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दिल्ली और कश्मीर को जोड़ता एकमात्र रास्ता पाकिस्तान में जाने से किसने बचाया था?

15 अगस्त की रात नेहरू घोषणा करते हैं. भारत आज़ाद हो चुका था. पड़ोसी देश पाकिस्तान इससे एक दिन पहले ही अपनी आजादी की घोषणा कर चुका था. वायसरॉय माउंटबेटन यहां भी थे और वहां भी. यूं तो माउंटबेटन, जिन्ना और नेहरू से मुस्कुराकर बात कर रहे. लेकिन माउंटबेटन के मन में बार बार दिल्ली में वायसराय ऑफ़िस के एक लॉकर का ख़्याल आ रहा था. वैसे तो लॉकर में बंद होने से ही चीज़ की अहमियत बढ़ जाती है. लेकिन इस लॉकर में बंद चीज़ से ये फैसला तक होना था कि वो लॉकर कहां जाएगा, भारत में ये पाकिस्तान में?

बात कर रहे हैं, भारत और पाकिस्तान के उस नक़्शे की जिसके तहत दोनों देशों की सीमा तय होनी थी. अब सवाल उठता है कि 15 तारीख़ को क्यों नहीं दिखाया नक़्शा. तो इसका कारण ये था कि अंग्रेज बहादुर नहीं चाहते थे कि इतने बड़े जश्न में ख़लल पड़े. दुनिया को दिखाना भी था कि देखो, हमारी महानता, आजादी दे रहे हैं. और अभी नक़्शा खोल देते तो हंगामा होना तय था. पूरे देश में बंटवारे के ज़ख़्म ज़िंदा थे. लेकिन सबसे बड़ी चिंता थी बंगाल और पंजाब के वो सूबे जिनका बँटवारा होना था. सीमा पर मौजूद ये लोग हैरान-परेशान थे, कौन कहाँ जाएगा?. धर्म और ज़मीन आपस में घुलती जा रही थी. डर था कि इस हिस्से में रह गए तो क्या सुलूक होगा. या उस हिस्से में चले गए तब क्या होगा.

पंजाब का गुरदासपुर ज़िला. यहां मुसलमानों की अच्छी ख़ासी जनसंख्या थी. ऐसा ही कुछ फ़िरोज़पुर में भी था. पाकिस्तान को लग रहा था कि ये दोनों उसके हिस्से में आएंगे. 17 को नक़्शा खुला तो सब हक्के बक्के. एक तहसील को छोड़कर पूरा गुरदासपुर भारत के हिस्से में था. और ये सब मुमकिन हुआ था. एक शख़्स के चलते. अपने जमाने के धुरंधर वकील. लाहौर में जिनकी तूती बोलती थी. और इन्होंने ही कश्मीर के भारत में विलय पर बहुत खास भूमिका निभाई थी. कौन थे ये शख़्स और कैसे आया गुरदासपुर भारत के हिस्से में? चलिए जानते हैं.

जस्टिस मेहर चंद महाजन

जिस शख़्स की बात कर रहे. उनका नाम था, मेहर चंद महाजन. पहले जान लीजिए कि आज की तारीख़ से इनका ताल्लुक़ क्या था. आज ही के दिन यानी 4 जनवरी, 1954 के रोज़ उन्हें सुप्रीम कोर्ट का चीफ़ जस्टिस नियुक्त किया गया था. भारत में सम्पत्ति के अधिकार पर जस्टिस महाजन ने एक लेंडमार्क फ़ैसला दिया था. जिसके चलते आगे जाकर संसद को संविधान में चौथा संसोधन करना पड़ा था. एक साल से भी कम चले tenure के बाद जस्टिस महाजन रिटायर हो गए थे.

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जस्टिस मेहर चंद महाजन (तस्वीर: Abebooks)

जस्टिस महाजन की कहानी का असल दिलचस्प पहलू आजादी के पहले का है. हिमांचल के काँगड़ा ज़िले में इनकी पैदाइश हुई. पिता धर्मशाला के नामी वकील थे. सो मेहर चंद ने भी वही रास्ता अपनाया. 1912 में LLB की डिग्री ली और फिर धर्मशाला में ही प्रैक्टिस शुरू कर दी. अगले 4 साल गुरदासपुर में बिताए. जहां वकील के तौर पर इनका बड़ा नाम हुआ. और आगे की प्रैक्टिस के लिए लाहौर चले गए. वहां बार एसोशिएशन के अध्यक्ष बने. और फिर पंजाब हाई कोर्ट के जस्टिस बने. भारत के बंटवारे के दौरान जस्टिस महाजन को एक बड़ा ज़िम्मा सौंपा गया.

यहां पढ़ें- क्या सोचकर रेडक्लिफ ने पाकिस्तान को लाहौर दे दिया?

3 जून को पाकिस्तान बनने की आधिकारिक घोषणा हुई. मेन सवाल था पंजाब और बंगाल के बंटवारे का. वायसरॉय माउंटबेटन ने दो ऑप्शन पेश किए. पहला कि UN से एक एक्स्पर्ट पेनल को बुलाकर ये ज़िम्मेदारी दी जाए. नेहरू इसके लिए राज़ी नहीं हुए. काहे कि UN इन्वॉल्व होता तो मसला और खिंचता.

दूसरा ऑप्शन जिन्ना का आइडिया था. 23 जून के रोज़ जिन्ना ने वायसरॉय से कहा कि बाउंड्री कमीशन के लिए हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के तीन मेम्बर बुला लिए जाएं. लेकिन बूढ़े हुज़ूर जुलाई में भारत की गर्मी सहन नहीं कर पाते. इसलिए ये आइडिया भी ड्रॉप कर दिया गया. तब लंदन के एक बड़े वकील रैडक्लिफ को बाउंड्री कमीशन का अध्यक्ष नियुक्त किया.

पंजाब बाउन्ड्री कमीशन

भारत के वायसरॉय माउन्टबेटन से बातचीत के बाद वो अपने काम पर लग गए. इस काम को पूरा करने के लिए दो बाउन्ड्री कमीशन बनाए गए. पहला पंजाब के लिए और दूसरा बंगाल के लिए. दोनों कमीशन की अध्यक्षता रैडक्लिफ को करनी थी. इसके अलावा कांग्रेस और मुस्लिम लीग से दो सदस्य इस कमीशन का हिस्सा थे. बंगाल के बाउन्ड्री कमीशन में मुस्लिम लीग की तरफ से अबू सहेल मोहम्मद अकरम और एसए रहमान. वहीं जस्टिस सीसी बिस्वास और बीके मुखर्जी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

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बाउंड्री कमीशन के सदस्य (बीच में रैडक्लिफ, उनके दाएं जस्टिस मेहर चंद महाजन) (तस्वीर: Flickr)

पंजाब के बंटवारे के कमीशन में कांग्रेस की तरफ से थे जस्टिस मेहर चंद महाजन और तेजा सिंह. मुस्लिम लीग ने दीन मोहम्मद और मुनीर साहिब को इस कमीशन में भेजा था. साथ ही रैडक्लिफ अपने निजी सचिव क्रिस्टोफर बिओमोंट की मदद भी ले रहे थे. रैडक्लिफ के पास ज़्यादा दिन का समय था नहीं. इतने बड़े एरिया का दौरा करना असंभव था. वो भी इतने कम टाइम में. इसलिए बाउंड्री इस बात पे तय होनी थी कि पुराना नक़्शा क्या कहता है. और किस एरिया में किसकी आबादी कितनी है. पंजाब के अधिकतर हिस्से का फ़ैसला हो चुका था. लेकिन मामला अटका गुरदासपुर और फ़िरोज़पुर पर.

गुरदासपुर में 4 तहसील थी. 1941 जनगणना के हिसाब से बटाला तहसील में 55 % मुसलमान थे. गुरदासपुर में 52 %. शकरगढ़ में 51% और पठानकोट में 40 %. इसके अलावा फ़िरोज़पुर का भी यही मसला था. फ़िरोज़पुर और जीरा तहसीलों में मुस्लिम आबादी क्रमशः 55% और 65 प्रतिशत थी. कुछ दावों से पता चलता है कि शुरुआत में रैडक्लिफ की मंशा गुरदासपुर और फ़िरोज़पुर को पाकिस्तान के हिस्से में देने की थी. और लाहौर को भारत के हिस्से में.

गुरदासपुर पाकिस्तान में जाने वाला था!

वेस्ट पंजाब के गवर्नर सर फ़्रांसिस मूडी ने दावा किया था कि आठ अगस्त को उन्हें एक नक़्शा मिला. जो उन्हें माउंटबेटन के सचिव ने भेजा था. इसके अनुसार फ़िरोज़पुर और जीरा को वेस्ट पंजाब यानी पाकिस्तान के हिस्से में दिखाया गया था. बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री जफरुल्ला ख़ां ने ये मसला UN सिक्योरिटी काउंसिल में भी उठाया. तब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फ़ॉर कॉमन वेल्थ, नोल बेकर से इस मामले में तहक़ीक़ात करने को कहा.

बेकर ने रैडक्लिफ से पूछा तो पता चला कि रैडक्लिफ ने जो नक़्शा बनाकर दिया था. उसमें माउंटबेटन ने कुछ चेंज करवाए थे. बाद में रैडक्लिफ के सेक्रेटरी क्रिस्टोफर बिओमोंट ने भी इस बाद की तक़सीद की थी. एक थियोरी ये है कि नेहरू से दोस्ती के चलते माउंटबेटन ने बंटवारे में भारत का थोड़ा पक्ष लिया था. लेकिन कारण इतना ही नहीं था. यहां पर एंट्री होती है जस्टिस महाजन की. हमने बताया था कि वो बाउंड्री कमीशन का हिस्सा थे. और भारत की तरफ़ से जिरह कर रहे थे.

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लॉर्ड माउंटबेटन के साथ जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना (तस्वीर: एएफपी)

गुरदासपुर और फ़िरोज़पुर के मामले में उन्होंने रैडक्लिफ के आगे दलील दी कि रावी को बाउंड्री बनाया जाना चाहिए. ताकि एक नेचुरल बाउंड्री बने. जस्टिस महाजन का गुरदासपुर से पुराना नाता रहा था. 4 साल यहां वकालत की थी. उन्होंने एक और दलील देते हुए कहा कि रावी कैनाल का निर्माण 40 हज़ार सिख फ़ौजियों ने किया था. इसलिए इसका पंजाब के सिखों से खास नाता है.

रैडक्लिफ को ये भी लग रहा था कि गुरदासपुर और फ़िरोज़पुर पाकिस्तान के हिस्से में चला गया, तो नक़्शे की सुंदरता बिगड़ जाएगी. उन्होंने जस्टिस महाजन के आगे दो ऑप्शन रखे. लाहौर या गुरदासपुर. जस्टिस महाजन ने गुरदासपुर और फ़िरोज़पुर को चुना. एक कारण ये कि श्रीनगर तक जाने का एक मात्र रास्ता गुरदासपुर से होकर जाता था. जिसके अहमियत अगले 4 महीने में सामने आ गई थी. दूसरा कारण था पंजाब तक सिंचाई नहरों का कंट्रोल, जिसका ऑपरेटिंग पोईंट फ़िरोज़पुर और गुरदासपुर में पड़ता था.

जस्टिस महाजन का कश्मीर से नाता

श्रीनगर तक रास्ते के बारे में जस्टिस महाजन क्यों सोच रहे थे? ये एक सवाल हो सकता है. काहे कि तब तक जम्मू कश्मीर को लेकर कोई फ़ैसला तो हुआ नहीं था. ये समझने के लिए इसके 3 महीने पहले के घटनाक्रम को जानते हैं.

मई महीने में महाराजा हरी सिंह एक प्रधानमंत्री की तलाश में थे. सरदार पटेल से उनकी अच्छी दोस्ती थी. और पटेल ने उन्हें सुझाव दिया कि जस्टिस महाजन से सम्पर्क करें. राजा हरी सिंह को भी जम्मू कश्मीर के भविष्य को लेकर कोई क़ानून का जानकार चाहिए था. इसलिए उन्होंने महारानी तारा देवी, बेटे कर्ण सिंह, और कैप्टन हरनाम सिंह को महाजन से मिलने भेजा. जस्टिस महाजन की तरह ही जम्मू-कश्मीर की रानी तारा देवी भी काँगड़ा से आती थीं. दोनों में काफ़ी पुरानी पहचान थी.

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जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह और महारानी तारा देवी, दाएं, बेटे कर्ण सिंह (तस्वीर: hinduon.net)

रानी तारा और जस्टिस महाजन की मुलाक़ात लाहौर के एक होटल में हुई. रानी ने जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव देते हुए जस्टिस महाजन से कहा कि हरी सिंह उनसे मिलना चाहते हैं. जस्टिस महाजन ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया. तब हरी सिंह के बेटे कर्ण सिंह ने जस्टिस महाजन से पूछा,“क्या हमारा राज्य इतना छोटा है कि उसके प्रधानमंत्री का पद भी आपकी शान से छोटा है”.

ये सुनकर जस्टिस महाजन हरी सिंह से मिलने को तैयार हो गए. फिर उन्हें बाउंड्री कमीशन की ज़िम्मेदारी मिल गई और मुलाक़ात हो नहीं पाई. लेकिन कश्मीर का मुद्दा उनके मन पर जमा रहा. और जब गुरदासपुर का सवाल आया तो उन्होंने कश्मीर मसले को देखते हुए, वहां तक एक रास्ता खुला रखने की सोची.

प्रधानमंत्री नेहरू से भिड़े

अगर गुरदासपुर पाकिस्तान के हिस्से चला जाता. तो भारत का लिंक कश्मीर से पूरी तरह टूट जाता. 15 अगस्त के रोज़ जब भारत आज़ाद हुआ तो पाकिस्तान को लग रहा था कि गुरदासपुर और फ़िरोज़पुर उनके हिस्से में जाएंगे. लेकिन 17 तारीख़ को पता चला कि गुरदासपुर की सिर्फ़ एक तहसील शकरगढ़ को पाकिस्तान में डाला गया. और पठानकोट, गुरदासपुर, फ़िरोज़पुर साब भारत के हिस्से आए.

भारत में कश्मीर में विलय के बाद जस्टिस महाजन को जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया. और इस तरह वो जम्मू कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री बने. जस्टिस महाजन ने जम्मू कश्मीर का भारत में विलय करने में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई. नेहरू जब सेना भेजें, ना भेजें कि कश्मकश में थे, तो एक बार के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री को धमकी तक दे डाली थी. बोले, आपको शेख़ अबदुल्ला को जो ताक़त देनी है, दिजीए. लेकिन जल्द से जल्द श्रीनगर तक सेना भेजिए. वरना मैं जिन्ना के पास जाकर खुद बात करता हूं. नेहरू इस बात से पहले तो बहुत नाराज़ हुए लेकिन बाद में सेना भेजने के लिए राज़ी हो गए. जस्टिस महाजन का जम्मू- कश्मीर के प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यकाल भी बहुत रोचक है. मौक़ा मिला तो उसका किस्सा भी आपको सुनाएंगे.


वीडियो देखें- कहानी उस प्लेन हाईजैक की, जिसने देश को हिला कर रख दिया!

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