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जब कश्मीर की घड़ियां आधा घंटा पीछे चलने लगीं

अप्रैल 1988 की बात है. इस्लामाबाद में एक टॉप सीक्रेट मीटिंग चल रही थी. अपनी बुलंद आवाज़ में राष्ट्रपति जनरल ज़िया-उल-हक़ फ़रमाते हैं,

“जेंटलमेन, शक-ओ-सुबाह की कोई गुंजाइश नहीं है. हमारा एक और सिर्फ़ एक मिशन है. कश्मीर की आज़ादी. हमारे मुस्लिम कश्मीरी भाइयों को अब और अधिक समय तक भारत के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती है. कश्मीरियों में कुछ हुनर हैं, जिनका हम फायदा उठा सकते हैं. पहला, उनकी शातिर बुद्धि; दूसरा, दबाव सह सकने की उनकी क्षमता, और तीसरी, उनकी राजनीतिक जागरूकता. हमें बस उन्हें साधन मुहैया कराने की ज़रूरत है.”

माना जाता है कि ज़िया ने तब इस ऑपरेशन को नाम दिया था, ऑपरेशन टूपाक. जिसका उद्देश्य था कश्मीर में भारत विरोधी भावनाएं भड़काना. 1988 अगस्त में ज़िया की एक प्लेन क्रैश में मृत्यु हो गई. लेकिन ऑपरेशन टूपाक जारी रहा. जिसका पहला असर तो ज़िया की मौत पर ही दिखा. तब कश्मीर में जुलूस निकले. नारे चले जिनमें कहा गया, “तमाशा नहीं, ये मातम है”.

आज 19 जनवरी है. और आज की तारीख का संबंध है कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से.

शेख़ अब्दुल्ला की मौत के बाद

शुरुआत 1982 से. तब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख़ अब्दुल्ला की मृत्यु हुई और नेशनल कॉन्फ़्रेन्स की लीडरशिप उनके बेटे फ़ारूख अब्दुल्ला के हाथ में आ गई. सरकार को दो साल हुए थे कि नेशनल कॉन्फ़्रेन्स में फूट पड़ गई. जिसका ज़िम्मेदार केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार को ठहराया गया. इसके बाद कांग्रेस के सपोर्ट से ग़ुलाम मुहम्मद शाह मुख्यमंत्री हो गए. सरकार के पहले 90 में से 72 दिन तो कर्फ्यू ही लगा रहा. तब इस दौर को ‘गुल-ए-कर्फ्यू’ का नाम दिया.

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ग़ुलाम मुहम्मद शाह (तस्वीर: timescontent.in)

कश्मीर में इसे लेकर नाराज़गी के स्वर उठे. तो ग़ुलाम मुहम्मद शाह में बहुसंख्यक मुसलमान आबादी को खुश करने के लिए एक खतरनाक निर्णय लिया. ऐलान हुआ कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर भव्य शाह मस्जिद बनवाई जाएगी. लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया तो जवाब में कट्टरपंथियों ने नारा दिया कि इस्लाम खतरे में है.

इस घटना के बाद से ही धीरे-धीरे अलगाववादी संगठनों ने कश्मीर में अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी. इनमें सबसे मुख्य था जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट. जिसको पूरा सपोर्ट मिल रहा था पाकिस्तान से. 1984 में ही दो और घटनाएं हुई. जिसने जम्मू कश्मीर के हालात पर गहरा असर डाला. पहला मक़बूल भट्ट की फांसी और दूसरा PM इंदिरा गांधी की हत्या. फिर 1985 में शाह बानो प्रकरण हुआ.

राजनैतिक बैलेन्स बनाने के चक्कर में 1986 में राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद के दरवाज़े खोल दिए, ताकि वहां पूजा अर्चना शुरू हो सके. इस पूरे घटनाक्रम की लहरें कश्मीर तक पहुंची. और वहां विद्रोह के स्वर और भड़क उठे. उसी साल अनंतनाग में मंदिरों को तोड़ने की घटनाएं हुई. कश्मीरी पंडितों की दुकानों पर हमला हुआ. इसके बाद 1986 में ग़ुलाम मुहम्मद शाह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया.

1987 में चुनाव

23 मार्च 1987 के रोज़ कश्मीर में फिर चुनाव हुए. कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ़्रेन्स मिलकर चुनाव लड़ रहे थे. राज्य की दो सबसे बड़ी पार्टियां यही थी. इनके विरोध में जमात-ए-इस्लामी जैसे मुस्लिम संगठनों ने मिलकर एक नई पार्टी बनाई. नाम था मुस्लिम यूनाइटेड फ़्रंट (MUF). इनका कहना था कि फ़ारूख अब्दुल्ला ने दिल्ली के आगे घुटने टेक दिए हैं. इसलिए वो कश्मीर को रिप्रेजेंट नहीं कर सकते.

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फ़ारूख अब्दुल्ला और राजीव गांधी (तस्वीर: getty)

इस चुनाव में 75 % वोट पड़े. नतीजे में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ़्रेन्स गठबंधन को 66 सीटें मिली. MUF 44 सीटों पर लड़ी थी. 31 % वोट मिलने के बावजूद वो सिर्फ़ 4 सीट पर जीत पाई. बड़ी संख्या में वोट मिलने के बावजूद MUF को सीटें कम मिली थी. इसलिए इन चुनावों के ऊपर धांधली के आरोप भी लगे. 1992 की इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इलेक्शन से ठीक पहले MUF के 600 कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया था. ऐसी ही और कई खबरें उठी. जिसकी वजह से फ़ारूख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री तो बन गए. लेकिन एक कश्मीर के एक बड़े हिस्से का लोकतंत्र से मोहभंग हो गया.

फ़ारूख अब्दुल्ला ने भी बहुसंख्यकों को खुश करने के लिए बहुत से विवादास्पद निर्णय लिए. जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किये गये. इन पर इल्ज़ाम था कि ये लोग बॉर्डर पार कर हथियारों की ट्रेनिंग लेकर आए थे.

कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया

साल 1989 दिसम्बर में एक और घटना हुई. देश के गृह मंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबिका सईद को आतंकियों ने अगवा कर लिया. इस घटना के बारे में हमने आपको 8 दिसंबर के एपिसोड में बताया था. गृहमंत्री की बेटी की रिहाई के एवज़ में सरकार को 4 अलगाववादी नेताओं को रिहा करना पड़ा. इससे अलगाववादियों और कट्टरपंथियों के मंसूबे और मज़बूत हो गए. और उन्होंने भारत समर्थक आवाज़ों को निशाना बनाना शुरू किया.

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मुफ़्ती मुहम्मद सईद और उनकी बेटी रुबिका (फ़ाइल फोटो)

सबसे आसान निशाना थे कश्मीरी पंडित. 1989 वो साल था जब कश्मीर में पहली बार राजनीतिक कारणों के चलते किसी की हत्या की गई. अगस्त में नेशनल कॉन्फ्रेंस के मोहम्मद यूसुफ हलवाई को गोली मार दी गई. नतीजा ये रहा कि अगले ही महीने यानी 13 सितम्बर को बीजेपी नेता टीकालाल टपलू की हत्या कर दी गई. इसके बाद 4 नवंबर के रोज़ जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट के बाहर जस्टिस नीलकंठ गंजू की गोली मारकर हत्या कर दी गई. गंजू वही थे जिन्होंने मक़बूल भट्ट को फांसी की सजा सुनाई थी.

ये ऐसी घटना थी, जिसने कश्मीर के पंडितों में डर बसा दिया. धीरे-धीरे कश्मीरी पंडितों के नामों की लिस्ट बांटी जाने लगी. अख़बारों में अनाम सूत्रों ने संदेश छपने लगे. 4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें. अखबार अल-सफा ने भी इसी चीज को दोबारा छापा. इसके बाद आया आज का दिन यानी 19 जनवरी 1990. तब तक फ़ारूख अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त कर राज्यपाल शासन लग चुका था.

माहौल गर्म था. कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ो, जैसी बातें अब गली मुहल्ले में सुनाई दे रही थी. कश्मीरी पंडितों के घरों की निशानदेही की जा रही थी. बंदूक़धारी अलगाववादी लोगों को धमकियां दे रहे थे कि घड़ी में टाइम आधा घंटा पीछे कर लो. यानी पाकिस्तान स्टैंडर्ड टाइम के अनुसार. बाद में कुछ कश्मीरी पंडितों ने यहाँ तक बताया कि उस दिन उनसे कहा गया, “वापस आओगे तो अब वीज़ा लेकर ही आओगे”.

19 जनवरी की रात

18 और 19 की रात घाटी में अचानक बहुत से घरों की बत्तियां काट दी गई. सिर्फ़ मस्जिद के लाउड स्पीकर बज़ रहे थे. जिनमें ऐलान हो रहा था कि कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर चले जाएं. हालात इतने बिगड़ चुके थे कि अगली सुबह बहुत से कश्मीरी पंडितों ने अपना घरबार सब कुछ छोड़ दिया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगले 2 सालों में 70 हजार परिवार कश्मीर छोड़कर भाग गये. उन्हें आस-पास के राज्यों में जगह मिली.19 जनवरी 1990 को सबसे ज्यादा लोगों ने कश्मीर छोड़ा था.

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कश्मीरी पंडित विस्थापित कैम्प (तस्वीर: openthemagazine)

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर लिखी गई किताब ‘आर मून हैज़ ब्लड क्लॉट्स’ के लेखक राहुल पंडिता बताते हैं :

“कश्मीर में पंडितों की मौत का ऑफिशियल आंकड़ा करीब 700 का है. लेकिन मैं कहूंगा कि आंकड़ा करीब 10 हजार है. वजह- जब विस्थापित लोगों को रिफ्यूजी कैंपों में रखा गया, तो तमाम लोगों की मौत अलग-अलग बीमारियों, सांप-बिच्छू वगैरह के काटने से हुई. इस पर कोई बात करने वाला ही नहीं है. ये विस्थापित पंडित पहले टेंट में रहते थे, फिर उन्हें एक गुंबदनुमा इमारत में रखा गया, फिर कच्ची ईंटों के मकान में और अभी कुछ साल पहले उन्हें जम्मू शहर से करीब 10-12 किमी की दूरी पर एक-एक कमरों के जर्जर मकान दिए गए हैं.”

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को लेकर तब राज्यपाल जगमोहन के निर्णयों पर भी सवाल उठे. गवर्नर नियुक्त होने के बाद 20 जनवरी को जगमोहन श्रीनगर पहुंचे.
वजाहत हबीबुल्ला, तब सरकार में सीनियर अधिकारी हुआ करते थे. अप्रैल 2015 में लिखे एक लेख में वे लिखते हैं कि मार्च 1990 में अनंतनाग में सैकड़ों लोग उनके ऑफ़िस के आगे इकट्ठा हुए. और कश्मीरी पंडितों को ना रोक पाने को लेकर सवाल करने लगे.

इन लोगों ने आरोप लगाया कि सरकार कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने को उकसा रही है. ताकि सेना आराम से एक्शन ले सके. वजाहत ने जमा हुई भीड़ को समझाया कि जब मस्जिदों से ऐलान हो रहा हो. और कश्मीरी पंडित समुदाय के बड़े लोगों को मारा जा रहा हो. तो ऐसे में उनसे वहां रुकने की उम्मीद करना बेमानी है. हबीबुल्ला ये भी लिखते हैं कि उन्होंने तब गवर्नर जगमोहन से अपील की थी, कि वो कश्मीरी पंडितों को रोकने की कोशिश करे. गवर्नर ऑफ़िस से ऐसी अपील की उम्मीद बेमानी थी. चूंकि लोग अपने आस-पास का माहौल देख कर घाटी छोड़ रहे थे. ना कि सरकार की उम्मीद पर.

सरकार की अपील

सरकार की तरफ़ से एक अपील की गई. लेकिन इसमें कहा गया कि जो लोग जान के डर से घाटी छोड़ रहे हैं. वो इसके बजाय रेफ़्यूजी कैम्प की शरण ले सकते हैं.
जिसके बाद कई कश्मीरी पंडित परिवारों ने कैम्प की शरण ली.

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जगमोहन मल्होत्रा (तस्वीर: इंडिया टुडे आर्काइव)

आने वाले सालों में इन्हें वापस बसाने की कई कोशिशें हुई. साल 1997, 1998 और 2003 में. लेकिन तब फिर बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया. इसी दौरान विस्थापित परिवारों के लिए तमाम राज्य और केंद्र सरकारों ने तरह-तरह के पैकेज निकाले. कभी घर देने की बात हुई. कभी पैसा.

लेकिन हालात ज्यों के त्यों बना रहे. कहानियां सिर्फ़ नफ़रत की नहीं है. ऐसी कई किस्से हैं जब मुसलमान परिवारों ने कश्मीरी पंडितों की मदद की. लेकिन नफ़रत के नासूर इतने गहरे हैं कि चंद प्यार की दास्तानें उन्हें पूरा नहीं कर सकती. कश्मीरी पंडितों का कश्मीर से जोड़ने वाला धागा इतनी बाद तोड़ा जा चुका है कि इसे जोड़ने की कोशिश में अब सिर्फ़ गांठें ही बच गई हैं.


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