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रेडियो के जनक को क्यों नहीं मिला नोबेल पुरस्कार?

कहानी कहती है कि 1896 में कलकत्ता से एक रिपोर्ट इंग्लैंड पहुंची. रिपोर्ट में लिखा हुआ था, ‘ब्रिटिश साम्राज्य का दिल ख़तरे में है.’ कलकत्ता तब भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का केंद्र हुआ करता था. और रिपोर्ट से आशय था कि एक चक्रवाती तूफ़ान कलकत्ता की तरफ़ बढ़ रहा था. जो पूरे शहर जो तहस-नहस कर सकता था. लेकिन, चिंता के बादल घिरते, इससे पहले ही आसमान साफ़ हो चुका था. सिर्फ़ एक व्यक्ति के अलावा किसी को पता नहीं चला कि इतना बढ़ा तूफ़ान अचानक कहां ग़ायब हो गया.

कहानी का नायक तब कलकत्ता से सीलोन की तरफ़ पानी से यात्रा कर रहा था. रास्ते में उसकी भेंट तूफ़ान से हुई तो उसे अपनी बेटी की याद आई. जिसने सफ़र के लिए उसके थैले में कुंतलिन ब्रांड हेयर ऑइल की एक बोतल डाल दी थी. तूफ़ान के बीच उसे एक साइंटिफ़िक आर्टिकल की भी याद आई. जो उसने बहुत पहले पढ़ा था. उसे याद आया कि आर्टिकल के अनुसार अगर तेल को पानी पर डाल दिया जाए. तो उसकी सतह शांत हो जाती है.

कुछ करने के प्रयास में वो कुंतलिन हेयर ऑइल की बोतल समंदर में खाली कर देता है. नतीजतन तेल के गाढ़ेपन से लहरों की सतह पर एक फ़िल्म बन जाती है. नाव के आसपास पानी शांत हो जाता है. और जब तूफ़ान से पैदा हुई तेज लहरें इस पानी से टकराती हैं, तो वो भी मद्दम पड़ जाती हैं. कुछ ही देर में तूफ़ान भी ग़ायब हो जाता है. और कलकत्ता शहर पर आने वाली एक बड़ी बला टल जाती है.

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जगदीश चंद्र बोस की लिखी कहानी , पोलातक तूफ़ान (तस्वीर: Commons)

कहानी अच्छी है. लेकिन सच्ची नहीं है. साइंस फ़िक्शन है. लेकिन लिखने वाला असली साइंटिस्ट है. अभी जो कहानी आपने सुनी. वो भारत की कुछ चुनिंदा पहली साइंस फ़िक्शन स्टोरीज़ में से एक थी. और इसे लिखने वाले थे, भारत के एक महान साइंटिस्ट.

कुंतलिन पुरस्कार

आजादी से पहले कलकत्ता के एक उद्यमी हुआ करते थे. नाम था हेमचंद्र मोहन बोस. भारत में पहली बार ग्रामोफ़ोन का निर्माण इन्होंने ही किया था. आगे जाकर एक तेल ब्रांड भी लॉंच किया. जिसका नाम था कुंतलिन ब्रांड हेयर ऑइल. 1896 में उन्हें अपने तेल को मार्केट करने का आइडिया सूझा. उन्होंने ‘कुंतलिन पुरस्कार’ नाम से एक शॉर्ट स्टोरी प्रतियोगिता रखवाई. जिसमें कोई भी भाग ले सकता था. शर्त बस इतनी थी कि स्टोरी में कुंतलिन हेयर ऑइल का रोल होना चाहिए. जो कहानी जीती. वो हम आपको शुरुआत में सुना चुके हैं.

इस कहानी को प्रतियोगिता में भेजा गया और उसने पहला पुरस्कार जीता. कहानी को लिखने वाले थे, भारत के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस. जिनके बारे में इतना तो हम सबने बचपन में पढ़ा है कि उन्होंने प्रूव किया था कि पेड़ पौधों में भी जीवन होता है. लेकिन कम लोग जानते हैं कि वो भारत के सबसे बड़े साइंस फ़िक्शन लेखकों में भी शुमार थे. आज ही के दिन यानी 30 नवंबर 1858 को जगदीश चंद्र बोस का जन्म हुआ था. बंगाल के मेमनसिंह इलाक़े में (अब बांग्लादेश में पड़ता है). उनके पिता भगवान चंद्र बोस ब्रिटिश राज में एक बड़े अधिकारी थे. इसके बावजूद उन्होंने बोस को पढ़ने के लिए गांव के एक स्कूल में भर्ती किया. गांव में नेचर के नज़दीक रहे. इसी के चलते पेड़-पौधों और भौतिकी विज्ञान से लगाव पैदा हुआ.

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हेमचंद्र मोहन बोस (तस्वीर: Wikimedia Commons)

1879 में बोस ने कोलकाता विश्वविद्यालय से भौतिकी में ग्रेजुएशन किया. और उसके बाद नैचुरल साइंस पढ़ने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए. 1884 में भारत लौटे. और कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में फिजिक्स के प्रोफेसर बन गए. रेडियो विज्ञान के पितामह माने जाने वाले बोस को उनके छात्र स्नेह से आचार्य बुलाया करते थे.

अदृश्य आलोक

अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने रेडियो तरंगों पर काम किया. नवम्बर 1894 में उन्होंने एक प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट के ज़रिए माइक्रोवेव के अस्तित्व को प्रूव किया. कलकत्ता के टाउन हॉल में बंगाल के गवर्नर सर विलियम मैकेंजी के सामने ये प्रदर्शन किया गया था. बोस ने बारूद में विस्फोट कर बिना तार की मदद लिए दीवार के पार एक घंटी बजाकर दिखाई थी. बाद में बोस ने बंगाली में इस पर एक शोध पेपर भी लिखा. जिसे नाम दिया, ‘अदृश्य आलोक’. इसमें उन्होंने थियरी दी कि न दिखाई देने वाली ये तरंगें दीवार के आर-पार जा सकती हैं. इसलिए इनका उपयोग कर बिना तार की मदद लिए संदेश भेजे जा सकते हैं.

इटली के वैज्ञानिक जी. मार्कोनी भी इन्हीं दिनों रेडियो तरंगों पर शोध कर रहे थे. उन्हें ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस के लिए वायरलेस उपकरण बनाने का काम मिला था. लंदन में मार्कोनी और बोस दोनों ही मौजूद थे, जब मैक्लर नाम की मैगज़ीन ने मार्च 1897 में इन दोनों वैज्ञानिकों के इंटरव्यू किए. बोस ने अपनी बातचीत में मार्कोनी की काफी तारीफ की. ब्रिटिश वैज्ञानिक उन दिनों मार्कोनी का उनकी अधूरी पढ़ाई और खराब नंबरों के कारण मज़ाक उड़ा रहे थे. बोस ने ये भी कहा कि वे कॉमर्शियल टेलिग्राफी में इंटरेस्टेड नहीं थे.

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रेडियो के आविष्कार के लिए मार्कोनी को 1909 का नोबेल पुरस्कार मिला (तस्वीर: commons)

रेडियो के आविष्कार का श्रेय मार्कोनी को जाता है. उन्हीं के बनाए ‘मर्करी ऑटो कोहेरर’ के ज़रिए पहली बार अटलांटिक महासागर के पार रेडियो संकेत प्राप्त हुआ था. लेकिन मार्कोनी ने जो डिज़ाइन बनाया था वो बोस के आविष्कार ‘मर्क्युरी कोहेनन विद टेलीफोन डिटेक्टर’ की तकनीक पर आधारित था. बोस का इसका श्रेय नहीं मिला. इसका एक कारण ब्रिटिश रॉयल सोसायटी में भारतीय वैज्ञानिकों के साथ होने वाला भेदभाव था. दूसरा कारण ये था कि बोस वैज्ञानिक पेटेंट के ख़िलाफ़ थे. उनका मानना था कि वैज्ञानिक आविष्कार का फ़ायदा पूरी मानवता को मिलना चाहिए, बजाय सिर्फ़ कुछ चुनिंदा लोगों के.

क्रेस्कोग्राफ की खोज़

1899 में JC बोस ने अपने वायरलेस और काम करने तरीके पर एक पेपर रॉयल सोसायटी में पब्लिश करवाया. लेकिन इसे बुरी किस्मत ही कहेंगे कि बोस की वो डायरी खो गई जिसमें इस आविष्कार से जुड़ी सारी डिटेल थी. दूसरी ओर मार्कोनी ने बोस के आविष्कार के व्यवसायिक फायदों को समझ लिया और अपने बचपन के दोस्त लुईजी सोलारी के साथ मिलकर एक बेहतर डिज़ाइन बनाया. मार्कोनी ने ब्रिटेन में इस खोज का पेटेंट करवाया, और 1909 में उन्हें अपनी इस खोज़ के लिए नोबेल पुरस्कार मिला.

बोस को इसका श्रेय मिलने में पूरे 100 से ज़्यादा वर्ष का समय लगा. 2012 में भारतीय वैज्ञानिकों के प्रयासों से IEEE ने सर बोस को रेडियो फ्रीक्वेंसी और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियेशन का फ़ाउंडिंग फादर होने का श्रेय दिया. इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों पर काम करने के दौरान ही बोस को पेड़-पौधों पर शोध का आइडिया सूझा. उनका मत था कि सजीव और निर्जीव, किसी ना किसी बिंदू पर ज़रूर मिलते होंगे.

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शिकागो में जगदीश चंद्र बोस (तस्वीर: Commons)

पेड़-पौधों पर शोध के दौरान उन्हें लगा कि इस काम में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों का उपयोग किया जा सकता है. इसके लिए उन्होंने ‘क्रेस्कोग्राफ’ नामक यंत्र का आविष्कार किया, जो पौधों की वृद्धि को दशमलव के छठे स्थान तक माप सकता था. यानी एक इंच के एक लाखवें हिस्से तक.

बर्नार्ड शॉ के आंसू

पेड़-पौधों पर प्रयोग के लिए उन्होंने मेडा वेल, लंदन में एक प्राइवेट लैब स्थापित की. और वहां पहली बार दर्शाया कि पेड़-पौधे भी बाहरी परिस्थिति के अनुसार रिएक्ट करते हैं. ये एक अनोखी खोज़ थी और तब लंदन के मशहूर लोग उनके एक्स्पेरिमेंट देखने आया करते थे. इन्हीं में से एक थे मशहूर ब्रिटिश लेखक और प्लेराइट, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ. बोस के एक्स्पेरिमेंट के दौरान उनकी मौजूदगी का एक किस्सा बहुत मशहूर है.

हुआ यूं कि पौधों में स्टिमुली चेक करने के लिए बोस एक पत्तागोभी को उबलते पानी में डाल के उसका रिएक्शन चेक कर रहे थे. जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने जब सिग्नल में हरकत देखी तो उनकी आंख में आंसू आ गए. बाद में शॉ ने बताया कि कि उन्हें अहसास हुआ कि पेड़ पौधों में दर्द को लेकर मानवीय करुणा का पैदा होना स्वाभाविक है. इस घटना के बाद शॉ और बोस की दोस्ती हो गई. शॉ ने उन्हें अपने लिखे हुए कई नाटक भेंट किए. जिसमें लिखा था,‘दुनिया के सबसे छोटे बायो टेक्नॉलॉजिस्ट की तरफ से दुनिया के सबसे बड़े टेक्नॉलॉजिस्ट को सप्रेम भेंट.’

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बोस इंस्टिट्यूट कोलकाता में रखा हुआ जे.सी. बोस का बनाया क्रेस्कोग्राफ (तस्वीर: बिश्वरूप गांगुली)

1915 में जेसी बोस ने रिटायरमेंट ले लिया. और 1917 में कलकत्ता में बोस इंस्टीट्यूट की स्थापना की. 1917 में ही उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा “नाइट” की मानद उपाधि भी दी गई. 23 नवंबर 1937 को इस महान वैज्ञानिक ने झारखंड के गिरिडीह (तब बंगाल) में इस दुनिया को अलविदा कह दिया.


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