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इंसाफ के लिए क़ानून का अंधा होना ज़रूरी है?

लंदन में लेडी जस्टिस की मूर्ति (तस्वीर: AFP)

आज 6 अक्टूबर है और आज की तारीख़ का संबंध है क़ानून से.

जिसके साथ 70’s में हिंदी सिनेमा ने अंधा शब्द जोड़ दिया. 1983 में ‘अंधा क़ानून’ नाम की फ़िल्म से रजनीकांत ने हिंदी सिनेमा में डेब्यू किया. फ़िल्म में अमिताभ का भी रोल था. फ़िल्म के एक सीन में अमिताभ का किरदार भरी अदालत में एक व्यक्ति का खून कर देता है. लेकिन इसी व्यक्ति की हत्या में अमिताभ के किरदार को पहले ही सजा हो चुकी थी. चूंकि एक ही अपराध के लिए दो बार सजा नहीं हो सकती. इसलिए सरेआम हत्या के बावजूद इस अपराध की कोई सजा नहीं दी गई.

यही फ़िल्म की थीम थी कि किस प्रकार क़ानून कई बार ग़लत व्यक्ति को सजा दे देता है और कई बार अपराधियों को छोड़ देता है. एक इंट्रेस्टिंग ट्रिविया ये है कि कोर्ट में हत्या दिखाने के लिए इस फ़िल्म पर एक केस भी हुआ था. अदालत ने खुद संज्ञान लेते हुए फ़िल्मकार से कहा कि आप कोर्ट में हत्या कैसे दिखा सकते हैं. लेकिन फ़िल्म रिलीज़ होने के कुछ ही महीनों में एक अदालत में सचमुच में हत्या हो गई, जिस कारण केस को ख़ारिज कर दिया गया.

क़ानून अंधा क्यों होता है या उसके हाथ कितने लम्बे होते हैं, ये जानने के लिए क़ानून की किताब पर जाना होगा. जिसे भारत में IPC कहा जाता है. आज ही के दिन यानी 6 अक्टूबर 1860 में ब्रिटिश लेजिस्लेटिव असेम्बली ने इंडियन पीनल कोड, IPC को भारतीय क़ानून के तौर पर पास किया था.

क़ानून क्या है

वैसे तो क़ानून की कई अलग-अलग परिभाषाएं हैं. क़ानून क्या है और क्या नहीं, इसको लेकर भी विद्वानों के मतों में टकराव है. लेकिन मोटा-मोटी क़ानून का अभिप्राय “मींस ऑफ़ जस्टिस” है. यानी न्याय पाने का साधन. लेकिन इस डेफ़िनिशन में बात सुलझने के बजाय उलझ जाती है. प्रश्न खड़ा होता है कि न्याय क्या है.

थिमिस या लेडी जस्टिस का आंखों पर पट्टी बांधना चित्रण 16 वीं शताब्दी और आधुनिक समय में अधिक सामान्य है (तस्वीर: Wikimedia)

सौ लोगों से पूछा जाए कि न्याय क्या है तो शायद ही किन्ही दो लोगों का एक उत्तर हो. मान लीजिए अमर ने अकबर के दोस्त एंथोनी का खून कर दिया. और अकबर ने बदला लेने के लिए अमर को मार दिया, तो क्या ये न्याय है? हैरत नहीं अगर अधिकतर लोग इसे न्याय कहें. लेकिन ये न्याय नहीं बदला है.

न्याय के लिए जो भी परिभाषा गढ़ी जाए, उसमें एक बात नितांत आवश्यक है. वो ये कि न्याय में पर्सनल रिश्ते, फ़ीलिंग या मत का कोई स्थान नहीं है. इसीलिए न्याय की देवी की आंख में पट्टी बंधी हुई रहती है. साथ में तराज़ू और एक तलवार. न्याय की देवी के हाथ में तराज़ू का उल्लेख प्राचीन मिस्र में मिलता है. जहां देवी ‘मात’ हाथ में तराज़ू लेकर खड़ी दिखती हैं.

ग्रीक मिथकों में ज़्यूस की बेटी ‘डाइक’ न्याय की देवी हैं. और रोमन मिथकों में लेडी ‘जस्टिसिया’ का वर्णन है. समय के साथ-साथ इन सिम्बल्स में भी चेंज आया. 1600 के बाद लेडी जस्टिसिया की आंखों पर पट्टी बंधी हुई दिखाई जाने लगी.

महकमा-ए-अदालत

भारत में न्याय और क़ानून का उल्लेख सबसे पहले वैदिक ग्रंथों में मिलता है. पुरातत्वविदों के हिसाब से ये समय 7000 BC से 3300 BC के बीच का है. इन ग्रंथों में धर्म के हिसाब से क़ानून और न्याय के बीच रिलेशन को दर्शाया गया है.

यहां धर्म से हिन्दू-मुस्लिम की बात नहीं हो रही है. यहां धर्म का अर्थ है सही आचरण. सही आचरण को बरकरार रखने के लिए जो नियम बनाए जाएं, वो क़ानून हैं. और नियम तोड़ने पर धर्म को दोबारा स्थापित करना ही न्याय है. 15 वीं सदी में भारत में मुग़ल आए तो उन्होंने भी अपना क़ानून लागू किया. जो मुख्यतः इस्लामिक नियमों के हिसाब से बनाया गया था. मुग़ल काल में क़ानूनी मामलों के लिए एक अलग विभाग बनाया गया था, महकमा-ए-अदालत.

मुग़ल दरबार का एक चित्र (तस्वीर: Wikimedia)

अदालतों में भी एक श्रेणीबद्ध ऑर्डर हुआ करता था. जिसमें सबसे ऊपर खुद बादशाह था, इसके बाद चीफ़ जस्टिस का ओहदा होता था. जिसे क़ाज़ी-ए-कुज़ात कहा जाता था. तीसरे दर्जे की अदालत रेवेन्यू से जुड़े मामलों को देखती थी. यहां तक कि मिलिट्री से जुड़े मामलों के लिए एक अलग अदालत होती थी, जिसे क़ाज़ी-ए-अस्कर कहा जाता था.

इसी तरह सूबों में भी अदालतों की श्रेणियां होती थीं जिसमें गवर्नर की अदालत सबसे ऊपर होती थी. उसके नीचे क़ाज़ी अदालत और रेवेन्यू कोर्ट हुआ करता था. मुग़ल काल में ज़िलों को सरकार बोला जाता था. इन सरकारों में भी 3 अदालतें हुआ करती थीं. इनमें सबसे ऊपर क़ाज़ी अदालत, फिर फ़ौजदारी अदालत और फिर कोतवाली अदालत हुआ करती थी.

ऑर्डर ऑफ़ कोर्ट

मुग़ल काल में अपराध को तीन श्रेणियों में बांटा गया था.

1) खुदा के ख़िलाफ़
2) शहंशाह के ख़िलाफ़
3) आम लोगों के ख़िलाफ़

सजा भी तीन तरीकों से दी जाती थी

1) हद, यानी ऐसी सजा जो फ़िक्स है. इसमें किसी भी प्रकार का हेरफेर नहीं किया जा सकता. इसके अनुसार शरिया में अपराध की जैसी सजा मेंशन है, उसमें कोई भी बदलाव नहीं हो सकता.

2) तजीर, यानी छोटे मसलों के लिए दी जानी वाली सजा. या ऐसा कोई भी अपराध जिसके लिए शरिया में सजा नहीं है. इसमें सजा का फ़ैसला बादशाह या जो कोई भी न्यायाधीश है, वो अपने हिसाब से कर सकता है.

3) किसास, यानी खून के बदले खून.

4) दियत, अगर अपराधी और विक्टिम के परिवार के बीच समझौता हो जाए तो अपराधी रक़म चुकाकर रिहा हो सकता है.

मुग़लों के बाद

1820 में तीसरे आंग्ल मराठा युद्ध के बाद अंग्रेजों का लगभग पूरे भारत पर एकाधिकार हो गया था. तब तक व्यापार आदि का सारा काम ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी (EIC) देखती थी. लेकिन 1830 के बाद हालात बदल गए. 1830 में अंग्रेजों ने मुग़ल सल्तनत का चैप्टर ख़त्म किया और लगभग पूरे भारत पर राज करने लगे. इतने बड़े देश को चलाने के लिए सरकार और क़ानून की ज़रूरत थी. ब्रिटेन का क़ानून सरकार और जनता के बीच था. लेकिन भारत में अंग्रेज भारतीयों को अपने बराबर तो मानते नहीं थे इसलिए यहां के लिए एक नए क़ानून की ज़रूरत थी. नतीजतन 1833 में एक नया चार्टर एक्ट पास किया गया.

लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले (तस्वीर : Wikimedia)

इसके तहत ब्रिटिश EIC को जो रॉयल चार्टर दिया गया था उसमें 20 साल की वृद्धि कर दी गई. लेकिन कुछ बदलाव भी किए गए. मसलन बंगाल का गवर्नर अब गवर्नर जनरल ऑफ़ इंडिया ने नाम से जाना जाने लगा. इसी चार्टर के तहत ये भी तय हुआ कि ब्रिटिश EIC अब एक कमर्शियल बॉडी न रहकर एक एडमिनिस्ट्रेटिव इंस्टिट्यूशन यानी प्रशासनिक संस्था होगी.

इस ऐक्ट में एक ख़ास बात और थी. वो ये कि इसके अनुसार एक लॉ कमीशन की स्थापना की जानी थी. जो 1834 में हुई. इसके चेयरमैन थे, लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले. वही मैकॉले जो भारत में शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए कुख्यात हैं. इस कमीशन ने इंडियन पीनल कोड (IPC) का पहला ड्राफ़्ट तैयार किया. इसमें ब्रिटेन के अलावा फ़्रेंच लॉ के कुछ हिस्से भी जोड़े गए थे.

1837 में पहला ड्राफ़्ट गवर्नर जनरल को सबमिट किया गया. लेकिन इसमें और सुधार की आवश्यकता थी. ड्राफ़्ट में संशोधन कर 1856 में इसे दुबारा सबमिट किया गया. सम्भावना थी कि 1857 में ही ये लागू हो जाता. लेकिन मंगल पांडे की लगाई क्रांति की चिंगारी पूरे भारत में फैल चुकी थी. सरकार का ध्यान क्रांति को कुचलने में लग गया. इसके IPC का ड्राफ़्ट ठंडे बस्ते में चला गया.

ताजिरात-ए-हिंद 

आगे चलकर बर्न्स पीकॉक ने इसे एक और बार रिव्यू किया और 1860 में लेजिस्लेटिव काउन्सिल ने इसे पास कर दिया. यही बर्न्स पीकॉक आगे जाकर कलकत्ता हाई कोर्ट के पहले चीफ़ जस्टिस बने. क़ानून पास होने के दो साल बाद यानी 1862 में इसे लागू किया गया और ये भारत का अधिकृत क़ानून बन गया. तब इसे ‘ताजिरातहिंद ’ भी कहा जाता था. यानी हिंद का क़ानून. इसीलिए हिंदी फ़िल्मों में हम सुनते है,

“तमाम गवाहों के बयानात और सबूतों के मद्देनजर अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि मुल्जिम दफा 302, ताजीरात ए हिन्द के तहत कसूरवार है.”

इसमें 302 IPC का कोड है जो हत्या के अपराध की व्याख्या करता है. IPC की कई धाराएं आम बोलचाल की भाषा का हिस्सा बन चुकी हैं. जैसे किसी धोखेबाज़ व्यक्ति को 420 कहा जाना. ऐसा इसलिए क्योंकि IPC का सेक्शन 420 धोखेबाज़ी से सम्बंधित है.

बर्न्स पीकॉक और कलकत्ता हाई कोर्ट 1860 (तस्वीर: Wikimedia)

IPC को 23 चैप्टर और 511 सेक्शंस में बांटा गया है. जिसके हर सेक्शन में अलग-अलग अपराध की परिभाषा और उसकी सजा का उल्लेख है. वैसे तो ये नियम और क़ानून की किताब है लेकिन ऑर्गेनिक केमिस्ट्री की तरह ये भी अपवादों से भरी पड़ी है. IPC में आज तक 77 अमेंडमेंट हो चुके हैं.

अपराध के 5 चरण

IPC के अनुसार किसी अपराध के 5 चरण होते हैं. समझने के लिए अमर-अकबर-एंथोनी के उदाहरण को दुबारा लेकर आते हैं. IPC के अनुसार अपराध का पहला चरण है,

1) मोटिव: अपराध के पीछे का कारण. जैसे अकबर अगर बदले में अमर की हत्या कर देता है. तो यही उसका मोटिव है, बदला. कोर्ट ड्रामा में आपने देखा होगा कि अक्सर वकील पहले मोटिव स्थापित करना चाहते हैं. ऐसा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि मनुष्य एक रेशनल प्राणी है और वो यूं ही कोई कार्य नहीं करता. बिना मोटिव के अपराध का अर्थ है कि इंसान की मानसिक अवस्था सही नहीं है. हालांकि सिर्फ़ मोटिव स्थापित करना काफ़ी नहीं है. क़ानून किसी व्यक्ति को सिर्फ़ मोटिव के चलते सजा नहीं दे सकता. अगला चरण है,

2) इंटेन्शन:  ऐक्सिडेंट के वक्त अमर का इरादा क्या था? क्या गाड़ी चलाते वक्त उसका इरादा एंथोनी को टक्कर मारने का था? अगर नहीं तो ये गैर इरादतन अपराध की श्रेणी में आएगा. और इसकी सजा भी हत्या से कम होगी. तीसरा चरण है

3) प्रेपरेशन: तैयारीअमर का उद्देश्य एंथोनी की हत्या का था. तो ज़रूर उसने इसके लिए तैयारी की होगी. जैसे ये पता करना कि एंथोनी किस वक्त कहां पर होगा. गाड़ी का इंतज़ाम आदि. इसके बरक्स मान लीजिए अमर ने कोई तैयारी नहीं की. उसे अचानक एंथोनी दिखा. और उसी दिन हुई किसी बात पर आवेश में आकर अमर ने एंथोनी को टक्कर मार दी. तो ये भी हत्या का ही केस है. लेकिन इसे आवेश में आकर अंजाम दिए गए अपराध की श्रेणी में डाला जाएगा. चौथा चरण है,

4) अटेम्प्ट: प्रयास. मान लीजिए अमर जैसे ही एंथोनी की तरफ़ गाड़ी बढ़ाता है. एंथोनी कूद कर अपनी रक्षा कर लेता है. अब यहां कोई ऐक्सिडेंट तो नहीं हुआ. लेकिन फिर भी इसे हत्या का प्रयास माना जाएगा. जो खुद अपने आप में एक अपराध है. आप सफल हो या ना हों, अपराध का प्रयास भी स्वयं में अपराध है. पांचवा और अंतिम चरण है,

5) अकंप्लिशमेन्ट: अपराध करने में सफल होना.

ये पांचों चरण स्थापित करने पर ही किसी आपराधिक केस को पूरा माना जाता है. अपराध के चरणों के अलावा IPC में अपराध क्या है, इसकी भी पूरी व्याख्या की गयी है. उदाहरण के लिए सेक्शन 378 में चोरी की 5 व्याख्याएं दी गई हैं. जिसमें ये बताया गया है कि किस कृत्य को चोरी माना जाएगा और कौन-कौन सी चीज़ें हैं जिनकी चोरी की जा सकती है.

IPC में अपराध और उसकी सजा का ब्यौरा तो दिया गया है. लेकिन अपराध हो जाने की स्थिति में पुलिस क्या करेगी. अपराध की तहक़ीक़ात कैसे होगी. अपराधी को पकड़ने और अदालत में पेश किए जाने की प्रक्रिया क्या रहेगी? इस सबके बारे में और सबूतों को लेकर नियम आदि के लिए अलग से कोड है जिसे क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) कहते हैं.

वीडियो देखें: रानी दुर्गावती ने अगर सेनापति की बात न मानी होती तो बादशाह अकबर से जीत सकती थी!

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