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क्या हुआ जब IAF का एक 
प्लेन बर्मा में पीछे छूट गया?

1942 की एक दोपहर भारत स्थित वायुसेना हेडक्वार्टर को एक संदेश मिला,

“ये वन-मैन गुर्रिला युद्ध मज़ेदार है, लेकिन मेरे पास सिर्फ़ एक जोड़ी क़मीज़ और निक्कर है. मुझे नहीं लगता दो हफ़्ते जंगल में बिताने के लिए ये काफ़ी होंगे” 

ये संदेश बर्मा से आया था. भेजने वाले थे, फ्लाइंग ऑफ़िसर हैदर रज़ा. बर्मा से लौटते हुए रज़ा अपनी यूनिट से बिछड़ गए थे. इंडियन एयर फ़ोर्स की स्क्वाड्रन 1 को वापस लौटने के लिए बोला जा चुका था. लेकिन इससे बेख़बर रज़ा मोर्चे पर डटे हुए थे. दो हफ़्ते तक वो जापानी सेना का सामना करते हुए लगातार उन पर बम और मशीन गन से हमला कर रहे थे. भारत में जब उनके वरिष्ठ ऑफ़िसरों को पता चला तब उन्हें मिशन के ख़त्म होने का पता चला और वो वापस लौट आए.

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फ्लाइंग ऑफ़िसर हैदर रज़ा (तस्वीर: rafmuseum)

बंटवारे के बाद जब पाकिस्तान बना तो यही हैदर रज़ा पाकिस्तान एयरफ़ोर्स, PAF के फ़ाउंडिंग मेम्बर बने. और आगे जाकर एयर वाइस-मार्शल की रैंक तक पहुंचे. 1965 युद्ध की याद में पाकिस्तान 7 सितम्बर को वायुसेना दिवस मनाता है. मनाता है तो मनाए. अपना पॉइंट सिर्फ़ इतना है कि भारत और पाकिस्तान की वायुसेना का गठन एक ही दिन दिन हुआ था. वो भी तब, जब दोनों देश एक थे.

आज 8 अक्टूबर है और आज की तारीख़ का संबंध है भारतीय वायुसेना से.

पहला विश्व युद्ध

20 वीं सदी से पहले भी युद्ध हुए. बड़े-बड़े युद्ध हुए. 16वीं और 17वीं शताब्दी में ब्रिटेन, स्पेन और फ़्रांस दुनिया के सुदूर इलाक़ों में लड़ाई लड़ रहे थे. 18वीं शताब्दी के अंत तक अमेरिका में भी एक बड़ी लड़ाई चल रही थी. नेपोलियन, सिकंदर का नाम भी हम सभी जानते ही हैं. ये भी विश्व विजेता ही बनने चले थे.

इसलिए पहला प्रश्न तो यही उठता है कि पहले विश्व युद्ध को पहला क्यों कहा जाता है. और विश्व युद्ध क्यों कहा जाता है?

दरअसल ‘विश्व युद्ध’, ये टर्म पहली बार 1914 में जर्मन्स ने यूज़ किया. तब लगभग पूरी दुनिया ही फ़्रांस या ब्रिटेन का उपनिवेश हुआ करती थी. जर्मनी की लड़ाई इन दोनों से और हेन्स प्रूव्ड- पूरी दुनिया से थी. ब्रिटेन और फ़्रांस तब इसे विश्व युद्ध ना कहकर ‘ग्रेट वॉर’ बुलाया करते थे.  1945 में आधिकारिक रूप से WW1 को WW1 का नाम दिया गया. क्योंकि ये पहली इंडस्ट्रिलाइज़्ड वॉर थी जिसमें शामिल देशों की पूरी मशनरी इसमें लगी हुई थी. इस विश्व युद्ध के साथ एक और ख़ास बात जुड़ी हुई थी- वायुसेना.

1903 में राइट बंधुओं ने दुनिया को एक नए आविष्कार से अवगत कराया. पहला मोटर चालित वायुयान. नाम था किटी हॉक.  इसके 11 साल बाद WW1 शुरू हुई तो पहली बार लड़ाई आसमान से लड़ी गई. WW1 में भारतीय पाइलट्स का रोल छोटा ही सही लेकिन था दमदार. कुल जमा 4 भारतीय फ़ाइटर पायलट्स ने WW1 में भाग लिया था. इनके नाम थे लेफ़्टिनेंट श्री कृष्ण चंदा वेलिंकर, हरदीत सिंह मलिक, चंदेर सेन, और इंदर लाल रॉय.

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1756 से 1763 के बीच सात साल का युद्ध एक वैश्विक संघर्ष था जो फ्रांस और उसके सहयोगियों और ग्रेट ब्रिटेन और उसके सहयोगियों के बीच चला (तस्वीर: wikimedia)

रॉय फ़ाइटर प्लेन उड़ाने वाले पहले भारतीय थे. इन सबकी ट्रेनिंग भारत के पहले मिलिट्री फ्लाइंग स्कूल से हुई थी. जिसे 1913 में खोला गया. खोलने वाले थे, पंजाब रेजीमेंट के कैप्टन SD मासी. और लोकेशन थी- लखनऊ से 90 किलोमीटर दूर सीतापुर में.  इन चार लोगों ने WW1 में ग़ज़ब का साहस दिखाया. आपको लगेगा कि भारतीय हैं तो भारतीयों की तारीफ़ तो करेंगे ही. लेकिन ये सब हम ब्रिटेन स्थित रॉयल एयर फ़ोर्स के म्यूज़ियम के हवाले से बता रहे हैं. जहां आज भी इन चारों की तस्वीर लगी हुई है.

सितम्बर 1917 में युद्ध के दौरान चंदेर सेन का प्लेन एनिमी ग्राउंड में गिरा और उन्हें युद्ध बंदी बना लिया गया. वेलिंकर और रॉय ने शहीद होने से पहले 10 विमानों को मार गिराया था. और हरदीत सिंह मलिक भी युद्ध के दौरान ज़ख़्मी हो गए थे.

1918 में युद्ध के बाद ब्रिटेन की सरकार ने रॉय को फ्लाइंग क्रॉस से सम्मानित किया.
1918 के बाद इंडियन एयर कोर को रॉयल ऐयर फ़ोर्स, RAF में मिला दिया गया. जिसका मुख्य मिशन अफ़ग़ानिस्तान में कबीलों से चल रही लड़ाई में आर्मी का सहयोग करना था. इसके लिए रिसालपुर, क्वेटा, अंबाला और सीतापुर में बेस बनाए गए थे.

अगला चरण

भारत को स्वायत्ता दिए जाने की मांग पर 1927 में स्कीन कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की. इसमें भारत के लिए अलग इंडियन एयर फ़ोर्स, IAF के गठन का सुझाव शामिल था. साथ ही भारतीय कडेट्स को RAF के लिंकनशायर स्थित क्रेनवेल अकादमी में ट्रेनिंग दिए जाने की सिफ़ारिश भी की गई थी. जिसके बाद सितंबर 1930 में 6 भारतीय कडेट्स ने क्रेनवेल अकादमी में ट्रेनिंग शुरू की.

5 अप्रैल 1928 को सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फ़ॉर इंडिया, लॉर्ड बर्कनहेड ने IAF के गठन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था. लेकिन इसे अमली जामा पहनाने में कुछ साल और लगे.  आज ही के दिन यानी 8 अक्टूबर 1932 को ब्रिटिश इंडिया सरकार ने इंडियन एयरफ़ोर्स ऐक्ट पास किया और भारतीय वायु सेना की आधिकारिक शुरुआत हुई. तब से इस दिन को भारतीय वायुसेना दिवस के रूप में मनाया जाता है.

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WW2 के दौरान बर्मा में एक मिशन के बाद भारतीय वायु सेना के पायलट (तस्वीर: Wikimedia)

8 अक्टूबर के दिन ही 6 भारतीय कडेट्स ने क्रेनवेल से अपनी ट्रेनिंग पूरी की. जिसके बाद उन्हें IAF में कमीशन किया गया. इनके नाम थे, सुब्रतो मुखर्जी, HC सरकार, भूपेन्द्र सिंह, ऐजाद अवान, अमरजीत सिंह और जगत नारायण टंडन. सुब्रतो मुखर्जी प्रथम विश्व युद्ध में शहीद होने वाले पायलट इंदर लाल रॉय के भतीजे थे. और आगे जाकर वो भारत के पहले एयर चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ भी बने.

पहली स्क्वाड्रन

1933 में IAF की पहली स्क्वाड्रन का बेस द्रिघ रोड, कराची में बनाया गया. शुरुआत में इसमें सिर्फ़ 4 Westland Wapitis विमान शामिल थे. ट्रेंड रिक्रूट्स की कमी के कारण सिर्फ़ एक फ़्लाइट के लायक़ ऑफ़िसर की संख्या हुआ करती थी. टेक्नीशियन के लिए भी रेलवे के लोगों को भर्ती करना पड़ता था, जो ग्राउंड स्टाफ़ का काम सम्भालते थे. उन दिनों अंग्रेज अधिकारी भारतीयों को अपने से निचले स्तर का समझते थे और IAF के बजट भी बहुत सीमित हुआ करता था.

स्थिति में परिवर्तन आया 1939 में, जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ. तब ब्रिटिश सरकार ने IAF के लिए 17 मिलियन पौंड की रक़म सेंक्शन की. उसी साल IAF ने सिविलियन पाइलट्स को वालंटियर रिज़र्व के तौर पर भर्ती करना शुरू किया. वालंटियर रिज़र्व के पाइलट्स ने WW2 के दौरान कोस्टल इलाक़ों और बंदरगाहों के डिफ़ेंस का काम सम्भाला. 1939 तक IAF में ऑफ़िसर्स की संख्या 200 हो चुकी थी. ये लोग मद्रास कोचीन, बॉम्बे, कलकत्ता, और कराची पोर्ट पर तैनात रहते थे.

इसी दौरान IAF की फ़्लीट में कुछ नए फ़ाइटर प्लेन भी जोड़े गए. जिनमें वल्टी वेंजेंस, डग्लस DC3, ब्रिटिश हॉकर हरिकेन, सुप्रीम स्पिटफ़ायर, और वेस्टलैंड लायसेंडर जहाज़ शामिल थे. सितंबर 1939 में IAF ने पहली बार WW2 में हिस्सा लिया. तब भी IAF की सिर्फ़ एक स्कवाड्रन हुआ करती थी. IAF के विस्तार के लिए 1940 में 20 भारतीय कडेट्स को पाइलट ट्रेनिंग के लिए UK भेजा गया. अंग्रेज तब मानते थे कि भारतीय आधुनिक फ़ाइटर प्लेन उड़ाने के काबिल नहीं. इसलिए इन कडेट्स की विशेष परीक्षा हुआ करती थी, ताकि ऐक्टिव सर्विस कंडीशन में उनकी फ़ाइटिंग क्वालिटी की जांच हो सके.

दूसरे विश्व युद्ध में IAF

1940 में फ़्रांस और पोलेंड हथियाने के बाद जर्मनी ने लुफ़्टवाफ़ा को लंदन की तरफ़ रवाना किया गया. इस लड़ाई को बैटल ऑफ़ ब्रिटेन के नाम से भी जाना जाता है. इस लड़ाई में आठ भारतीय फ़ाइटर पाइलट्स ने भी हिस्सा लिया था. ये सिर्फ़ शुरुआत थी. IAF का असली पराक्रम देखने को मिला बर्मा में.

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करुण कृष्णा “जंबो” मजूमदार विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय अधिकारी थे (तस्वीर: Wikimedia)

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1941 में पसिफ़िक में लड़ाई शुरू हुई और जापानी आर्मी ने ब्रिटिश और अमेरिकन कॉलोनियों पर हमला कर दिया. इंडिया और ऑस्ट्रेलिया पर भी इन्वेज़न का ख़तरा मंडरा रहा था. ऐसे में इंडियन एयर फ़ोर्स, IAF की नम्बर 1 स्क्वाड्रन को टैक्टिकल रिकॉनसेंस ऑपरेशन के लिए बर्मा भेजा गया. बर्मा में IAF का में हुआ करता था.

1 फरवारी 1942 को जापानी आर्मी ने टोउंगू पर हमला किया लेकिन बेस को बचा लिया गया. अगले दिन स्क्वाड्रन लीडर करुण कृष्ण मजूमदार ने वापसी हमले का फ़ैसला किया. जापान का एयरबेस थाईलैंड में था. मजूमदार जिन्हें जंबो कहकर बुलाया जाता था, उन्होंने अपने आदमियों से 113 किलो के दो बम, एयरक्राफ़्ट से अटैच करने को कहा. अगले दिन यानी 3 फरवरी को उन्होंने 12 Westland Lysander जहाज़ों के साथ उड़ान भरी. और थाईलैंड बेस पर एक हैंगर सहित सभी जापानी विमानों को नष्ट कर दिया.

इस ऑपरेशन के चलते मजूमदार को विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस से सम्मानित किया गया और वो विंग कमांडर की पदवी पाने वाले पहले भारतीय बने.

IAF से RAIF से IAF

बर्मा अभियान के दौरान भारतीय वायुसैनिकों को उनके साहस और प्रोफेशनलिस्म के लिए जाना गया. भयावह परिस्थितियों में काम करते हुए, बर्मा में भारतीय ग्राउंड क्रू ने भारतीय वायुसेना के विमानों को उड़ान भरने के काबिल बनाए रखा. इस दौरान जापानी सेना का ख़तरा लगातार बना हुआ रहता. IAF के पराक्रम और साहस को देखते हुए ब्रिटिश क्राउन ने 12 मार्च 1945 को IAF को रॉयल की उपाधि दी और IAF का नाम रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स, RAIF हो गया. हालांकि इसके सिर्फ़ 5 साल बाद गणतंत्र की स्थापना के साथ ही ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया.

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वेस्टलैंड वैपिटी, भारतीय वायु सेना के पहले विमानों में से एक (तस्वीर: Wikimedia)

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान IAF के 25 हज़ार भारतीय सैनिकों ने ब्रिटेन की तरफ़ से युद्ध में हिस्सा लिया. 1945 के अंत तक IAF की 9 स्क्वाड्रन तैयार हो चुकी थी. पूरे WW2 के दौरान भारतीय फ़ाइटर पाइलट्स ने 16 हज़ार सॉर्टीज़ को अंजाम दिया. और 24 हज़ार से घंटों की उड़ान भरी.

WW2 के दौरान IAF के सैनिकों को 22 विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस, 1 विशिष्ट सेवा मेडल, 2 एयर फ़ोर्स क्रॉस और 45 अन्य मेडल्स से सम्मानित किया गया. कॉम्बैट के दौरान 688 एयरमैन और ज़मीनी लड़ाई में 231 सैनिक शहीद हुए. इसके अलावा 267 लोग ज़ख़्मी भी हुए. और जैसा कि शुरुआत में बताया आज़ादी के बाद 7:3 के रेशियो के हिसाब से IAF की 2 स्क्वाड्रन पाकिस्तान के हिस्से में गई जिनसे PAF का गठन हुआ.


वीडियो देखें- मदर टेरेसा को नरक का फ़रिश्ता क्यों कहा गया?

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