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पाकिस्तान का अपना रिपोर्टर बना 1971 की हार का कारण

13 जून 1971 को UK के संडे टाइम्स अख़बार में एक खबर छपी. खबर की शुरुआत कुछ यूं थी.

“अब्दुल बारी की क़िस्मत जवाब दे चुकी थी. पूर्वी बंगाल के हज़ारों लोगों की तरह उसने भी एक अज़ीम गुनाह कर डाला था. गुनाह ये कि वो पाकिस्तानी पेट्रोलिंग पार्टी की निगाह में आ गया. 24 साल का दुबला-पतला अब्दुल फ़ौजियों से घिर चुका था. उसके हाथ पैर कांप रहे थे, उसे अंदाज़ा हो चुका था कि अब वो सिर्फ़ चंद मिनटों का मेहमान है.”

कहां UK और कहां पूर्वी बंगाल. सवाल ये कि वहां से ये रिपोर्ट (खबर) इतनी दूर पहुंची कैसे, और लिखने वाला था कौन. ज़ाहिर सा जवाब है, एक पत्रकार. पत्रकारिता के उसूल पूछेंगे तो किसी ना किसी नम्बर पर ये जवाब ज़रूर मिलेगा, पत्रकार के लिए ज़रूरी है कि वो कहानी कहे, खुद कहानी ना बन जाए. लेकिन पत्रकार भी इंसान है. और इंसान की कहानी, कब किस मोड़ पे कौन सा रुख ले ले. कहा नहीं जा सकता. आज किस्सा एक ऐसे ही पत्रकार का. जिसकी लिखी एक रिपोर्ट ने दक्षिण एशिया का नक़्शा बदलकर रख दिया. कौन था ये पत्रकार और उनकी एक रिपोर्ट ने 1971 युद्ध में क्या भूमिका निभाई. जानेंगे आज के एपिसोड में.

1971 युद्ध की शुरुआत

3 दिसम्बर 1971 को भारत पाकिस्तान युद्ध की आधिकारिक शुरुआत हुई थी. इंदिरा गांधी तब दिल्ली से बाहर थीं. जैसे ही उन्हें सूचना मिली कि पाकिस्तानी जंगी जहाज़ों ने भारत पर हमला कर दिया है. इंदिरा दिल्ली लौट गईं.

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सैम मानेकशॉ ने इंदिरा से युद्ध की तैयारी के लिए 6 महीने का वक्त मांगा था (फ़ाइल फोटो)

उन्होंने सेना के अफसरों और कैबिनेट के नेताओं के साथ रात के ग्यारह बजे एक मीटिंग की और उसके बाद आधी रात को ऑल इंडिया रेडियो से अनाउंस किया-

“कुछ ही घंटों पहले पाकिस्तानी हवाई जहाज़ों ने हमारे अमृतसर, पठानकोट, श्रीनगर, अवंतीपुर, उत्तरलाई, जोधपुर, अम्बाला और आगरे के हवाईअड्डों पर बमबारी की. मुझे ज़रा भी संदेह नहीं है कि विजय भारत की जनता की, भारत की बहादुर सेना की होगी.”

इसके ठीक तीन दिन बाद आज ही के दिन यानी 6 दिसम्बर 1971 को इंदिरा ने संसद में घोषणा की. भारत ने बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर मान्यता दे दी थी. इस घोषणा के बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ सभी डिप्लोमेटिक रिलेशन ख़त्म कर दिए. पूर्वी पाकिस्तान में अगले दिन यानी 7 दिसम्बर को चुनाव होने थे. उन्हें भी निरस्त कर दिया गया.

ज़मीन पर जहां सेना ने जंग की शुरुआत की. वहीं वैश्विक स्तर पर भी गोटियां सेट की जा रही थीं. शीत युद्ध अपनी चोटी पर था. अमेरिका में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान का समर्थन कर रहे थे. अमेरिका नए सिरे से चीन से संबंध बनाने की क़वायद में था. और इसमें मोहरा था पाकिस्तान, जिसके चीन के साथ सम्बंध अच्छे थे. किसिंजर बार-बार चीन को पाकिस्तान की मदद करने के लिए उकसा रहे थे. लेकिन भारत की तैयारी पूरी थी. लगभग किवदंती बन चुका किस्सा है. मानेकशॉ ने इंदिरा से युद्ध की तैयारी के लिए 6 महीने का वक्त मांगा था. और इन 6 महीनों में भारत ने 3 फ़्रंट पर लड़ाई की तैयारी कर ली थी. वेस्टर्न फ़्रंट, ईस्टर्न फ़्रंट और इंडो चायनीज़ बॉर्डर पर.

आख़िर अमेरिका की मंशा क्या है?

भारत तैयार था कि अगर युद्ध में चीन उतरे, तो उसका भी माकूल जवाब दिया जा सके. चीन ने भी किसिंजर की बात को नज़रंदाज़ करते हुए युद्ध में उतरने से इनकार कर दिया. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याहया ख़ान चीन और अमेरिका के भरोसे थे. पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला सैनिक विद्रोह कर चुके थे. हार निश्चित देख उन्होंने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को संयुक्त राष्ट्र भेजा. युद्ध को शुरू हुए 9 दिन हुए थे कि 12 दिसंबर, 1971 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक बुलाई गई. ज़ुल्फ़िकार पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे थे. और उनका साथ दे रहे थे, संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के प्रतिनिधि जॉर्ज बुश सीनियर. भारत की तरफ़ से इंदिरा गांधी ने विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह को UN की बैठक में शामिल होने के लिए भेजा.

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याहया खान और रिचर्ड निक्सन (तस्वीर: एएफ़पी)

जॉर्ज बुश सीनियर की बारी आई, तो उन्होंने स्वर्ण सिंह की ओर मुख़ातिब होकर एक सवाल पूछा, आख़िर भारत की मंशा क्या है? स्वर्ण सिंह ने नहले-पे-दहला मारते हुए उल्टा सवाल दागा, भारत तो पड़ोसी है, आख़िर अमेरिका की मंशा क्या है? संयुक्त राष्ट्र में बैठक अभी चल ही रही थी कि निक्सन और किसिंजर ने अमेरिका से अपनी सेवंथ फ्लीट से टास्क फोर्स 74 नाम के एक नौसैनिक बेड़े को बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना किया. बहाना दिया कि ऐसा अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए किया गया है. जबकि एक दिन पहले ही सभी अमेरिकी नागरिकों को ढाका से निकाला जा चुका था. अगर कोई अमेरिकी नागरिक पीछे रह भी गया था, तब भी ये समझ से बाहर था कि उसे निकालने के लिए परमाणु शक्ति से चलने वाला एक विमानवाहक पोत क्यों भेज दिया गया था.

टास्क फोर्स 74 का नेतृत्व कर रहा था- यूएसएस एंटरप्राइज़. एंटरप्राइज़ एक चलता फिरता एयरफोर्स स्टेशन था, जिसके पास ताकत का अकूत भंडार था. फिर वो अकेला भी नहीं आ रहा था. उसके साथ 7 डिस्ट्रॉयर एक हैलिकॉप्टर वाहक यूएसएस ट्रिपोली और एक टैंकर शामिल था. भारतीय नौसेना के पास भी विमानवाहक पोत था – आईएनएस विक्रांत. लेकिन तब हम एक न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर से टकराने लायक मज़बूत नहीं थे.

हालांकि, लड़ाई का इरादा अमेरिका का भी नहीं था. वो वियतनाम युद्ध में फंसा हुआ था. जिसके ख़िलाफ़ अमेरिकी लोग सड़कों पर थे. ऐसे में अमेरिका एक और युद्ध में अपने हाथ जलाने का जोखिम नहीं ले सकता था. लेकिन उसकी इतनी मंशा ज़रूर थी कि अमेरिकी बेड़े को देखकर भारत पर दबाव बनेगा.

सोवियत संघ की एंट्री

तब भारत की मदद के लिए आगे आया, सोवियत संघ. जिसने पहले संयुक्त राष्ट्र में तीन बार सुरक्षा परिषद के युद्धविराम के प्रस्ताव पर वीटो कर भारत को बचाया. दोस्ती का वादा निभाते हुए सोवियत संघ ने हिंद महासागर में अपने नौसैनिक बेड़े को अमेरिकी बेड़े के पीछे लगा दिया. और सोवियत बेड़े में जानबूझकर एक ऐसी पनडुब्बी को भेजा गया, जो परमाणु हथियारों से लैस थी. साथ में एक माइन्स्वीपर को बंगाल की खाड़ी में तैनात कर दिया. इसने अमेरिका के सैनिक विकल्पों को एक झटके में खत्म कर दिया. अब भारत पर से सारा दबाव लगभग चला गया था. बहरहाल, सोवियत संघ की हरकत से किंसिंजर इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने निक्सन से बिना पूछे शिखर वार्ता को रद्द करने की धमकी दे डाली. लेकिन सोवियत का बेड़ा बंगाल की खाड़ी में तब तक डटा रहा, जब तक कि 1972 के पहले सप्ताह में अमेरिकी बेड़ा वहां से चला नहीं गया.

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निक्सन  के कार्यकाल में UN में अमेरिका के राजदूत रहे जॉर्ज बुश सीनियर जो आगे जाकर अमेरिका के राष्ट्रपति बने (तस्वीर: Getty)

यहां एक बात नोट कीजिए, ये बात सच है कि भारत और सोवियत के रिश्ते हमेशा से अच्छे थे. लेकिन वैश्विक परिदृश्य में कोई देश फ़ालतू में किसी की मदद को नहीं आता. वो भी तब, जब इसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच एक महत्वपूर्ण शिखर वार्ता होनी थी. सोवियत संघ के इस कदम की ज़मीन बहुत पहले तैयार हो चुकी थी. जब युद्ध से कुछ महीने पहले इंदिरा गांधी ने मॉस्को और यूरोप का दौरा किया था. युद्ध के समाप्त होने के बाद द संडे टाइम्स में एक इंटरव्यू छपा. एक सवाल के जवाब में इंदिरा ने बताया कि द संडे टाइम्स के एक आर्टिकल को पढ़कर ही उन्होंने यूरोप और मॉस्को का दौरा करने का फ़ैसला किया था. ये वही आर्टिकल था जिसके बारे में हमें आपको शुरुआत में बताया.

इस आर्टिकल से दुनिया को पहली बार पूर्वी पाकिस्तान में सेना के कारनामों का पता चला था. ऑपरेशन सर्चलाइट की शुरुआत से पहले ही बांग्लादेश से विदेशी पत्रकारों को निकाला जा चुका था. और बिना पाकिस्तानी सेना की सहमति के कोई भी न्यूज़ नहीं छाप सकता था. ऐसे में ये आर्टिकल आया कहां से? जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं.

एंथनी मेस्करनेस

1970 में पाकिस्तान में जनरल इलेक्शन हुए. पाकिस्तान की नेशनल असेम्ब्ली में 313 सीटें थीं. जिनमें से 169 पूर्वी पाकिस्तान में थीं. पूर्वी पाकिस्तान की बड़ी पार्टी आवामी लीग ने 167 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया. मतलब प्रधानमंत्री उनकी पार्टी से बनना था. लेकिन राष्ट्रपति याहया ख़ान नहीं चाहते थे कि पूर्वी पाकिस्तान की पार्टी देश पर राज करे. ऐसे में दिसम्बर 1970 के बाद ही पूर्वी पाकिस्तान में प्रदर्शन शुरू हो गए.

25 मार्च 1971 को पश्चिम पाकिस्तान ने सेना भेजकर आवामी लीग और स्थानीय हिंदू और बंगाली जनता का दमन करना शुरू कर दिया. ढाका यूनिवर्सिटी, जो आंदोलन का केंद्र थी, वहां छात्रों और प्रोफ़ेसरों को लाइन में खड़ा कर गोली मार दी गई. और इसके बाद गांवों और क़स्बों में लाखों लोगों की हत्या का प्रोग्राम शुरू हुआ. सेना के ऑफ़िसर इसे ‘फ़ाइनल सोल्यूशन’ का नाम दे रहे थे. वही टर्म जो कभी हिट्लर की नाज़ी नाज़ी पार्टी ने यहूदियों के नरसंहार के लिए दिया था.

भारतीय इंटेलिजेन्स को इसकी भनक थी. और जब भारत में रिफ़्यूजियों का आगमन हुआ, तो समस्या अकेले पाकिस्तान की नहीं रह गई थी. इंटेलिजेन्स सोर्सेस ने पता लगाया कि बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) में चल क्या रहा है. लेकिन बाकी दुनिया इससे अंजान थी. कम से कम पब्लिक तो ख़ास तौर पर. यकीनन अमेरिका चीन जैसे देशों की सरकारों को इसका पता था. लेकिन शीत युद्ध की हवा पाकिस्तान की तरफ़ बह रही थी. इसलिए कोई कुछ नहीं कह रहा था.

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1970 में पाकिस्तान में पहली बार जनरल इलेक्शन हुए जिसमें पूर्वी पाकिस्तान की आवामी लीग पार्टी जीती (फ़ाइल फोटो)

दूसरी तरफ़ पूर्वी पाकिस्तान में आर्मी को विरोध कुचलने में सफलता मिल रही थी. ये देखकर याहया ख़ान ने सोचा कि चलो, अपने लिए कुछ पोईंट्स जुटाए जाएं. पश्चिमी पाकिस्तान से 8 रिपोर्टर की एक टीम पूर्वी पाकिस्तान पहुंची. ताकि इस बात कि ढींगें हांकी जा सकें कि सेना ने पाकिस्तान के ग़द्दारों को सबक़ सिखा दिया है.

10 दिन का टूर हुआ और पत्रकारों को जैसा सिखाया गया था, वैसा उन्होंने वापस जाकर छाप भी दिया. सिवाय एक के. पत्रकार का नाम था एंथनी मेस्करनेस. अंग्रेज़ी नाम से धोखा मत खाइए. शुद्ध पाकिस्तानी पत्रकार थे. 10 दिन के टूर के बाद मेस्करनेस वापस पाकिस्तान पहुंचे. जो हैवानियत उन्होंने देखी थी, उसने उनकी रातों की नींदे हराम कर दी थी. परिवार वालों ने पूछा तो मेस्करनेस ने सच्चाई बयान की. उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, मैंने जो नजारा देखा है, अगर उसकी सच्चाई नहीं लिखी, तो कभी दुबारा एक शब्द भी नहीं लिख पाऊंगा.

कराची टू लंदन

लेकिन पाकिस्तान में असलियत लिखना आसान तो था नहीं. हर अख़बार की रिपोर्ट मिलिटरी सेंसर से होकर गुजरती थी. और अगर मेस्करनेस सच्चाई लिखने की कोशिश भी करते, तो उन्हें गोली मार दी जाती. मेस्करनेस की बहन तब लंदन में रहती थीं. उनकी बीमारी का बहाना मार के मेस्करनेस लंदन और वहां से सीधे संडे टाइम्स के दफ़्तर पहुंचे. खबर दुनिया हिला देने वाली थी. एडिटर ने छापने के लिए हामी तो भर दी. लेकिन एक और मुसीबत थी. मेस्करनेस का परिवार पाकिस्तान में ही था. और रिपोर्ट छपने से पहले उनका पाकिस्तान से निकलना ज़रूरी था.

रिपोर्ट एडिटर को सौंप कर मेस्करनेस पाकिस्तान रवाना हुए. और एडिटर से कहा, जब तक उनका परिवार पाकिस्तान से निकल ना जाए. रिपोर्ट छपनी नहीं चाहिए. पाकिस्तान में तब नियम था कि नागरिक सिर्फ़ एक बार विदेशी उड़ान भर सकते थे. इसलिए मेस्करनेस को अपने परिवार सहित पहले अफ़ग़ानिस्तान में दाखिल होना पड़ा. और वहां से वो लंदन पहुंच पाए. जिस दिन मेस्करनेस का परिवार लंदन पहुंचा. अगले ही दिन संडे टाइम्स के पहले पन्ने में बोल्ड लेटर में छपा. जेनॉसायड.

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मार्च 1971 में संडे टाइम्स में पकिस्तानी पत्रकार ऐन्थनी मेस्करेनस की रिपोर्ट (तस्वीर: द संडे टाइम्स)

इस आर्टिकल के थ्रू पहली बार पूरी दुनिया को पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर हुए नरसंहार का पता चला. युद्ध के बाद इंदिरा गांधी ने संडे टाइम्स के एडिटर हैरल्ड इवांस के साथ इंटरव्यू में इस आर्टिकल का ज़िक्र किया. उन्होंने बताया कि रेफ़्यूजी के पलायन और इंटेलिजेन्स सोर्स से उन्हें पूर्वी पाकिस्तान के हालत का अंदाज़ा था. लेकिन मेस्करनेस के आर्टिकल को पढ़कर उन्हें पहली बार उस वीभत्सता का अहसास हुआ, जो पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के साथ बरती जा रही थी. इंदिरा ने आगे बताया कि इस आर्टिकल को पढ़कर वो इतनी शॉक हुईं कि उन्होंने तभी निर्णय ले लिया कि वो यूरोप और मॉस्को का दौरा करेंगी.

पत्रकारों की बदौलत

संडे टाइम्स में छपे आर्टिकल की बदौलत भारत को युद्ध में स्टैंडिंग मिली. और मॉस्को और बाकी यूरोपीय राजधानियों का दौरा कर इंदिरा ने बांग्लादेश में भारत के दख़ल की ज़मीन तैयार की. पाकिस्तान के नज़रिए से मेस्करनेस ग़द्दार थे. लेकिन इसके बावजूद मेस्करनेस पाकिस्तान से बड़ी खबरें क्रैक करते रहे. 1979 में पाकिस्तान ने जब न्यूक्लियर अस्त्र तैयार किए तो इसे रिवील करने वाले वो पहले पत्रकार थे.

बांग्लादेश में आज भी उन्हें हीरो की तरह देखा जाता है. बांग्लादेश के लिबरेशन वार म्यूज़ियम में आज भी उनका यह आर्टिकल रखा हुआ है. संयोग रहा कि भारत पाकिस्तान युद्ध के ठीक 15 साल बाद यानी 3 दिसम्बर 1986 को मेस्करनेस की मृत्यु हो गई. उनका परिवार आज भी लंदन में ही रहता है. युद्ध के क़िस्सों को सुनाते-सुनाते, हम भूल जाते हैं कि ऐसा उन जांबाज पत्रकारों की बदौलत होता है, जो अपनी जान जोखिम में डालकर, ये कहानियां और सच हमारे आपके सामने लाते हैं.


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