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हैदराबाद में क़त्लेआम मचाने वाले रज़ाकारों की पूरी कहानी

आज 17 सितंबर है और आज की तारीख़ का संबंध है हैदराबाद से. आज ही के दिन यानी 17 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो के तहत निज़ामशाही को हराकर हैदराबाद को भारत में विलय कर दिया था. क़िस्से की शुरुआत, साइंस फ़िक्शन से.

प्रॉमीथियस और हर्क्युलीज़

सन 1818 में अंग्रेज़ी लेखिका ‘मैरी शैलि’ ने एक नॉवल लिखा. नाम था, ‘दी मॉर्डन प्रॉमीथियस’. नॉवल की कहानी के अनुसार एक वैज्ञानिक ‘विक्टर फ्रैंकेंस्टीन’ के हाथ एक ऐसी विधि लग जाती है, जिससे वो मरे हुए लोगों के बेजान अंगों को जोड़कर एक नया आदमी बना सकता था. लेकिन इस विधि से उसने जिस चीज़ का क्रिएशन किया, वो इतनी भयानक थी कि उसे देखकर उसको खुद से ही घृणा हो गई और वो भाग गया.

कहानी के अनुसार आगे चलकर इस कृति का नाम पड़ा ‘फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर’. जो यूं ही दर दर भटक कर और लोगों को मारने लगा. मैरी शैलि को इस नॉवल का idea एक ग्रीक मिथक से आया था. जिस ग्रीक किरदार पर इस नॉवल का नाम रखा गया था, वो था प्रॉमीथियस.

नोट : चूंकि अब ग्रीक और रोमन साम्राज्य तो रहे नहीं, इसलिए इस बात का डर नहीं है कि प्रॉमीथियस की बात करने से किसी की ‘नाज़ुक आस्था’ को ठेस लगे. 

ग्रीक मिथकों में प्रॉमीथियस आग का देवता है. कहा जाता है कि उसी ने मानव को मिट्टी से बनाया. इतना ही नहीं ज़्यूस और बाकी देवताओं की इच्छा के विपरीत उसने मानव को एक विशेष हथियार भी दे दिया था. ये हथियार था ‘आग’. जिसे मानवीय इनोवेशंस की शुरुआत माना जाता है. इसी कारण प्रॉमीथियस को इनोवेशन का देवता भी कहा जाता है.

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ग्रीक मिथकों के अनुसार प्रॉमीथियस अग्नि का देवता है (तस्वीर: Universal History Archive)

इस बात से ग़ुस्सा होकर ज़्यूस ने प्रॉमीथियस को सजा दे डाली. उसकी सजा ये थी कि एक चील उसका कलेजा ख़ा जाएगी. लेकिन उसका कलेजा रोज़ दुबारा पैदा होता और रोज़ चील उसका कलेजा नोचती. (ग्रीक मिथकों में माना जाता था कि इंसानी इमोशन कलेजे से उत्पन्न होते हैं). ये सिलसिला तब तक यूं ही चलता रहा, जब तक ज़्यूस के बेटे हर्क्युलीज़ ने चील को मारकर प्रॉमीथियस को आज़ाद न करा लिया.

यूनिवर्सल आर्कटाइप्स

इन ग्रीक मिथकों और साइंस फ़िक्शन की बात क्यों?

क्योंकि मिथक केवल कहानी भर नहीं होते. बल्कि इनका इस्तेमाल रूपक के तौर पर होता है, जो बार बार अलग अलग कहानियों के माध्यम से पूरे इंसानी इतिहास में दोहराए गए हैं. स्विस साइकोलोजिस्ट ‘कार्ल युंग’ ने इन रूपकों के लिए एक टर्म दिया है, ‘आर्कटाइप’.

यानी ऐसे यूनिवर्सल ‘मिथक’ जो इंसान के व्यवहार पर आदम काल से असर डालते आए हैं. इसीलिए हिटलर के गुर्गों जैसे ‘हाइनरिक हिमलर’ और जोसेफ गोएबेल्स को हिट्लर के ‘फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर्स’ की संज्ञा दी जाती है, जिन्हें उसने खुद ही बनाया था.  1946 में भारत में भी एक ऐसा व्यक्ति उभरा जिसे भारत सरकार ने फ्रैंकेंस्टीन मान्स्टर की संज्ञा दी. कौन था ये व्यक्ति और इसे किसने बनाया? आइए जानते हैं.

भारत के दिल का नासूर

आज़ादी के बाद अक्टूबर 1947 तक अधिकतर रियासतों ने भारत में विलय को मंज़ूरी दे दी थी. सिवाय तीन के, कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़. तीनों एक आज़ाद अस्तित्व चाहते थे. और भारत और पाकिस्तान दोनों इनको खुद में मिला लेना चाहते थे. तब भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबैटन ने मोहम्मद अली जिन्ना को एक लिखित प्रस्ताव भेजा. जिसमें उन्होंने कहा कि जिन रियासतों में हुकूमत पर अल्पसंख्यकों का क़ब्ज़ा है, वहां जनमत संग्रह कराया जा सकता है.

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1963 के चीन युद्ध के दौरान निजाम मीर उस्मान अली ने भारत सरकार को पांच टन सोना नेशनल डिफेंस फंड में दिया था (तस्वीर: Wikimedia)

वैसे तो ये सुझाव कश्मीर के लिए था, लेकिन जिन्ना को लगा कि कश्मीर से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हैदराबाद की रियासत थी. उन्होंने सोचा कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान में शामिल हो गया तो ये भारत के लिए बहुत शर्मिंदगी की बात होगी. इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया. जिन्ना की इस नीयत को सरदार पटेल जल्द ही भांप गए थे. इसलिए जहां नेहरू का फ़ोकस कश्मीर समस्या पर था, पटेल की ज़्यादा दिलचस्पी हैदराबाद में थी. उन्हें लग रहा था कि हैदराबाद भारत के दिल पर नासूर की तरह है, जिसका जल्द निपटारा ना किया गया तो ये घाव पूरे भारत में फैल जाएगा.

तब का हैदराबाद आज से कहीं ज़्यादा फैला हुआ करता था. इसमें महाराष्ट्र और कर्नाटक के भी कुछ हिस्से आते थे. और इसके नवाब थे, उस्मान अली ख़ान. नवाब साहब की दौलत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पेपर वेट के लिए वो 185 कैरट का हीरा इस्तेमाल किया करते थे. आज के हिसाब से जिसकी क़ीमत थी 20 करोड़ अमरीकी डॉलर यानी करीब 1400 करोड़ रुपये. सरदार पटेल चाहते थे कि हैदराबाद जल्द से जल्द भारत में विलय हो जाए. लेकिन नवाब साहब को ये मंज़ूर नहीं था.

पाकिस्तान तब तक कश्मीर में घुस चुका था और उस फ़्रंट पर भारत एक बड़ी लड़ाई लड़ रहा था. मसले को सुलझाने के लिए हैदराबाद और भारत के बीच स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट साइन हुआ. जिसके अनुसार भारत हैदराबाद की विदेश नीति सम्भालता और बाक़ी काम निज़ाम सरकार. लेकिन शर्त ये थी कि निज़ाम किसी दूसरे देश से सीधे तौर पर सम्बन्ध नहीं रख सकते थे.

नवाब का फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर

निज़ाम के इरादे साफ़ नहीं थे. ना केवल वो पाकिस्तान से संबंध बनाए हुए थे बल्कि पाकिस्तान उन्हें हथियार भी सप्लाई कर रहा था. निज़ाम की इस ख़ुशफ़हमी की वजह थी उनके कानों में पड़ रही एक आवाज़. आवाज़ जो कह रही थी कि ख़ुदा के फ़ज़्ल से एक दिन दिल्ली के लाल क़िले पर निज़ामशाही का झंडा फहराएगा. इस आवाज़ का भौपूं बजाने वाला व्यक्ति था क़ासिम रिज़वी. जिसे भारत सरकार निज़ाम का पैदा किया फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर बुलाती थी.

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क़ासिम रिज़वी और रज़ाकार सेना (तस्वीर: wikimedia)

1902 में क़ासिम की पैदाइश हुई थी. आगे जाकर उसने AMU से लॉ की डिग्री ली और हैदराबाद चला गया. वहां पहुंचकर उसने लातूर, उस्मानाबाद में अपनी वकालत शुरू कर दी. पिता पुलिस में DSP हुआ करते थे. सो क़ासिम ने पिता के रौब में ग़ैरक़ानूनी ढंग से बहुत सी दौलत इकट्ठा कर ली थी. रुतबा बढ़ा तो फ़ॉलोअर्स भी बन गए. जिनसे उसने एक मिलिशिया ग्रुप बनाया. ग्रुप का नाम रखा रज़ाक़ार.

इस शब्द का अर्थ होता है वॉलंटियर. बांग्लादेश में आज किसी से पूछेंगे तो कहेगा रज़ाक़ार का मतलब देशद्रोही. इसका कारण ये है कि 1971 बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान पाकिस्तान ने बांग्लादेश में कट्टरपंथियों की जो पैरामिलिटरी फ़ोर्स बनाई थी, उसका नाम भी रज़ाक़ार ही था. 1946 तक रज़ाक़ारों की संख्या दो लाख हो चुकी थी. आज़ादी ने दस्तक दी तो ये मुद्दा भी खड़ा हो गया कि हैदराबाद को भारत में मिल जाना चाहिए. क़ासिम इसके सख़्त ख़िलाफ़ था और उसने रज़ाक़ारों के दम पर चारों तरफ़ दहशत फैला दी.

आमतौर पर माना जाता है कि क़ासिम हिंदुओं के खिलाफ था. ये बात सच है लेकिन इसके साथ एक और सच ये भी है कि उसका असली निशाना थी, हिंदुस्तान परस्त आवाम. उन दिनों हैदराबाद में एक मुस्लिम पत्रकार हुआ करते थे, शोएबुल्ला ख़ान. वो हैदराबाद के भारत में विलय का समर्थन कर रहे थे. क़ासिम के इशारे पर रज़ाक़ारों ने उन्हें भी मार दिया. क़ासिम ने अपने समर्थकों से कहा,

‘काग़ज़ पर कलम के छोटे से स्ट्रोक से ख़त्म हो जाने की बजाय कहीं बेहतर है हाथ में तलवार लेकर मरना’

‘तेलंगाना’ में कम्युनिस्ट क्रांति

बात केवल हैदराबाद के भारत में विलय की नहीं थी. इस दौर में हैदराबाद में क्लास वॉर भी चल रहा था. जिसे समझे बिना हैदराबाद और ऑपरेशन पोलो की कहानी पूरी नहीं होती. शुरुआत से ही बाकी रियासतों की तरह हैदराबाद में भी सामंती राजशाही चलती थी. अधिकतर ज़मीन पर चंद सामंतों का क़ब्ज़ा था.

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तेलंगाना विद्रोह के दौरान कम्युनिस्ट झंडे के साथ विद्रोहियों का गठन (तस्वीर: wikimedia)

1930 में अमेरिका से ग्रेट डिप्रेशन की शुरुआत हुई. इसका असर भारत में भी पड़ा. ज़मींदारों ने अपनी ज़मीन पर कैश क्रॉप्स उगाना शुरू कर दिया. इससे बंधुआ मज़दूरों और छोटे किसानों की हालत और ख़राब हो गई. 1940 तक पूरे हैदराबाद में मार्क्स का नारा गूंज उठा,

‘दुनिया के मजदूरों एकजुट हो जाओ. तुम्हारे पास खोने को कुछ भी नहीं है’

बात शब्दशः सही थी. छोटे किसानों के पास खोने को कुछ था भी नहीं. ज़मींदारों के उत्पीड़न से तंग आकर मज़दूरों ने इकट्ठा होकर विद्रोह करना शुरू कर दिया. नतीजतन तेलंगाना में कम्युनिस्ट क्रांति शुरू हो गई. WW2 के दौरान भारत में अन्न का भारी अकाल पड़ा. जिससे किसानों के आंदोलन को और हवा मिली.

रज़ाकार

ज़मींदारों ने निज़ाम का दरवाज़ा खटखटाया. और निज़ाम ने क़ासिम रिज़वी को इस बात की खुली छूट दे दी कि वो किसी भी तरह से कम्युनिस्ट क्रांति को ख़त्म करे. क़ासिम रिज़वी की ताक़त इतनी बढ़ चुकी थी कि वो अकेले पूरी राजशाही को चलाने लगा था. उसने रियासत में कम्युनिस्ट पार्टी पर बैन लगा दिया. साथ ही उसने रज़ाक़ारों को निर्देश दिया कि वो लेफ़्ट से सहानुभूति रखने वाले लोगों को चुन चुन कर मारें. इस दौरान गांव के गांव तबाह कर दिए गए. लोगों को टॉर्चर किया गया और आतंक फैलाने के लिए महिलाओं का रेप तक किया गया. लेकिन इससे कम्युनिस्ट क्रांति को और बल मिला और 1948 तक उन्होंने तेलंगाना के एक बड़े हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया.

भारत सरकार को इस क़त्लेआम की खबर लगी तो स्टैंड स्टिल एग्रीमेंट की अवधि पूरी होने से पहले ही सेना को हैदराबाद के लिए रवाना कर दिया गया. ऑपरेशन पोलो के लिए 13 तारीख़ चुनी गई. 11 तारीख़ को पाकिस्तान में जिन्ना का निधन हो चुका था. इसलिए पाकिस्तान चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया.

ऑपरेशन पोलो और उसके बाद

मेजर जनरल जे. एन चौधरी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने हैदराबाद के ख़िलाफ़ विभिन्न दिशाओं से मोर्चे खोल दिए. पश्चिम में उनका रुख़ विजयवाड़ा की ओर था तो पूर्व में वो शोलापुर पर केंद्रित थे. केवल 4 दिनों में आर्मी ने निज़ाम की सेना और रज़ाक़ारों का सफ़ाया कर दिया. और 17 तारीख यानी आज ही के दिन, शाम 5 बजे निज़ाम ने सीजफ़ायर का एलान कर दिया. इसके अगले ही दिन औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण की घोषणा हुई.

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ऑपरेशन पोलो के दौरान भारतीय सेना की गतिविधियां (तस्वीर: Wikimedia)

इस लड़ाई के दौरान भारतीय सेना पर भी कई आरोप लगे. इल्ज़ाम था कि सेना ने आम नागरिकों को भी मार डाला था. बात बढ़ी तो सरकार ने जांच के लिए सुन्दर लाल कमिटी का गठन किया. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पेश भी की लेकिन नेहरू ने मामले की नज़ाकत को देखते हुए रिपोर्ट को गुप्त रखा. इसे कभी भी संसद में पेश नहीं किया गया. 2013 में ये रिपोर्ट पब्लिक के सामने आई. रिपोर्ट के अनुसार ऑपरेशन पोलो के दौरान क़रीब 40 हज़ार लोगों की जान चली गई थी.

1950 में गणतंत्र की स्थापना के बाद निज़ाम उस्मान अली ख़ान को हैदराबाद का गवर्नर नियुक्त किया गया. क़ासिम रिज़वी को 10 साल तक जेल में रखा गया. जहां से निकलकर वो पाकिस्तान चला गया और 1970 में उसकी मौत हो गई.


वीडियो देखें- गल्फ वॉर के दौरान एयर इंडिया के रेस्क्यू ऑपरेशन ने पाकिस्तानी क्रू को कैसे बचाया?

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