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जब हिटलर को नोबेल मिलने वाला था!

सारी वादी उदास बैठी है
मौसम-ए-गुल ने खुदकशी कर ली
किसने बारूद बोया बागों में?

गुलज़ार जब त्रिवेणी से ये सवाल पूछते हैं तो आवाज़ दूर तक जाती है. सिर्फ़ टाइम में ही नहीं स्पेस में भी. लगभग 2 सदी पहले स्वीडन में एक बच्चे का जन्म हुआ. नाम था अल्फ्रेड नोबेल. जिसने आगे डायनमाइट और जिलेटिन जैसे विस्फोटकों का आविष्कार किया. और विस्फोटकों के कारोबार से एक बड़ा बिज़नेस एम्पायर खड़ा किया. लेकिन अख़बार में छपी एक खबर में जब उसने अपना नाम पढ़ा तो उसे माज़ी और मुस्तकबिल, दोनों की चिंता होने लगी. अपनी पूरी जायदाद विज्ञान के हवाले कर उसने नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत की. और तब से लेकर आज तक विज्ञान, शांति, साहित्य और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ये दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार माने जाते हैं. कैसे हुई थी नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत. क्या थी अल्फ्रेड नोबेल की कहानी. और भारत में अब तक किस-किस को मिल चुका है ये पुरस्कार. आइए जानते हैं.

अल्फ्रेड नोबेल को नाइट्रोग्लिसरिन का पता चला

19 वीं सदी के मध्य में 17 साल का अल्फ्रेड जब पेरिस पहुंचा तो उसे वहां एक ऐसे पदार्थ की खोज का पता चला जो बारूद से भी भयानक था, नाइट्रोग्लिसरिन. लेकिन इसे साथ दिक़्क़त थी कि ये बहुत ही अनप्रिडिक्टेबल था. इसके विस्फोट को नियंत्रण करने का कोई तरीक़ा नहीं था. इसलिए नाइट्रोग्लिसरिन बनाने वाले ने इसके व्यापक इस्तेमाल से इनकार कर दिया था. अल्फ्रेड के पिता का बिज़नेस डूब चुका था. जिस कारण उन्हें स्वीडन से रूस जाना पड़ा था. अल्फ्रेड ने सोचा कि अगर नाइट्रोग्लिसरिन के विस्फोट को किसी तरह कंट्रोल कर लिया जाए तो बहुत बड़ा बिज़नेस आईडिया बन सकता है.

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युवा और प्रौढ़ अल्फ़्रेड नोबेल (तस्वीर: Commons)

यही सोचकर 1852 में अल्फ्रेड अमेरिका पहुंचा. वहां उसने नाइट्रोग्लिसरिन को लेकर अपनी रिसर्च जारी रखी. इस दौरान उसे पता चला कि अगर नाइट्रोग्लिसरिन में कीसलगुहर (kieselguhr) मिलाया जाए तो विस्फोट को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. 1863 में उसने डेटोनेटर का आविष्कार किया और 1865 में ब्लास्टिंग कैप का. इस दौरान एक विस्फोट में उसके भाई की मौत भी हो गई. लेकिन 1867 तक उसने नाइट्रोग्लिसरिन के मिश्रण को विस्फोटक के तौर पर इस्तेमाल करने का पूरा तरीक़ा खोज लिया था. इस मिश्रण को पेटेंट कराते हुए उसने नाम दिया, नोबेल सेफ़्टी पाउडर.

नाम के पीछे सोच ये थी कि इससे विस्फोटकों के निर्माण में जो बदनामी होती थी. उसकी काट मिलेगी और अल्फ्रेड के परिवार का नाम ख़राब नहीं होगा. लेकिन नोबेल सेफ़्टी पाउडर बिकवाली के लिए एक अच्छा नाम नहीं था. इससे विस्फोटक की शक्ति का पता नहीं चलता था. अंत में नाम रखा गया, डायनामाइट. ग्रीक भाषा का एक शब्द जिसका मतलब होता है, शक्ति.

डायनामाइट से शांति  

न्यूक्लियर हथियारों को लेकर ‘म्यूचवल डिस्ट्रक्शन’ की जो थियोरी दी गई वही कभी अल्फ्रेड ने डायनामाइट के लिए भी दी थी. उसने कहा,

“हज़ारों विश्व सम्मेलनों की बजाय मेरा बनाया डायनामाइट जल्दी शांति ला देगा. जैसे ही आदमी को अहसास होगा कि एक झटके में पूरी आर्मी को तबाह किया जा सकता है. वो तुरंत ही शांति के लिए तैयार हो जाएगा.”

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स्वीडन के कार्लस्कोगा में अल्फ्रेड नोबेल की प्रयोगशाला का इंटीरियर, जहां कृत्रिम रबड़ और सिंथेटिक धागे के साथ पाउडर परीक्षण और प्रयोग किए गए थे (तस्वीर: AFP)

डायनामाइट के बाद 1875 में अल्फ्रेड ने जिलेटिन का आविष्कार किया. और इसके बाद उसका कारोबार दिन दुगना चौगुना फलता भूलता गया. उसने यूरोप के स्वीडन, जर्मनी, स्कॉटलैंड, पेरिस और इटली में 90 भी ज़्यादा कारखाने स्थापित किए. 1888 में नोबेल के एक और भाई लुडविग की मृत्यु हुई. बहुत से अख़बारों में ये खबर छपी. लेकिन गलती से खबर में लुडविग के बजाय अल्फ्रेड का नाम छप गया. एक फ़्रेंच अख़बार ने लिखा,

“मौत का सौदागर मर गया”

खबर में आगे लिखा था,

“डॉक्टर अल्फ्रेड नोबेल, जो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों लोगों को मारने के नए और तेज तरीक़े ढूंढ कर अमीर बना था. कल रात उसकी मृत्यु हो गई.”

अल्फ्रेड ने अख़बार में जब अपनी ही मौत की खबर पढ़ी तो उसे अचरज तो हुआ. लेकिन ज़्यादा दुःख इस बात का था कि मौत के बाद उसे ‘मौत के सौदागर’ के रूप में याद किया जाएगा. इस घटना के बाद अल्फ्रेड ने विस्फोटकों के बजाय दूसरी चीजों पर रिसर्च करना शुरू किया. 1896 तक अल्फ्रेड ने कृत्रिम सिल्क और लेदर जैसे 355 पेटेंट हासिल कर लिए थे.

इतना ही काफ़ी नहीं था. अपनी लेगेसी बचाने के लिए अल्फ्रेड ने एक वसीयत भी बनाई और अपनी 94% सम्पत्ति एक ट्रस्ट में दान कर दी. ट्रस्ट को ज़िम्मेदारी मिली कि अल्फ्रेड की मृत्यु के बाद नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हो और साइंस, लिट्रेचर और शांति के क्षेत्र में 5 नोबेल पुरस्कार दिए जाएं. हालांकि आगे चलकर इसमें इकनॉमिक्स को भी शामिल कर लिया गया.

नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत

1896 में अल्फ्रेड की मृत्यु के बाद उनकी वसीयत खोली गई तो बहुत हंगामा हुआ. परिवार तो नाराज़ था ही, साथ ही जिस ट्रस्ट को इन पुरस्कारों को शुरुआत करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. उसने भी इनकार कर दिया. बहुत कोशिशों के बाद साल 1901 में नोबेल प्राइज़ दिए जाने की शुरुआत हुई. चूंकि अल्फ्रेड नोबेल की मृत्यु आज ही के दिन यानी 10 दिसंबर 1896 को हुई थी. इसलिए हर साल 10 दिसंबर को नोबेल पुरस्कार बांटे जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़कर.

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1867 में डायनमाइट का आविष्कार किया गया था (तस्वीर: AFP)

जैसे 1939 में शांति का पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री नेविल चेंबरलिन को तब नामित किया गया था. जर्मनी के साथ किए गए शांति समझौते, म्यूनिक एग्रीमेंट के कारण. लेकिन इसके ठीक तीन दिन बाद स्वीडिश सांसद एरिक ब्रैंट ने शांति पुरस्कारों के लिए एक और नाम सुझाया. उन्होंने कहा,

‘अगर चेम्बरलिन को शांति पुरस्कार के लिए नामित किया का सकता है. तो अडोल्फ़ हिटलर को भी किया जा सकता है. इसलिए मैं हिटलर को शांति नोबेल के लिए नामित करता हूं”

इसके चलते एरिक ब्रैंट को पब्लिक का बहुत ग़ुस्सा झेलना पड़ा. लेकिन हिलटर को नामित करने के पीछे ब्रैंट की मंशा उसे नोबेल दिलाने की नहीं थी. वो इस आयरनी की तरफ़ ध्यान दिलाना चाह रहे थे कि चेंबरलिन ने हिटलर के साथ समझौता करके उसके हाथों को मज़बूत किया था. और इसके लिए शांति पुरस्कार की बात एकदम बेमानी जान पड़ती थी. आगे जाकर ब्रैंट की बात सच साबित हुई, जब हिटलर ने पोलेंड पर आक्रमण कर दिया.

गांधी को नोबेल क्यों नहीं मिला

इस विवाद के कारण नोबेल कमिटी ने 1939 में फ़ैसला किया कि उस साल शांति का पुरस्कार किसी को नहीं दिया जाएगा. 1948 में भी कुछ ऐसा ही हुआ. उस साल भी शांति का नोबेल किसी को नहीं दिया गया. माना जाता है कि उस साल शांति का नोबेल गांधी को दिया जाना था. लेकिन नोमिनेशन के कुछ ही दिन बाद उनकी हत्या हो गई. कमिटी ने कहा,

’कोई भी ज़िंदा उम्मीदवार प्राइज़ के लायक नहीं है.”

इससे पहले भी गांधी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए 4 बार नोमिनेट हुए थे- 1937, 1938, 1939, और 1947 में. गांधी को प्राइज़ क्यों नहीं मिला? इस पर नोबेल कमिटी ने कभी भी साफ तौर पर कुछ नहीं कहा. लेकिन सवाल उठते रहे कि क्या नोबेल कमिटी की सोच बहुत छोटी थी? या वो नॉन-यूरोपियन लोगों के संघर्षों की तारीफ करना पसंद नहीं करते थे? या फिर उन्हें इस बात का डर था कि अगर महात्मा गांधी को प्राइज़ दिया जाएगा, तो नॉर्वे और ब्रिटेन के रिश्तों में खटास आ जाएगी?

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महात्मा गांधी को 5 बार शांति के नोबेल के लिए नामित किया गया था (फ़ाइल फोटो)

1989 में जब दलाई लामा को प्राइज़ मिला, तब कमिटी के चेयरमैन ने कहा था,

“महात्मा गांधी की स्मृति में एक श्रद्धांजलि.”

2006 में भी नोबेल कमिटी ने गांधी को नोबेल ना दिए जाने पर खेद जताया. नोबेल कमिटी के सेक्रेटरी गेर लुंडस्टड ने कहा,

“हमारे 106 साल के इतिहास में सबसे बड़ी चूक निस्संदेह यह है कि महात्मा गांधी को कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला. गांधी नोबेल शांति पुरस्कार के बिना भी गांधी थे. लेकिन सवाल ये है कि क्या नोबेल समिति गांधी के नाम के बिना काम चला सकती है.”

इसी वजह से महात्मा गांधी को ‘नोबेल का मिसिंग विजेता’ भी कहा जाता है. महात्मा गांधी के अलावा डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा को भी नोबेल के लिए 6 बार नोमिनेट किया गया था. लेकिन उन्हें भी ये पुरस्कार नहीं मिला. 2021 तक कुल मिलाकर 11 भारतीयों को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है. रविंद्रनाथ टैगोर वो पहले भारतीय थे जिन्हें साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए इस पुरस्कार से नवाज़ा गया था. टैगोर को 1913 में ये सम्मान मिला और तब ये पुरस्कार पाने वाले वो पहले गैर यूरोपीय थे.

नोबेल पाने वाले भारतीय

विज्ञान के क्षेत्र में भारत को सिर्फ़ 1 नोबेल मिला है. सीवी रमण, जिन्हें 1930 में फिजिक्स के क्षेत्र में ये पुरस्कार दिया गया. इसके अलावा तीन और भारतीयों को साइंस का नोबेल पुरस्कार मिला है, हरगोविंद खुराना. जिन्हें 1968 में मेडिसिन के क्षेत्र में नोबेल मिला. सुब्रहमण्यम चंद्रशेखर, जिन्हें 1983 में सितारों की आकृति और कैसे सितारे बने, इसके सैद्धांतिक शोध के लिए नोबेल पुरस्कार मिला.

यहां पढ़ें-  ‘चंद्रशेखर लिमिट’ देने वाले भारतीय वैज्ञानिक को ब्रिटेन में मिला धोखा

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2015 में कैलाश सत्यार्थी को शांति के लिए और 2019 में अभीजीत बैनर्जी को अर्थशास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया (तस्वीर: AFP)

इसके अलावा भारतीय मूल के वेंकट रामाकृष्णन को वर्ष 2009 में राइबोसोम के स्ट्रक्चर और कार्यप्रणाली के क्षेत्र में शोध के लिए केमिस्ट्री का नोबेल पुरस्कार मिला. हालांकि जब इन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, ये तीनों ही अमेरिका के नागरिक थे. शांति के लिए दो भारतीयों को नोबेल पुरस्कार मिला है. 1979 में मदर टेरेसा और 2014 में कैलाश सत्यार्थी. इसके अलावा इकनॉमिक्स के फ़ील्ड में भी दो भारतीयों को नोबेल मिला है. 1998 में अमर्त्य सेन और 2019 में अभिजीत बैनर्जी.

आजादी के बाद विज्ञान के क्षेत्र में भारत एक भी नोबेल पुरस्कार नहीं जीत पाया है. जिन भारतीयों ने नोबेल जीता, वो देश से बाहर जाकर जीता. यहां हम तर्क देते हुए ये कह सकते हैं कि पाकिस्तान को भी तो नहीं मिला या श्रीलंका को. लेकिन ये हमें तय करना है कि हमें किसके साथ अपनी तुलना करनी है. दूसरा बहाना ये भी दिया जाता है कि विदेशी भारत को महत्व नहीं देते, या ये पोलिटिकल कारणों के चलते हुआ है. इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है. लेकिन जब किसी वेंकट रामाकृष्णन या सुब्रहमण्यम चंद्रशेखर को ये पुरस्कार मिलता है. तब उन्हें भारतीय कहकर कंधे चौड़े करना. इसका हक़ हम तभी रख पाएंगे, जब हम ये सवाल पूछेंगे कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत नोबेल क्यों नहीं जीतता.


वीडियो देखें- गृहमंत्री की बेटी को छुड़ाने के लिए 5 आतंकियों की रिहाई, क्या कोई षड्यंत्र था? 

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