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कोहिनूर याद है लेकिन करोड़ों का नीलम भूल गया भारत

किसी चीज़ की असली क़ीमत क्या होती है?

ये जानने के लिए कॉस्ट vs वैल्यू का अंतर समझना ज़रूरी है. और ये समझे बिना कोई भी व्यापार करना मुश्किल है. विक्रेता के लिए कॉस्ट का अर्थ है, किसी सामान या सर्विस को प्रोवाइड करने में उसका कितना माल खर्च हुआ. जबकि वैल्यू का ज़िम्मा ख़रीदार के हिस्से आता है. सामान या सर्विस का उसके लिए क्या मूल्य है, या क्या अहमियत है, यही तय करता है कि सामान या सर्विस की वैल्यू क्या होगी.

यूं तो कॉस्ट और वैल्यू को मुद्रा के स्केल में नापा जाता है. जैसे डॉलर या पैसे. लेकिन तब क्या हो जब ये स्केल टाइम का हो?

यानी किसी चीज़ की वैल्यू इस बात से भी निर्धारित हो सकती है कि उसमें समय कितना खर्च हुआ है. उदाहरण के लिए चलिए कोहिनूर को ही लेते हैं. 105.6 कैरेट का हीरा जो अब ब्रिटिश क्राउन के पास है. पैसों में कोहिनूर की क़ीमत तय नहीं हो सकती. क्योंकि ना किसी ने इसे कभी ख़रीदा, ना बेचा. तब इसकी क़ीमत तय होगी वर्षों में. अंग्रेजों के लिए ये क़ीमत है 200 साल. क्योंकि लगभग इतने ही साल उन्होंने भारत पर राज किया.

कोहिनूर की कहानी

कोहिनूर कहां से आया, किस खदान से निकला. ठीक-ठीक बताना मुश्किल है. लेकिन एक बात पक्की है कि भारत में ही पाया गया था. और ये बात इतने कॉन्फ़िडेन्स से इसलिए कही जा सकती है क्योंकि 1725 तक भारत पूरी दुनिया में हीरों का एकमात्र सोर्स हुआ था.

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शाहजहां और मुग़ल मोर गद्दी (तस्वीर : Wikimedia Commons)

कोहिनूर का ज़िक्र पहली बार मिलता है बाबर के लिखे में. उसके अनुसार कोहिनूर अलाउद्दीन ख़िलजी के पास हुआ करता था. बाबर के बाद कोहिनूर का ज़िक्र सीधे शाहजहां के टाइम में आता है. जब ताजमहल बन रहा था, उसी दौरान शाहजहां एक शाही तख़्त भी बनवा रहा था, मोरगद्दी. जिसे बनवाने में 7 साल लगे और ताजमहल से 4 गुना खर्चा हुआ. इस मोरगद्दी में सबसे ऊपर लगा हुआ था, कोहिनूर. जिसे मुग़ल बादशाह अपनी शान समझा करते थे.

कोहिनूर का अगला ज़िक्र आता है 1739 में, जब नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया. दिल्ली की लूट में उसे इतना ख़ज़ाना मिला कि 700 हाथी, 4000 ऊंट और 12000 घोड़ों में लादकर ले जाना पड़ा. इनमें मोर गद्दी और कोहिनूर भी शामिल थे. आगे चलकर कोहिनूर दुर्रानी शासकों के हाथ लगा. 1813 में जब शुजा शाह दुर्रानी का तख्तापलट हुआ तो वो भागकर लाहौर पहुंचा.

लाहौर से ब्रिटेन

तब लाहौर पर सिख महाराजा रणजीत सिंह का राज हुआ करता था. लाहौर पहुंचकर दुर्रानी ने उनसे शरण मांगी और बदले में कोहिनूर भेंट किया. महाराजा रणजीत सिंह ने दुर्रानी से कोहिनूर की क़ीमत पूछी तो उसने जवाब में बताया,

‘कोहिनूर को आठ दिशाओं में फेंकों और उस पूरी जगह को सोने से भर दो तो भी उसकी क़ीमत कोहिनूर जितनी नहीं होगी.’

ये सुनकर महाराजा रणजीत सिंह बहुत खुश हुए और कोहिनूर को हमेशा अपने साथ रखने लगे. ख़ासकर जब किसी विशेष दौरे पर जाना हुआ तो. इन दौरों में उनकी मुलाक़ात ब्रिटिश EIC के अफ़सरों से हुई तो उनकी नज़र भी कोहिनूर पर पड़ी. रणजीत सिंह के कोहिनूर की क़ीमत उसकी शान थी. लेकिन अंग्रेजों के लिए उसका मूल्य ये था कि वो उत्तर-पश्चिम भारत में शक्ति का सिम्बल था.

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महाराजा रणजीत सिंह (तस्वीर: wikimedia commons)

भारत पर शासन करने के लिए ज़रूरी था उसके सिंबल पर कब्जा. इसलिए जब अंग्रेजों ने 1849 में दूसरी ऐंग्लो-सिख वॉर जीती तो उन्होंने एक विशेष मांग रखी. ये कि कोहिनूर उन्हें सौंप दिया जाए. तब तक कोहिनूर जम्मू-कश्मीर के राजा गुलाब सिंह के पास चला गया था. गुलाब सिंह की ताक़त ज़्यादा थी नहीं. कश्मीर का शासन भी अंग्रेजों का दान किया हुआ था. इसलिए उसे कोहिनूर अंग्रेजों को सौंपना पड़ा.

इसके बाद ब्रिटेन ले जाकर कोहिनूर महारानी विक्टोरिया के आगे पेश किया गया. विक्टोरिया ने कोहिनूर की एक प्रदर्शनी आयोजित की. लेकिन ठीक से पॉलिशिंग ना होने का कारण किसी को कोहिनूर में कुछ ख़ास लगा नहीं. तब कोहिनूर की कटिंग की गई और वो 185 से 105 कैरेट का रह गया.

आगे जाकर ये ब्रिटेन की महारानी के मुकुट में जड़ा. मुग़ल वंश और सिख एम्पायर के ख़ात्मे के चलते कोहिनूर के साथ एक अंधविश्वास भी जुड़ा. इसलिए ब्रिटेन के किसी राजा के मुकुट पर कोहिनूर को नहीं जड़ा गया. आमतौर पर समझा जाता है कि ब्रिटेन की मौजूदा महारानी एलिज़ाबेथ-2 के मुकुट पर कोहिनूर जड़ा है लेकिन ये सच नहीं है. ये उनकी मां एलिज़ाबेथ-1 के मुकुट में जड़ा था. एलिज़ाबेथ-2 जब रानी बनी तब आख़िरी बार इसे पहना गया था.

‘स्टार ऑफ़ इंडिया’

आगे चलकर 1981 में इन्हीं एलिज़ाबेथ-2 की बहू बनी प्रिन्सेस डायना. प्रिन्स चार्ल्स की पूर्व पत्नी. जो पब्लिक में अति फ़ेमस हुआ करती थी. और जब चार्ल्स और डायना की सगाई हुई तो कुछ समय के लिए एक नए ज्यूल ने कोहिनूर को प्रसिद्धि में पीछे छोड़ दिया.

हुआ यूं कि डायना से जब अंगूठी चुनने को कहा गया तो उन्होंने शाही ज़ेवर छोड़कर एक आम अंगूठी चुनी. सस्ती वो भी नहीं थी पर रॉयल परिवार से बाहर कोई और भी उसे ख़रीद सकता था. ये जानकर रानी एलिज़ाबेथ को तो बहुत ग़ुस्सा आया. लेकिन पब्लिक एकदम खुश थी. डायना की नीली अंगूठी, खबरों और फ़ैशन का हिस्सा बन गई.

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प्रिन्स डायना और उनकी अंगूठी (तस्वीर: Getty)

इस अंगूठी में लगा था एक नीला नीलम. वैसे तो नीलम सफ़ेद होता है. लेकिन अलग अलग इम्प्यूरिटीज़ के चलते उसके रंगों में भिन्नता आ जाती है. ये नीला नीलम आया था श्रीलंका के एक शहर, रत्नागिरी से. नाम से ही पता चलता है कि रत्नों का शहर है.

यहां कहानी में एंट्री होती है ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ की. ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ 563 कैरेट का एक नीला नीलम है. साइज़ में गोल्फ़ की बॉल जितना. दुनिया के सबसे बड़े जवाहरात में से एक. इसकी ख़ास बात है कि ‘टायटेनियम ऑक्साइड’ की प्रेजेंस के चलते इसके दो सिरों पर सितारे का पैटर्न बनता है.

अभी कहां है? अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नैचुरल हिस्ट्री, न्यू यॉर्क में. स्टार ऑफ़ इंडिया के साथ एक कंट्रोवर्सी भी जुड़ी है. वो ये कि सितारों के पैटर्न वाला ऐसा नीलम सिर्फ़ श्रीलंका में मिलता है.

नाम में इंडिया

इतिहास के हिसाब से स्टार ऑफ़ इंडिया की कहानी शुरू होती है 1900 में. JP मॉर्गन बैंक का नाम आपने सुना होगा. इसके मालिक JP मॉर्गन 1900 में पेरिस के मेले में जवाहरात की एक प्रदर्शनी लगाना चाहते थे. उन्होंने सम्पर्क किया जॉर्ज कंज से. जो जवाहरात के एक्स्पर्ट हुआ करते थे. रत्नों के साथ एक ख़ास बात ये है कि इनकी अहमियत वक्त से तय होती है. अमेरिका कुल 400 साल पुराना देश था.

वहां ऐतिहासिक महत्व के जवाहरात मिलना मुश्किल था. ऐसे रत्न सिर्फ़ यूरोप में मिल सकते थे. और ब्रिटेन के पास ऐसे रत्नों का एक अच्छा-ख़ासा सोर्स था, भारत. कंज ब्रिटेन गए और एक ब्रिटिश इंडियन ऑफ़िसर से मिले. ऑफ़िसर ने भारत से कुछ ख़ास रत्न लाने का वादा किया. और वो सितारों वाला नीलम लेकर कंज के पास पहुंचा. तब बाकी दुनिया के लिए बर्मा, भारत और श्रीलंका, ये सब ब्रिटिश उपनिवेश थे. और इन सबको मोटे तौर पर इंडिया कहकर ही रेफ़र किया जाता था.

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जेपी मॉर्गन (तस्वीर: Getty)

इसलिए कंज ने सितारों वाले नीलम को नाम दिया स्टार ऑफ़ इंडिया. इसके अलावा ऐसा ही एक नीलम महाराजा जोधपुर के पास भी हुआ करता था. जिसका नाम था, स्टार ऑफ़ एशिया. इसलिए ये माना गया कि स्टार ऑफ़ इंडिया भी भारतीय रियासतों से आया है. पेरिस में प्रदर्शनी के बाद JP मॉर्गन ने सारे जवाहरात अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नैचुरल हिस्ट्री को दान कर दिए. जहां इन्हें मॉर्गन हॉल ऑफ़ मिनरल्स में रखा गया.

न्यू यॉर्क हाइस्ट

1964 में ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ फ़ेमस हुआ एक जवाहरात हाइस्ट के चलते. ये हाइस्ट आज ही के दिन यानी 29 अक्टूबर को हुई थी. जिसमें करोड़ों के जवाहरात चोरी कर लिए गए थे. और चोरी हुए जवाहरात में से एक ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ भी था. ये आज वाला न्यू यॉर्क नहीं था. 1990 तक न्यू यॉर्क में औसतन हर घंटे एक चोरी हुआ करती थी. लेकिन तब अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नैचुरल हिस्ट्री में लूट की ये पहली घटना थी. क्या हुआ था उस रात?

29 अक्टूबर 1964 की रात म्यूज़ियम के बाहर एक सफ़ेद कैडिलैक आकर रुकी. कार में से दो लड़के उतरे और फ़ेंस फ़ांदकर म्यूज़ियम के अहाते में घुस गए. एक लड़का बाहर ही रुका ताकि पुलिस आए तो इत्तिला कर सके. अंदर जाकर दोनों लड़के एक फ़ायर इस्केप की मदद से म्यूज़ियम की छत पर चढ़े. वहां उन्होंने एक खम्बे से रस्सी बांधी और झूलते हुए जवाहरात हॉल की एक खिड़की तक पहुंच गए. वेंटीलेशन के लिए खिड़की खुली छोड़ी गई थी. इसलिए अंदर घुसने में दोनों को कोई दिक़्क़त पेश नहीं आई.

अंदर पहुंचकर दोनों ने एक ग्लास क़टर की मदद से तीन डिस्प्ले केसेस को काटा. और 24 बेशक़ीमती रत्न अपने साथ ले गए. इनमें से एक स्टार ऑफ़ इंडिया भी था. और तब ये दुनिया का सबसे बड़ा नीलम हुआ करता था. इस डर से कि साइलेंट अलार्म ना ट्रिप हो जाए, दोनों जिस रास्ते आए थे उसी रास्ते वापस निकल गए.

अगले दिन पुलिस पहुंची तो पता चला कि अलार्म की बैटरी तीन महीने से डेड पड़ी थी. पहले gem हॉल के अंदर एक गार्ड भी तैनात होता था लेकिन सालों से चोरी की कोई कोशिश नहीं हुई तो उसे भी हटा लिया गया था. चोरी किए जवाहरात की क़ीमत तब के हिसाब से 22 करोड़ रुपए थी. इनका प्रीमियम ही इतना बनता था कि insurance भी नहीं कराया गया था.

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अख़बार में हाइस्ट की खबर और स्टार ऑफ़ एशिया (तस्वीर: डेली न्यूज़ और getty)

तब के हिसाब से ये न्यू यॉर्क की सबसे बड़ी जवाहरात हाइस्ट थी. न्यू यॉर्क से लेकर मायामी तक चोरों का पीछा किया गया. अगले दो दिनों में चोरों को तो पकड़ लिया गया. लेकिन जवाहरात का पता लगाने में पुलिस को 3 महीने लग गए. जनवरी 1965 में पुलिस को ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ मायमी के एक बस लॉकर में मिला.

फ़ेमस होने के चलते इसे किसी ने नहीं ख़रीदा था. साथ ही 9 और जवाहरात भी मिल गए लेकिन 12 जवाहरात कभी नहीं मिल पाए. तब से लेकर आज तक ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ न्यू यॉर्क के अमेरिकन म्यूज़ियम ऑफ़ नैचुरल हिस्ट्री में कड़ी सुरक्षा में रखा हुआ है.

कोहिनूर पर किसका हक़

WW2 ख़त्म हुआ तो ब्रिटेन ने मांग रखी कि नाज़ियों ने जितना सोना चुराया है, वो सब वापस लौटाया जाए. लेकिन कोहिनूर और बाकी ऐसे ही बेशक़ीमती जवाहरातों के नाम पर ब्रिटेन के मुंह पर ज़िप लग जाती है.

भारत ही नहीं पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, भारत और ईरान सब कोहिनूर और बाकी रत्नों की वापसी की मांग समय-समय पर करते रहते हैं. श्रीलंका भी 2014 तक दावा करता रहा कि ‘स्टार ऑफ़ इंडिया’ का नाम ‘स्टार ऑफ़ श्रीलंका’ कर उसे वापस लौटाया जाना चाहिए. लेकिन 2016 में रत्नागिरी में जब इससे भी बड़ा नीलम पाया गया तो श्रीलंका की ये मांग शांत हो गई.

नया नीलम 1400 कैरेट का था. उसका नाम रखा गया ‘स्टार ऑफ़ ऐडम’. इसके अलावा इसी साल जनवरी में रत्नागिरी में एक घर के पीछे ‘स्टार नीलम’ का एक क्लस्टर मिला. जिसका वजन 510 kg या 25 लाख कैरेट है. इसकी कुल क़ीमत 750 करोड़ के लगभग आंकी गई है. भारत में नीलम कम ही पाया जाता है. ख़ासकर स्टार पैटर्न वाला. इसलिए कोहिनूर के साथ स्टार ऑफ़ इंडिया ही मिल जाए तो अपन संतुष्ट हो लेंगे.


वीडियो देखें- 1929 में अमेरिका में आई आर्थिक मंदी ने कैसे भारत में तबाही मचाई थी?

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