होंने चंद्रशेखर से माफ़ी मांगी. इस पर चंद्रशेखर ने उनसे पूछा कि क्या उनका मत बदल चुका है. ऐडिंगटन ने जवाब दिया, नहीं. इस पर चंद्र्शेखर ने कहा, फिर आप माफ़ी किस बात की मांग रहे हैं. और वहां से चले गए.

अक्टूबर 1953 में चंद्रशेखर और उनकी पत्नी ने अमेरीका की नागरिकता ले ली (तस्वीर: Getty)

विज्ञान के इतिहासकार आर्थर मिलर के अनुसार ऐडिंगटन के इस व्यवहार के पीछे उनकी पर्शनल ज़िंदगी के कुछ मसले हो सकते हैं. कथित तौर पर ऐडिंगटन समलैंगिक थे और तब के समाज में अपनी इज्जत के लिए उन्होंने इस बात को दबाए रखा था. आर्थर मिलर के अनुसार ऐडिंगटन का ये व्यवहार इसी फ़्रस्ट्रेशन के चलते हो सकता है पैदा हुआ हो.

चंद्रशेखर ने अपने लेखन में वैज्ञानिक कम्यूनिटी के इस व्यवहार को रंगभेद से जोड़कर भी देखा है. ख़ैर ऐस्ट्रोफ़िज़िक्स के क्षेत्र में इस अपमान के चलते चंद्रशेखर ने ये फ़ील्ड छोड़ दिया और वो अमेरिका में शिकागो में जाकर बस गए. 1983 में अपनी इस खोज़ के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 1953 में ही उन्होंने अमेरिका की नागरिकता ले ली थी और 1995 में अपनी मृत्यु तक वो वहीं बने रहे.

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