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डॉक्टर भाभा के प्लेन क्रैश के पीछे CIA का हाथ था?

1966 का साल. भारत के लिए दुर्घटनाओं का साल था. पहले 11 जनवरी को खबर आई कि देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में मृत्यु हो गई. देश से हज़ारों मील दूर. आने वाले वक्त में इस घटना ने कई कांस्पीरेसी थियरीज़ को जन्म दिया. पिक्चरें बनी. लोगों को खूब माल मसाला मिला. किसी ने कहा KGB का हाथ है तो किसी ने CIA का हाथ बताया.

इस घटना को बीते कुछ ही दिन हुए थे कि एक और बुरी खबर आई. सुदूर फ़्रांस से. जहां देश के प्रीमियर वैज्ञानिक डॉक्टर होमी जहंगीर भाभा का प्लेन क्रैश कर गया था. शास्त्री जी का शरीर भारत लाया गया था. मृत्यु के वक्त गवाह भी मौजूद थे. लेकिन तब भी इस मृत्यु से जुड़ी कमिटी की रिपोर्ट सामने नहीं आ पाई. कई सवाल ज्यों के त्यों रहे.डॉक्टर भाभा का केस तो और भी मिस्ट्री से भरा था. सिर्फ़ तीन महीने पहले डॉक्टर भाभा ने बयान दिया था कि भारत परमाणु हथियार बना सकता है.

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ताशकंद समझौते पर दस्तख़त करते हुए लाल बहादुर शास्त्री (तस्वीर: Getty)

प्लेन हादसे की जो तहक़ीक़ात हुई उसमें फ़्रेंच अधिकारियों ने सिर्फ़ एक हाइपोथीसीस की बात की. ना प्लेन का ब्लैक बॉक्स मिला. ना ही किसी यात्री का शरीर. ये कोल्ड वॉर का दौर था. भारत को रूस के पक्ष में देखा जाता था. इसलिए इस विमान दुर्घटना को लेकर भी कई तरह की थियरीज चली.

लॉकर में क्या रखा है?

फ़र्ज़ कीजिए एक लॉकर है. वो जो फ़िल्मों में दिखाई देता है. जिसमें कई घिर्रियां होती हैं. और लॉक मास्टर कान लगाकर एक-एक घिर्री को खोलता है. अब मान लीजिए लॉकर बनाने वाला एक चैलेंज रख दे. कि जो लॉकर खोलेगा, उसे अंदर रखी चीज़ मिल जाएगी. इस लॉकर को खोलने की कोशिश कई महारथियों ने की. सालों, दशकों तक. लेकिन कोई खोल नहीं पाया.

फिर इतना समय बीत गया कि लोग अंदर रखी चीज़ को तो भूल ही गए. अंदर क्या था, वैसे भी किसी को नहीं पता. लेकिन सिर्फ़ लॉकर में छुपा देने से उस चीज़ की अहमियत बढ़ गई. चाहे फिर वो कोई मामूली चीज़ ही क्यों ना हो. और बड़ा सवाल ये हो गया है कि आख़िर लॉकर में चीज़ क्यों छुपाई गई है. यानी चीज़ के क़ीमती होने का महत्व इसलिए नहीं है कि वो अपने आप में क़ीमती है. बल्कि इसलिए है कि उसे लॉकर में छुपा कर रख दिया गया है.

ऐसे ही जन्म लेती है कांस्पीरेसी थियरी. अगर बात छुपा दी जाए. तो उसको लेकर लोग तरह-तरह के अंदाज़े लगाने लगते हैं. यही उस विमान दुर्घटना के साथ भी हुआ जिसमें डॉक्टर भाभा की मृत्यु हुई थी. इस दुर्घटना की तहक़ीक़ात फ़्रेंच अधिकारियों ने की. पहले ऑफिसियल पक्ष जान लेते हैं.

विमान हादसे की सरकारी थियरी

डॉक्टर भाभा को उस दिन जेनेवा जाना था. इसके लिए वो एयर इंडिया की फ़्लाइट 101 में सवार हुए थे. इस विमान का नाम था कंचनजंगा. प्लेन में 106 यात्री और 11 क्रू मेंबर थे. मुंबई से उड़ान भरने के बाद ये विमान दिल्ली में रुका. उसके बाद बेरुत पहुंचा. जहां एक और बार इसे रुकना था. बेरुत से इसने जेनेवा के लिए उड़ान भरी. और आज ही के दिन यानी 24 जनवरी 1966 को जेनेवा उतरने से कुछ मिनट पहले ही आल्प्स की पहाड़ियों पर प्लेन क्रैश कर गया.

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क्रैश साइट से मिला नेशनल हेराल्ड अख़बार (तस्वीर: AFP)

बचाव दल पहुंचा. तब तक पूरा प्लेन नष्ट हो चुका था. बचाव दल ने यात्रियों को खोजने की बहुत कोशिश की. लेकिन सिर्फ़ कुछ पैकेट्स और चिट्ठियों के अलावा, उन्हें कुछ भी ना मिला. अंत में ख़राब मौसम के चलते, राहत कार्य को वहीं रोक दिया गया. इसके बाद फ़्रेंच अधिकारियों ने तहक़ीक़ात शुरू की.

प्लेन का अधिकतर मलबा ग्लेशियर में धंस चुका था. ना ब्लैक बॉक्स मिला था, ना ही और कोई और हिस्सा. इसलिए एक हाइपोथीसिस तैयार की गई. एक मात्र सबूत था एयर कंट्रोल रूम का प्लेन से कम्यूनिकेशन. उससे जो तस्वीर निकल कर सामने आई, वो कुछ यूं थी.

पायलट इन कमांड ने बेरुत से उड़ान भरी. लेकिन उसे ये ध्यान नहीं रहा कि प्लेन का एक रेडियो उपकरण VHF ऑम्नीडायरेक्शनल रेंज (VOR) ख़राब था. लैंडिंग के वक्त इसकी मदद से ऊंचाई और दूरी कैल्क्युलेट की जाती है. पायलट ने लैंडिंग की तैयारी करते हुए मांट ब्लांक पीक से अपनी ऊंचाई कैल्क्युलेट की. और अपना एस्टिमेट कंट्रोल रूम को बताया.

कंट्रोल रूम ने रडार की मदद से पायलट को उसकी पोजिशन बताई. ताकि वो अपना एस्टिमेट सही कर, फ़्लाइट की पोजिशन चेंज कर सके.यहां पायलट से एक गलती हुई. उसे लगा उसने माउंट ब्लांक की चोटियों को पार कर लिया है. साथ ही उसने विमान की ऊंचाई समझने में गलती कर दी. उसे लगा विमान की ऊंचाई इतनी है कि नीचे उतरते हए फ़्लाइट आराम से पहाड़ को क्लियर कर जाएगी. इसके बाद एक ऑफिसियल नरेटिव बना. इसके अनुसार फ़्लाइट 101 पायलट की गलती से क्रैश हुई थी. लेकिन इस निष्कर्ष पर सबको भरोसा नहीं हुआ.

सरकारी थियरी में छेद

सबसे बड़ा सवाल क्रैश के चंद मिनट पहले के कम्यूनिकेशन को लेकर उठा. जिसमें पायलट ने कंट्रोल टावर को बताया कि सब कुछ ठीक है. और एयर क्राफ़्ट 19 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर है. यानी माउंट ब्लांक की सबसे ऊंची पीक से 3000 फ़ीट ऊपर. इसके सिर्फ़ दो मिनट बाद प्लेन पहाड़ी से कैसे टकराया. ये सवाल सबके मन में था.

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प्लेन क्रैश साइट से मिला डिप्लोमेटिक केबल का बैग (तस्वीर: AFP)

फ़िलीपे रेयाल तब फ़्रांस के पब्लिक ब्रॉडकास्टर ORTF के एडिटर हुआ करते थे. सबसे पहले उन्होंने ही प्लेन क्रैश की ऑफिसियल थियरी पर सवाल खड़े किए. उन्होंने क्रैश साइट पर अपना खुद का कैमरा क्रू भेजा. ये क्रू पहुंचा मांट ब्लांक के इटली वाले हिस्से की तरफ़. 1843 नाम की मैगज़ीन में छपी रिपोर्ट के अनुसार रेयाल की टीम को दो सबूत मिले. पहला प्लेन का एक टुकड़ा जिसमें 1 जून 1960 लिखा था. जबकि एयर इंडिया 101 एक बोईंग 707 विमान था. और 1961 में ही उसकी शुरुआत हुई थी.

दूसरा सबूत था, विमान के मुख्य हिस्से का एक पीले रंग का टुकड़ा. एक्सपर्ट्स के अनुसार ये हिस्सा भारतीय विमान का नहीं था. जल्द ही ORTF ने अपनी एक और टीम मांट ब्लांक पर भेजी. ताकि प्लेन के ब्लैक बॉक्स को खोजा का सके. इससे पहले कि कुछ मिलता. फ़्रांस के एक मंत्री ने OTRF के हेड को फ़ोन किया. और अपनी टीम को वापिस बुलाने को कह दिया.

इससे पहले कि टीम वापस आती, रेयाल की इन्वेस्टिगेशन टीम के एक मेम्बर ने अपनी एक थियरी पब्लिक कर दी. जिसके अनुसार एयर इंडिया का विमान एक दूसरे विमान से टकराया था. ये टीम अपने साथ प्लेन का जो मलबा साथ लाई थी. उसे भी फ़्रेंच अधिकारियों ने अपने कब्जे में ले लिया.जैसे ही ये बात पब्लिक हुई कि फ़्रेंच सरकार मामले को दबा रही है. एक के बाद एक कांस्पीरेसी थियरीज़ बननी शुरू हो गई. चूंकि विमान दुर्घटना में मरने वालों में एक नाम भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम के जनक डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा का भी था. इसलिए कांस्पीरेसी थियरीज़ को और बल मिला.

ग्लोबल वॉर्मिंग से मिली मदद

ये थियरीज़ यहीं ख़त्म हो जाती. अगर इस मामले में एक शख़्स ने खास रुचि ना ली होती. इस शख़्स का नाम था ज्यां-डेनियल रौश. रौश एक फ़्रेंच बिज़नेसमैन और पूर्व स्पोर्ट्सपर्सन थे. जिनकी हवाई हादसों में खास दिलचस्पी थी. उन्होंने एयर इंडिया विमान के हादसे के बारे में एक किताब पढ़ी. और तब से उन्हें इसकी तहक़ीक़ात का जुनून लग गया. रौश को मदद मिली एक अनजाने दुश्मन से. ग्लोबल वॉर्मिंग. वो कैसे, ये समझने में हमें मदद मिली, द प्रिंट की एक रिपोर्ट से. जिसके अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग ने इस प्लेन हादसे की गुत्थियां सुलझाने में अहम रोल निभाया.

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प्लेन के मलबे के साथ ज्यां-डेनियल रौश (तस्वीर: गेटी)

ध्यान दिजीए, प्लेन हादसा जहां हुआ था, वो एक ग्लेशियर था. इस ग्लेशियर का नाम है बॉसां ग्लेशियर. वक्त के साथ एक ग्लेशियर निश्चित गति से खिसकते रहते हैं. साधारण तौर पर एक साल में लगभग एक मीटर. लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते बॉसां ग्लेशियर काफ़ी तेज गति से पिघला. और ग्लेशियर के ऊपर की बर्फ़ जल्द ही नीचे पहुंच गई. साथ ही पहुंचा विमान का मलबा. ग्लेशियर का निचला सिरा फ़्रांस के शामनी इलाक़े से सिर्फ़ 4 किलोमीटर की दूरी पर है. इसलिए विमान के मलबे की तहक़ीकात के लिए ये एक अच्छी जगह साबित हुई.

रौश ने इस इलाक़े के दर्जनों दौरे किए. यहां उन्हें विमान के मलबे के कई हिस्से मिले. मसलन सीट बेल्ट, कॉकपिट के हिस्से, एक फ़्लेयर पिस्टल और एक कैमरा. साल 2018 में उन्हें फ़्लाइट 101 का जेट इंजन भी मिल गया. जिसे उन्होंने एक हेलिकॉप्टर से लिफ़्ट करवाया. इन सब टुकड़ों से उन्हें जो सबूत मिले, उससे प्लेन हादसे को लेकर रौश ने अपनी थियरी बनाई.सबसे पहले तो रौश ने अधिकारियों पर इल्ज़ाम लगाया. उनके अनुसार फ़्रेंच अधिकारियों ने उनकी खोज को रोकने या रुकवाने की कई बार कोशिश की.डॉक्टर

डॉक्टर भाभा के प्लेन से दूसरा प्लेन टकराया था?

रौश की थियरी भी कई बार बदली. शुरुआत में उन्होंने कहा कि एक मिसाइल से प्लेन को गिराया गया था. लेकिन बाद में उन्होंने थियरी दी कि एयर इंडिया का प्लेन एक दूसरे प्लेन से टकराया था. रौश ने दूसरे प्लेन का नाम भी बताया. F-104G स्टारफ़ाइटर फ़ाइटर जेट. रौश के अनुसार 1960 के दशक में इटली की सरकार फ़्रेंच मिलिट्री की जासूसी करने के लिए स्टार फ़ाइटर का उपयोग करती थी.

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F-104G स्टारफ़ाइटर फ़ाइटर जेट (सांकेतिक तस्वीर: NASA)

इतालवी पायलट फ़्रेंच अधिकारियों के डिटेक्शन से बचने के लिए अपना ट्रांसपोंडर हटा दिया करते थे. लेकिन ट्रांसपोंडर हटा देने से वो दूसरे एयरक्राफ़्ट्स से भी सम्पर्क नहीं कर पाते थे. और इसी के चलते उस दिन स्टारफ़ाइटर की एयर इंडिया फ़्लाइट 101 से भिड़ंत हो गई थी. रौश के अनुसार सैन्य मसला होने के चलते इस मामले को वहीं दबा दिया गया था. इसलिए पूरी बात कभी सामने ही नहीं आ पाई.

रौश और उनके जैसे कई लोगों के लिए इस गुत्थी का एक महत्वपूर्ण सुराग छुपा है ब्रिटनी में. फ़्रांस का एक शहर, जहां ‘ज्यां नोल बेनेट’ ने क्रैश साइट्स का एक मेमोरियल बनाया है. नोल बेनेट फ़्रेंच एयर एमब्युलेंस सर्विस में हेलिकॉप्टर पायलट हुआ करते थे. ब्रिटनी के मेमोरियल भवन में विभिन्न क्रैश साइट्स का मलबा रखा हुआ है. इस मेमोरियल में एयर इंडिया के क्रैश से जुड़ी एक खास चीज़ है. एक बेंट पैनल. 25 बाई 12 सेंटीमीटर का. इस पर लिखा है USAF यानी यूनाइटेड स्टेट्स एयर फ़ोर्स. रौश और उनकी तरह और लोगों के लिए ये एक पक्का सबूत है कि एयर इंडिया फ़्लाइट 101 अमेरिकन मेड, F-104G स्टारफ़ाइटर से टकराया था.

कन्वर्शेसन विद द क्रो

इसी पैनल के चलते इस थियरी में CIA का नाम भी जोड़ा जाता है. 2008 में रिलीज़ हुई एक किताब से भी CIA वाली थियरी को बल मिला. किताब का नाम था‘कन्वर्शेसन विद द क्रो’. किताब में CIA ऑफ़िसर रॉबर्ट क्राउली और पत्रकार ग्रेगरी डग्लस के बीच बातचीत का ब्योरा दिया गया है.

किताब में एक जगह क्राउली ग्रेगरी से कहता है,

‘तुम्हें पता है, 60’s में जब भारत ने एटॉमिक बॉम्ब पर काम करना शुरू किया. हम मुसीबत में पड़ गए थे. क्योंकि वो रशियन्स के साथ थे.’

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रॉबर्ट क्राउली और पत्रकार ग्रेगरी डग्लस के बीच शास्त्री जी और डॉक्टर भाभा की मौत को लेकर बातचीत का ब्योरा किताब में दिया गया है (तस्वीर: Amazon एंड AFP)

आगे बोलते हुए उसने प्लेन हादसे के बारे में कहा,

‘यक़ीन करो, वो बहुत ख़तरनाक था. भाभा न्यूक्लियर मामले में विएना जा रहे थे. और इससे और बड़ी दिक़्क़तें खड़ी हो सकती थीं. तभी उनके प्लेन के कार्गों में एक बम विस्फोट हुआ और प्लेन क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई’

कांस्पीरेसी थियरीज़ से इतर लोगों को मांट ब्लांक में विमान हादसे से जुड़ी कई चीजें मिलती रही हैं. 2008 में इस जगह हिंदुस्तान टाइम्स वीकली अख़बार की एक कॉपी मिली थी. 2013 में एक व्यक्ति को यहां पर एक ज्वेलरी का केस मिला. जिसकी क़ीमत 2 लाख 70 हज़ार डॉलर आंकी गई. साल 2020 में अखबार नेशनल हेराल्ड का एक पन्ना भी मिला. जो 20 जनवरी 1966 का था. इसमें इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने की खबर छपी थी. क्रैश साइट पर मिलने वाली सबसे खास चीज़ थी कुछ डिप्लोमेटिक केबल. माना जाता है कि डॉक्टर भाभा इन्हें अपने साथ लेकर चल रहे थे. इनमें 1966 में चीन के न्यूक्लियर प्रोग्राम, चीन और सोवियत के रिश्ते से जुड़ी जानकारी थी.

एपिलॉग

चूंकि फ़्लैट अर्थ, कोविड जैसी कोई चीज नहीं होती, इस तरफ़ की बातें मानने वाले लोगों को भी कांस्पीरेसी थियोरिस्ट की कैटेगरी में जोड़ दिया जाता है. इसलिए कांस्पीरेसी थियरीज़ के साथ एक नेगेटिव कोनोटेशन जुड़ गया है. लेकिन डॉक्टर भाभा की मृत्यु से जुड़ा विमान हादसा हो, या शास्त्री जी की मौत. इसमें सुई अटकती है सरकार की तरफ.

चूंकि ये मामले अंतरराष्ट्रीय रूप से सेंसेटिव है इसलिए सरकार इनमें कोई भी स्टैंड लेने से बचती रहती है. कुछ भी खुलकर सामने नहीं आ पाता, और लोगों को लगता लॉकर में छुपा कर रखी चीज़ है तो ज़रूर क़ीमती होगी. और इस तरह नित नई थियरीज़ का जन्म होता रहता है.

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